सूखे दूध: संरचना और उत्पादन | Read this article in Hindi to learn about:- 1. शुष्क दूध का संगठन तथा पोषक मात्रा (Composition and Nutritive Value of Dried Milk) 2. शुष्क दूध की उत्पादन विधियां (Production Methods of Dried Milk) 3. वांछित गुण (Desirable Characteristics) 4. महत्व एवं उपयोग (Importance and Uses).

दूध के पानी को वाष्पन या अन्य विधि द्वारा निकालने के बाद 5% या कम नमी युक्त प्राप्त दुग्ध ठोस पदार्थ को शुष्क दूध या दुग्ध चूर्ण कहते हैं । (Milk Powder is Obtained by Removal of Water from Milk by Heat or by Other Suitable Means, to Produce a Solid Containing 5% or Less Moisture). दुग्ध चूर्ण पूर्ण दूध या स्किम दूध दोनों से निर्मित किया जा सकता है ।

इसे बनाते समय दूध में उत्पादित होने वाले दुग्ध चूर्ण का 0.3% तक कैल्शियम क्लोराईड, सिट्रिक अम्ल, सोडियम साइट्रेट, ओर्थोफोस्फोरिक अम्ल या पोलीफोस्फोरिक अम्ल का सोडियम लवण मिलाये जा सकते हैं । इनके अतिरिक्त पूर्ण दुग्ध चूर्ण में भार का 0.01% ब्यूटाईलेटिड हाईड्रोक्सी ऐनीसोल (Butylated Hydroxy Anisol) भी मिलाया जाता है ।

शुष्क दूध का संगठन तथा पोषक मात्रा (Composition and Nutritive Value of Dried Milk):

दुग्ध चूर्ण में दूध के सभी संघटक पाये जाते हैं ।

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दुग्ध चूर्ण का औसत संगठन निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है:

शुष्क दूध की पोषक मात्रा (Nutritive Value of Dried Milk):

शुष्कन की आधुनिक विधि में दुग्ध अव्ययों को अत्यधिक उच्च स्तर तक सुरक्षित रखा जाता है । फुहार शुष्कन विधि में लाईसीन का बहुत थोड़ा सा विघटन होता है, जबकि रोलर शुष्कन विधि में लाईसीन की अधिक मात्रा खराब हो जाती है । शुष्क चुर्ण्ति दूध विटामिन A, कैल्शियम तथा फोस्कोरस का अच्छा स्रोत है । इनमें राइबोफ्लेविन भी उच्च मात्रा में मिलता है ।

शुष्क दूध की उत्पादन विधियां (Production Methods of Dried Milk):

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दुग्ध चूर्ण उत्पादन विधियों को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है:

A. शीत द्वारा (By Cold):

(i) पानी को बर्फ बनाकर सैन्ट्रीफ्यूज विधि द्वारा निकालना । (Freezing out Water and Centrifuging)

(ii) दुग्ध बर्फ का वाष्पन (Freezing Milk and Sublimation)- बर्फ का द्रव में परिवर्तित हुए बिना वाष्प में परिवर्तन की क्रिया को Sublimation कहते हैं ।

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B. गर्मी द्वारा (By Heat):

(i) ड्रम विधि,

(ii) फुहार विधि ।

दुग्ध चूर्ण बनाने में वर्तमान में उष्मा द्वारा शुष्कन विधि का प्रयोग किया जाता है । औद्योगिक स्तर पर फुहार विधि का प्रयोग का प्रचलन अधिक है । ड्रम विधि का उपयोग सप्रेटा दुग्ध चूर्ण निर्माण में प्रयोग करते हैं ।

1. ड्रम विधि (Drum Process) से शुष्कन:

दूध को महीन पर्त के रूप में वाष्पयुक्त ड्रम के ऊपर सुखाया जाता है । दुग्ध चूर्ण उत्पादन में इस विधि का उपयोग लगातार घट रहा है ।

प्रवाही आरेख द्वारा इस विधि को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता:

2. फुहार विधि से शुष्कन (Spray Drying Method):

दूध को महीन कणों के रूप में गर्म हवा से भरे चैम्बर में सुखाया जाता है । दुग्ध उद्योग में दुग्ध चूर्ण तथा अन्य शुष्क पदार्थ निर्माण में इस तकनीक का उपयोग किया जाता है । हम विधि द्वारा शुष्कन का अब प्रचलन लगभग बन्द हो चुका है । क्योंकि ड्रम विधि से निर्मित दुग्ध चूर्ण की विलेयता फुहार विधि द्वारा निर्मित दुग्ध चूर्ण की अपेक्षा कम है ।

शुष्क दुग्ध पदार्थ निर्माण में फुहार शुष्कन विधि को निम्नलिखित प्रवाही आरेख द्वारा दर्शाया जा सकता है:

 

अच्छे शुष्क दूध के वांछित गुण (Desirable Characteristics of Good Dried Milk):

स्प्रे विधि से सुखाये गये दुग्ध चूर्ण की गन्ध साफ, पूर्ण मीठी व सुहावनी होती है । इसका बदन व गठन महीन, नर्म व समांग होता है । रंग समान रूप से हल्का पीला या क्रीम जैसा सफ़ेद होता है । स्किम दुग्ध चूर्ण से यदि चूर्णरचित दूध निर्मित करें तो वह ताजे स्किम दूध की तरह सुवास व गन्धयुक्त होता है । हम विधि से निर्मित दूध में जली गन्ध (Cooked Flavour) आ सकती है ।

चूर्ण का मूल्यांकन (Judging of Milk Powder):

चूर्ण के मूल्यांकन के लिए पैकेज का परीक्षण करने के बाद लगभग ¾ भाग ढक्कन काटकर चूर्ण निकालते हैं । चूर्ण का रूप, दशा व गन्ध का परीक्षण किया जाता है ।

चूर्ण से दूध बनाकर लगभग 1 घन्टे बाद उसका स्वाद व गन्ध का परीक्षण करते हैं । सूखा चूर्ण समान रंग युक्त, गुच्छे रहित जले कण युक्त होना चाहिए । चूर्ण को उड़ेलते हुए उसकी महीनता, बदन व गठन का परीक्षण किया जाता है ।

दुग्ध चूर्ण के दोष-कारण व बचाव:

A. सुवास:

i. वासी (State या Old):

 

कारण:

1. अधिक समय तक संग्रह ।

2. उच्च ताप पर संग्रह ।

3. पूर्वतापन पर धक ताप ।

4. देर से ठण्डा करना ।

5. अधिक नमी ।

निवारण:

1. संग्रह काल अल्प हो ।

2. 24°C से कम ताप पर संग्रहण ।

3. पूर्वतापन में उचित ताप ।

4. निर्माण के तुरन्त बाद ठण्डा करें ।

5. नमी न्यूनतम रखें ।

ii. आक्सीकृत/धात्विक (Oxidized/Tallowy):

कारण:

1. पैकेजिम में अधिक O2 का प्रयोग ।

2. सूर्य के प्रकाश से क्रिया ।

3. मूल दूध में अधिक अम्लता ।

4. धात्विक दूषण होना ।

5. पूर्वतापन का उच्च ताप होना ।

6. अधिक ताप पर संग्रह करना ।

निवारण:

1. O2 डिब्बे में 2% से अधिक न हो ।

2. अपारदर्शी पैक का प्रयोग करें ।

3. दूध ताजा व स्वच्छ प्रयोग करें ।

4. अवकारी इस्पात का प्रयोग करे ।

5. पूर्वतापन का उचित ताप रखें ।

6. 24°C से अधिक ताप पर संग्रह न करें ।

iii. विकृत (Rancid):

कारण:

1. लाईपेज की क्रियाशीलता ।

निवारण:

1. पूर्वतापन में उचित ताप पर लाईपेज को अक्रियाशील बना दे ।

iv. जली गन्ध (Scorched or Burnt):

कारण:

1. ड्रम विधि से सुखाने का अधिक ताप होना ।

2. ड्रम की सतह गर्तयुक्त होना ।

3. खुरचने वाले चाकू ठूठें (Dull) होना ।

निवारण:

1. उचित ताप पर सुखाएं ।

2. सतह नर्म रखें ।

3. चाकू तेज (Sharp) रखें ।

(B) बदन व गठन (महीनता तथा समांगता):

i. गुच्छेदार पिण्ड (Lumpy):

कारण:

1. अप्रयाप्त शुष्कन होना ।

2. नमी का अवशोषण करना ।

निवारण:

1. पर्याप्त शुष्कन (Drying) करे ।

2. चूर्ण को नमीरुद्ध पैकों में रखें ।

 

ii. पिण्डित (Caked):

कारण:

1. नमी का शोषण करना ।

निवारण:

1. चूर्ण को नमी से बचायें ।

(C) रंग तथा रूप (Colour and Appearance):

i. घुसर होना (Browing):

कारण:

1. उच्च ताप पर संग्रह करना ।

2. अधिक समय तक संग्रह करना ।

3. शुष्कन कक्ष से चूर्ण निकालने तथा ठण्डा करने में देरी करना ।

4. संग्रह के समय अधिक नमी ।

निवारण:

1. उचित ताप पर संग्रह करें ।

2. लम्बे समय तक संग्रह न करें ।

3. तुरन्त निकाल कर ठण्डा करें ।

4. कम नमीं युक्त चूर्ण संग्रह करें ।

ii. जला हुआ (Scorched/Burnt):

कारण:

1. शुष्कन के समय अधिक ताप होना ।

2. ड्रम की सतह पर गढढे (गर्त) होना ।

3. चाकू ठूठें होना ।

निवारण:

1. उचित ताप पर सुखायें ।

2. ड्रम सतह सपाट व एक सार रखें ।

3. चाकू तेज रखें ।

शुष्क दूध का महत्व एवं उपयोग (Importance and Uses of Dried Milk):

भंडारण एवं परिवहन की सुविधा हेतु मूल दूध (Original Milk) का आयतन कम करने के उद्देश्य से इसके पानी को पूर्णतया वाष्पित करके यह उत्पाद तैयार करते हैं । शुष्क दूध का उत्पादन सामान्यतया शीतकाल में दुग्ध उत्पादन अधिक होने के मौसम (Flush Season) में किया जाता है ।

दुग्ध ठोस के सान्द्रित होने से उसका संचय गुण (Keeping Quality) बढ़ जाती है । दूध की आपूर्ति अधिक हानि पर, फालतू दूध को दुग्ध चूर्ण में परिवर्तित कर लिया जाता है जिसका उपयोग ग्रीष्म काल के दूध की कमी वाले दिनों (Lean Season) में दुग्ध आपूर्ति कम होने पर पुन: निर्मित, पुन: संयोजी या टोन्ड दूध बना कर दुग्ध आपूर्ति वृद्धि के कार्य में उपयोग किया जाता है ।

इसके अतिरिक्त दूध चूर्ण का उपयोग आईसक्रीम आदि अन्य दुग्ध उत्पाद निर्माण में भी किया जाता है । दूध के शुष्कन के लिए वर्तमान में फुहार विधि (Spray Method) का उपयोग किया जाता है । इस विधि का प्रयोग भारत में सर्वप्रथम सन् 1935 ई. में आनन्द स्थित अमूल डेरी में किया गया ।

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