जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट पर निबंध | Essay on Biomedical Waste in Hindi.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट पर निबंध | Essay on Biomedical Waste


Essay Contents:

  1. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का परिचय (Introduction to Biomedical Waste)
  2. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का वर्गीकरण और श्रेणियाँ (Classification and Categories of Biomedical Waste)
  3. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट से रोग फैलने के रास्ते (Routes of Transmission of Disease by Biomedical Waste)
  4. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के खतरे में आने वाले लोग (Effects of Biomedical Waste on Humans)
  5. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के तथ्य (Impact of Biomedical Wastes)
  6. अस्पताल में व्यक्तिगत बचाव के उपकरण (Personal Protective Devices Used in Hospital)
  7. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के सुरक्षा उपाय (Protective Measures to Reduce Biomedical Waste)

Essay # 1. जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का परिचय (Introduction to Biomedical Waste):

यह वह अपशिष्ट है जो स्वास्थ्य परिचर्या प्रतिष्ठानों (अस्पतालों), अनुसंधान केन्द्रों और प्रयोगशालाओं से पैदा होता है ।

यह वह अपशिष्ट है, जो निम्नलिखित के दौरान पैदा होता है:

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1. रोग निदान, रोग का उपचार और रोग प्रतिरक्षण

2. इनसे जुड़े जैव-चिकित्सीय अनुसंधान, और

3. जैव रसायनों का उत्पादन एवं परीक्षण

प्रायः जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट अस्पतालों, उपचर्या गृहों, क्लीनिकों, विकृति विज्ञान/सूक्ष्म जीव विज्ञान प्रयोगशालाओं, रक्त बैंकों, पशु-गृहों और पशु चिकित्सा संस्थानों में पैदा होता है । इस प्रकार का अपशिष्ट घर में भी पैदा हो सकता है यदि किसी रोगी की घर पर चिकित्सा परिचर्या की जा रही है । जैसे- डायलिसिस इंसुलिन इंजेक्शन, ड्रेसिंग सामग्री आदि ।


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Essay # 2.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट का वर्गीकरण और श्रेणियाँ (Classification and Categories of Biomedical Waste):

लगभग 75 प्रतिशत से 90 प्रतिशत चिकित्सीय अपशिष्ट उतना ही हानिरहित होता है जितना कोई भी अन्य म्यूनिसिपल अपशिष्ट । बाकी का 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत अपशिष्ट अन्य प्रकार के कचरों से भिन्न होता है, जो कि मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाता है । स्मरण रहे कि यदि इन दोनों प्रकार के कचरों को एक साथ मिला दिया जाये तो पूरा का पूरा अपशिष्ट हानिकारक बन जाता है ।

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट को आगे और निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. संक्रामक

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2. हानिकारक

3. कोशिका-विषी

4. रासायनिक

1. संक्रामक (Infectious):

संक्रामक अपशिष्ट में रोगाणु (पैथोजेन्स), जीवाणु, विषाणु, परजीवी या काई की सघनता और मात्रा इतनी हो सकती है कि जल्द बीमारी पकड़ लेने वाले लोगों में रोग पनप सकते हैं ।संक्रामक रोग से पीड़ित किसी रोगी के संपर्क में जो अपशिष्ट रहता है उसमें सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो उस रोग को किसी अन्य व्यक्ति तक पहुंचा देते हैं ।

इस प्रकार लगने वाले कुछ रोग निम्नलिखित हैं:

(i) यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए, बी, सी, डी, और ई

(ii) जठरांत्रशोथ और मियादी बुखार

(iii) क्षयरोग

(iv) ऑपरेशन के बाद घावों का संक्रमण

(v) त्वचा और रक्त का संक्रमण, और

(vi) एड्‌स आदि ।

इस श्रेणी से शामिल हैं:

(a) संक्रमण रोगों से पीडित रोगियों की शल्यक्रिया और ऑटोप्सी करने से उत्पन्न अपशिष्ट (अर्थात् टिस्सू और रक्त अथवा अन्य संक्रमित शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में रही सामग्री एवं उपकरण) ।

(b) अलग रखे गए वार्डों में संक्रमित रोगियों से उत्पन्न अपशिष्ट (अर्थात् मल, मूत्र, संक्रमित अथवा ऑपरेशन किए गये घावों की पट्टियाँ, मानव-रक्त अथवा अन्य तरल पदार्थों से सने कपडे) ।

(c) हीमोडायलेसिस पर रखे गये संक्रमित रोगियों के संपर्क से उत्पन्न अपशिष्ट (अर्थात् टयूब और फिल्टर जैसे डायलेसिस उपकरण, फेंकने योग्य तौलिए, गाऊन, एप्रेन, दस्ताने और प्रयोगशाला में पहने जाने वाले कोट) ।

(d) प्रयोगशाला कार्य से उत्पन्न संक्रामक एजेंटों के कल्चर और स्टॉक्स ।

(e) प्रयोगशालाओं के संक्रमित जीव ।

(f) संक्रमित व्यक्ति अथवा जीवों के संपर्क में रहने वाले अन्य उपकरण अथवा सामग्री ।

2. हानिकारक (Harmful):

यह खतरा तेज धार वाले जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट से हो सकता है जिसके कारण घाव हो सकता है जिसमें सुइयां, अधस्त्वक (हाइपोडर्मिक) सुइयाँ, छुरी और अन्य ब्लेड, चाकू, इन्फ्युजन सैट, आरियाँ, टूटे कांच की शीशियों, एकल और नाखून । ये वस्तुएँ संक्रमित हों अथवा न हों परन्तु इन्हें प्रायः स्वास्थ्य परिचर्या अपशिष्ट में सबसे खतरनाक माना जाता है । इनसे घाव हो जाते हैं, जिसके फलस्वरूप जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं ।

तेज धार वाला अपशिष्ट संक्रामक भी हो सकता है और निम्नलिखित संक्रामक रोग फैला सकता है:

(a) टेटनस

(b) एड्‌स

(c) हेपेटाइटिस

(d) सेप्टिसीमिया

(e) घाव संक्रमण

3. कोशिका-विषी (Cellular):

कुछ औषधियाँ अथवा अन्य पदार्थ कोशिका (शरीर की ढांचागत और कार्यात्मक इकाई) को जख्मी कर सकते हैं । कोशिका-विषी अपशिष्ट में आषधि तैयार करने और संचालन के दौरान संदूषित वस्तुएँ शामिल होती हैं जो इस प्रकार हैं- सिरिंज, सुइयों की मापक शीशियाँ और पैकेजिंग, ऐसी ओषाधियां जिनके उपयोग की तिथि समाप्त हो गई है, वार्डों से लौटा हुआ फालतू (बचा हुआ) घोल और दवाइयाँ ।

इसमें रोगियों का मल-मूत्र और उल्टी भी शामिल होती है जिसमें उपयोग की गई कोशिका-विषी औशधियों अथवा उनके चयापचय का अधिक खतरा हो सकता है और जिसे औषध लेने के बाद कम से कम 48 घंटे और कभी-कभी एक सप्ताह के लिए जीनोविषी (जीनोटोक्सिक) माना जाना चाहिए ।

इनमें से ध्यान देने योग्य ये हैं:

(i) केंसर-रोधी औषधियाँ

(ii) तेज तेजाब तथा क्षार

(iii) तेज फिनायल

(iv) रोडियो-धर्मी सामग्री ।

कोशिका-विषी एजेंट निम्नलिखित प्रभाव डाल सकते हैं:

(a) रोगरोधक शक्ति का दब जाना

(b) रक्त की कमी हो जाना

(c) बिम्बाणु अल्पता हो जाना (थ्रोम्बोसाइटोपीनिया)

(d) व्रण (अल्सर)

(e) कैंसर

(f) गर्भ- संबंधी असामान्यताएँ

(g) अनुवांशिक असामान्यताएँ जिनके कारण विभिन्न रोग हो सकते हैं ।

4. रसायन (Chemical):

खतरे वाले रसायन प्रायः प्रयोगशाला के अपशिष्ट अथवा अन्य पदार्थों से उत्पन्न होते हैं ।

इसमें ये शामिल हैं:

(i) रसायन चिकित्सीय अपशिष्ट

(ii) फोटोग्राफी के रसायन

(iii) फार्मल्डीहाइड और अन्य रोगाणुनाशक

(iv) भारी धातुएं (जैसे पारा)

(v) बेहोशी की फालतू गैसें

(vi) अन्य जीव-विष और जंग वाले पदार्थ

(vii) विकिरणधर्मी रसायन

(viii) रंगाई की सामग्री

(ix) कीटनाशक (जैसे डी डी टी)

रासायनिक अपशिष्ट में रोग निदानकारी और परीक्षणात्मक कार्य से और सफाई, हाउसकीपिंग और संक्रमण-रहित करने जैसी प्रक्रियाओं के कारण फेंके गए ठोस, द्रव एवं गैसीय रसायन होते हैं । स्वास्थ्य परिचर्या से होने वाला अपशिष्ट नुकसानदायक अथवा नुकसानरहित हो सकता है । रसायन अपशिष्ट से संक्षारण हो सकता है, जहर फैल सकता है, चमडी रोग और केन्सर आदि हो सकते हैं ।

इसे नुकसानदेह माना जा सकता है यदि यह निम्नलिखित प्रकार का हो:

1. विषालु

2. जंग खाने वाला

3. ज्वलनशील

4. प्रतिक्रियात्मक (विस्फोटक, पानी से प्रतिक्रिया करने वाला, झटके के प्रति संवेदनशील)

5. जीनीविशालु (जैसे कोशिका-विषी दवाएं)

यदि इस अपशिष्ट को उपयुक्त रूप से संसाधित किए बगैर बहा दिया जाये तो यह मल वाले पानी के जीवाणु के लिए भी नुकसानदेह होगा ।


Essay # 3.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट से रोग फैलने के रास्ते (Routes of Transmission of Disease by Biomedical Waste):

1. सांस के द्वारा

2. मुख के रास्ते से

3. घावों के संक्रमण द्वारा

4. श्लेष्मा झिल्लियों द्वारा सोख लेने पर

5. चोट तथा इसके बाद संक्रमण होने पर

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट से जुडे रोग:

i. एड्‌स

ii. हपेटाइटिस (यकृतशोथ)

iii. आंत्रशोथ, आंत्र ज्वर (टाइफाइड बुखार)

iv. त्वचा संक्रमण

v. सेप्टीसीमिया

vi. क्षयरोग

vii. टेटनस

viii. केंसर

ix. आनुवंशिक/गर्भ-संबंधी असमान्यताएं ।


Essay # 4.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के खतरे में आने वाले लोग (Effects of Biomedical Waste on Humans):

विभिन्न प्रकार के लोगों पर जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के बुरे प्रभाव हो सकते हैं । इस प्रकार कोई भी (आम जनता सहित) इन बुरे प्रभावों से पीड़ित हो सकता है । लेकिन, स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने वाली संस्था (अस्पताल, नर्सिंग होम आदि) से जुड़े लोगों को इनसे ज्यादा खतरा होता है ।

निम्नलिखित तरह के व्यक्ति बहुत ही आसानी से इन बुरे प्रभावों का शिकार बन सकते हैं:

i. मेडिकल डॉक्टर, नर्सें, कंपाउंडर, मरहम पट्टी करने वाले, ऑपरेशन थियेटर सहायक, प्रयोगशाला सहायक, वार्ड बॉय, आया, सफाई कर्मचारी, जैव चिकित्सीय अपशिष्ट का काम करने वाले व्यक्ति आदि ।

ii. स्वास्थ्य परिचर्या संस्थाओं में या घर पर परिचर्या प्राप्त करने वाले रोगी ।

iii. स्वास्थ्य परिचर्या संस्थाओं के आगंतुक/परिचारक अथवा घर पर परिचर्या करने वाले ।

iv. स्वास्थ्य परिचर्या संस्थाओं से जुड़ी सहायक सेवाओं के कार्यकर्ता, जैसे- लाउंड्री, कचरे और परिवहन का काम करने वाले ।

v. बड़ा बीनने वाले व्यक्ति ।


Essay # 5.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के तथ्य (Impact of Biomedical Waste):

विश्व स्वास्थ्य संगठन (1999) के अनुसार, एच आई वी/ एड्‌स और हैपेटाइटिस बी और सी जैसे विषाणुजन्य गंभीर संक्रमणों के संबंध में, स्वास्थ्य परिचर्या कर्मियों, विशेषकर नसों को संदूषित तेज धार वाले औजारों (अधिकतर अंदरूनी त्वचा में लगाई जाने वाली सुइयों) से लगने के कारण सबसे ज्यादा संक्रमण होने का खतरा है । जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट हानिरहित नहीं है । यह खतरनाक तो है ही साथ ही कई बार जानलेवा भी हो सकता है ।

इस संबंध में पिछले कुछ समय में दुनियाभर में जो तथ्य सामने आए हैं, वे इस प्रकार हैं:

1. 1992 में, फ्रांस में आठ व्यक्तियों को एच आई वी संक्रमण उनके व्यवसाय से जुडे खतरों के कारण हुआ था । इनमें से दो मामलों में कचरे में काम करने वालों को लगे घावों के जरिए रोग फैला ।

2. जून, 1994 में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एच आइ वी संक्रमण के 39 मामलों में से 34 में संक्रमण किसी तेज धार वाले जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के द्वारा लगी चोट के कारण होना बताया गया था । चार मामलों में, संक्रमित खून के संपर्क में त्वचा या श्लेष्मा झिल्ली के आने के कारण संक्रमण हुआ ।

3. जून, 1996 तक, संयुक्त राज्य अमोरका में व्यावसायिक एच.आई.वी. संक्रमण के आवर्ती पहचान किये गये मामले बढकर 51 हो गये और ये सभी रोगी नर्सें, डॉक्टर या प्रयोगशाला सहायक थे ।

4. ऐसा अनुमान है कि अमेरिका में प्रति वर्ष 86,000 से लेकर 1,60,000 तक स्वास्थ्य परिचर्या-कर्मी तेज धार वाले जैव-चिकित्सीय कचरे से घायल हो जाते हैं । इनमें से लगभग 164 से लेकर 323 तक व्यक्तियों में बाद में हैपेटाइटिस बी (यकृत-शोथ बी) संक्रमण हो जाता है ।

5. ऐसा अनुमान है कि जापान में अंदरूनी त्वचा में सुई लगाने के बाद एच आई वी और हैपेटाइटिस बी संक्रमण होने का जोखिम क्रमशः 0.3 प्रतिशत तथा 3 प्रतिशत है ।

6. भारत में कूडा बीनने वाले लगभग 66 प्रतिशत व्यक्ति जैव-चिकित्सीय कचरे के कारण चोट लगने (या घाव) से पीडित हैं ।

7. संयुक्त राज्य अमेरिका में किसी अस्पताल के एक हाउसकीपर को सुई का घाव लगने से स्टेफिलोकॉकल बैक्टीरिमीया और अन्तर्हदशोथ (एन्डोकार्डाईटिस) रोग हो गये ।

8. दुर्भाग्यवश हमारे यहाँ भारत में इस प्रकार के हादसों की सूचना देने की कोई कारगर प्रणाली नहीं है । लेकिन कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि यदि विकसित देशों में हालत इतनी भयानक है तो हमारे देश में क्या हालत होगी ।

अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के खतरों से कोई भी प्रभावित हो सकता है चिकित्सा के पेशे से जुडे लोगों के इनसे प्रभावित होने की विशेष तौर पर संभावना होती है । इसलिए, जैव-चिकित्सीय कचरे का काम करते समय हम में से हर एक को बचाव के कुछ उपाय अपनाना जरूरी है । बचाव के उपायों का इस्तेमाल करना बहुत ही आसान और सुविधाजनक है । यदि इन उपायों का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो ये उपाय काफी प्रभावी सिद्ध होंगे ।


Essay # 6.

अस्पताल में व्यक्तिगत बचाव के उपकरण (Personal Protective Devices Used in Hospitals):

बचाव की महत्वपूर्ण विधियाँ इस प्रकार हैं:

1. दस्ताने (Gloves):

ये हाथों को सुरक्षित रखने के लिए होते हैं । ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को रोग लगने की रोकथाम करते हैं ।

दस्तानों का सही इस्तेमाल निम्न तरीके से हो सकता है:

i. इन्हें तब पहनें जब:

(क) चीर-फाड का कोई काम कर रहे हों,

(ख) रोगी को पट्टी कर रहे हों,

(ग) खून या शरीर के अन्य स्रावों के संपर्क में आने पर,

(घ) तेज धार वाले औजारों और रसायनों के साथ काम करते हुए ।

ii. दस्ताने इस्तेमाल करने से पहले तथा बाद में हाथों को साबुन और पानी से धोना चाहिए ।

iii. दस्ताने पहनने के बाद, जिस काम के लिए आपने दस्ताने पहने हों, उसके अलावा किसी अन्य वस्तु को न छुना चाहिए ।

iv. वैसे तो दस्ताने प्रत्येक रोगी की जाँच अथवा परिचर्या के बाद बदल देने चाहिए । परन्तु यदि ऐसा करना संभव न हो तो दस्ताने चढे हाथों को एक मिनट तक एक प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइट के घोल में डुबाए तथा तभी अगले रोगी की जाँच करना चाहिए ।

v. इस्तेमाल किए हुए दस्तानों का निपटान सही प्रक्रिया अपनाकर करना चाहिए । पहले इन्हें एक प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइट के घोल में 30 मिनट के लिए रखें, फिर उनका असली स्वरूप बदलने के लिए केची से काट देना चाहिए ।

vi. कचरे का काम करने वाले कर्मी जैव-चिकित्सीय कचरे का काम करते समय मोटी तह वाले दस्तानों का प्रयोग करना चाहिए ।

2. टोपी, मुखपट्टी/मुखावरण (मास्क-फेस मास्क) और चोगा (गाउन) [Caps Mask/Face Masks and Gowns]:

ये सब विधियाँ शरीर को संक्रमण से बचाने के लिए हैं ।

 

इनका सही इस्तेमाल इस प्रकार से करना चाहिए:

i. मास्क को इस तरह से पहनें जिससे यह मुख और नाक को ढक लेना चाहिए । यदि यह खून या शरीर के स्रावों से गंदा हो जाए तो इसे तुरन्त बदल देना चाहिए ।

ii. एप्रेन/गाउन शरीर को गर्दन से घुटने तक ढके होना चाहिए ।

iii. इन सब को तब जरूर पहनें जब आपके शरीर पर खून शरीर के स्रावों के छींटे गिरने की संभावना हो ।

iv. प्रसव कराने (बच्चे के पैदा होने) के दौरान और सभी ऑपरेशनों के दौरान इन्हें पहनें ।

v. वार्डों में काम करते समय कम से कम टोपी और मास्क जरूर पहनें ।

vi. इनकी सफाई के लिए, इन्हें 30 मिनट तक एक प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइट के घोल में रखें और तब काफी साबुन और पानी से धोना चाहिए । सुखाने के बाद इन्हें भाप देना चाहिए (ऑटोक्लेव करना चाहिए) ।

3. मोटे सोल वाले गमबूट (Gumboots with Thick Soles):

ऑपरेशन थियेटर तथा प्रसव कक्षों (लेबर रुम) में काम करते समय गमबूटों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए । ये गमबूट अपने पर छलके हुए पदार्थों से तथा तेज धार वाले जैव-चिकित्सीय कचरे की चोट से (और इस तरह रोग फैलने से) बचाव करते हैं । भस्मक (इनसिनिटरों) पर और दबाने वाली जगहों (लैंडफिल साइटों) पर काम करने वालों के लिए ये गमबूट पहनने बहुत ही जरूरी हैं ।

4. सादा चश्मा/ बडा रंगीन चश्मा (गोगल्स) [Plain Eyeglasses / Large Colored Glasses (Goggles)]:

दाँतों की सर्जरी, हड़ियों की सर्जरी करते हुए तथा यदि यह पता हो कि रोगी एच आई वी से पीडित है तो रंगीन चश्में (गोगल्स या सादे चश्मे) पहनने चाहिए । जैव-चिकित्सीय कचरे का काम करने वालों को सादा चश्मा या बडे रंगीन चश्मे अवश्य पहनने चाहिए ।

5. बचाव कवच (शील्ड) [Rescue Armor (Shield)]:

विकिरण के खतरे की संभावना वाले वातावरण (जैसे कि रेडियोलॉजी और रेडियोथेरेपी विभाग) में काम करते समय प्रत्येक व्यक्ति को बचाव कवच (शील्ड) पहनना चाहिए यह कवच विकिरण से होने वाले खतरों से बचाव करता है । रेडियोलॉजी विभाग में काम कर रहे व्यक्तियों को विकिरण के खतरे की सीमा का पता लगाने के लिए एक डोसीमीटर भी पहनना चाहिए ।


Essay # 7.

जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के सुरक्षा उपाय (Protective Measures to Reduce Biomedical Waste):

(i) जैव-चिकित्सीय कचरे का काम करने वाले व्यक्तियों सहित अस्पताल के सभी कर्मचारियों को टेटनस और हैपेटाइटिस बी का टीका लगाया जाना चाहिए ।

(ii) सुइयों और तेज धार वाली अन्य वस्तुओं का इस्तेमाल करते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि तेजधार वाली वस्तुओं से लगने वाली चोट ज्यादातर उनका इस्तेमाल करते समय और उनका निपटान करने के दौरान लगती है ।

(iii) तेज धार वाली वस्तुओं को काउंटरों, खाने की ट्रे, बिस्तरों पर ऐसे ही नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि इनसे गहरी चोट लग सकती है ।

(iv) कांच और सुइयों को हाथों से तोडना-मरोडना नहीं चाहिए क्योंकि इससे अचानक चोट लग सकती है ।

(v) तेज धार वाली वस्तुओं को इस्तेमाल करने के बाद वहीं पर अलग करना चाहिए और इसके बाद ऐसे डिब्बे में रखें जिसे वे वस्तुएँ चुभ न सकें ।

(vi) इस्तेमाल की जाने वाली सभी वस्तुओं को कम से कम आधे घंटे तक एक प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइट के घोल में जरूर डुबाए रखें ताकि इन्हें पूरी तरह संक्रमण रहित किया जा सके ।

(vii) जहाँ तक संभव हो सके, स्वयं को विकिरण के सीधे असर से बचाए ।

(viii) एच आई वी से पीडित या हैपेटाइटिस बी से पीडित रोगियों की परिचर्या करते समय सम्पूर्ण सावधानियाँ बरतें:

(a) इन रोगियों की परिचर्या करते समय हमेशा दो जोडे दस्ताने पहनें

(b) टोपी, मॉस्क और एप्रेन पहनें ।

(c) ऑपरेशन थियेटर में गोगल्स/चश्मा जरूर पहनें ।

(d) ऑपरेशन थियेटर में नर्स, डॉक्टर को या डॉक्टर नर्स को औजार हाथ से नहीं देना चाहिए बल्कि उन्हें औजार एक-दूसरे को पकडाने के लिए एक ट्रे या चिलमिल का इस्तेमाल करना चाहिए । औजारों को नुकीले/धारदार कोनों से न पकड़े । प्राथमिक सहायता बॉक्स (फर्सट एड बाक्स) और आपातकालिक दवाइयाँ उपलब्ध होनी चाहिए ।

दुर्घटना के उपरांत किए जाने वाले उपाय (Measures after the Accident):

1. तेज धार वाले औजारों का इस्तेमाल करते वक्त अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए । अगर (संक्रमित) तेज धार वाले औजार या टूटे कांच से चोट लग जाती है तो घाव को तुरंत पहले लवण के घोल (सेलाइन) से और फिर स्प्रिट या पोवीडोन आयोडीन (बीटाडिन) से साफ करना चाहिए । डॉक्टर को दिखाना चाहिए । घाव की पट्टी करना जरूरी होगा । टेटनेस टीक्साइड (टी टी) का टीका लगाने की सलाह दी जाती है ।

2. यदि शरीर पर कोई नुकसानदेय घोल गिर जाता है तो गंदे हो गये कपडों को उतार देना चाहिए और जिस अंग पर घोल गिर जाता है उसे काफी पानी से धोना चाहिए । उस पर जलन न करने वाली एंटीसेप्टिक क्रीम लगाना चाहिए और तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए । आँखों में यह घोल गिर जाने पर, आँखों को पानी से धोए लेकिन मले नहीं । जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाना चाहिए ।

कड़ा बीनने वाले व्यक्ति (Rag Pickers):

कूड़ा बीनने वाले व्यक्ति, जैव-चिकित्सीय कचरे में से इस्तेमाल करके फेंक दी जाने वाली चीजें (सिरिंजें, आई वी सैट, खून की थेलियों, मूत्र-थेलियाँ आदि) अक्सर इकट्ठा करते हैं । इन वस्तुओं को दोबारा पैक करके बेचे जाने की संभावना रहती है ।

इनकी कीमत बहुत कम होने के लालच में लोग इन्हें खरीदतें हैं । लेकिन ये सभी वस्तुएँ इस्तेमाल करने वालों को रोगी बना सकती हैं । कानूनी तौर पर ऐसी किसी वस्तु को सरकारी आज्ञा के बिना वैसे ही ठीक-ठाक करके दोबारा बेचना अपराध है, क्योंकि ऐसा करने से किसी इंसान के लिए यह जानलेवा साबित हो सकती है ।

हालांकि कड़ा बीनने वालों की गरीबी की हालत पर मानवता के आधार पर सोच-विचार होना चाहिए लेकिन उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ अन्य लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को देखते हुए इस धंधे को करते रहने की इजाजत उन्हें नहीं दी जा सकती । सभी लोगों पर गैर कानूनी तरीके से चीजों को ठीक-ठाक कर पुन: बेचने पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए ।


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