भारत में असहयोग आंदोलन के लिए अग्रणी घटनाक्रम (1818-1833) | Events Leading to Non-Cooperation Movement in India (1818-1833).

१९१४-१९१८ ई॰ का युद्ध, जो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मैत्रीभाव लाया, अन्य तरीकों से भी भारतीय पक्ष को आगे बढ़ाया । भारतीय सैनिकों ने युद्ध के संकट-पूर्ण क्षणों में साम्राज्य की महान सेवा की । इसे स्वीकार करते हुए लार्ड बर्केनहेड ने सच ही कहा “यदि सचमुच भारत की सहायता के बिना युद्ध विजयपूर्ण समाप्ति पर लाया जा सकता, तो उसके बिना यह (युद्ध) बहुत ही समयसध्या बन जाता” ।

इंगलैंड ने भारत में राजनीतिक सुधारों के द्वारा इस सेवा का बदला देने को लाचार महसूस किया, खासकर इसलिए कि युद्ध का एक स्वीकृत उद्देश्य था पराधीन जातियों के लिए आत्मनिर्णय प्राप्त करना और संसार को जनतंत्र के लिए सुरक्षित बनाना ।

इसके अतिरिक्त रूसी क्रांति एवं जारशाही शासन के एकाएक पतन की शिक्षाओं ने संभवत: ब्रिटिश राजनीतिज्ञों के एक वर्ग पर कुछ प्रभाव डाला । इन सब बातों के फलस्वरूप १९१७ ई॰ की प्रसिद्ध घोषणा हुई तथा १९१९ ई॰ का संविधान आया ।

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मांटेगू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रकाशन ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में फूट डाल दी । यह कांग्रेस के एक विशेष अधिवेशन में विचारित हुआ तथा यथेष्ट निराशाकारक एवं असंतोषजनक कहकर निंदित हुआ । इस पर माडरेट दल के अधिकतर नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी तथा पीछे चलकर भारतीय लिबरल फेडरेशन की स्थापना की ।

महात्मा गाँधी (१८६९-१९४८ ई॰) का झुकाव पहले इन सुधारों के कार्यान्वित करने की चेष्टा की ओर था तथा कांग्रेस ने दिसम्बर, १९१९ ई॰ में इसके पक्ष में निर्णय किया । मगर उन्होंने एक वर्ष बीतने-बीतते अपने विचार बदल लिये । उनकी प्रेरणा से कांग्रेस ने १९२० ई॰ में कलकत्ते में हुए एक विशेष अधिवेशन में असहयोग पर प्रसिद्ध प्रस्ताव अपनाया ।

इस प्रस्ताव ने सिफारिश की कि सरकारी उपाधियों का त्याग किया जाय, विधानमंडलों, कानून की कचहरियों एवं सरकारी शिक्षण-संस्थाओं का बायकाट (बहिष्कार) किया जाए; तथा आगे चलकर करों की अदायगी बंद कर दी जाए । और भी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य अब सभी कानूनी एवं शांतिपूर्ण साधनों द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति निर्धारित किया गया ।

इस प्रकार पहले के “संविधानिक साधनों” का स्थान अब कानूनी एवं शांतिपूर्ण साधनों ने ले लिया । स्वराज्य का अर्थ लगाया गया “अपने से शासन-साम्राज्य के भीतर यदि संभव हो, बाहर यदि आवश्यक हो” ।

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इस नवीन नीति का उत्साह के साथ स्वागत हुआ । इसे जनसाधारण से अत्यधिक समर्थन प्राप्त हुआ । जैसा कि एक ब्रिटिश लेखक ने लिखा है, गाँधीजी ने “न केवल राष्ट्रीय आंदोलन को क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में परिणत किया, बल्कि उसे सर्वप्रिय भी बना दिया” । कांग्रेस ने संविधानिक आंदोलन के अपने पुराने तरीके छोड़ दिये ।

अब यह जन-साधारण के प्रसन्नतापूर्वक प्रदत्त समर्थन पर सुविस्तृत हो चली । इस महान् परिवर्तन को कुछ समसामयिक घटनाओं से सहायता मिली । इनमें दो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं: पंजाब में नृशंसता के कारनामे तथा खिलाफत आंदोलन ।

१९१९ ई॰ में सरकार ने कुछ नये उत्पीड़क उपाय पास किये । ये रौलट ऐक्ट्स के नाम से प्रसिद्ध हुए । इस नामकरण का कारण यह था कि जिस समिति की रिपोर्ट पर वे आधारित थे, उसके अध्यक्ष का नाम रौलट था । युद्ध में सरकार को असाधारण दमनकारी शक्तियाँ प्रदान की गयी थीं, जिनसे वह साधारण कानूनी कार्य-प्रणाली से छुटकारा पा ले तथा बिना मुकदमा चलाये कैद में डालने को अधिकार-संपन्न हो ।

इन उत्पीड़क काननों ने उक्त दमनकारी शक्तियों के चिरस्थायी करने की चेष्टा की । गांधीजी ने विरोध में एक सहनशील प्रतिरोध आंदोलन का संगठन किया । “भारत के बहुत-से भागों में जन-प्रदर्शनों, हड़तालों, अशांति एवं विद्रोह की एकजबर्दस्त कहर फैल गयी” । सरकार ने दमन का सहारा लेकर आंदोलन को दबा दिया ।

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इस सम्बन्ध में इसका सबसे काला धब्बा अमृतसर के जलियानवाला बाग के बारे में था । यह एक घिरी हुई जगह थी, जहाँ मनाही के बावजूद नागरिकों की एक सभा हो रही थी । भीड़ निहत्थी थी । उसके बाहर निकलने का कोई साधन न था । जनरल डायर के अधीन सैनिकों ने इस पर १६०० राउंड की गोलियाँ चलायीं ।

सरकारी हिसाब के अनुसार भी ३७१ व्यक्ति मारे गये तथा १२०० घायल बिना देखभाल के छोड़ दिये गये । पंजाब में फौजी कानून (मार्शल ला) घोषित कर दिया गया । बाद की जाँचों से उस भयंकर चित्र का उद्‌घाटन हुआ, जिसमें भरे थे- बंदूक आदि से वध, फाँसियाँ, आसमान से बमवर्षा और अत्यंत कठोर दंड जो भय के शासन में न्यायालयों द्वारा दिये गये थे ।

ब्रिटेन ने प्रथम विश्व-युद्ध में टर्की की पराजय और टर्की-साम्राज्य के अंगच्छेद में जो भाग लिया था, उगने मुसलमानों की धार्मिक एवं ऐतिहासिक भावना को चोट पहुँचाई । फलत: उन्होंने ब्रिटेन के विरुद्ध छेड़छाड़ का रुख अपनाया । मुहम्मद अली एवं शौकत अली नामक दोनों भाइयों और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने खिलाफत दोलन नामक मुसलमानों के एक जन-आंदोलन का संगठन किया ।

औद्योगिक कार्यकर्त्ताओं में पहले से ही दूर तक अशांति व्याप्त थी । १९१९ ई॰ में प्रारंभ में बम्बई मिल हड़ताल ने सवा लाख से अधिक कार्यकर्त्ताओं को प्रभावित किया । १९२० ई॰ के प्रथम छ: महीनों में दो सौ हड़तालें हुईं, जिनमें पंद्रह लाख कर्मचारी फँसे थे ।

पंजाब में नृशंसता के कारनामों ने देश को आदोलित कर डाला । खिलाफत आंदोलन में गाँधीजी ने “हिन्दुओं और मुसलमानों के मिलाने का एक वैसा अवसर” देखा, “जो सौ वर्षों में नहीं आता” । उन्होंने पूर्ण हार्दिक रूप से खिलाफत का पक्ष लिया । जैसा कि एक सरकारी पुस्तक में लिखा गया, “हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अभूतपूर्ण भ्रातृभाव” स्थापित हो गया ।

गाँधी ने विचार किया कि इस संयुक्त जन-आंदोलन की शक्तिशाली धाराओं का इस प्रकार उपयोग किया जाए, जिससे स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष को अधिकतम प्रेरणा मिले । इसने उपरिलिखित अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन का आकार ग्रहण किया ।

विरोध होने पर भी यद् प्रथम बार सितम्बर, १९२० ई॰ में कलकत्ते में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में अपनाया गया तथा दिसम्बर, १९२० ई॰ में नागपुर के वार्षिक अधिवेशन में करीब-करीब सर्वसम्मति से पुन: दृढ़ीकृत हुआ ।

आंदोलन को देश भर में हार्दिक उत्तर मिला । नवम्बर, १९२० ई॰ में कौंसिलों के लिए जो चुनाव हुआ, उसमें करीब दो तिहाई वोटरों ने भाग नहीं लिया । बहुत-से विद्यार्थी स्कूलों और कालेजों के बाहर चले आये ।

जिन वकीलों ने अपनी प्रैक्टिस छोड़ दी, उनमें देशबन्धु चित्तरंजन दास और पंडित मोतीलाल नेहरू-जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे । आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि अंग्रेजी कपड़े आग में जला दिये गये थे । सर्वत्र सरकार के विरुद्ध भद्र अवज्ञा और सहनशील प्रतिरोध की भावना दृष्टिगोचर होती थी ।

चूंकि तीस हजार राजनीतिक कैदी थे, अतएव जेल ने अपना भय खो दिया तथा जेल जाना तमगा (प्रतिष्ठा का चिह्न) बन गया । जन-साधारण में राजभक्ति की परंपरागत भावना जगाने की व्यर्थ आशा में बिटिश सरकार प्रिंस ऑफ वेल्स (ब्रिटिश सम्राट के ज्येष्ठ पुत्र) को भारत बुला लायी ।

किन्तु जिस दिन प्रिंस ऑव वेल्स बम्बई में उतरे, उस दिन समग्र भारत में हड़ताल मनायी, गयी तथा जब उन्होंने भारत की प्रांतीय राजधानियां देखीं, तब उन्हें अधिकतर परित्यक्त सड़कों से गुजरना पड़ा । इस प्रकार १९२१ ई॰ का षर्ष भारत के स्वातंष्य संग्राम के इतिहास में एक स्मरणीय सीमा-चिढ़ है ।

कांग्रेस ने, अहमदाबाद (दिसम्बर, १९२१ ई॰) के अपने वार्षिक अधिवेशन में, न केवल अधिक उत्साह के साथ अहिंसात्मक असहयोग का कार्यक्रम जारी रखने शा अपना संकल्प व्यक्त किया, बल्कि भद्र अवज्ञा का संगठन करने के कदम भी उठाये । महात्मा गांघी कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए एकमात्र कार्यकारी अधिकारी नियुक्त हुए ।

जनता का उत्साह बहुत ऊँचा उठ गया । बड़े पैमाने पर जन-आंदोलन के चलाये जाने की उत्सुकतापूर्ण आशा की जाने लगी । मगर गाँधीजी ने पहले इसे बारडोली तक सीमित करने का निर्णय किया । यह सतासी हजार आबादी का एक छोटा इलाका था । किन्तु यह आंदोलन भी स्थगित कर दिया गया ।

कारण यह हुआ कि संयुक्त प्रांत में गोरखपुर के समीप चौराचौरी नामक एक छोटे गाँव में भीड़ की ओर से हिंसा हो गयी, जिसके दौरान में एक थाना जला दिया गया तथा बाईस पुलिस जन मार डाले गये ।

गांधीजी का निर्णय सारे देश में विस्मय की भावनाओं के साथ सुना गया । किन्तु कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति द्वारा वह १२ फरवरी, १९२२ ई॰ को समर्थित हुआ । फलस्वरूप राष्ट्रीय दोलन के कुछ कामों को बहुत वर्षों के लिए स्थगित करना पड़ा ।

चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस के एक बर्ग द्वारा एक नवीन नीति अपनायी गयी । उन्होंने स्वराज्य पार्टी का संगठन किया तथा कौंसिल का आगामी चुनाव लड़े । उनका उद्देश्य था “एक नियमानुवर्ती, स्थिर एवं अविच्छिन्न रुकावट” द्वारा भीतर से सुधारों को नष्ट करना । किन्तु कुछ सफलता के बावजूद यह नीति अपने मुख्य उद्देश्य में असफल रही ।

जन-आंदोलन स्थगित होने से विफलता की भावना आ गयी । इसका हिन्दु-मुस्लिम- सम्बन्ध पर बुरा प्रभाव पड़ा । उन्हें एक साथ लाने के लिए कोई सामान्य कार्यक्रम न था । टर्की के कमाल पाशा के अधीन एक धर्म-निरपेक्षवादी राज्य बन जाने से खिलाफत आंदोलन खतम हो गया ।

अन्य कारण भी काम कर रहे थे । दोनों जातियों के बीच फ्टू का बीज बोनेवाले कुचक्री लोगों की कमी न थी । १९२३ ई॰ में कई सांप्रदायिक दंगे हुए तथा समय-समय पर ठहर-ठहरकर भारतीय राजनीतिक जीवन की करीब-करीब नियमित विशेषता बन बैठे । स्वराज्य पार्टी की असफलता का मुख्य कारण यही सांप्रदायिक वैमनस्य था ।

मुसलिम लीग की ताकत बत्‌ती गयी । इसने सर सैयद अहमद के पुराने विचारों को पुनर्जीवित कर डाला । मगर कांग्रेस को अटल राष्ट्रीय दृष्टिकोण ने घेर रखा था । इसने सांप्रदायिक समस्या के महत्व एवं प्रकृति की वास्तविक थाह नहीं ली । इसने मुस्लिम लीग की शक्ति और स्थिति का बहुत कम मूल्य लगाया ।

इस समय कुछ खिलाफत के नेता भी लीग को मजबूत करने लगे, जो अब महात्मा से प्रेरणा नहीं ग्रहण कर रहे थे । कांग्रेस ने लीग के जवाब में मुस्लिम राष्ट्रवादियों को इकट्‌ठा करना चाहा-बहुत कुछ उसी तरह जिस तरह ब्रिटिश सरकार माडरेटों को चरमपंथियों के विरुद्ध इकट्‌ठा करना चाहती थी । परिणाम एक ही हुआ, क्योंकि अंत में दोनों अपने विरोधियों की जबर्दस्त सफलता के ज्वारभाटे को रोकने में समान रूप से अयोग्य सिद्ध हुए ।

साइमन कमीशन के बायकाट ने विभिन्न जातियों और राजनीतिक दलों के बीच पुन: मेल पैदा करने के लिए एक महान् अवसर प्रस्तुत किया । कांग्रेस, मुसलिम लीग और लिबरल फेडरेशन (माडरेटों का संगठन जो ११२० ई॰ के बाद कांग्रेस से पृथक हो गये थे) सबने भारत के लिए एक संविधान बनाने के निमित्त मेल कर लिया ।

सर्व-दल-संमेलन (ऑल पार्टी कन्‌वेन्दान) १९२८ ई॰ के अंत में बैठा । किन्तु इसने मुसलमानों की ओर से मिस्टर मुहम्भद अली जिन्ना द्वारा पेश किये गये दावों को नही माना । अतएव मिस्टर जिन्ना उन मुसलमान नेताओं से जा मिले जो कांग्रेस से संपूर्णत: सहमत नहीं थे ।

१ जनवरी, १९२९ ई॰ को उन्होंने (मिस्टर जिन्ना ने) एक अखिल भारतीय मुस्लिम सम्मेलन किया, जिसने मुस्लिम दावों का एक घोषणापत्र निकाला । यह उसी बर्ष आगे चलकर मिस्टर जिन्ना द्वारा बनायी गयी प्रसिद्ध चौदह माँगों का झाधार बना । १९२७ ई॰ में हुए मद्रास के अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने लक्ष्य के रूप में पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता की घोषणा की थी ।

तो भी सर्वदल संमेलन ने, और पीछे कांग्रेस ने, स्वीकार किया कि यदि ३१ दिसम्बर, १९२९ ई॰ को या उसके पहले डोमिनियन स्टेटस दे दिया गया, तो वे इसे कबूल कर लेंगे । इसके असफल होने पर कांग्रेस ने निश्चय किया कि वह पूर्ण स्वतन्त्रता के अपने लक्ष्य का अनुसरण करेगी तथा अहिंसात्मक असहयोग का संगठन करेगी, जिसमें करों की बंदी भी सम्मिलित होगी ।

कांग्रेस की माँगों के उत्तर में वाइसराय लार्ड इरविन ने ३१ अक्टूबर, १९२९ ई॰ को घोषणा की कि “भारत की संविधानिक प्रगति का स्वाभाविक विचार्य विषय” डोमिनियन स्टेटस की प्राप्ति थै ।

उन्होंने यह भी घोषित किया कि साइमन कमीशन की सिफारिशों पर बिचार करने के लिए लंडन में सभी दलों का एक गोल मेज सम्मेलन होगा । यह कांग्रेस की मांगों से कहीं कम था । अत: कांग्रेस ने दिसम्बर, १९२९ ई॰ हुए अपने लाहौर के अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया, विधानमंडलों एवं गोल मेज सम्मेलन के बहिष्कार का निश्चय किया तथा भद्र अवज्ञा का कार्यक्रम चलाने के कदम उठाये ।

ज्योंही ३१ दिसम्बर, १९२९ ई॰ को घड़ी ने आधी रात को बारह का घंटा बजाया, त्योंही कांग्रेस के अध्यक्ष श्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत का राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया । समस्त भारत में छब्बीस जनवरी, १९३० ई॰ को स्श्तंत्रता-दिवस मनाया गया । आगे भी प्रति वर्ष इसी दिन यह गंभीर कार्य संपादित किया जाता रहा । इस प्रकार यह दिन भारत के स्वातंत्र्य-संग्राम के इतिहास में एक सीमा-चिह्न बन गया ।

गाँधीजी ने पश्चिम भारत में अपनी प्रसिद्ध डंडी-यात्रा द्वारा ६ अप्रैल को भद्र अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया । वे नमक-कानू न के नियमों की अवहेलना कर समुद्र-तट पर नमक बनाने के लिए चले । यह बड़े पैमाने पर होनेवाले जन-आंदोलन का संकेत था ।

इसके अंतर्गत जनता की हड़तालें हुई, ब्रिटिश मालों का बायकाट हुआ, चटगाँव अस्त्रागार धावा-जैसे आतंकवाद के गंभीर कांड हुए, तथा अनेक स्थानों पर “समानांतर” सरकारों की स्थापना हुई । सरकार ने दमन के कड़े उपाय अपनाये ।

सरकारी ऑकड़ों के अनुसार २९ बार गोलियाँ चलायी गयीं, जिनके फलस्वरूप १०३ मरे और ४२० घायल हुए, तथा एक वर्ष से कम ही समय में साठ हजार व्यक्ति जेल गये । सरकार द्वारा अपनाये गये दमनचक्र की एक विशेषता यह थी कि पुरुषों और महिलाओं को विचारहीन एवं निष्ठुर तरीके से पीटा जाता था ।

हड़ताल और बायकाट ने ब्रिटिश जाति पर कड़ी चोट पहुँचायी । सरकार शक्ति (पशुबल) द्वारा आंदोलन को दबाने में असमर्थ रही । तब उसने मैत्रीपूर्ण उपाय अपनाये । गोल मेज सम्मेलन नवम्बर, १९३० ई॰ में बैठा । इसमें कांग्रेस का कोई प्रतिनिधि न था । २ जनवरी १९३१ को यह स्थगित हो गया ।

४ मार्च को प्रसिद्ध गाँधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर हुए । इसके द्वारा कांग्रस ने भद्र अवज्ञा को छोड़ना और गोल मेज सम्मेलन में भाग लेना कबूल किया सरकार ने दमनकारी कानून उठा लिये तथा हिंसात्मक के अतिरिक्त अन्य राजनीतिक कैदियों को छोड़ दिया ।

गांधीजी गोल मेज सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन (७ सितम्बर से १ दिसम्बर, १९३१ ई॰ तक) में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि चुने गये । किन्तु सांप्रदायिक प्रश्न कठिन समस्या सिद्ध हुआ । भारतीय नेताओं के बीच कोई समझौता संभव न था ।

अत: प्रधान मंत्री मिस्टर रैम्जे मैकडोनल्ड को प्रसिद्ध सांप्रदायिक निर्णय (कम्युनल एवार्ड) करना पड़ा । गाँधीजी २८ दिसम्बर, १९३१ ई॰ को भारत लौटे । उन्होंने सरकारी दमनचक्र को पूर्ण रूप में कार्य में संलग्न पाया । उन्होंने वाइसराय से साक्षात्कार की प्रार्थना की ।

यह अस्वीकृत हुई । तब १ जनवरी, १९३२ ई॰ को कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति ने भद्र अवज्ञा एवं ब्रिटिश मालों के बहिष्कार के पुनर्नवीकरण का प्रस्ताव अपनाया । ४ जनवरी को गाँधीजी गिरफ्तार कर लिये गये । सरकार ने कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था करार दे दी तथा कई दमनकारी कानून निकाले ।

उनकी खुले तौर पर अवहेलना की गयी । सरकार ने प्रतिरोघ आंदोलन के विरुद्ध कड़ी कारवाइयाँ कीं । कांग्रेस के हिसाब के अनुसार एक लाख बीस हजार से अधिक व्यक्ति मार्च, १९३३ ई॰ के अंत तक गिरफ्तार हुए ।

इंडिया लीग डेलिगेशन रिपोर्ट में, जो १९३३ ई॰ में निकली थी, “विस्तृत हिंसा, शारीरिक अत्याचारों (बलात्कारों) गोली दागने एवं मारने, पीटने, दंडप्रद हमलों, गाँवों पर सामूहिक जुर्मानों और ग्रामवासियों की जमीन-जायदाद की जन्ती कुर्की का एक भयानक विवरण पाया जाता है ।

ऐसी ही उदास घड़ी में ब्रिटिश सरकार ने अपने संविधानिक प्रस्तावों की घोषणा की । रैम्जे मैकडोनल्ड ने जो सांप्रदायिक निर्णय दिया था उसका एक भाग था दलित वर्गों के लिए पृथक् निर्वाचक दल की स्थापना । इसने गाँधीजी को, जो उस समय जेल में थे उपवास करने को प्रेरित किया । परिणाम हुआ पूना पैक्ट ।

इसने दलित वर्गो में के लिए सुरक्षित स्थानों की संख्या को करीब-करीब दूना कर दिया । ये स्थान एक सामान्य संयुक्त निर्वाचकदल द्वारा भरे जाते । इन स्थानों के लिये नाम उसी नामतालिका से लिए जाते, जिसे केवल वें (दलित वर्ग) ही मूलत: चुनते । भद्र अवज्ञा आंदोलन किसी तरह मई, १९३४ ई॰ तक चलता रहा, जब यह वस्तुत: कांग्रेस द्वारा छोड़ दिया गया ।