ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना: परिचय, दृष्टिकोण, विकास और मुद्दे | Read this article in Hindi to learn about:- 1. ग्यारहवीं योजना का परिचय (Introduction to Eleventh Five-Year Plan) 2. ग्यारहवीं योजना का प्रस्ताव पत्र (Approach Paper of Eleventh Five-Year Plan) 3. विकास पृष्ठभूमि (Background of Development) and Other Details.

Contents:

  1. ग्यारहवीं योजना का परिचय (Introduction to Eleventh Five-Year Plan)
  2. ग्यारहवीं योजना का प्रस्ताव पत्र (Approach Paper of Eleventh Five-Year Plan)
  3. ग्यारहवीं योजना का विकास पृष्ठभूमि (Background of Development of Eleventh Five-Year Plan)
  4. ग्यारहवीं योजना का अर्थव्यवस्था की दृढ़ता (Strength of the Economy)
  5. अर्थव्यवस्था द्वारा सामना की जा रही कुछ मुख्य चुनौतियां (Some Major Challenges Faced by the Economy)
  6. महत्वपूर्ण समस्याएं: सतत् एवं समावेशी वृद्धि (Important Issues: Sustainable and Inclusive Growth)
  7. ग्यारहवीं योजना की प्राथमिकताएं (Priorities of Eleventh Year Plan)

1. ग्यारहवीं योजना का परिचय (Introduction to Eleventh Five-Year Plan):

योजना आयोग ने 18 अक्तूबर, 2006 को हुई बैठक में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के प्रस्ताव पत्र (Approach Paper) के प्रलेख को सर्वसम्मति से स्वीकृति प्रदान की |

राष्ट्रीय विकास परिषद् (NDC) ने 9 दिसम्बर, 2006 को हुई 52वीं बैठक में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के प्रस्ताव पत्र को अन्तिम स्वीकृति दी जिसमें 10 प्रतिशत महत्वाकांक्षी वृद्धि दर की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया ।

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योजना आयोग के अध्यक्ष, प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने बैठक में कहा ”ग्यारहवीं योजना अनेक प्रकार से ऐतिहासिक होने वाली है……. हमने इससे बेहतर योजना की मांग नहीं की होती……. अन्ततः हम तीव्रतापूर्वक बढ़ते हुये विकासशील देशों की प्रथम श्रेणी में उभरेंगे ।

अर्थव्यवस्था की दृढ़ता जिसमें प्रोत्साहक FDI प्रवाह, हल्की सी स्फीति, सुखदायी बाहरी स्थिति तथा चालू खाते का घाटा तथा विदेशी विनियम के संचय क्या वर्णन करते हुये डा. सिंह ने कहा, ”योजना प्रक्रिया के आरम्भ से यह पहला समय है कि हम योजना के अन्तिम वर्ष में 10 प्रतिशत वृद्धि दर का लह्म रखेंगे ।” इतना उच्च वृद्धि दर कृषि वृद्धि के दुगना होने और बड़े स्तर पर रोजगार की उत्पति पर आधारित है ।


2. ग्यारहवीं योजना का प्रस्ताव पत्र (Approach Paper of Eleventh Five-Year Plan):

नवम दिसम्बर 2006 को हुई राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठक ने ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकृति प्रदान की । इस प्रस्ताव पत्र में सकल घरेलू उत्पाद का औसत वार्षिक वृद्धि दर का महत्वाकांक्षी लक्ष्य ग्यारहवीं योजना के दौरान 9 प्रतिशत रखा गया और इस योजना के अन्तिम वर्ष में 10 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य था ।

प्रस्ताव पत्र ने साधन संरचना के पुन: नवीनीकरण की आवश्यकता तथा व्यय प्रबन्ध को पुन: संशोधित करने पर ध्यान दिया ताकि ग्यारहवीं योजना के लिये निर्धारित अन्य लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके, विशेषतया कृषि विकास से सम्बन्धित, निर्धनता में रहते हुये लोगों की संख्या को 10 प्रतिशित बिन्दुओं तक कम करना, लिंग अन्तराल को कम करना और लिंग-अनुपात को बढ़ाना, वृद्धि सम्बन्धी संरचनात्मक और सामाजिक क्षेत्र के विकास कार्यक्रमों द्वारा बेरोजगारी को कम करना ।

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प्रस्ताव पत्र ने अधिक व्यापक एवं समावेशी वृद्धि को उच्च प्राथमिकता दी, निर्धनता कम करने, रोजगार के अवसरों की रचना और लिंग अन्तरलों के घटाव, साक्षरता बढ़ाने तथा सुदृढ़ कृषि की 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य और इन कारकों से सम्बन्धित रणनीति के पुनर्निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया गया है ।


3. ग्यारहवीं योजना का विकास पृष्ठभूमि (Background of Development of Eleventh Five-Year Plan):

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) की तैयारी अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में अच्छे निष्पादन के कारण उच्च प्रत्याशाओं के साथ और अर्थव्यवस्था द्वारा सामना की जा रही कुछ समस्याओं के पृष्ठपट में की जा रही है ।

ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र में वर्णित है कि – ”ग्यारहवीं योजना के समय भारतीय अर्थव्यवस्था अति दृढ़ स्थिति में है । नवम् योजमा (1997-2002) में लगभग 55 प्रतिशत का काम वृद्धि दर प्रदर्शित करने के पश्चात, हाल ही के वर्षों में यह बड़ी है तथा दसवीं योजना काल के दौरान (2002-07) औसत वृद्धि दर के 7 प्रतिशत होने की सम्भावना है । यह दसवीं योजना के 8 प्रतिशत के लक्षित दर से कम है, परन्तु किसी योजना काल के दौरान प्राप्त किये किसी वृद्धि दर की तुलना में यह उच्चतम दर था ।”


4. ग्यारहवीं योजना का अर्थव्यवस्था की दृढ़ता (Strength of the Economy):

अर्थव्यवस्था की दृढ़ता सुप्रसिद्ध है तथा दसवीं योजना के अन्त में देश के समष्टि आर्थिक संकेतकों में प्रतिबिम्बित है । घरेलू बचत दर बढ़ता रहा है तथा 2005-06 में सकल घरेलू उत्पाद के 32.4 प्रतिशत तक पहुंच गया । केन्द्र और राज्य सरकारों का संयुक्त राजकोषीय घाटा जितना होना चाहिये उससे अधिक है, परन्तु गिर रहा है ।

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सन् 2006-07 के बजट अनुमान दर्शाते हैं कि यह 7 प्रतिशत तक नीचे होना चाहिये । तेल की कीमतों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि के बावजूद स्फीति की दर सामान्य है । दसवीं पंचवर्षीय योजना के पहले दो सालों के दौरान चालू खाते में अतिरेक था तथा सन् 2004-05 में सकल घरेलू उत्पाद एक प्रतिशत की सीमा तक घट गया । 2005-06 के दौरान घाटे के सकल घरेलू उत्पाद के 1.3% तक बढ़ने के अनुमान हैं । 25 अगस्त, 2006 को विदेशी विनियम संचय $ 165.3 बिलियन की सन्तोषजनक स्थिति में था ।

दृढ़ता का एक महत्वपूर्ण स्रोत यह है कि अर्थव्यवस्था अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में परिपक्व हुई है क्योंकि पिछले 25 वर्षों में क्रमिक सरकारें आर्थिक सुधार कार्यान्वित करती रही हैं । भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व की अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक सुबद्ध है तथा इस सुबद्धता से इसे लाभ प्राप्त हुये हैं ।

सूचना तकनीक द्वारा समर्थित सेवाओं ”IT Enabled Services (ITES)” की शानदार सफलता ने प्रदर्शित कर दिया कि भारतीय निपुणताएं और उद्यम ठीक वातावरण मिलने पर क्या कुछ कर सकते हैं । अन्य क्षेत्रों जैसे औषधीय, स्वचालित वाहनों के संघटकों और वस्त्र क्षेत्रों में भी ऐसी ही स्थिति है ।

विश्व सुबद्धता से एक अन्य लाभ यह है कि इससे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के बहाव में वृद्धि हुई है । नवम योजनाकाल के दौरान FDI की औसत $3.7 बिलियन से बढ़ कर दसवीं योजना में $3.7 बिलियन हो गई । यह अभी भी हमारी क्षमता से कम है । ग्यारहवीं योजना के दौरान इसे प्राप्त करने के सभी प्रयत्न किये जायेंगे ।


5. अर्थव्यवस्था द्वारा सामना की जा रही कुछ मुख्य चुनौतियां (Some Major Challenges Faced by the Economy):

सुदृढ भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ कुछ चुनौतियाँ भी हैं जिनका सामना किया जा रहा है ।

यह चुनौतिया निम्नलिखित हैं:

1. निर्धन लोगों को आवश्यक सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध करना (Providing Essential Public Services for the Economy):

अत्यावश्यक चुनौती यह है कि भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या को आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य आदि कैसे उपलब्ध करायी जायें जो इस समय उन्हें प्राप्त नहीं हैं । शैक्षिक सुविधाओं, स्वास्थ्य संभाल तथा सम्बन्धित सेवाओं जैसे शिशु सम्भाल, शुद्ध पेय जल तथा निर्धन लोगों को मूलभूत सफाई की सेवाओं आदि में विस्तृत अन्तराल हैं ।

2. कृषि में गति की पुन: प्राप्ति (Regaining Agricultural Dynamism):

ग्यारहवीं योजना की एक अन्य चुनौती है कृषि वृद्धि में अवनति, जोकि 1980 और 1999-2000 के दौरान 3.2 प्रतिशत थी को 1.5 प्रतिशत की औसत तक लाना । नि:सन्देह यह अवनति देश में ग्रामीण व्यथा का आधार है । कृषि के कुल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर को 4 प्रतिशत के समीप लाने के लिये एक अन्य हरित क्रान्ति की आवश्यकता है । इसके लिये माँग एवं पूर्ति दोनों ओर कार्यवाही की आवश्यकता है ।

3. उत्पादन प्रतियोगिता को बढाना (Increasing Manufacturing Competitiveness):

उत्पादन क्षेत्र उतनी तीव्रता से विकसित नहीं हुआ जितनी तीव्रता से इसके विकसित होने की सम्भावना थी । इस क्षेत्र में औसत वृद्धि दर 8 प्रतिशत था । सकल घरेलू उत्पाद का 9 प्रतिशत वृद्धि दर प्राप्त करने के लिये उत्पादन क्षेत्र के वृद्धि दर का लक्ष्य 12 प्रतिशित रखना चाहिये । ग्यारहवीं योजना को चाहिये कि इस विषय से प्राथमिकता के आधार पर निपटे ।

उत्पादन की तीव्र वृद्धि प्राप्ति के मार्ग में मुख्य बाधा यह है कि संरचना में सम्मिलित सड़कें, रेल मार्ग, बन्दरगाहें, हवाई पतन, संचार एवं विद्युत शक्ति आदि का स्तर हमारे प्रतियोगियों के अनुरूप नहीं है । आने वाले 5-10 वर्षों के भीतर इसमें प्रभावी सुधारों की आवश्यकता है । भारतीय उद्योग को संरचना की गुणवत्ता के संदर्भ में निर्विव्न विकास की आवश्यकता है ।

4. विकासशील मानवीय साधन (Developing Human Resources):

आर्थिक विकास की प्राप्ति के लिये मान्त्रीय साधनों का विकास बहुत महत्व रखता है तथा ग्यारहवीं योजना के सामने यह एक बड़ी चुनौती है । गुणवत्तापूर्ण श्रम शक्ति की निरन्तर एवं बढ़ती हुई पूर्ति सुनिश्चित करने के लिये हमें सार्वजनिक क्षेत्र में उच्च शिक्षा की संस्थाओं में भारी निवेश की आवश्यकता है ।

इसके साथ पाठ्‌यचर्या में मौलिक सुधारों तथा शिक्षकों की सेवा शर्तों में सुधारों की आवश्यकता है ताकि योग्य अध्यापक शिक्षा क्षेत्र की ओर आकर्षित हों । उच्च शिक्षा के क्षेत्र के विस्तार के लिये निजी क्षेत्र का सहयोग भी प्राप्त किया जाना चाहिये । उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता एवं विस्तार अर्थव्यवस्था की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिये ।

5. पर्यावरण का संरक्षण (Protecting the Environment):

पर्यावरण सम्बन्धी चिन्ताएं देश के भीतर एवं विश्व स्तर पर बढ़ रही हैं । पर्यावरणीय विचारों की उपेक्षा, जल का दुरूपयोग और वनों के नाश आदि के विपरीत प्रभाव हो सकते हैं । जलवायु परिवर्तन का संकट भी आने वाली पीढ़ियों के लिये वास्तविक चुनौती उत्पन्न कर सकता है । इन सभी दिशाओं में सुधार लाने के प्रयत्न किये जाने चाहिये । इन संकटों के उचित मूल्यांकन की आवश्यकता है ।

6. पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास प्रथाओं में सुधार (Improving Rehabitation and Resettlement Practices):

पुन: स्थापन एवं पुनर्वास की प्रथाओं का संशोधन सरकार के सामने एक अन्य चुनौती है । पुनर्वास सम्बन्धी हमारी प्रथाएं गम्भीरतापूर्वक त्रुटिपूर्ण हैं और बढ़ते हुये बहिष्करण और महत्वहीनता के लिये उत्तरदायी हैं । हमारी जनजाति जनसंख्या द्वारा सहन की गई विस्थापन की लागत अनावश्यक रूप में ऊँची है ।

विशेष आर्थिक इलाकों (SEZs) से सम्बन्धित भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी ऐसी अशांति भी स्पष्ट दिखाई देती है । भारी संघर्ष एवं शान्ति और विकास के मार्ग में आने वाले सकट को रोकने के लिये, आवश्यक है कि एक पारदर्शी नीति का निर्माण किया जाये जिससे क्षतिपूर्ति से प्रभावित लोगों को परियोजनाओं से लाभ प्राप्त हो ।

7. प्रशासन में सुधार (Improving Governance):

प्रशासन में सुधार एक अन्य गम्भीर चुनौती है जिसका देश सामना कर रहा है । यदि हम जन-कार्यक्रमों में अच्छा प्रशासन सुनिश्चित नहीं कर सकते तो तीव्र विकास के हमारे सभी प्रयास व्यर्थ होंगे । आजकल भ्रष्टाचार हर दिशा में फैला हुआ है उससे छुटकारा पाना आवश्यक है ।

केन्द्र और राज्यों दोनों द्वारा स्वेच्छाचारी शक्तियों को कम करने की आवश्यकता है ताकि अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व हो सके तथा नागरिकों में जागृति की रचना हो । सूचना के अधिकार का अधिनियम लोगों को सुधरे हुये प्रशासन के लिये प्रेरित करता है तथा हमें इससे सहयोग करने के लिये तैयार रहना चाहिये ।


6. महत्वपूर्ण समस्याएं: सतत् एवं समावेशी वृद्धि (Important Issues: Sustainable and Inclusive Growth):

इस समय प्रतीत होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने निश्चित रूप में प्रगति की ओर प्रस्थान आरम्भ कर दिया है तथा यह सामान्य वृद्धि की स्थिति से उच्च विकास की स्थिति में प्रवेश कर गई है । तीव्र एवं सतत् विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिये दो विषयों पर ध्यान देने की आवश्यकता है अर्थात सामान्य स्फीति के साथ उच्च वृद्धि की सत्ता तथा ऐसी उच्च वृद्धि की समावेशी प्रवृति ।

उच्च विकास की सततता और उच्च स्फीति में प्रवेश कर जाना पहला बिन्दु है, विभिन्न सकेत दर्शाते हैं कि वृद्धि की वर्तमान स्थिति सतत् है क्योंकि, पहले तो अर्थव्यवस्था की उच्च वृद्धि के साथ खिगाशील आयुवर्ग की जनसंख्या के बढ़ते हुये अनुपात के रूप में जनसांख्यिक लाभ अधिक निवेश की वित्त-व्यवस्था के लिये बचतें बढ़ायेगें ।

दूसरे, 1990-2000 से अर्थव्यवस्था की दक्षता में सुधार उच्च वृद्धि की स्थिति में विश्वास को पुन: स्थापित करता है । तीसरे, सेवाओं में, पहले से सुपरिचित आई.टी. और आई.टी.ई एस, क्षेत्रों के अतिरिक्त नये अवसरों उपलब्धि नई उच्च वृद्धि पक्ष में विश्वास को उत्साहित करेगी ।

चौथे, निवेशों द्वारा क्षमता बढ़ाने में तीव्र वृद्धि क्षमता बाधाओं की समस्या का समाधान कर सकती पांचवें, प्रतीत होता है कि देश की संरचना में सुधार हो रहा है । इस प्रकार ऊर्जा, सड़कों, हवाई पतनों और बन्दरगाहों में प्रगति के संकेत स्पष्ट दिखाई देते हैं ।

दूसरा बिन्दु, समावेशन के सन्दर्भ में इस उच्च वृद्धि की प्रकृति से सम्बन्धित है । उत्पादक और स्थायी कामों पर अधिक लोगों को नियुक्त करना समावेशी बुद्धि का सार है । अतः समावेशी वृद्धि की प्राप्ति में सफलता उच्च वृद्धि की प्राप्ति एवं सम्भाल पर निर्भर करेगी । इसके अतिरिक्त समावेशी वृद्धि का स्वरूप स्वयं शिक्षा, स्वास्थ्य और भौतिक संरचना के क्षेत्रों में उन्नति पर निर्भर करेगा ।


7. ग्यारहवीं योजना की प्राथमिकताएं (Priorities of Eleventh Year Plan):

अपनी ग्यारहवीं योजना को अन्तिम रूप देते समय योजना आयोग ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्राथमिकताएँ की हैं:

(i) उच्च वृद्धि की सम्भाल और प्रबन्ध की चुनौती सर्वप्रथम प्राथमिकता है । वृद्धि में संवेग को प्रोत्साहित करना सदैव देश की प्रमुख प्राथमिकता रहा है । प्रासंगिक नीतियां अपनाने से, स्फीति के भय के बिना उच्च वृद्धि की सम्भाल और प्रबन्ध सम्भव है ।

(ii) उच्च वृद्धि के जुड़वा स्तम्भों अर्थात राजकोषीय समझदारी और उच्च निवेश को प्रोत्साहित करना दूसरी प्राथमिकता है । वृद्धि में अनुभव ने राजकोषीय समझदारी के लाभों का स्पष्ट प्रदर्शन FRBMA रेखाओं के साथ किया है । अतः वृद्धि की सुदृढ़ नींव रखने के लिये निवेश बढ़ाने हेतु लोचपूर्ण नीतियों की रचना करनी होगी । अतः भारतीय अर्थव्यवस्था को सार्वजनिक एवं निजी, घरेलू एवं विदेशी निवेश की आवश्यकता है ।

(iii) तीसरी प्राथमिकता, महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विशेषतया सामाजिक क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप के प्रभाव को सुधारने के लिये निश्चित है । तदानुसार, समावेशी वृद्धि के लक्ष्य की प्राप्ति शिक्षा, स्वास्थ्य और जरूरतमन्दों की सहायता के क्षेत्रों में कार्यक्रमों के ठीक प्रकार से आकृतिबद्ध करके एवं निरीक्षण द्वारा सरकार के प्रभावपूर्ण हस्तक्षेप से की जा सकती है ।

प्राथमिकताओं के सम्बन्ध में आर्थिक सर्वेक्षण 2006-07 ने सत्य ही कहा है ”चालू आर्थिक संयोग आशावाद के लक्षण प्रस्तुत करता है । विकास नीतियों के संवेग को प्रोत्साहित करने को उच्च प्राथमिकता दी जाती है । ऐसी वृद्धि की निरंतरता ऐसी नीतियों के अंश-शोधन पर निर्भर करेंगी जिन द्वारा वृद्धि को मन्द किये बिना स्फीति को धीमा किया जा सके, उचित पूर्ति पक्ष के उपायों का निर्माण विशेषतया कृषि में बेहतर आकार और सामाजिक सेवाओं की अधिक प्रभावी उपलब्धता जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और निर्धनता उन्मूलन, वृद्धि को अधिक समावेशी बनाना तथा संरचना के विकास के लिये नया उत्साह जागृत करना ।”

संक्षेप में, ग्यारहवीं योजना के प्राथमिकता पूर्ण क्षेत्र हैं- कृषि, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्धनता को कम करना तथा देश के पिछड़े क्षेत्रों के लिये योजनाएं ।