पाश्चराइजेशन: परिभाषा और महत्व | Read this article in Hindi to learn about:- 1. पास्तुरीकरण की परिभाषा (Definition of Pasteurization) 2. भारत में दुग्ध पास्तुरीकरण का महत्व (Importance of Milk Pasteurization in India) 3. तापमान व समय का सम्बन्ध (Temperature and Time Relationship) 4. विधियां (Methods).

पास्तुरीकरण की परिभाषा (Definition of Pasteurization):

”दूध के प्रत्येक कण को क निश्चित तापमान पर निश्चित समय के लिए गर्म करना जिससे उसमें उपस्थित सभी हानिकारक जीवाणु (Pathogenic Organism) नष्ट हो जाए तथा दूध की खाद्य महत्ता तथा संगठन पर कोई विशेष विपरीत प्रभाव न पड़े । पास्तुरीकरण के तुरन्त बाद दूध को भंडारण करने के लिए 4C तापमान पर ठण्डा किया जाता है ।”

दूसरे शब्दों में अधिक स्पष्ट तौर पर हम यह भी कह सकते है कि ”दूध के प्रत्येक कण को कम से कम 145F तापमान पर 30 मिनट के लिए या 161F तापमान पर 15 सैकिंड के समय के लिए गर्म करना तथा तुरन्त ही 4-5C तापमान पर ठण्डा कर देने की प्रक्रिया को पास्तुरीकरण कहते है ।”

भारत में दुग्ध पास्तुरीकरण का महत्व (Importance of Milk Pasteurization in India):

1. शहरों में वितरित होने वाला दूध छोटे-छोटे कृषक दुग्ध उत्पादकों से आता है जो दूध उत्पादन के सिद्धान्तों से भली भाँति परिचित नहीं है अतः यह ठीक से नहीं, कहा जा सकता कि कच्चे दूध में कौन-कौन तथा कितने-कितने सूक्षम जीवाणु उपस्थित है । अतः दूध को उपभोग से पहले पास्तुरीकृत करना नितान्त आवश्यक है ।

ADVERTISEMENTS:

देश में दूध को सामान्यतया उबाल कर पीने की प्रथा है अतः व्यवसायिक तौर पर दूध के पास्तुरीक्रण का महत्व उपभोग की दृष्टि से कम हो जाता है क्योंकि उपभोक्ता तो उसे उबाल कर ही प्रयोग करेगा । परन्तु दूध के भंडारण की दृष्टि से पास्तुरीकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि पास्तुरीकरण की क्रिया के बाद दूध को संचित रखने की शक्ति बढ जाती है ।

2. यदि दूध को मानकीकृत (Standardized) करके बेचना है तो पास्तुरीकरण अति आवश्यक होता है । क्योंकि यदि मानकीकरण के किसी भी स्तर पर यदि भूल वश दूध में कोई संक्रमण (Contamination) हो गया है तो पास्तुरीकरण की क्रिया में दूध को खराब करने वाले तथा व्याधिजनक जीवाणु समाप्त हो जाते हैं ।

अतः दूध की संचयन क्षमता (Keeping Quality) तथा उपभोग के प्रति सुरक्षा (Safeness for Consumption) बढ़ जाती है ।

दूध के पास्तुरीकरण में तापमान व समय का सम्बन्ध (Temperature and Time Relationship for Pasteurization of Milk):

दूध उसमें उपस्थित जीवाणुओं द्वारा खराब किया जाता है । जीवाणु को यदि दूध में से समाप्त कर दिया जाए तो दूध खराब नहीं होगा । जीवाणु दूध को गर्म करने पर समाप्त होने लगते हैं तथा जीवाणु के समाप्त होने का समय दूध के तापमान से प्रभावित होता है ।

ADVERTISEMENTS:

जैसे-जैसे तापमान बढता है जीवाणुओं के समाप्त होने का समय कम होता जाता है अर्थात् पास्तुरीकरण में धारणकाल (Holding Period) उतना ही कम हो जाता है । टी. बी. के जीवाणु किसी निश्चित तापमान पर सबसे देर में समाप्त होते है । अतः यदि दूध में उपस्थित T.B. जीवाणुओं को नष्ट कर दिया जाए तो दूध में कोई व्याधिजनक जीवाणु शेष नहीं बचता अर्थात इस जीवाणुओं की ताप के प्रति सहनशीलता दूसरे व्याधिजनक जीवाणुओं की अपेक्षा अधिक होती है ।

कोई भी व्याधिजनक जीवाणु बीजाणु (Spore) नहीं बनाता है अतः इन सभी जीवाणुओं को समाप्त करना अपेक्षाकृन आसान है । पास्तुरीकरण के समय दूध के कुछ एन्जाईम भी नष्ट हो जाते है । थोडा सा प्रभाव Cream Line पर भी पडता है । अतः पास्तुरीकरण के लिए तापमान व समय के मानक निश्चित करते समय इन बातों को ध्यान में रखना अत्यावश्यक होता है ।

कच्चे दूध में फोस्फेटेज इन्वाईम पाया जाता है जो दूध को पास्तुरीकरण तापमान तक गर्म करने पर. नष्ट हो जाता है तथा इसका पुनर्जनन या पुन. क्रियाशीलन (Reactivation) नहीं होता है । अतः दूध के पूर्ण पास्तुरीकरण की परीक्षा के लिए पास्तुरीकृत दूध में फोस्केटेज एन्जाईम की उपस्थिति का परीक्षण किया जाता है । पूर्ण पास्तुरीकृत दूध का फोसफेटेज परीक्षण (Phosphatase Test) ऋणात्मक (Negative) आता है ।

अर्थात पास्तुंरीकृत दूध में यह एन्जाईम अनुपस्थित होता है परन्तु यदि पास्तुरीकृत दूध में कच्चा दूध का संक्रमण हो गया है या पास्तुरीकरण के समय दूध को ठीक प्रकार से उचित ताप पर पर्याप्त समय के लिए गर्म नहीं किया है तो फोसफेटेज एन्जाईम निश्चित रूप से उपस्थित होता है अर्थात् Phosphatase Test Positive आता है ।

ADVERTISEMENTS:

पास्तुरीकरण के लिए 30 मिनट का समय रखने पर पास्तुरीकरण ताप की आवश्यकता को 143F या 61.7C से बढा कर सन् 1956 में 145F या 62.8C कर दिया गया है । क्योंकि 143F ताप पर मिनट का समय दूध में पाये जाने वाले एक व्याधिजनक (Coxiella Burnetii) को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं था ।

यह एक Rickettsial Organism होता है । तथा मनुष्यों में ”Q” Fever नामक बीमारी उत्पन्न करता है । इस बीमारी का प्रकोप बम्बई में 1956 में बहुत भयंकर रूप से हुआ था तथा पता चला था कि यह बीमारी पास्तुरीकृत दूध के प्रयोग से उत्पन्न होती थी अतः उपर्युक्त तापमान में वृद्धि की गई ।

वर्तमान में किये जा रहे अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि यदि दूध को’ 190F तापमान पर एक सैकिंड या इससे भी कम समय के लिए गर्म किया जाए तो सन्तोषजनक पास्तुरीकरण हो जाता है । जबकि कुछ Regulatory Agencies दूध को 192F ताप पर कम से कम 3 सैकिंड के समय तक गर्म करने की सन्तोषजनक पास्तुरीकरण बताती है ।

दूध के पास्तुरीकरण की विधियां (Methods for Pasteurization of Milk):

दूध के पास्तुरीकरण की तीन विधियाँ हैं:

1. धारण विधि या बैच विधि (Holding/Batch Method)

2. सतत प्रवाह विधि (Continuous Flow Method)

3. अति उच्च ताप विधि (Ultra-High-Temperature Method)

1. धारण विधि या बैच विधि (Holding or Batch Method):

इस विधि को कम ताप अधिक समय (Low Temperature Long Time Method L.T.L.T.) भी कहा जाता है । इस विधि में दूध की कम ताप पर अधिक समय के लिए गर्म किया जाता है । इस विधि में दूध को पास्तुरीकृत करने के लिए उसे 145F या 62.8C तापमान पर 30 मिनट के लिए गर्म रखते हैं ।

दूध का तापन (Heating), धारण (Holding) तथा शीतलन (Cooling) एक ही कुन्द (Vat) में किया जाता है । जो अवकारी इस्पात (Stainless Steel) के बने होते हैं । इनकी बनावट तथा धारिता (Capacity) अलग-अलग होती है । सभी कुन्डों में प्रक्षोभक (Agitator) तथा तापमापक (Thermometer) लगे रहते है ।

बनावट के आधार पर ये कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं:

i. पानी भर कर प्रयोग होने वाले कुण्ड (Flooded Type Vat):

यह दोहरी दीवार वाला कुण्ड (Jacketed Vat) ऊपर से जुड़ा हुआ एक के अन्दर एक कुन्ड होता है । दो कुण्डों की दीवारों के मध्य रिक्त स्थान में दूध को गर्म या ठण्डा करने हेतु क्रमश गर्म या ठण्डा पानी भरा जाता है ।

अन्दर वाले कुण्ड में दूध भरा जाता है जहाँ पर दूध के प्रत्येक कण को, तापमान के समान स्तर तक गर्म करने के लिए दूध को हिलाने हेतु एक प्रक्षोभक (Agitator) लगा होता है । दूध का तापमान नोट करने के लिए एक तापमापक (Thermometer) लगा होता है । ये कुण्ड दूध की थोडी मात्रा को पास्तुरीकृत करने लिए प्रयोग किये जाते हैं ।

ii. फुहार कुण्ड (Spray Vats):

ये कुण्ड भी अवकारी इस्पात (Stainless Steel) के बने होते है । दोहरी दीवार वाले (Jacketed) कुण्डों की दिवारों के मध्य खाली स्थान में गर्म पानी भरने के स्थान पर अन्दर वाले कुण्ड की दीवार की बाहरी सतह पर गर्म या ठण्डे पानी का छिडकाव (Spray) किया जाता है ।

पानी दीवार से लग कर बहता हुआ पैंदे में गिरता है जिसे पुन भाप द्वारा गर्म करके या ब्राईन विलयन द्वारा ठण्डा करके छिडकाव के कार्य में लिया जाता है । इस प्रकार दूध को गर्म या ठण्डा करने के लिए पानी का छिडकाव या बहाव लगातार चलता रहता है । इनमें दूध को हिलाने के लिए प्रक्षोभक (Agitator) तथा तापमान पाठयांक लेने के लिए तापमापी (Thermometer) लगे होते हैं ।

iii. कुण्डलीयुक्त कुण्ड (Coil Type Vats):

अवकारी इस्पात के बने इन कुण्डों के अन्दर 1-5 से 3.0 इंच व्यास के खोखले पाईप लगे होते हैं जिनमें से दूध को गर्म या ठण्डा करने हेतु क्रमश गर्म या ठण्डा पानी प्रवाहित किया जाता है । कुण्ड में दूध का स्तरइतना रखा जाता है कि ये पाइप दूध में डूबे रहें ।

कार्य के समय ये कुण्डल (Coils) हिलने लगते है अत दूध के कणो के गतिमान रहने के कारण उसका प्रत्येक कण का तापमान समान रूप से बढता है । कुण्ड में ये पाईप क्षैतिज (Horizonatal) या खडे (Vertical) लगे होते हैं ।

कुण्डलों की स्थिति के अनुसार ये कुण्ड दो प्रकार को होते है:

1. क्षैतिज कुण्डलाकार कुण्ड (Horizontal Coil Vats)

2. खडे कुण्डलाकार कुण्ड (Vertical Coil Vats)

कुण्डलों युक्त कुण्डों में सकेती तथा अभीलेखी (Indicating and Recording Thermometer) तापमापी तथा प्रक्षौभक (Agitator) लगे होते है । दूध को गर्म करने के बाद इन्ही कुण्डों में ही ठण्डा भी किया जा सकता है । ठण्डा करने के लिए तलशीतक (Surface Coolers) का प्रयोग किया जा सकता है ।

धारण विधि में पास्तुरीकरण की विधियाँ (Methods of Pasteurization in Holding/Batch Method):

धारण विधि द्वारा दूध को पास्तुरीकृत करने की तीन विधियां हैं:

1. बैच पास्तुरीकरण (Batch Pasteurization):

कम मात्रा में दूध का पास्तुरीकरण करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है । इस विधि में प्रयुक्त होने वाले कुण्डों की धारिता दूध की मात्रा के अनुसार निश्चित की जाती है । कुण्डों (Vats) में दूध भरकर कुण्ड में ही उसे 62.8C या 145F तापमान तक गर्म किया जाता है । इस ताप पर स्थिर करके दूध को 30 मिनट तक रखते हैं ।

धारण समय के बाद इन कुण्डों की Jacket में गर्म पानी के स्थान पर अवशीतित पानी भर कर कुण्ड में उपस्थित दूध को 4-5C तापमान तक ठण्डा किया जाता है । दूध के प्रत्येक कण को समानरूप से गर्म करने के लिए दूध को हिलाना आवश्यक होता है अतः कुण्ड में एक प्रक्षोभक (Agitator) लगा होता है ।

जो कार्य के समय चलाया जाता है तथा दूध को हिलाकर उसके तापमान को समान रखता है । दूध का तापमान का मापन करने के लिए कुण्ड पर लगे तापमापी का प्रयोग किया जाता है । इस विधि में उपरोक्त वर्णित तीन प्रकार के कुण्डों (Vats) में से कोई भी प्रयोग किया जा सकता है ।

2. बहुकक्षीय विधि (Multiple Compartment Method):

इस विधि का प्रयोग कुछ अधिक मात्रा में दुग्ध व्यवसाय को चलाने वाले व्यापारियों द्वारा किया जाता है । इस विधि का प्रयोग करके बैच विधि की तुलना में समान समय में अधिक मात्रा में दूध का पास्तुरीकरण किया जा सकता है । इसमें एक बार में सामान्यतया तीन कुण्डों का प्रयोग किया जाता है ।

प्रथम कुण्ड में दूध को 145F ताप तक गर्म करके दूसरे कुड में 30 मिनट तक 145F ताप स्थिर करके रखा जाता है । समय पूरा होने पर गर्म दूध को तीसरे कुण्ड में ठण्डा होने के लिए स्थानान्त्रित किया जाता है । जहाँ पर Jacketed Vat में शीतल जल द्वारा इसे 4-5C ताप तक ठण्डा किया जाता है ।

इस विधि में कार्य लगातार चलता रहता है । दूध को एक से दूसरे कुण्ड में भेजने के लिए पम्पों का प्रयोग करते हैं । इस विधि को सततः धीमी विधि (Continuous Slow Method) भी कहा जाता है ।

इस विधि में प्रयोग होने वाले तीनों कुण्डों (Vats/Compartments) की धारिता (Capacity) समान होनी चाहिए तथा प्रथम कक्ष में दूध को 30 मिनट में 145F ताप तक गर्म किया जाता है तथा दूसरा कुण्ड 30 मिनट के धारण काल के बाद ही खाली होना होता है ।

अतः दूध को ठण्डा करने में भी 30 मिनट का ही समय लगना चाहिए । इस विधि में कार्य प्रारम्भ करने के 1 घण्टे बाद पास्तुरीकृत दूध प्राप्त होता है तथा इसके बाद प्रत्येक 30 मिनट बाद पास्तुरीकृत दूध का एक बैच प्राप्त होता रहता है ।

3. बोतल पास्तुरीकरण (Bottle Pasteurization):

इस विधि द्वारा पास्तुरीकरण करने के लिए दूध को बोतलों में भर कर पास्तुरीकृत किया जाता है । इस प्रकार पास्तुरीकृत दूध खुले वायुमण्डल के सम्पर्क में नहीं आता है अतः वह दूषित भी नहीं होता है । बोतल पास्तुरीकरण में व्यय तथा समय अधिक लगने के कारण इस विधि का प्रयोग काफी कम किया जाता है ।

बोतल पास्तुरीकरण की प्रमुखतः दो विधियाँ है:

A. बोतलों को वाशिंग मशीन से धोने के बाद 79C तापमान पर गर्म की हुई बोतलों में गर्म दूध भरा जाता है बोतलों को अच्छी प्रकार सील करके 63 से 65C के गर्म पानी के कक्ष (Cabin) में रखा जाता है ताकि बोतलों के अन्दर दूध का तापमान 62.8C तक हो जाए । धारण समय पूरा होने पर अर्थात् 30 मिनट बाद इन बोतलों को ठण्डे पानी का प्रयोग करके धीरे-धीरे ठण्डा किया जाता है ।

B. अच्छी प्रकार से साफ की हुई गर्म बोतलों में 63C तापमान का गर्म दूध भर कर, बोतलों को ठीक से बन्द करके उष्ण वायु कक्ष (Hot Air Chamber) में जिसका तापमान 64C हो, 30 मिनट के लिए रखा जाता है । 30 मिनट का धारण काल पूरा होने पर ठण्डे पानी या हवा से धीरे-धीरे 5C तापमान तक बोतलों की ठण्डा किया जाता है ।

धारण विधि के लाभ (Advantages of Holding Method):

1. छोटे पैमाने पर कार्य करने के लिए यह उत्तम विधि है ।

2. यह किण्वित दुग्ध पदार्थ बनाने के लिए उत्तम विधि है क्योंकि इस विधि में जिस बर्तन में दूध को गर्म किया जाता है उसी बर्तन में उसे ठण्डा भी करना होता है ।

3. थोडी-थोडी मात्रा में दूध को पास्तुरीकृत करके कई तरह के दुग्ध पदार्थ बनाये जा सकते है ।

4. बोतल विधि अपनाने पर दूध का दूषित होने का भय नहीं रहता है ।

5. क्रीम लेयर की हानि कम होती है अतः ग्राहकों द्वारा अधिक पसन्द किया जाता है ।

6. बोतल विधि से पास्तुरीकृत करने से दुध की आयु काफी अधिक बढ जाती है ।

धारण विधि की परिसीमाएं (Limitation of Holding Method):

1. इस विधि में अधिक समय लगता ।

2. पुनजर्नन प्रक्रिया (Regeneration Process) का लाभ नहीं मिल पाता है ।

3. इस विधि में पूरा नियन्त्रण मानव द्वारा होता है । अतः अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पडती है फलस्वरूप मानव श्रम अधिक लगने के कारण व्यय अधिक आता है ।

4. अपेक्षाकृत अधिक उर्जा का उपयोग होता है ।

5. बोतल विधि में बोतल के अन्दर दूध का तापमान ज्ञात करना मुश्किल होता है ।

6. काँच की बोतलों में दूध को ठण्डा करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक पानी की आवश्यकता पडती है क्योंकि कांच की बोतलों में ताप का संचार आसानी से नहीं होता है ।

7. बोतलों के लिए क्रेट्‌स का प्रयोग करना होता है । अतः परिवहन का खर्च बढ जाता है ।

उच्चताप अल्पकालीन पास्तुरीकरण (High Temperature Short Time Pasteurization):

यह एक सतत विधि (Continuous Method) है । इस विधि का प्रथमतः प्रयोग इग्लैंड में सन् 1923 ई. में किया गया था । इस विधि में प्रयोग होने वाले यन्त्र में कच्चा दूध एक तरफ से प्रवेश करता है तथा 71.8C ताप पर 15 सैकिंड के लिए पास्तुरीकृत होकर दूसरी तरफ से बाहर आना प्रारम्भ हो जाता है ।

अतः इस विधि में कार्य शुरू करने के 15 सैकिंड बाद पास्तुरीकृत दूध प्राप्त होना शुरू हो जाता है तथा कार्य चलने तक लगातार पास्तुरीकृत दूध प्राप्त होता रहता है । इस विधि में धारण विधि की भाँति पास्तुरीकृत दूध प्राप्त करने के लिए घण्टों प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है ।

इस विधि का प्रयोग बडे पैमाने पर दूध को पास्तुरीकृत करने के लिए ही किया जा सकता है । छोटे पैमाने पर दूध के पास्तुरीकरण के लिए यह विधि उपयुक्त नहीं है । इस विधि में तमाम कार्य स्वचालित मशीनों द्वारा ही पूरा किया जाता है । अतः मानव श्रम (Man Power/Labour) की आवश्यकता कम पडती है ।

कुछ वर्षों पहले इस विधि में तापमान, समय तथा दूध के प्रवाह को नियंत्रित करने के यान्त्रिक साधन उपलब्ध नहीं थे अतः पहले इस विधि को फ्लैश (Flash) विधि के नाम से जाना जाता था । वर्तमान में मशीनों की गुणवत्ता अच्छी हो जाने से स्व-नियंत्रण यान्त्रिक तथा स्वचालित हो गया है और अब इस विधि को H.T.S.T. (High Temperature Short Time), उच्च ताप अल्प कालीन (पास्तुरीकरण) के नाम से जाना जाता है ।

पास्तुरीकरण यन्त्र के भाग (Parts of H.T.S.T. Pasteurizer):

इस यन्त्र के 7 प्रमुख भाग होते है:

1. फ्लोट वाल्व सहित सन्तुलन टैंक (Balance Tank with Float Valve)

2. पुनर्जनन कक्ष (Regeneration Section)

3. टाईमिंग पम्प (Timing Pump)

4. उष्मन कक्ष (Heating Chamber)

5. धारण कक्ष (Holding)

6. प्रवाह पथान्तरी वाल्व (Flow Diversion Valve)

7. शीतलन कक्ष (Cooling Chamber)

उपरोक्त भागों के अतिरिक्त कुछ सहायक या आवश्यकतानुसार प्रयोग किये जाने वाले भाग भी होते है ।

इनमें निम्नलिखित प्रमुख भाग हैं:

1. सन्तुलन टैंक एवं पुनर्जनन कक्ष के मध्य अपकेन्द्री (Centrifugal Pump between Balance Tank and Regenerator)

2. पुनर्जनन कक्ष एवं उष्मक के मध्य फिल्टर या कलारीफर का प्रयोग (Filter/Clarifier between Regenerator and Heater)

3. पुनर्जनन कक्ष व उष्मक के मध्य समांगीकरण यन्त्र (Homogenizer between Regenerator and Heater)

पास्तुरीकरण यन्त्र में दूध का प्रवाह (Flow of Milk in Pasteurizer):

सर्व प्रथम कच्चा दूध अपकेन्द्री पम्प (Centrifugal Pump) द्वारा सन्तुलन टैंक (Balance Tank) से यन्त्र के पुनर्जनन कक्ष (Regeneration Section) में जाता है । दूध के प्रवाह को समान रखने हेतु प्रवाह नियन्त्रण वाल्व (Flow Control Valve) तथा टैंक की सतह को समान करने के लिए Float Valve प्रयोग होता है ।

पुनर्जनन कक्ष से दूध छन कर स्वच्छ होता हुआ समांगीकारक (Homogenizer, यदि प्रयोग किया है) में जाकर समागीकृत होता है । समांगीकृत दूध/पुनर्जनन कक्ष का गर्म दूध Timing पम्प द्वारा उष्मन कक्ष (Heating Section) में जाता है तथा पर्याप्त तापमान तक गर्म होकर धारण कक्ष (Holding Section) से होता हुआ प्रवाह पथान्तरी वाल्व (Flow Diversion Value) में जाता है जहाँ से पास्तुरीकृत दूध पुन पुनर्जनन से होता हुआ शीतलक (Cooler) से ठण्डा होकर भंडारण टैंक (Storage Tank) या पैकिंग यन्त्र (Packaging Machine) में जाता है ।

यदि दूध पूर्णरूप से पास्तुरीकृत नहीं हुआ है तो प्रवाह पथान्तरी वाल्व (F.D.V.) से दूध सीधा सन्तुलन टैंक (Balance Tank) में दोबारा पास्तुरीकरण के लिए चला जाता है ।

उच्चताप अल्पकालीन पास्तुरीकरण यन्त्र के प्रमुख भागों में दुग्ध पास्तुरीकरण कार्य-इस यन्त्र के विभिन्न भागों के कार्य निम्नलिखित प्रकार से है:

1. फ्लोट नियन्त्रित सन्तुलन टैंक (Float Controlled Balance Tank):

यह, यन्त्र में कच्चे दूध की आप्रर्ति को नियन्त्रित करता है तथा F.D.V. से वापिस आये अपास्तुरीकृत दूध को प्राप्त करता है ।

2. पम्प (Pump):

दूध के बहाव को नियन्त्रित करने के लिए पम्प का प्रयोग करते हैं । Regenerator तथा Heater के मध्य Rotary Positive Pump या Balance Tank के एक दम बाद Centrifugal Pump का प्रयोग किया जाता है ।

3. प्लेटस (Plates):

सामान्य रूप से H.T.S.T. प्रणाली में Plate Heat Exchanger का प्रयोग किया जाता है । ये अवकारी इस्पात (Stainless Steel) की बनी होती है । रचना की दृष्टि से Cooler, Regenerator तथा Heater में प्रयोग होने वाली Plates प्रकार की ही होती है ।

ये प्रत्येक इकाई में Press द्वारा कसी रहती हैं । दो प्लेटों के बीच लगभग 3 मी.मी. का खाली स्थान रखा जाता है । इस खाली स्थान में एकान्तर प्लेटों (Alternate Plates) के मध्य दूध बहता है तथा शेष एकान्तर प्लेटों के बीच खाली स्थान में गर्म या ठण्डा (आवश्यकतानुसार) पानी विपरीत (Opposite) दिशा में प्रवाहित होता है ।

Regenerator की Alternate Plates में पास्तुरीकृत तथा कच्चा दूध एक-दूसरे के विपरीत दिशा में बहता है । जहां पास्तुरीकृत दूध से प्लेट गर्म होकर उसके दूसरी तरफ बहने वाले कच्चे दूध को गर्म करती है । इसी प्रकार पास्तुरीकृत दूध ठण्डा होता रहता है ।

दूध की मात्रानुसार प्लेटों की संख्या कम या अधिक रखी जा सकती है प्लेटों के ऊपरी व निचले सिरे पर उचित छिद्र होते है जिनके माध्यम से दूध एवं गर्म या ठण्डा पानी एकान्तर प्लेटों में बिना एक दूसरे में मिले बहता रहता है ।

4. पुनर्जनन (गर्म करना) (Regeneration-Heating):

सन्तुलन टैंक (Balance Tank) से यन्त्र में आया हुआ कच्चा दूध शीतक (Cooler) में जाने से पूर्व पुनर्जनन भाग में पास्तुरीकृत दूध से गर्म होता है । इस विधि को दूध से दूध पुनर्जनन (Milk to Milk Regeneration) कहा जाता है । इससे कार्य में ऊर्जा व समय की बचत होती है । आगे इस कच्चे दूध को गर्म करने में कम ऊर्जा की आवश्यकता पडती है । इस भाग में 40F ताप युक्त कच्चा दूध 120F तापमान तक गर्म हो जाता है ।

5. छन्ना (Filter/Clarifier):

पुनर्जनन भाग के बाद 40 से 90 Mesh Cloth का एक फिल्टर दूध को छानने के लिए लगाया जाता है । सामान्य रूप से दो छन्ने लगाने जाते हैं । परन्तु एक समय में केवल एक ही छनना कार्य करता है ।

6. उष्मक (Heater):

छन्ना से छना हुआ दूध सीधा या समांगीकारक (Homogenizer) से होता हुआ उष्मक (Heater) में आ जाता है । यहाँ पर लगी प्लेटस में दूध को गर्म पानी की सहायता से 72C ताप तक गर्म किया जाता है । इस गर्म दूध को 15 सैकिंड तक इस ही तापमान तक धारण किया जाता है यह ध्यान रखने की बात है कि इन 15 सैकिंड में Holding Tubes में दूध का तापमान 71.8C से कम न होने पाये ।

7. धारक (Holders):

तापन के तुरन्त बाद दूध धारण कुण्डल (Holding Rules) या धारण प्लेटस (Holding Plates) में से गुजरता है । इनकी क्षमता तथा दूध के प्रवाह की गति में एक सम्बन्ध होता है जिससे दूध को इनसे गुजरने में 15 सैकिड का समय लगता है तथा दूध का तापमान 15 सैकिंड तक 71.8C रहता है ।

8. प्रवाह पथान्तर वाल्व (Flow Diversion Valve):

धारण कक्ष से दूध F.D.V. में आता है । इस वाल्व से दूध Balance Tank या Regeneration Chamber तथा Cooler में से होता हुआ भंडारण टैंक (Storage Tank) या Packaging Machine में जाता है ।

दूध का तापमान यदि 71.8C से कम हो जाए तो दूध F.D.V. से Divert होकर पुनः पास्तुरीकरण होने के लिए कर F.C.B.T. (Float Controlled Balance Tank) में चला जाता है । तापमान 71.8C या अधिक होने पर दूध का प्रवाह पुनर्जनन भाग की ओर जाता है । यहाँ से ठंडा होता हुआ दूध अन्तिम शीतलन के लिए Cooler में तथा Cooler में तथा Storage Tank में या Packaging Machine में चला जाता है ।

9. पुनर्जनन (शीतलन) [Regeneration (Cooling)]:

पास्तुरीकरण गर्म दूध F.D.V. से निकलकर पुनर्जनन भाग में Milk to Milk Regeneration क्रिया द्वारा ठण्डा लिए जाता है । यहाँ पर दूध के शीतलन कार्य में ऊर्जा की बचत होती है क्योंकि गर्म दूध Cooler में जाने से पहले Regeneration Section में, Balance Tank लिए आने वाले कच्चे ठण्डे दूध से काफी निम्न तापमान तक ठण्डा हो जाता है । पुनर्जनन 70-80% तक दक्षतापूर्ण हो जाता है । इस क्रिया में गर्म दूध 142F से 82F तथा 40F का ठण्डा दूध (कच्चा) 120F तक गर्म हो जाता है ।

10. शीतलक (Cooler):

पुनर्जनन भाग से दूध ठण्डा होने के लिये Coolers में प्रवेश करता है यहाँ पर शीतलक की प्लेट्स से होता हुआ गर्म दूध पहले ठंडे जल से तथा बाद में अवशीतित जल से ठण्डा होकर भंडारण टैंक में चला जाता है ।

कम समय उच्च ताप (H.T.S.T.) विधि के लाभ:

1. अधिक मात्रा में दूध को पास्तुरीकृत करने की यह एक उत्तम विधि है ।

2. इस विधि द्वारा पास्तुरीकृत दूध की गुणवत्ता उत्तम रहती है ।

3. इस विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती है ।

4. यह एक सतत विधि है अतः एक बार कार्य प्रारम्भ होने के बाद सतत रूप से पास्तुरीकृत दूध उपलब्ध होता रहता है ।

5. चूँकि अधिक मात्रा में दूध को पास्तुरीकृत किया जाता है अतः प्रति इकाई कम खर्च आता है ।

6. स्वचालित मशीनों का प्रयोग होता है अतः मानव ऊर्जा व समय दोनों की बचत होती है ।

7. पास्तुरीक्तण के तुरन्त बाद पैकिंग का कार्य प्रारम्भ हो जाता है ।

8. यन्त्र आसानी से साफ व स्वच्छ किया जा सकता है ।

9. पास्तुकरण यन्त्र (HTST) की क्षमता केवल प्लेटों की संख्या बढाकर अपेक्षाकृत् काफी कम खर्च से बढ़ाई जा सकती है ।

10. संसाधन (Processing) में होने वाले दुग्ध ठोस की हानि को घटाता है ।

11. उष्ण प्रिय जीवाणुओं (Thermophillus Bacteria) के बढने की समस्या H.T.S.T. विधि का प्रयोग करने पर काफी स्तर तक कम हो जाती है क्योंकि उच्चताप पर दूध को काफी कम समय के लिए रखा जाता है जबकि धारण विधि (Holding Batch Method) में दूध को अधिक तापमान पर अधिक समय के लिए रखने के कारण इन जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है ।

12. पुनर्जनन का प्रयोग करने से उभा की बचत होती है ।

H.T.S.T. विधि की हानियाँ:

1. दूध की थोड़ी मात्रा होने पर पास्तुरीकरण के लिए यह विधि उपयोगी नहीं है ।

2. गैसकैटों (Gaskets) की निरन्तर सफाई की आवश्यकता पड़ती है ।

3. उष्मक में Milk Stones अधिक मात्रा में बनते है ।

अति उच्च ताप पास्तुरीकरण विधि (Ultra High Temperature Pasteurization):

 

अन्तर्राष्ट्रीय डेरी फैड्रेशन (International Dairy Federation, 1979) के अनुसार Ultra Heat Treated (U.H.T.) दुग्ध पदार्थ वह दूध है जिसे कम से कम 132C तापमान पर 1 सैकिंड के लिए गर्म किया गया ही तथा जिसका निर्जमीकृत बर्तन (Sterilized Containers) में स्वच्छ (Aseptically) दशाओं में पैकेजिंग किया गया हो । क्रीम को यह उपचार देने के लिए 132C तापमान पर 2 सैकिंड के लिए रखा जाता है ।

क्रिया विधि (Procedure):

U.H.T. यन्त्र लगभग HTST यन्त्र की तरह की बनावट का होता है । अन्तर यह है कि इस यन्त्र में Holding Tubes की लम्बाई धारण काल कम होने के कारण अपेक्षाकृत कम होती है तथा F.D.V. से निकलने वाला दूध U.H.T. उपचार के लिए जाता है ।

दूध को U.H.T. उपचार देने के लिए दो विधियाँ अपनायी जाती हैं:

1. सीधी प्रणाली (Direct System):

इस विधि में दूध को सीधा भाप के सम्पर्क में लाया जाता है ।

इसकी दो विधियों है:

(a) दूध में भाप का प्रवाह करना (Steam into Milk)

(b) दूध को उच्च ताप युक्त भाप से भरे कक्ष में छिडकना (Milk into Steam)

दूध में उपचार के समय भाप के रूप में मिले पानी को अलग करने के लिए उसे उच्च ताप से सामान्य ताप पर ठण्डा करने के लिए निर्वात कक्ष (Vacuum Chamber) में भेजा जाता है जहाँ पर दूध में मिली भाप तथा अन्य वाष्पशील गन्ध आदि निकलकर संघनक (Condenser) में चली जाती है । जहां से संघनित (Condensed) होकर पानी के रूप में निकल जाता है ।

2. अप्रत्यक्ष प्रणाली (Indirect System):

इस प्रणाली में दूध को उष्मक में बिना भाप पा पानी मिश्रित किये Plates, Tubes या Scraped Surface Heat Exchangers का प्रयोग करके U.H.T. तापमान तक गर्म किया जाता है । इसमें दूध को पहले एकान्तर प्लेटों में गर्म पानी का प्रयोग करके गर्म करते हैं तथा गर्म दूध का समांगीकरण किया जाता है तदान्तर उसे एकान्तर प्लेटों में भाप का प्रयोग करके अति उच्च ताप पर उपचार देने के बाद सामान्य ताप पर ठण्डा करने के उपरान्त उसका Aseptically पैकेजिंग किया जाता है ।

इसमें लगने वाली प्लेटों का अति उच्च ताप (Ultra High Temperature) पर कार्य करने योग्य होना आवश्यक है । इन प्लेटों में दूध का आन्तरिक दबाव इतना होता है कि जो पदार्थ को उबलने से तथा उष्मीय सतह (Heating Surface) पर गैस के पृथकीकरण को रोक सके ।

अति उच्च ताप पास्तुरीकरण विधि के लाभ (Merits of U.H.T. Pasteurization Method):

1. यू. एच. टी. उपचारित दूध लम्बे समय तक बिना प्रशीतित किये रखा जा सकता है । अतः अधिक उत्पादन के दिनों में (Flush Season) दूध को उपचारित करके कम उत्पादन (Lean Season) के समय में प्रयोग हेतु भंडारित किया जा सकता है ।

2. यह सामान्य तापक्रम पर भंडारित किया जाता है । अतः प्रशीतन पर होने वाले खर्च से बचा जा सकता है । तथा घर में जहां प्रशीतन की सुविधा नहीं है आसानी से भडारित किया जा सकता है ।

3. इस दूध के उत्पादन में मानवीय ऊर्जा (Main Power) की कम आवश्यकता पडती है ।

4. दूध के किण्वन (Fermentation) या अम्लीय (Souring) होने की सम्भावना लगभग समाप्त हो जाती है ।

5. दूध के पोषक गुणों (Nutritive Qualities) पर कोई विशेष खराब प्रभाव नहीं पडता है ।

6. यह मानव उपयोग हेतु सुरक्षित होता है । अर्थात इसके उपभोग से कोई बिमारी फैलने या अन्य नुकसान होने की कोई सम्भावना नहीं होती है ।

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