Read this article in Hindi to learn about:- 1. राष्ट्रपति का  चुनाव और पदच्युति (पद से हटाया जाना) (President- Election and Dismissal) 2. राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य (President – Powers and Functions) 3. राष्ट्रपति  का संवैधानिक स्थिति (Constitutional Position of the President).

राष्ट्रपति का  चुनाव और पदच्युति (पद से हटाया जाना) (President- Election and Dismissal):

भारत के विधान में राष्ट्रपति पद का प्रावधान है । राष्ट्रपति भारतीय राज्य का प्रमुख है । संघ की कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति में निहित हैं पर वह नाममात्र का कार्यकारी है ।

राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के सदस्यों और राज्यों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों द्वारा चुना जाता है । इस प्रकार, संसद के दोनों सदनों के लिए नामित (मनोनीत) सदस्यगण, राज्य विधानसभाओं और विधान परिषदों (द्विसदनी विधानमंडल की स्थिति में के नामित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में नहीं लेते हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ ‘राज्य’ शब्द में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और संघ क्षेत्र पांडिचेरी शामिल हैं ।

संविधान में प्रावधान है कि राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के स्तर पर तथा समग्र रूप से राज्यों और संघ के जहाँ तक व्यावहारिक हो समानता और एकरूपता । राष्ट्रपति का चुनाव एकल हस्तांतरणीय और गुप्त मतदान द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रक्रिया के अनुसार किया है ।

ADVERTISEMENTS:

राष्ट्रपति पद पर चुने जाने के लिए किसी व्यक्ति को निम्नलिखित अर्हताएँ पूरी करनी चाहिएँ:

(i) भारत का नागरिक होना चाहिए ।

(ii) 35वर्ष की आयु पूरी की होनी चाहिए ।

(iii) लोकसभा की सदस्यता कार पात्र होना चाहिए ।

ADVERTISEMENTS:

(iv) संघ सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण में किसी लाभ के पद पर न हो ।

संविधान में उपरोक्त के अतिरिक्त निम्नलिखित शर्तें भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए निर्धारित की गई हैं:

(i) राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को संसद के किसी सदन और राज्य विधानसभा का सदस्य नहीं होना चाहिए ।

(ii) उसे लाभ के किसी अन्य पद पर नहीं होना चाहिए ।

ADVERTISEMENTS:

(iii) राष्ट्रपति की परिलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का निर्धारण संसद द्वारा किया जाएगा ।

(iv) राष्ट्रपति की परिलब्धियों और भत्ते उसके कार्यकाल में रोकी नहीं जा सकेंगी ।

राष्ट्रपति को भारत का मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाता है । उसकी अनुपस्थिति में यह कार्य सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम उपलब्ध न्यायाधीश के द्वारा संपन्न किया जाता है । राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है । तथापि वह किसी भी समय भारत के उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप सकता है । उपराष्ट्रपति को संबोधित यह त्यागपत्र लोकसभा अध्यक्ष को भेजा जाता है ।

राष्ट्रपति को संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन के महाभियोग में पद से कार्यकाल की समाप्ति से पहले हटाया जा सकता है । महाभियोग संसद के किसी भी सदन द्वारा आरोपित किया जा सकता है । यह अभियोग पर सदन के एक-चौथाई सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए । (जो बदलाव कर सकते हैं) तथा राष्ट्रपति को 14 दिन की पूर्व-सूचना देनी होती है ।

सदन के कुल सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्यों द्वारा महाभियोग विधेयक पारित कर दिए जाने के बाद इसे दूसरे सदन में अभियोगों की जांच के लिए भेजा जाता है । ऐसे जाँच के समय राष्ट्रपति को उपस्थित रहने या अपना कोई प्रतिनिधि भेजने का अधिकार है ।

यदि दूसरा सदन भी अभियोग को ठीक मानता है और अपने सदस्यों की कुल संख्या के दो-तिहाई बहुमत द्वारा महाभियोग विधेयक पारित कर देता है तो विधेयक पारित किए जाने की तिथि से ही राष्ट्रपति को पदक्षत माना जाता है । राष्ट्रपति के निधन, उनके त्यागपत्र अथवा पश्चति या अन्य स्थिति में स्थान रिक्त होने पर नया राष्ट्रपति चुने जाने तक राष्ट्रपति पद का कार्य उपराष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा ।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति बीमारी, अनुपस्थिति या अन्य कारण से अपना कार्य कर सकने कर स्थिति में न हो तो राष्ट्रपति द्वारा कार्यभार सँभालने तक उपराष्ट्रपति को वे सभी शक्तियाँ और निरापदताएँ प्राप्त होती हैं जो राष्ट्रपति को प्राप्त होती हैं । इस अवधि में उपराष्ट्रपति संसद द्वारा निर्धारित परिलब्धियों और भत्तों तथा विशेषाधिकार का हकदार होता है ।

राष्ट्रपति पदधारी अथवा पदधारण कर चुके व्यक्ति इस पद पर दुबारा चुने जाने के लिए पात्र होते हैं । राष्ट्रपति के कार्यकाल की समाप्ति पर रिक्ति को भरने के लिए चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल की समाप्ति से पहले पूरा कर लिया जाता है । इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति के निधन, त्यागपत्र या पदच्युति या अन्य कारण से हुई रिक्ति को भरने के लिए चुनाव रिक्ति की तिथि से 6 माह के भीतर करा लिया जाना चाहिए ।

राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित सभी संदेहों और विवादों का निराकरण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाता है जिसका निर्णय अंतिम होता है । राष्ट्रपति के रूप में किसी व्यक्ति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि चुनाव के समय सदस्यों की संख्या (जो चुनाव में मताधिकार का प्रयोग करते हैं) पूरी नहीं थी ।

यदि सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति के राष्ट्रपति चुने जाने को रद्द कर देता है तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसा निर्णय देने की तिथि से पूर्व उसके (राष्ट्रपति) द्वारा किए गए कार्य को अवैध नहीं माना जाएगा अर्थात वे कार्य प्रभावी रहेंगे ।

राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य (President – Powers and Functions):

भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियाँ और उसके द्वारा निष्पादित कार्य की जानकारी निम्नलिखित शीर्षों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है:

1. कार्यकारी / कार्यपालक शक्तियाँ

2. विधायी शक्तियाँ

3. वित्तीय शक्तियाँ

4. न्यायिक शक्तियाँ

5. कूटनीतिक शक्तियाँ

6. सैन्य शक्तियाँ

7. आपातकालीन शक्तियाँ

कार्यकारी शक्तियाँ:

राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य इस प्रकार हैं:

(i) भारत सरकार के सभी कार्य औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं ।

(ii) राष्ट्रपति, उस रीति के उल्लेख के साथ नियम बना सकता है जिससे उसके नाम से किए गए सभी आदेश और बनाए गए प्रपत्र प्रामाणिक हों ।

(iii) राष्ट्रपति, केंद्र सरकार के कामकाज को अधिक सुविधाजनक बनाने तथा उस कार्य को मंत्रालयों के बीच बाँटने के लिए नियम बना सकता है ।

(iv) प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है । वे राष्ट्रपति की सहमति से ही पद पर बने रह सकते हैं ।

(v) भारत के महा-न्यायवादी की नियुक्ति और उनके वेतन और भत्तों का निर्धारण राष्ट्रपति करता है । महा-न्यायवादी राष्ट्रपति की सहमति से ही पद पर बना रह सकता ।

(vi) भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों, संघ लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों राज्यों के राज्यपालों वित्त आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति करता है ।

(vii) राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से संघ के प्रशासनिक कार्यों से संबंधित सूचना और विधान से संबंधित प्रस्ताव की माँग कर सकता है ।

(viii) राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद के विचारार्थ किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय से संबंधित ऐसे किसी विषय की माँग प्रधानमंत्री से कर सकता है जिस पर मंत्रिपरिषद ने विचार विमर्श न किया हो ।

(ix) राष्ट्रपति अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग की हालात की जाँच के लिए आयोग का गठन कर सकता है ।

(x) राष्ट्रपति, केंद्र-राज्यों के मध्य और अंतर्राज्यीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राज्यीय परिषद का गठन भी कर सकता है ।

(xi) राष्ट्रपति का केंद्रीय शासित क्षेत्रों पर सीधे प्रशासनिक नियंत्रण होता है ।

विधायी शक्तियाँ:

राष्ट्रपति, भारतीय संसद का अभिन्न अंग है । राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ ये हैं:

(i) राष्ट्रपति, संसद सत्र का आह्वान और सत्रावसान कर सकता है । वह लोकसभा को भंग भी कर सकता है । वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकें भी बुला सकता है जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष को करनी होती है ।

(ii) राष्ट्रपति प्रत्येक आम चुनाव के बाद संसद के प्रथम सत्र को और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र को संबोधित करता ।

(iii) राष्ट्रपति संसद में लंबित किसी विधेयक या अन्य के संदर्भ में संसद के सदनों को संदेश भेज सकता है ।

(iv) लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद रिक्त होने की स्थिति में राष्ट्रपति लोकसभा के किसी सदस्य को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करने के लिए नियुक्त कर सकता है । इसी प्रकार वह, राज्यसभा के सभांपति और उपसभापति दोनों का पद रिक्त होने पर राज्यसभा के किसी सदस्य को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता/सभापतित्व करने के लिए नियुक्त कर सकता है ।

(v) राष्ट्रपति, साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा के क्षेत्र के 12 प्रतिष्ठित और विद्वान व्यक्तियों को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर सकता है ।

(vi) राष्ट्रपति, आंग्ल-भारतीय समुदाय से 2 व्यक्तियों को लोकसभा सदस्य के रूप में भी मनोनीत कर सकता है ।

(vii) राष्ट्रपति, चुनाव आयोग के परामर्श से संसद सदस्यों की अयोग्यता के प्रश्न का भी समाधान करता है ।

(viii) कुछ तरह के विधेयकों को संसद में लाने के लिए राष्ट्रपति की पूर्वानुमति जरूरी होती है । जैसे कि- (a) भारत की संचित निधि से व्यय किए जाने के आशय3 का विधेयक, और (b) किसी राज्य की सीमाओं में बदलाव अथवा नए राज्य का निर्माण-संबंधी विधेयक ।

(ix) संसद द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास जब भेजा जाता है तब राष्ट्रपति:

(क) विधेयक पर अपनी सहमति प्रदान करता है, या

(ख) विधेयक से संबंधित अपनी सहमति रोकता है या

(ग) विधेयक को (यदि यह मुद्रा विधेयक या संविधान संशोधन विधेयक नहीं है तो) संसद में पुनर्विचार के लिए वापिस भेजता है ।

तथापि, संसद यदि विधेयक को संशोधन के साथ या इसके । बिना दोबारा पारित करती है तो राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी होती है । इस प्रकार राष्ट्रपति को संसद द्वारा पारित विधेयकों के संदर्भ में वीटो शक्ति प्राप्त है ।

वीटो शक्ति निम्नलिखित चार प्रकार की हैं:

(क) विधेयक से संबंधित अपनी सहमति रोक लेने की वीटो शक्ति जिसे परम वीटो कहते हैं ।

(ख) सशर्त वीटो जिसके लिए विधायिका में उच्चतर बहुमत आवश्यक है ।

(ग) निलंबनीय वीटो जिसके लिए विधायिका में साधारण बहुमत आवश्यक है ।

(घ) जेबी वीटो अर्थात विधेयक से संबंधित सहमति देने में विलंब किया जाना ।

भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त वीटो शक्ति परम (एब्सॉल्युट), निलंबनीय (सस्पेंसिव) और जेबी (पॉकेट) वीटो का मिलाजुला रूप है ।

(x) जब राज्यपाल राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजता है तो राष्ट्रपति:

(क) विधेयक पर अपनी सहमति देता है, या

(ख) विधेयक पर अपनी सहमति रोक लेता है, या

(ग) राज्यपाल को विधेयक वापस राज्य विधानसभा को पुनर्विचार के लिए भेजने का (यदि विधेयक धन विधेयक नहीं है तो) निर्देश देता है । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक दोबारा पारित कर दिए जाने तथा दोबारा विचारार्थ भेजे जाने पर भी राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य नहीं है । इस प्रकार राष्ट्रपति को राज्य के विधेयकों के संबंध में निरंकुश वीटो शक्ति प्राप्त है ।

(xi) राष्ट्रपति, संसद सत्रावसान के समय अध्यादेश जारी कर सकता है । इन अध्यादेशों पर संसद द्वारा सत्र पुन: शुरू होने की तिथि से 6 सप्ताह के भीतर स्वीकृति प्रदान करनी होती है । राष्ट्रपति अध्यादेश को किसी भी समय वापस ले सकता है ।

(xii) राष्ट्रपति, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट संघ लोकसेवा आयोग की रिपोर्ट वित्त आयोग की रिपोर्ट तथा अन्य रिपोर्ट को संसद में प्रस्तुत करता है ।

वित्तीय शक्तियां:

राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियों और कार्य इस प्रकार हैं:

(i) राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही संसद में धन विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता है ।

(ii) वार्षिक वित्तीय विवरण (केंद्रीय बजट) भी राष्ट्रपति की अनुमति से संसद में रखा जाता है ।

(iii) राष्ट्रपति की अनुशंसा पर ही अनुदान की मांग की जा सकती है ।

(iv) राष्ट्रपति किसी अप्रत्याशित व्यय की पूर्ति के लिए भारत की संचित निधि से अग्रिम राशि का प्रबन्ध कर सकता है ।

(v) राष्ट्रपति, प्रत्येक पांच वर्ष बाद वित्त आयोग का गठन केंद्र और राज्यों के मध्य करों के वितरण की अनुशंसा करने की दृष्टि से करता है ।

न्यायिक शक्तियाँ:

राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियाँ और कार्य ये हैं:

(i) राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है ।

(ii) राष्ट्रपति, कानून अथवा तथ्य से जुड़े किसी प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह ले सकता है । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई सलाह को राष्ट्रपति मानने के लिए बाध्य नहीं है ।

(iii) राष्ट्रपति, किसी व्यक्ति को, किसी न्यायालय द्वारा, किसी अपराध के लिए दी गई सजा को माफ कर सकता है सजायाफ्ता व्यक्ति को कुछ समय की ढील दे सकता है सजा को कानून में निर्धारित तिथि से कम करने को कह सकता है तथा सजा के स्वरूप को बदले बिना सजा को कम करने की सलाह दे सकता है बशर्ते कि-

(a) दंड या सजा कोर्ट मार्शल द्वारा सुनाई गई हो;

(b) दंड या सजा किसी ऐसे कानून के विरुद्ध अपराध के लिए दी गई हो जो संघ की कार्यकारी शक्तियों से परे हो; और

(c) उन तमाम मामलों में जिनमें सजा मौत की सजा हो ।

माफी/क्षमा (पारडन) का आशय है किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा किसी अंपराध के लिए दी गई सजा से मुक्त करना । प्राणदंड को स्थगित (रीप्राइव) करने का आशय हैं- सजा को कुछ समय के लिए स्थगित करना । सजा स्थगित करने (रिस्पाइट) का आशय कानून में निर्धारित दंड के बदले अपेक्षाकृत कम सजा दिया जाना है । छूट (रेमिशन) से आशय है- सजा की प्रकृति को बदले बिना सजा कम करना । लघुकरण (कम्यूटेशन) का आशय है- दंड की प्रकृति को कम करना ।

कृटनीतिक शक्तियां:

अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों को राष्ट्रपति की ओर से अंतिम रूप दिया जाता है । तथापि उन पर संसद की स्वीकृति भी जरूरी होती है । राष्ट्रपति अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है तथा राजदूतों और उच्चायुक्तों जैसे कूटनीतिज्ञों की नियुक्ति करता है ।

सैन्य शक्तियाँ:

राष्ट्रपति भारतीय सेना का सर्वोच्च कमांडर होता है । थल सेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुखों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति द्वारा ही की जाती है । वह युद्ध की घोषणा करने के साथ-साथ शांति से जुड़े मामलों को संसद की स्वीकृति के लिए भेजता है ।

आपातकालीन शक्तियां:

ऊपर उल्लिखित सामान्य शक्तियों के अतिरिक्त संविधान के तहत निम्नलिखित तीन तरह की आपातकाल की स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रपति को असाधारण शक्तियाँ दी गई हैं:

(i) राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)

(ii) राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356 और 365)

(iii) वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)

राष्ट्रीय आपातकाल:

राष्ट्रपति पूरे देश में या देश के किसी भाग में निम्नलिखित आधार पर आपातकाल की घोषणा कर सकता है:

(i) युद्ध की स्थिति में या

(ii) बाह्य आक्रमण की स्थिति में या

(iii) सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में ।

संविधान में मूलतया ‘आंतरिक उपद्रव’ शब्द था किंतु 44वें संविधान (संशोधन) अधिनियम 1978 द्वारा इसकी जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द को लाया गया है । राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा मंत्रिमंडल की लिखित अनुशंसा पर ही कर सकता है । संविधान के अनुच्छेद 352 (3) में ‘मंत्रिमंडल’ शब्द का आशय ‘प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की परिषद’ से है ।

आपातकाल की घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा एक माह के भीतर अनुमोदित किया जाना होता है । संसद के अनुमोदन पर आपातकाल 6 माह तक जारी रह सकता है । प्रत्येक 6 माह के लिए संसद की स्वीकृति से आपातकाल अनिश्चित काल तक जारी रह सकता है । अब तक राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तीन बार वर्ष 1962, 1971 में और 1975 में की गई है ।

राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति को निम्नलिखित असाधारण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं:

(i) वह किसी भी राज्य को, अपनी कार्यकारी शक्तियों के उपयोग के ढंग के संबंध में निर्देश दे सकता है ।

(ii) वह लोकसभा के सामान्य कार्यकाल को एक समय पर एक वर्ष की अवधि के लिए बढ़ा सकता है ।

(iii) वह केंद्र और राज्यों के मध्य वित्तीय संसाधनों की वितरण की प्रणाली में संशोधन कर सकता है ।

(iv) जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) तथा अपराध के लिए दोषसिद्धि से संबंधित सुरक्षा को अधिकार (अनुच्छेद 20) को छोड्‌कर वह नागरिकों की मौलिक अधिकारों से वंचित कर सकता है ।

इसके अतिरिक्त 6 तरह की आजादी के अधिकार (अनुच्छेद 19) तभी निलंबित हो सकते हैं जब बाह्य आपातकाल की घोषणा हुई हो (अर्थात युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर) न कि आंतरिक आपातकाल की स्थिति में (अर्थात सशस्त्र उपद्रव की स्थिति के आधार पर)

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद उन विषयों से संबंधित कानून भी बना सकती है जिसे राज्य सूची में शामिल किया गया है । ऐसे कानून आपातकाल के 6 माह बाद प्रभावी नहीं रहते ।

राष्ट्रपति शासन:

इसे राज्य आपातकाल या संवैधानिक आपातकाल के रूप में भी जाना जाता हैं ।

राष्ट्रपति द्वारा इसकी घोषणा निम्नलिखित आधार पर की जाती है:

(i) राज्य में संवैधानिक तंत्र के असफल हो जाने पर (अनुच्छेद 356) या

(ii) संघ द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन न करने अथवा उन्हें प्रभावी न करवाने की स्थिति में (अनुच्छेद 365)

इस प्रकार राष्ट्रपति शासन राज्य के राज्यपाल से या अन्यथा प्राप्त रिपोर्ट के माध्यम से इस तथ्य से राष्ट्रपति के संतुष्ट हो जाने पर ही लगाई जाती है कि राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं किया जा सकता है ।

किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा को दो माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसे स्वीकृति देनी होती है । स्वीकृति मिल जाने पर राष्ट्रपति शासन 6 माह तक जारी रह सकता है । प्रत्येक 6 माह पर संसद की स्वीकृति से राष्ट्रपति शासन की अवधि अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है ।

तथापि, राष्ट्रपति शासन की अवधि एक वर्ष के बाद एक समय में 6 माह की अवधि के लिए ही बढ़ाई जा सकती है, बशर्ते कि निम्नलिखित दो शर्ते पूरी की जाएँ:

(i) पूरे देश में, या पूरे राज्य अथवा संबद्ध राज्य के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित हो; और

(ii) चुनाव आयोग यह प्रमाणित करे कि संबद्ध राज्य में आम चुनाव के आयोजन कठिनाइयों के कारण नहीं कराए जा सकते हैं ।

राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने पर सष्ट्रपति को निम्नलिखित असाधारण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं:

1. वह राज्य सरकार को सौंपे गए सभी या कुछ कार्य तथा राज्य में किसी निकाय या प्राधिकरण तथा राज्यपाल को प्रदत्त सभी या कुछ शक्तियाँ अपने अधीन कर सकता है ।

2. राष्ट्रपति, यह घोषणा कर सकता है कि राज्य विधानसभा की शक्तियों का उपयोग संसद द्वारा या संसद के अधीन किसी प्राधिकरण द्वारा ही किया जाएगा ।

3. राष्ट्रपति, लोकसभा के सत्रावसान के समय राज्य की संचित निधि से व्यय प्राधिकृत कर सकता है जिस पर संसद की स्वीकृति बाद में ली जाती है ।

4. राष्ट्रपति, संसद के सत्रावसान के समय राज्य में प्रशासन के लिए अध्यादेश जारी कर सकता है ।

संक्षेप में, यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति राज्य में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली राज्य मंत्रिपरिषद को भंग कर सकता है । राष्ट्रपति शासन की अवधि में राज्य के बजट और विधेयकों को संसद पारित करती है । राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त सलाहकार अथवा राज्य के मुख्य सचिव की सहायता से राज्य का प्रशासन राष्ट्रपति की ओर से चलाता है ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान संबद्ध राज्य के उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति शक्तियाँ और कार्य अपरिवर्तित रहते हैं अर्थात इन पर राष्ट्रपति शासन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । राष्ट्रपति संबद्ध उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से छेड़छाड़ नहीं कर सकता है ।

वित्तीय आपातकाल:

राष्ट्रपति उस स्थिति में वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है जब वह इस तथ्य से संतुष्ट हो कि भारत अथवा इसके किसी भाग में वित्तीय स्थिरता की स्थिति खतरे में है । वित्तीय आपातकाल की घोषणा पर संसद को दो माह के भीतर अपनी स्वीकृति देनी होती है ।

देश में वित्तीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति को निम्नलिखित असाधारण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं:

(i) वह राज्यों को वित्तीय संपत्ति से जुड़े कानूनों पर नजर रखने का निर्देश दे सकता है ।

(ii) वह राज्य के अधीन सेवारत सभी अथवा कुछ श्रेणी के व्यक्तियों के वेतन और भत्तों में कटौती संबंधी निर्देश दे सकता है ।

(iii) राष्ट्रपति, राज्य विधानसभा द्वारा पारित सभी धन विधेयक और अन्य वित्त विधेयक अपने विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है ।

(iv) राष्ट्रपति राज्य में संघ के कार्यों की देखरेख के लिए सेवारत सभी अथवा किसी वर्ग के व्यक्ति के वेतन और भत्तों में कटौती के निर्देश जारी कर सकता है जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी शामिल हैं । इस तरह के आपातकाल की घोषणा अब तक नहीं हुई है ।

राष्ट्रपति  का संवैधानिक स्थिति (Constitutional Position of the President):

भारत के संविधान में संसदीय प्रणाली की सरकार का प्रावधान है । फलस्वरूप, राष्ट्रपति को नाममात्र का कार्यकारी तथा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद को वास्तविक कार्यकारी माना गया है । दूसरे शब्दों में राष्ट्रपति को अपनी शक्तियों का उपयोग और कार्य प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह से करने होते हैं ।

संविधान में इस संदर्भ में निम्नलिखित दो प्रावधान किए गए हैं:

(i) राष्ट्रपति को संघ की कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग उसके द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर अथवा संविधान के प्रावधान के अनुसार उसके अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करना होगा (अनुच्छेद 53) ।

(ii) राष्ट्रपति की सहायता तथा उसे परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होगी तथा राष्ट्रपति अपने कार्यों का निष्पादन ऐसे परामर्श के अनुसार करेगा (अनुच्छेद 74) ।

42वें संविधान (संशोधन) अधिनियम 1976 के अनुसार राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह मानने को बाध्य है । वे संविधान (संशोधन) अधिनियम 1978 के माध्यम से राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वह मंत्रिपरिषद से ऐसी सलाह पर सामान्यतः या अन्यथा पुनर्विचार के लिए कहे । तथापि राष्ट्रपति पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करने का बाध्य होगा ।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति को संवैधानिक तौर पर कोई विवेकाधीन शक्ति प्राप्त नहीं है किंतु कुछ परिस्थितिजन्य विवेकाधीन शक्ति प्राप्त है अर्थात वह मंत्रियों की सलाह के बिना निम्नलिखित परिस्थितियों में अपने विवेक से कार्य कर सकता है:

(i) लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में प्रधानमंत्री की नियुक्ति करना ।

(ii) लोकसभा में विश्वास मत सिद्ध न कर पाने पर मंत्रिपरिषद को बरखास्त करना ।

(iii) मंत्रिपरिषद द्वारा बहुमत खो देने पर लोकसभा को भंग करना ।