ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण | Read this article in Hindi to learn about the seven major approaches of eleventh five year plan. The approaches are:- 1. कृषि क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Agricultural Sector) 2. औद्योगिक क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Industrial Sector) 3. संरचनात्मक क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Infrastructural Sector) and Other Details.

ग्यारहवीं योजना ने अन्त में 9.0 प्रतिशत वृद्धि दर का लक्ष्य रखा है जो वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये निष्पाद्य प्रतीत होता है । तथापि, 9 प्रतिशत वृद्धि दर की प्राप्ति दृढ़ता से कृषि एवं संरचना क्षेत्रों के निष्पादन पर निर्भर करती है ।

कृषि में 4 प्रतिशत तक की वृद्धि का सभी ओर से स्वागत किया गया जो कि अर्थव्यवस्था द्वारा 9 प्रतिशत की वृद्धि के लिए मुख्य कारक है । कहा गया है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान कृषि का वृद्धि दर अनिश्चित रहा और अपनी वृद्धि प्रक्रिया को स्थिर कर पाने में सफल नहीं हुआ तथा कृषि की वृद्धि दर को 4 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर करने के सभी प्रयत्न किये जाने चाहियें ।

इसके अतिरिक्त, संरचना क्षेत्र विशेषतया विद्युत क्षेत्र (Power) की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि यह वृद्धि प्रक्रिया में आवश्यक सहायता उपलब्ध कर सके ।

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ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र ने ”समावेशी वृद्धि की रणनीति” को निर्धनता की बहुमुखी समस्याओं जैसे बेरोजगारी और सामाजिक असन्तुलनों से निपटने के लिये आमन्त्रित किया है । यह एक समयानुकूल अवधारणा प्रतीत होती है ।

इस प्रकार योजना का प्रस्ताव पत्र ठीक ही इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ”भारत के आर्थिक मूल तत्वों का ऐसे बिन्दु तक सुधार हुआ है जहां हम अपने लोगों विशेतया निर्धन लोगों के जीवन की गुणवता को सुधारने के सम्बन्ध में निर्णय लेना के सक्षम हैं । हम दस वर्षों से कम समय के भीतर औसत भारतीय की वास्तविक आय को दुगना करने का लक्ष्य रखकर और इसी काल में निर्धनता को 10 प्रतिशत कम करके लोगों के जीवन स्तर को सुधार सकते हैं । इसके लिये लक्षित वृद्धि दर अथवा ग्यारहवीं योजना में सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 4 प्रतिशत बढ़ने की आवश्यकता है, इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वृद्धि भूतकाल की तुलना में अधिक विस्तृत आधार वाली है । स्वास्थ्य, शिक्षा और विशेष निर्वाह कार्यक्रमों द्वारा निर्धन लोगों को सशक्त बनाने का प्रयास इस रणनीति का मुख्य तत्व होना चाहिये ।”

(1) कृषि क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Agricultural Sector):

कृषि क्षेत्र में अधिक सम्भाव्यताएँ हैं परन्तु इस क्षेत्र का वृद्धि दर बहुत कम है । अतः कृषि क्षेत्र द्वारा दसवीं योजना के दौरान प्राप्त की गई वृद्धि दर को दुगना करना ग्यारहवीं योजना के सामने मुख्य चुनौती है ।

कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र ने निम्नलिखित रणनीति का सुझाव दिया है:

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(क) सिंचाई के अधीन क्षेत्र की वृद्धि दर दुगना करना;

(ख) जल प्रबन्ध, वर्षा जल को एकत्रित करना और जल-विभाजक विकास का सुधार करना,

(ग) घटिया भूमि को कृषि योग्य बनाना तथा इसकी सुदृढ़ गुणवत्ता की ओर ध्यान देना;

(घ) प्रभावी प्रसार द्वारा ज्ञान के अन्तराल को भरना;

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(ङ) खाद्य पदार्थों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुये, उच्च मूल्य वाले उत्पादों की ओर विविधीकरण जैसे फलों; सब्जियों, फूलों जड़ी बूटियों, मसालों, चिकित्सा से सम्बन्धित पौधों, बाँस, बायो-डीजल आदि;

(च) पशु पालन तथा मख्स उद्योग;

(छ) सस्ते दरों पर साख तक सरल पहुँच उपलब्ध करना;

(झ) भूमि सुधार समस्याओं पर पुन: ध्यान देना, किसानों पर राष्ट्रीय आयोग ने पहले ही ऐसे ढांचे की नींव रख दी है ।

भारत में कृषि पर शोध एवं विकास (R&D) व्यय, अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार, कृषि के उच्च सामाजिक प्रतिफलो के बावजूद, बहुत कम है । भविष्य शोध एवं विकास में अधिक व्यय के साथ आधुनिक तकनीकों तथा अनुकूल संस्थाओं पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिये ।

वर्ष 2006 में राष्ट्रीय कृषि नवप्रर्वतन परियोजना आरम्भ की गई जिसका लक्ष्य था, किसानों के वर्गों और पंचायत राज संस्थाओं के सहयोग से जीविका सुरक्षा को बढ़ाना । इसके अतिरिक्त सीमान्त कृषि विज्ञान में मौलिक एवं युक्ति संगत शोध के दृढ़ीकरण में निजी क्षेत्र बहुत सहायक होगा ।

(2) औद्योगिक क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Industrial Sector):

औद्योगिक क्षेत्र ने औद्योगिक नियन्त्रणों के उदारीकरण एवं वर्ष 1991 से विश्व अर्थव्यवस्था के क्रमिक एकीकरण के कारण सुदृढ़ स्थिति प्राप्त कर ली है परन्तु अभी भी अनेक बाधाएं हैं जो औद्योगिक निष्पादन में रुकावट बनती हैं ।

अतः समय की माँग है कि औद्योगिक विकास को सभी प्रकार से उत्साहित किया जाये:

औद्योगिक क्षेत्रों में लक्षित वृद्धि दर की प्राप्ति के लिये निम्नलिखित नीति प्रस्तावित की गई है:

(क) संरचना की उन्नति;

(ख) एक समर्थक राजकोषीय ढांचा जिसमें विकार-रहित और अन्तर्राष्ट्रीय रूप में प्रतियोगी कर और शुल्क हो;

(ग) तकनीकी-वैज्ञानिक आधुनिकीकरण और उन्नति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहभागिता बनाना;

(घ) स्थानीय क्षेत्रों जैसे विशेष आर्थिक इलाकों (SEZs) में संरचना विकास का संवर्धन;

(ड) अधिक लचक सुनिश्चित करने के लिये श्रम नियमों तथा निगमित नियमों में संशोधन;

(च) लघुस्तरीय उद्योगों के लिए उद्योग के आरक्षण की क्रमिक समाप्ति;

(छ) संस्थागत साख को सुविधापूर्ण बनाना;

(ज) राज्य सरकारों द्वारा औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के लिये दिये गये प्रार्थना पत्रों के निपटारे के लिये एकल-खिड़की (Single Window) व्यवस्था द्वारा निवेश हितैषी वातावरण का निर्माण;

(झ) संरचना और सहायक सेवाएँ उपलब्ध करके ग्रामीण एवं लघु उद्योगों का प्रोत्साहन; और

(च) खनन कार्यों में निवेश के मार्ग में आने वाली बाधाओं को पहचानना और समाप्त करना ।

(3) संरचनात्मक क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Infrastructural Sector):

विकास गतिविधियों को प्रेरित करने के लिये संरचनात्मक सुविधाएं अत्यावश्यक है । अर्थव्यवस्था से प्रवाहित होने वाली वृद्धि की पूर्ण सम्भाव्यताओं की प्राप्ति के लिये गुणवत्ता की व्यवस्था और दक्ष संरचनात्मक सेवाओं का होना अत्यावश्यक है ।

”प्रस्ताव पत्र में वर्णित है ”प्रारम्भिक अभ्यास सुझाव देते हैं कि संरचना में निवेश जिसे सड़क, रेल, वायु और जल परिवहन, विद्युत उत्पादन, संचरण और वितरण, दूरसंचार, जल पूर्ति, सिंचाई और भण्डारण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है के लिये जी.डी.पी के 4.6 प्रतिशत से ग्यारहवीं योजना-काल में 7 से 8 प्रतिशत के बीच वृद्धि की आवश्यकता होगी । इससे सार्वजनिक क्षेत्र पर भारी बोझ पड़ेगा जिसे इस क्षेत्र में अधिक निवेश करना पड़ेगा । क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के साधन सीमित है, संरचनात्मक विकास के लिये सार्वजनिक निजी सहभागिता के संवर्धन के लिये एक उत्तेजक प्रयास की आवश्यकता होगी ।”

ग्यारहवीं योजना ने संरचनात्मक क्षेत्र के विकास के लिये 14,50,000 करोड़ रुपयों के निवेश का प्रस्ताव रखा है । इन निवेशों की प्राप्ति सार्वजनिक निवेश, सार्वजनिक निजी सहभागिता (PPPs) तथा जहां सम्भव हो केवल निजी निवेशों के मिश्रण द्वारा की जायेगी ।

वर्ष 2012 तक, निवेश आवश्यकताओं का अनुमान, संरचना समिति द्वारा लगाया गया है जिसके अध्यक्ष प्रधानमन्त्री हैं, कुछ क्षेत्रों के अनुमान इस प्रकार है- 2,20,000 करोड़ रुपये राज मार्गों के आधुनिकीकरण और सुधार के लिये जिसमें NHDP III से VIII, NHDP के अर्न्तगत, 40,000 करोड़ रुपये नागरिक विमानन के लिये; 50,000 करोड़ बन्दरगाहों के लिये तथा 3,00,000 करोड़ रुपये (जिनमें से 40 प्रतिशत की PPP द्वारा निजी क्षेत्र से आने की सम्भावना है) रेलवे के लिए ।

विद्युत क्षेत्र में, NTPC और कुछ राज्य उपयोगिताओं की योजना काल में 800 MW यूनिटस को अपनाने की योजना है । भारत सरकार के विद्युत मन्त्रालय ने कोयले पर आधारित अल्ट्रा-मेघा-पावर प्रोजैक्टों (UMPPs) के विकास के लिये कदम उठाये हैं । प्रस्तावित UMPPs के लिये CEA द्वारा नौ प्रान्तों में नौ स्थानों की पहचान की गई है ।

भारत सरकार भी जल और वायु स्रोतों की ऊर्जा को उत्साहित कर रही है जो कोयला ईंधन आदि पर निर्भर नहीं करते हैं और कार्बन नहीं छोड़ते । ग्यारहवीं योजना के अन्त तक, कुल 650 मिलियन टैलीफोन कनैक्यान दिये जाने की सम्भावना है जिसमें 66 मिलियन तार वाले तथा 584 मिलियन तार रहित कनैफ्यान (Mobile) होंगे । तीव्र शहरी वृद्धि की भारी समस्या को रोकने के लिये, ग्यारहवीं योजना ने जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (JNURM) के अन्तर्गत शहरी संरचना के निर्माण के लिये पर्याप्त कोष की व्यवस्था की है ।

(4) सेवाओं के क्षेत्र की ओर अभिगम (Approach towards Service Sector):

सेवाओं का क्षेत्र हमारे देश में पर्याप्त गति से बढ रहा है । इस सम्बन्ध में ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र ने कहा है कि ”सेवाओं का क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद के 54 प्रतिशत के लिये उत्तरदायी है और इस समय यह अर्थव्यवस्था का तीव्रतापूर्वक बढता हुआ क्षेत्र है, जो सन् 1990 के दशक के मध्य से प्रति वर्ष उच्च प्रतिशत से बढ़ रहा है । इस क्षेत्र में 40 मिलियन सेवाओं की रचना करने तथा सन् 2020 तक अतिरिक्त $200 बिलियन वार्षिक आय उत्पन्न करने की क्षमता है ।

इसके क्षेत्र में श्रम लागत लाभ के कारण क्षेत्र के विकास की उच्च सम्भावना है । श्रम लागत लाभ संसार में न्यूनतम वेतन स्तरों तथा क्रियाशील जनसंख्या के बढ़ते हुये भाग से प्रातेबिम्बित होते हैं । इसलिये ग्यारहवीं योजना के लिये आवश्यक है कि इस क्षेत्र की ओर विशेष ध्यान दे ताकि इस क्षेत्र की रोजगार और वृद्धि की क्षमता का पूर्ण उपयोग हो सके ।”

सेवा क्षेत्र में सक्षम क्षेत्र जब कि रोजगार और वृद्धि में बहुत योगदान कर सकते हैं उनमें सम्मिलित हैं:

(क) व्यवसायिक सेवाएँ

(ख) निर्माण विद्युतकरण और भू-सम्पदा,

(ग) पर्यटन,

(घ) प्रचून व्यापार और व्यवस्थित प्रचून व्यापार,

(ड) मनोरंजन और माध्यम सेवाएं ।

इन सभी सेवाओं में व्यवसायिक सेवाओं की परियोजना बहुत उज्ज्वल है । व्यवसायिक सेवाओं में विस्तृत सूचि सम्मिलित है जैसे आई.टी. सेवाएं ग्राहक सम्पर्क सम्बन्ध, स्वास्थ्य सेवाएं लेखा सेवाएं कानूनी सेवाएँ शैक्षिक सेवाएं निर्माण एवं इन्नीनियरिंग सेवाएं वास्तुशिल्पीय और अभिकल्प सेवाए आदि ।

सूचना और संचार तकनीक की क्रान्ति ने इन सेवाओं की सम्पूर्ण विश्व उपलब्धता को सरल बना दिया है तथा भारतीय व्यवसायियों ने अनेक क्षेत्रों में ख्याति प्राप्त की है तथा विश्व भर में अर्थशास्त्रीय जान में उनकी पहचान है ।

भारत ने अपतटीय बाजार का एक बड़ा भाग प्राप्त कर लिया है जिसमें 65 प्रतिशत भाग व्यापक अपतट आई.टी. सेवाओं का है (i.e. Outsourced Software Services) और 46 प्रतिशत व्यापक व्यापार प्रक्रिया अपतटीय (B.P.O उद्योग) भारत में IT/ITES क्षेत्र और पर्यटन, गृह-निर्माण, भूमिगत सम्पत्ति आदि का भविष्य बहुत उज्ज्वल है ।

अतः योजना आयोग ने ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र में इन विशेष क्षेत्रों पर उचित बल दिया है और योजना काल में 9.9 प्रतिशत वार्षिक औसत वृद्धि दर की प्राप्ति का लक्ष्य रखा है जबकि दसवीं योजना के दौरान यही वृद्धि दर 9.0 प्रतिशत प्राप्त किया गया था ।

(5) समावेशी विकास और समाज क्षेत्र के विकास के लिये अभिगम (Approach for Inclusive Development and Social Sector Development):

ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र ने विस्तृत-आधार पूर्ण और समावेशी वृद्धि का निर्धनता कम करने, रोजगार की रचना तथा 4 प्रतिशत, प्रतिवर्ष के दर से कृषि वृद्धि प्राप्त करने का दृढ़ता से समर्थन किया । इस प्रकार समावेशी वृद्धि की प्राप्ति की कुली मौलिक सुविधाएं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, शुद्ध पेयजल और जन समूहों को मौलिक सुविधाएं उपलब्ध करने में निहित है ।

इसलिये प्रस्ताव पत्र में लिखा गया है कि जीविका समर्थन सुधारने और रोजगार बढ़ाने पर लक्षित विभागीय नीतियों के साथ विकास प्रक्रिया में अन्तर्वेशन और विस्तृत-आधार वाली सहभागिता की रणनीति शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य आधारभूत सार्वजनिक सुविधाओं पर बल देती है । इन आवश्यक सेवाओं की अपर्याप्त उपलब्धता न केवल हमारी जनसंख्या के बड़े भाग के कल्याण को सीधे सीमित करती है बल्कि उन्हें वृद्धि के लाभों में भागीदारी से भी वंचित करती है ।

वास्तव में मानवीय साधनों की गुणवत्ता के विकास को सीमित करके यह विकास प्रक्रिया को सीमित करती है । अतः सामाजिक विकास के साथ देश के लिये आवश्यक है कि समावेशी विकास की प्राप्ति के लिये भी प्रयत्न करें । समावेशी विकास की प्राप्ति के लिये ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के निम्नलिखित उपायों के सुझाव दिये ।

(क) शिक्षा द्वारा रोजगार (Employment through Education):

सभी बच्चों को उनकी योग्यता के अनुसार तथा माता-पिता की भुगतान की क्षमता देखे बिना शिक्षा प्रदान करना लोगों को सशक्त करने के लिये अत्यावश्यक है । इसके लिये आवश्यक है कि सर्व शिक्षा अभियान (SSA) को आरम्भिक शिक्षा के स्तर पर अतिप्रभावी रूप में जारी रखा जाये, इसके लिये स्कूल छोड़ने वालों की संख्या को कम करना तथा मध्यान्ह के भोजन की योजना द्वारा स्कूलों में हाजरी को बढाना आवश्यक है ।

सैकेंडरी शिक्षा के स्तरों को बढ़ाने के लिये, ग्यारहवीं योजना ने सर्वशिक्षा अभियान-2 का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जो दसवीं श्रेणी तक प्रच्छन्नता प्रदान करेगा । इसके लिये तकनीकी व्यवसायिक और कौशल विकास के विस्तार की आवश्यकता होगी ।

अतः ग्यारहवीं योजना में पुरुषों और स्त्रियों दोनों के व्यवसायिक प्रशिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है । इसके अतिरिक्त, उच्च शिक्षा प्रणाली को विकसित करने की आवश्यकता है जिससे अधिक बच्चे प्रवेश प्राप्त कर सकें । ग्यारहवीं योजना ने व्यस्क साक्षरता को भी उचित महत्व दिया है जिससे व्यस्क साक्षरता को योजना के अन्त तक 8.5 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सके ।

(ख) बेहतर स्वास्थ्य के लिये व्यापक रणनीति (A Comprehensive Strategy for Better Health):

प्रारम्भिक स्वस्थ सुधार प्रणाली को सुधारने के लिए ग्यारहवीं योजना ने एकीकृत जिला स्वास्थ्य योजनाओं और पुन: ब्लॉक विशिष्ट स्वास्थ्य योजनाओं पर बल दिया जिससे सभी स्वास्थ्य सम्बन्धित क्षेत्रों तथा गैर-सरकारी संस्थाओं का सहयोग सुनिश्चित होगा । एक सात वर्षीय राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) जो ग्यारहवीं योजना काल को पार कर जाता है, आरम्भ किया गया है, यह ग्रामीण स्वास्थ्य संभाल की बुढ़ियों और समस्याओं का समाधान करेगा ।

(ग) सबके लिये शुद्ध पेय जल (Clean Water for All):

रोग के आपत्तन और कुपोषण को कम करने के लिये स्वच्छ पेयजल अत्यावश्यक है । ग्यारहवीं योजना सभी ग्रामीण इलाकों के निवासियों के लिये सुरक्षित पानी उपलब्ध करने की व्यवस्था करती है । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सर 1972-73 से एक मुख्य कार्यक्रम- ”Accelerated Rural Water Supply Programme (ARWSP)” कार्यान्वित किया जा रहा है ।

66,000 करोड़ रुपयों से अधिक राशि के निवेश से ग्रामीण क्षेत्रों में 42 मिलियन हैण्डपम्प और 2.1 लाख नल-गत जल योजनाओं की स्थापना की गई है । अप्रैल 1, 2006 को 97.02 प्रतिशत ग्रामीण निवासी पूर्णतया प्रच्छन्न हो चुके थे और प्रतिशत आशिक रूप से प्रच्छन्न थे ।

‘भारत निर्माण’ से पहले लगभग 28 लाख निवासी पूर्णतया प्रच्छन्न श्रेणी से पीछे फिसल चुके हैं, एक अन्य लाख निवासियो को पीने के जल की गुणवता सम्बन्धी समस्या है और लगभग 60,000 खारेपन अथवा आर्सेनिक और फ्लोराइड संदूषण की गम्भीर समस्या का सामना कर रहे हैं ।

तथापि, अप्रैल 1, 2006 को पिछड़े प्रान्तों की समस्याएँ तथा आर्सेनिक, खारेपन, फ्लोराइड तथा लोह आदि के कारण प्रदूषण में 1,95,813 निवासियों की समस्याओं को प्राथमिकता के स्तर पर सुधारने की आवश्यकता थी ।

”भारत निर्माण” के अन्तर्गत पीछे फिसल चुके निवासियों और जल की गुणवत्ता की समस्या से निपटने का भी प्रस्ताव है । इसलिये ग्यारहवीं योजना ने भारत निर्माण लक्ष्यों की पूर्ण और समय पर प्राप्ति कर ली है ।

(घ) सफाई (Sanitation):

ग्रामीण सफाई एक अन्य ध्यान देने योग्य समस्या है । सन् 1986 में केन्द्रीय ग्रामीण सफाई कार्यक्रम ”पूर्ण सफाई अभियान” सन् 1999 से आरम्भ हुआ जिस द्वारा 540 जिले तथा लगभग 35 प्रतिशत जनसंख्या दसवीं योजना के अन्त तक प्रच्छन्न हो चुकी थी । ग्याहरवीं योजना ने भी इस समस्या पर उचित ध्यान दिया ।

(6) सामाजिक क्षेत्र के विकास की और अभिगम (Approach towards Social Sector Development):

सामाजिक क्षेत्र में उन्नति की गति धीमी प्रतीत होती है जैसा कि भारत के नवीनतम ”Human Development Index” में प्रतिबिम्बित है, वर्ष 2000 के कड़ी से श्रेणी दो बिन्दु नीचे हैं । वर्तमान स्थितियों में जीवन स्तर में तीव्र उन्नति, स्वास्थ्य शिक्षा, लिंग न्याय, अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ी श्रेणियों के कल्याण और विकास की आवश्यकता है ।

ग्यारहवीं योजना के प्रस्ताव पत्र में वर्णित है कि योजना निर्धनता कम करने, प्रदेशों एवं प्रजातियों के बीच असमानता कम करने के लिये सबको मूलभूत भौतिक संरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध करेगी और लिंगभेद को सभी क्षेत्रों में कटु विषम रूप में पहचानेगी ।

प्रस्ताव पेपर, समाज क्षेत्र के विकास कार्यक्रम को पूरा करने का विश्वास दिलाता है जैसा कि ”National Common Minimum Programme (NCMP)” में वर्णित है तथा इसे पहले वर्ष 2006-07 में आरम्भ किया जा चुका है । इसमें सम्मिलित योजनाएँ जैसे NREGS, बड़ा हुआ निर्धारण, दोपहर के भोजन की योजना, राजीव गान्धी राष्ट्रीय पेय जल मिशन, NRM, JNURM, NSAP योजनाएं अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण और विकास के लिये हैं ।

(7) निर्धनता और रोजगार की ओर अधिगम (Approach towards Poverty and Employment):

भारत निर्धनता एवं बेरोजगारी की गम्भीर जुड़वा समस्याओं का सामना कर रहा है । निर्धनता को कम करने और रोजगार को बढ़ाने के लिये विभिन्न योजनाओं में अनेक निर्धनता उन्मूलन, रोजगार उत्पन्न करने और आधारभूत सेवाओं के कार्यक्रम कार्यान्वित किये जा रहे हैं ।

भारत सरकार ने पंचायत राज मन्त्रालय की स्थापना की है । जो पंचायत राज संस्थाओं के शक्तिकरण के कार्य को आगे बढा रहा है । सरकार ने पिछड़े प्रदेशों के अनुदान कोष [Backward Regions Grant Fund (BRGF)] की पिछड़े हुये 250 जिलों के लिये रचना की है तथा सन् 2006-07 के दौरान इस कार्य के लिये 3,750 करोड़ रुपये निर्धारित किये थे ।

ग्यारहवीं योजना का प्रस्ताव पत्र सेवाओं और उत्पादन क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लक्ष्य रखता है विशेषतया श्रम-गहन उत्पादन क्षेत्रों में जैसे आहार-संसाधन, चमड़े के उत्पाद, जूते और कपड़ा तथा सेवा क्षेत्र जैसे पर्यटन और निर्माण आदि ।

यह विकृत राजकोषीय प्रोत्साहनों के विलोपन के लिये भी आमन्त्रित करता है जो पूँजी गहनता, संरचनात्मक निवेश, उन विकृतियों का विलोपन जो प्रतियोगिता में बाधा बनती है, प्रवेश को रोकती है और से व्यवस्थित पदवीं की ओर अनुक्रम को हतोत्साहित करती है तथा व्यवसायिक प्रशिक्षण निपुणता पर अधिक बल देता है जिससे युवकों की रोजगार क्षमता में सुधार हो ।

ग्यारहवीं के दौरान, क्योंकि ”Village and Small Scale Enterprise (VSSE)” अधिकांश रोजगार उपलब्ध प्रस्ताव पत्र VSSE और श्रमिकों विशेषतया स्त्रियों द्वारा की जा रही समस्याओं के समाधान के निर्देश देता है जिसमें सम्मिलित हैं- समय पर और पर्याप्त मात्रा में की पूर्ति न होना, विद्युत की अनिश्चित पूर्ति, अनेक सरकारी अभिकरणों से आज्ञा की आवश्यकता और निरीक्षणों का बोझ । इसके अतिरिक्त कार्यक्रम जैसे NREGS भी रोजगार दृश्य को वर्तमान योजना में पर्याप्त सीमा तक सुधारेंगे ।