वाणिज्यिक बैंकों की विफलता / दोष (सुझावों के साथ) | Read this article in Hindi to learn about the failure/defects of commercial banks in India with suggestions to remove the same.

भारत में व्यापारिक बैंकों ने राष्ट्रीयकरण के पश्चात यद्धपि महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित की है तथापित अनेक क्षेत्रों में ये बैंक असफल भी रहे हैं । इसके साथ ही इन बैंकों के व्ययों में अनेक कठिनाइयां भी आ रही है ।

व्यापारिक बैंकों की कठिनाइयां एवं असफलताएँ (Failure/Defects of Commercial Banks):

व्यापारिक बैंकों की कठिनाइयां एवं असफलताएँ निम्न कारणों से हैं:

1. क्षेत्रीय विषमताएं:

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भारत में व्यापारिक बैंकों द्वारा किया गया शाखा विस्तार पूरी तरह असंतुलित रहा है । भारत में मार्च 2014 के अंत में औसतन 12000 जनसंख्या के लिये एक बैंक शाखा है किन्तु यदि राज्य आधार पर विश्लेषण करें तो मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, उड़ीसा जैसे बड़े राज्यों में प्रति बैंक 20,000 से अधिक जनसंख्या है ।

एक ही राज्य में जहाँ कुछ जिलों में बैंक शाखाएँ अधिक है, वही अन्य जिलों में शाखाएं बहुत कम हैं । देश के सुदूर राज्यों (मणिपुर, मिजोरम, असम, अरुणाचल प्रदेश आदि) में अधिकांश गाँव आज भी बैंकिंग सेवाओं से वंचित है । अतः कहा जा सकता है कि देश में बैंक शाखाओं के विस्तार से क्षेत्रीय विषमता में वृद्धि हुई है ।

2. ग्रामीण शाखाओं का कार्य असंतोषजनक होना:

व्यापारिक बैंकों की ग्रामीण शाखाएँ अनेक समस्याओं से ग्रसित हैं । इन शाखाओं को आमदनी की तुलना में व्यय का अत्यधिक बोझ उठाना पड़ रहा है ।

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इसके कई कारण हैं:

(i) छोटे ऋण खातों की संख्या अधिक होना ।

(ii) ऋणों पर रियायती ब्याज दरों का होना ।

(iii) चालू जमा राशियों का अनुपात कम होना ।

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(iv) ऋणों की वसूली में कठिनाई होना आदि ।

इन कारणों से अनेक ग्रामीण शाखाएँ घाटे में चल रही हैं । इससे ग्रामीण शाखाओं का व्यवस्थापन एवं प्रबंधन भी असंतोषजनक हो गया है ।

3. ऋण-जमा अनुपात का असंतोषजनक होना:

व्यापारिक बैंकों के ऋण-जमा अनुपात का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि इसमें वर्ष 2001 तक निरन्तर कमी आई है । अन्य शब्दों में, बैंकों को प्राप्त जमाओं का व्यावसायिक क्षेत्रों को दिये गये ऋणों का अनुपात घट गया है । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जहां 1960-70 के दौरान ऋण-जमा अनुपात 77.8 प्रतिशत था, वह घटकर 1980-90 के दौरान 64.8 प्रतिशत एवं 2001 में 58.5 प्रतिशत रह गया ।

हालांकि वर्ष 2008 में ऋण-जमा अनुपात बढ़कर 74.6 प्रतिशत हो गया था, किन्तु वर्ष 2010 में यह गिरकर 73.7 प्रतिशत हो गया । वर्ष 2014 की स्थिति में व्यापारिक बैंकों का ऋण-जमा अनुपात 77.6 प्रतिशत है, जो कि असंतोषजनक स्थिति है । चूंकि ऋण-जमा अनुपात में कमी होने से बैंकों की लाभप्रदता में कमी आती है, अतः यह बैंकिंग विकास की दिशा में शुभ संकेत नहीं है ।

4. अनर्जक परिसम्पत्तियों (Non-Preforming Assets) का ऊँचा अनुपात:

व्यापारिक बैंकों द्वारा दिये गये ऋणों की अदायगी यदि निर्धारित समय से 180 दिन से अधिक समय तक बकाया रहती है, तो इसे अनर्जक परिसम्पत्ति माना जाता है । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार व्यापारिक बैंकों की अनर्जक परिसम्पत्तियों में क्रमशः वृद्धि हो रही है ।

बैंकों की गैर-निष्पादक अस्थियां मार्च 1998 में 50,815 करोड़ रुपये थे, जो बढ़कर मार्च 2001 में 63,883 करोड़ रुपये और मार्च 2013 में 1,931,941 करोड़ रुपये हो गई है । मार्च 2013 में केवल भारतीय स्टेट बैंक और इसकी सहायक बैंकों की गैर निष्पादक अस्थियां 2,19,565 करोड़ रुपये थी ।

वर्तमान में सभी व्यापारिक बैंक अपनी अनुत्पादक अस्तियों के दबाव को कम करने के प्रयास में है । इस दबाव को कम करने के प्रयास में बैंकों की लाभदायकता भी कम हो रही है ।

5. बैंकों के संगठन, कार्यप्रणाली एवं नीतियों में विशेष परिवर्तन नहीं:

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य जन साधारण की अल्पबचतों को संकलित करना और बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उन तक पहुँचाना था । अभी तक इस दिशा में बैंकों को पूर्णतः सफलता नहीं मिल सकी है । अभी भी बैंकों द्वारा दिये गये ऋणों का अधिकांश भाग बड़े एवं मध्यम आकार वाले उद्योगों को प्राप्त हो रहा है ।

कृषि के क्षेत्र में भी बैंकों के ऋणों से छोटे एवं सीमांत कृषकों की तुलना में बड़े कृषकों को अधिक लाभ हुआ है । प्रायः यह देखा जाता है कि सरकारी क्षेत्री की बैंकों में सेवाओं का स्तर गिर गया है, कार्यों में विलम्ब अधिक होता है और बैंक कर्मचारियों का व्यवहार सहयोगपूर्ण नहीं है । निजी क्षेत्रों के बैंकों से होने वाली प्रतियोगिता ने इन बैंकों की कमियों को उजागर कर दिया है ।

6. शुद्ध लाभ में कमी:

वर्ष 2000-01 में अनुसूचित व्यापारिक बैंकों में कुल परिचालन लाभ 19,747 करोड़ रुपये तथा शुद्ध लाभ 6,424 करोड़ रुपये दर्शाया गया था । यदि कुल अस्थियों के अनुपात के रूप में देखें तो परिचालन लाभ 1.52 प्रतिशत तथा शुद्ध लाभ केवल 0.5 प्रतिशत रहा ।

यह अनुपात बैंकों के शुद्ध लाभ की दयनीय स्थिति को प्रकट करता है । यदि केवल भारत के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक की बात करें तो वर्ष 2011 के अंत में शुद्ध लाभ मार्जिन अनुपात 8.50% था जो वर्ष 2015 के अंत में 7.49% हो गया है ।

विगत वर्षों में बैंकों की शाखाओं और ग्राहकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होने के पश्चात भी बैंकों के लाभ अनुपात में गिरावट अत्यधिक चिंता का विषय है ।

7. निक्षेप वृद्धि की असंतोषजनक प्रगति:

भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात यह माना गया था कि बैंकों की जमाओं में अभूतपूर्व वृद्धि होगी किन्तु ऐसा हुआ नहीं । हालांकि आंकडों के आधार पर विश्लेषण करें, तो मार्च 2013 में प्रति व्यक्ति निक्षेप 16,281 रुपये था, जो मार्च 2013 में बढ़कर 56,380 रुपये हो गया है ।

लेकिन बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में यह वृद्धि असंतोषजनक प्रतीत होती है । आज भी कमजोर वर्ग के लोग, किसान, कारीगर आदि की पहुँच बैंक तक नहीं बन पाई है ।

8. नियोजन हेतु धन का अभाव:

भारत ने अपने आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से लक्ष्य प्राप्ति को अपना आधार बनाया है । इस स्थिति में देश के व्यापारिक बैंकों से यह अपेक्षा रखी गई थी कि वे पंचवर्षीय योजनाओं के लिये लक्ष्य प्राप्ति हेतु वित्तीय व्यवस्था करेंगे ।

सरकार एवं योजना आयोग की अपेक्षाओं के बावजूद व्यापारिक बैंक योजनाओं के लिये वांछित राशि उपलब्ध नहीं करा सकें । इस स्थिति का बैंकों पर क्रियात्मक दबाव पड़ रहा है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है ।

9. समन्वय का अभाव:

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण अंग हैं- संगठित क्षेत्र तथा संगठित क्षेत्र के अंतर्गत व्यापारिक बैंक, सहकारी बैंक, विदेशी विनिमय फेंक, निजी क्षेत्र के बैंक आदि आते हैं जबकि असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत देशी बैंकर्स, महाजन, साहूकार आदि आते है ।

इन दोनों ही क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का सम्पर्क एवं परस्पर संबंध नहीं है । इन दोनों ही क्षेत्रों में समन्वय के अभाव के कारण देश की मौद्रिक नीति एवं साख नियंत्रण के अन्य उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सकता है ।

10. भारत में बिल बाजार का अभाव:

किसी भी देश के मुद्रा बाजार के लिये यह आवश्यक है कि वहाँ पर बिल बाजार हो, किन्तु भारत में अभी तक बिल बाजार का समुचित रूप से विकास नहीं हो सका है । इसके कारण भारतीय व्यापारी एवं उद्योगपति सस्ती साख सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं । बिल बाजार का विकास न हो पाने के कारण व्यापारिक बैंकों का विस्तार भी अवरुद्ध हुआ है ।

11. अन्य कठिनाइयां:

(a) बैंकों में अधिकांश कार्य अंग्रेजी भाषा में किया जाता है, जिससे अंग्रेजी न जानने वाले लोगों का बैंकिंग सुविधाओं के प्रति प्रत्यक्ष आकर्षण समाप्त हो रहा है ।

(b) बैंकों के कामकाज में कम्प्यूटर को प्राथमिकता दी जा रही है लेकिन अधिकांश बैंकों में कम्प्यूटर में दक्ष कर्मचारी नहीं हैं जिससे कामकाज में अधिक समय लग रहा है ।

(c) ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत रख कम्प्यूटर नेटवर्क की समस्या एक आम बात है जिससे बैंकिंग तब का प्रवाह अवरुद्ध हो रहा ।

(d) बैंकों के कामकाज पर जनप्रतिनिधियों एवं राजनीतिज्ञों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है । ऋण मेलों, ऋण स्वीकृति आदि के लिये इनका बैंकों पर दबाव बढ़ता जा रहा है, जिससे बैंक अपनी क्षमता से अधिक ऋण वितरित कर रहे हैं और उन्हें ऋण की वसूली में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ।

भारतीय वाणिज्य बैंकिंग प्रणाली के दोषों को दूर करने के सुझाव (Suggestions for Removing Defects of Indian Commercial Banking System):

भारत में वाणिज्य बैंकों की कार्यप्रणाली में कई दोष दृष्टिगोचर हो रहे हैं । इन दोषों का समाधान किये बिना भारतीय बैंकिंग प्रणाली का उच्चतम आदर्श स्थापित किया जाना असंभव सा लगता है ।

यदि निम्नलिखित सुझावों पर विचार किया जाये, तो भारतीय बैंकिंग प्रणाली के अवरोधक तत्वों का समाधान किया जा सकता है:

1. बैंक शाखाओं का विस्तार:

आज भी देश के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां बैंक शाखा न होने के कारण लोग बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उठाने में असमर्थ हैं । यदि कहीं बैंक शाखा है भी तो वे जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त नहीं है । देश में बैंकिंग वातावरण को प्रोत्साहित करने के लिये यह अत्यावश्यक है कि प्रत्येक क्षेत्र में जनसंख्या के आधार पर बैंक शाखाओं की स्थापना की जाये ।

2. बैंकों का संतुलित विकास:

एक संतुलित बैंकिंग प्रणाली की स्थापना के लिये यह अत्यावश्यक है कि नई बैंक शाखाओं अथवा नये बैंकों की स्थापना ऐसे क्षेत्रों में पहले की जानी चाहिये जहाँ पहले से कोई बैंक न हो । इससे न केवल बैंकों की आपसी प्रतियोगिता समाप्त होगी, बल्कि नये स्थानों पर नये ग्राहक बनने से बैंकिंग सुविधाओं का विकास भी हो सकेगा ।

3. जनता के विश्वास में वृद्धि:

सरकार द्वारा यह प्रयास किये जाने चाहिये कि जनता का बैंकिंग व्यवस्था में विश्वास दृढ़ हो । यदि लोग अपनी छोटी-छोटी बचतों के भी बैंक में जमा करेंगे तो बैंकों की स्थिति भी सुदृढ़ होगी और देश में बैंकिंग व्यवस्था के प्रति एक विश्वास का वातावरण पैदा हो सकेगा ।

4. साख नीति का निर्धारण:

वाणिज्यिक बैंकों को अपनी एक साख नीति का निर्धारण करना चाहिये जिसके अनुसार वे एक निश्चित सीमा तक ही जनता को ऋण दे सकें तथा आसानी से ऋणों की वसूली कर सकें । साथ ही ऋण क भुगतान समय पर न करने वाले ऋणधारकों के लिये कठोर ऋण शर्तों का भी निर्धारण किया जाना चाहिये ।

5. बैंकों की कार्य कुशलता में वृद्धि:

वर्तमान में वाणिज्यिक बैंकों को निजी एवं विदेशी बैंकों से भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है । यदि वाणिज्यिक बैंकों को अपना विकास करना है तो उन्हें अपनी कार्यकुशलता में वृद्धि करनी होगी । इसके लिये आवश्यक होगा कि बैंक अपने यहाँ योग्य, कार्यकुशल दक्ष एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति करें तथा अपनी प्रबंध व्यवस्था में सुधार करें ।

6. बैंकों की विनियोग नीति में सुधार:

बैंकों में ऐसी संस्थाओं में अपने धन को निवेश नहीं करना चाहिये, जिनमें उनके संचालकों के व्यक्तिगत हित हों तथा स्वार्थ की भावना हो । बैंकों में यथा सम्भव सरकारी प्रतिभूतियों में ही अपने धन का निवेश करना चाहिये, जिससे उनका धन की सुरक्षित रहे और सम्पत्ति की तरलता भी बनी रहे ।

7. बैंकों का आधुनिकीकरण:

बैंकों की कार्यकुशलता बढाने तथा ग्राहक संख्या में वृद्धि करने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि बैंकों में आधुनिक यंत्रों का प्रयोग किया जाये तथा कम्प्यूटरीकरण को प्राथमिकता दी जाये ।

8. स्थानीय अथवा प्रादेशिक भाषा का प्रयोग:

अधिकांशतः यह देखा जाता है कि बैंकों में अधिकतर कार्य अंग्रेजी भाषा में किये जाते है, जिससे अंग्रेजी न जानने वाले लोगों का बैंकिंग सुविधाओं के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है । यदि बैंकों में स्थानीय अथवा प्रादेशिक भाषा में प्रोत्साहन दिया जाये तो न केवल लोगों का बैंकों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा बल्कि ग्राहक संख्या में भी वृद्धि होगी ।

9. छोटे बैंकों का एकीकरण:

देश में कई वाणिज्यिक बैंक ऐसे हैं जिनकी कार्यशील पूँजी कम है । यदि इन बैंकों का एकीकरण कर दिया जाये तो इनमें आपसी प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जायेगी और इनकी कार्यशील पूंजी भी बढ़ जायेगी, जिसका लाभ जनता से बैंकिंग सुविधाओं के रूप में मिल सकेगा ।

10. लाभांश वितरण की उचित नीति:

भारतीय बैंकिंग कम्पनी अधिनियम 1949 में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि बैंकों को अपने लाभ का 20% भाग सुरक्षित कोष में तब तक जमा करना चाहिये जब तक कि उनका सुरक्षित कोष उनकी परिदत्त पूँजी के बराबर न हो जाये । प्रायः व्यवहार में यह देखा गया है कि अधिकतर बैंक अपने लाभ का अधिकांश भाग हिस्सेदारों के बीच वितरित कर देते है और सुरक्षित कोष की ओर कम ध्यान देते है ।

इससे बैंकों की वित्तीय स्थिति कमजोर हो जाती है । अतः यह अत्यावश्यक है बैंक लाभांश वितरण की एक उचित नीति बनायें और बैंकिंग अधिनियम के प्रावधानों का कढाई से पालन करें ।

11. बिल बाजार का विकास:

किसी भी देश के मुद्रा बाजार के लिये यह आवश्यक है कि वहाँ पर बिल बाजार हो, किन्तु भारत में अभी तक बिल बाजार का समुचित रूप से विकास नहीं हो सका है । भारत में बैंकिंग विकास को प्रोत्साहित करने के लिये यह आवश्यक है कि बिल बाजार तथा मुद्रा बाजार का भी विकास हो ।

12. राजनीतिक हस्तक्षेप पर लगाम:

भारत में बैंकिंग तंत्र को निर्गमित करने के लिये एक बैंकिंग विधान है जिसके प्रावधानों का कढाई से पालन सुनिश्चित होना चाहिये । प्रायः यह देखा जाता है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि बैंकों को अपनी सीमा से बाहर आकर कार्य करने के लिये विवश करते हैं, जिससे बैंकिंग व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है । अतः यह आवश्यक है कि बैंकों के कामकाज में राजनीतिज्ञ हस्तक्षेप को नियंत्रित करने के लिये कठोर नियम बनाये ।

13. अन्य सुझाव:

(a) वित्तीय संकट के समय बैंकों को अन्य संस्थाओं से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिये प्रावधान बनाये जाने चाहिये ।

(b) एक व्यक्ति-एक बैंक पद्धति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ।

(c) जमा बीमा योजना (Deposit Insurance Plan) का विकास किया जाना चाहिए ।

(d) छोटे बैंकों का एकीकरण किया जाना चाहिए ।

(e) बैंकिंग तंत्र के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित किया जाना चाहिये ।

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