अमेरिका की बहिनो और भाइयो !  Speech of Swami Viveknanda “Bothers and Sister of America” in Hindi Language!

अमेरिका की बहिनो और भाइयो ! आपने जिस मैत्री और प्रेम के साथ हम लोगों का स्वागत किया है उसके प्रति आभार प्रकट करने के लिए जब मैं यहां खड़ा हुआ हूं तो मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रह       है ।

मैं विश्व में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं; मैं धर्मों की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूं और मैं सभी सम्प्रदायों एवं मतों के करोड़ों हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं ।

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन चन्द कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद करता हूं जिन्होंने पूर्व से आये प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि दूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विभिन्न देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं ।

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मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व महसूस करता हूं जिसने विश्व को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत-दोनों का ही पाठ पढ़ाया है । हम लोग सभी धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते अपितु सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं ।

मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने पर गर्व है, जिसने इस धरती के सभी धर्मों और देशों के सताये हुए लोगों और शरणार्थियों को आसरा दिया है । मुझे आपको यह बताते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी साल शरण ली थी जिस साल उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से ध्वस्त हो गया था ।

मैं ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व महसूस करता हूं जिसने महान् जोरोस्ट्रियन राष्ट्र के विस्थापितों को आसरा दिया और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है । भाइयो! मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसको मैं बचपन से दोहराता आया हूं और जिसे रोजाना असंख्य व्यक्ति दोहराते हैं:

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।

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अर्थात् जैसे भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर विभिन्न नदियां समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे ईश्वर ! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े या सीधे मार्ग से जाने वाले लोग आखिर में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं । यह सभा, जो अब तक आयोजित हुई महान् सभाओं में से एक है, स्वत: ही ‘गीता’ के इस अद्‌भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं संसार के प्रति उसकी घोषणा करती है:

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ।।

अर्थात् जो कोई किसी भी स्वरूप में मेरी ओर आता है, मैं उसको प्राप्त होता हूं । लोग अलग रास्ते द्वारा प्रयत्न करते हुए आखिर में मेरी ही ओर आते हैं । साम्प्रदायिकता, कट्टरता और उनकी भयानक वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत वक्त तक राज्य कर चुकी है ।

वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के खून से नहलाती रही हैं सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई समूचे राष्ट्रों को निराशा के गर्त में धकेल रही हैं ।  यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियां न होतीं, तो मानव समाज आज की अवस्था में कहीं विकसित हो गया होता परन्तु अब उनका अन्तकाल आ गया है और मैं आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घाटा ध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मान्धता का तलवार या लेखनी द्वारा होने वाले सभी अत्याचारों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मनुष्यों की पारस्परिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो ।