Read this article in Hindi to learn about:- 1. विश्व राजनीति में शीत युद्ध काल (Cold War Period in World Politics) 2. शीत युद्ध के मुख्य सीमा चिह्न (Main Landmarks of the Cold War) 3. मंच (Stages) 4.तनाव शैथिल्य (Stress Staggering) 5. प्रभाव (Influence).

Contents:

  1. विश्व राजनीति में शीत युद्ध काल (Cold War Period in World Politics)
  2. शीत युद्ध के मुख्य सीमा चिह्न (Main Line Mark of the Cold War)
  3. शीत युद्ध के मंच (Stages of Cold War)
  4. शीत युद्ध में तनाव शैथिल्य (Stress Staggering during Cold War)
  5. शीत युद्ध का प्रभाव (Influence of the Cold War)


1. विश्व राजनीति में शीत युद्ध काल (Cold War Period in World Politics):

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शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त विश्व राजनीति की महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है । शीत युद्ध का तात्पर्य राष्ट्रों व उनके गुटों के मध्य घृणा व अविश्वास का वातावरण होता है तथा वे एक-दूसरे को प्रचार तथा अन्य माध्यमों से नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं । यह शस्त्रों से लड़ा जाने वाला युद्ध नहीं है ।

इसमें राष्ट्र एक-दूसरे के विरुद्ध दुष्प्रचार को मुख्य साधन के रूप में अपनाते हैं । शीत युद्ध से राष्ट्रों के मध्य तनाव बढ़ता है तथा यदि तनाव एक सीमा से आगे बढ़ जाता है तो वह वास्तविक युद्ध को जन्म दे सकता है ।

संक्षेप में शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो गुटों अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी पूँजीवादी गुट तथा भूतपूर्व सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट के मध्य तनाव की ऐसी स्थिति थी जिसने दोनों गुटों के बीच ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में घृणा व अविश्वास का वातावरण उत्पन्न किया तथा वैश्विक समस्याओं के समाधान को जटिल बना दिया ।

‘शीत युद्ध’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले अमेरिका के विद्वान बर्नाड एम बरूच ने 1947 में किया था । मोहन सुन्दर राजन ने शीत युद्ध की व्याख्या करते हुये लिखा है कि यह दो गुटों के मध्य शक्ति-संघर्ष विचारधाराओं के संघर्ष जीवन-शैली तथा राष्ट्रीय हितों के संघर्ष की राजनीति का मिला-जुला परिणाम है । इन तत्वों का अनुपात समय-समय पर बदलता रहा है, लेकिन वे एक-दूसरे को मजबूती प्रदान करते रहे हैं ।

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लुई हाल के अनुसार शीत युद्ध परमाणु युग में शस्त्र युद्ध से भी भयानक स्थिति है । उनके अनुसार शीत युद्ध ने अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान के स्थान पर उन्हें अधिक उलझा दिया है ।

शीत युद्ध-उद्‌भव तथा कारण (दो महाशक्तियों का उदय):

शीत युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति की महत्त्वपूर्ण घटना है । 1991 में सोवियत रूस के विघटन के उपरान्त ही साम्यवादी गुट का अन्त हो गया तथा इसे ही शीत युद्ध के अन्त के रूप में जाना जाता है । द्वितीय विश्व युद्ध से 1991 तक शीत युद्ध की तीव्रता में कई उतार चढ़ाव देखे गये हैं । शीत युद्ध की राजनीति ने इस काल में विश्व की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को प्रभावित किया है ।

विद्वानों ने शीत युद्ध के विकास हेतु निम्नलिखित कारकों को उत्तरदायी माना है:

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1. 1917 में रूस में साम्यवादी क्रान्ति का सूत्रपात हुआ । सोवियत संघ की साम्यवादी विचारधारा अमेरिका व पश्चिमी देशों की पूँजीवादी विचारधारा की विरोधी है । अंत: दोनों गुटों के मध्य वैचारिक संघर्ष का आरम्भ यहीं से होता है । शीत युद्ध काल में दोनों गुटों ने एक-दूसरे के वैचारिक प्रभाव को सीमित करने का भरसक प्रयास किया है ।

2. द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब हिटलर ने सोवियत संघ के विरुद्ध आक्रमण किया तो सोवियत संघ ने अमेरिका व पश्चिमी देशों से हिटलर के विरुद्ध दूसरा मोर्चा खोलने का अनुरोध किया था लेकिन अमेरिका ने दूसरा मोर्चा खोलने में देरी की जिससे सोवियत संघ को अकेले ही जर्मन आक्रमण का सामना करना पड़ा । इस घटना से अमेरिका व सोवियत संघ के बीच मनमुटाव बढ़ गया ।

3. युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के देशों हंगरी, यूगोस्लाविया, रूमानिया, बुल्गारिया आदि में अपने साम्यवादी प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास किया जिसका अमेरिका व पश्चिमी गुट द्वारा तीव्र विरोध किया गया । इसी तरह ईरान से सोवियत संघ ने अपनी सेनाएँ हटाने में आनाकानी की । यूनान में भी सोवियत संघ के साम्यवादी हस्तक्षेप से पश्चिमी देश नाराज हो गये ।

4. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही अमेरिका द्वारा परमाणु बम का आविष्कार किया गया जिसकी जानकारी उसने अपने पश्चिमी मित्रों को दे दी, लेकिन सोवियत संघ को इसकी जानकारी नहीं दी गयी । सोवियत रूस ने इसे विश्वासघात माना क्योंकि अमेरिका व सोवियत संघ युद्ध में एक साथ थे ।

5. द्वितीय विश्व युद्ध के अन्तिम चरण में एक तरफ अमेरिका व पश्चिमी देशों तथा दूसरी तरफ सोवियत संघ दोनों ने एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना आरम्भ कर दी । सोवियत समाचार पत्रों में जहाँ अमेरिका विरोधी लेख प्रकाशित हुये वहीं अमेरिका व ब्रिटेन के विदेश सचिवों ने अपने एक संयुक्त बयान में 18 अगस्त 1945 को कहा कि हमें तानाशाही के एक रूप के स्थान पर दूसरे रूप की स्थापना को रोकना चाहिये ।

इस कड़ी में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने 5 मार्च, 1946 को फुल्टन नामक स्थान पर दिये गये अपने प्रसिद्ध भाषण में सोवियत संघ के शासन को लौह आवरण बताते हुये स्वतंत्रता की रक्षा के लिये सोवियत संघ के विरुद्ध एक रेल-अमेरिकी गठबन्धन की आवश्यकता पर बल दिया ।

चर्चिल के इसी भाषण को शीत युद्ध की औपचारिक शुरुआत के रूप में जाना जाता है । शीत युद्ध के परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर दोनों गुटों के सैनिक गठबन्धनों का विकास हुआ वहीं दूसरी ओर दोनों महाशक्तियों के मध्य शस्त्रों की दौड़ को भी बढ़ावा मिला । यद्यपि दोनों महाशक्तियों के मध्य तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ लेकिन शीत युद्ध से विश्व में तनाव व अविश्वास को बढ़ावा मिला तथा कई वैश्विक समस्याओं का समाधान जटिल हो गया ।

सैनिक गठबन्धनों की स्थापना (Establishment of Military Alliances):

यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में सामूहिक सुरक्षा के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी थी, लेकिन दोनों गुटों ने अपने प्रभाव में वृद्धि करने तथा अपने सहयोगियों की सुरक्षा बढ़ाने के लिये सैनिक गठबन्धनों की स्थापना की नीति अपनायी ।

अमेरिका तथा उसके पश्चिमी सहयोगी देशों ने जहाँ 1949 में ‘नाटो’-नार्थ अटलांटिक संधि संगठन’ की स्थापना की वहीं सोवियत संघ तथा उसके साम्यवादी सहयोगियों ने 1955 में ‘वारसा’ सन्धि की स्थापना की । इन सैन्य गठबन्धनों की सन्धि में इस बात का प्रावधान किया गया था कि यदि किसी एक सदस्य देश पर बाह्य आक्रमण होता है तो वह सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जायेगा ।

अत: इन सैनिक गठबन्धनों से वैश्विक सुरक्षा के स्थान पर असुरक्षा व तनाव को बढ़ावा मिला । 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद 1992 में वारसा सन्धि संगठन को भंग कर दिया गया था लेकिन नाटो का अस्तित्व अब भी बना हुआ है ।

बल्कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप के देशों में किया गया है । सैनिक गठबन्धनों की राजनीति केवल यूरोप तक ही सीमित नहीं थी । पश्चिमी गुट द्वारा इनका विस्तार पश्चिम एशिया दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में भी किया ।

दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों जैसे कम्बोडिया, लाओस, वियतनाम आदि को साम्यवादी प्रभाव में जाने से रोकने के लिये 8 सितम्बर, 1954 को ‘सीटो’ -साउथ-ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन-सैनिक सन्धि पर हस्ताक्षर किये गये ।

1955 में मध्य एशिया में पश्चिमी प्रभाव को मजबूत करने के लिये ‘सेण्टो’ -सेण्ट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन- नामक सैनिक सन्धि संगठन की स्थापना की गयी । पाकिस्तान भी सेण्टो तथा SEATO का सदस्य था तथा इसे बगदाद पैक्ट के नाम से भी जाना जाता है ।

शस्त्रों की दौड़ को बढ़ावा:

शीत युद्ध के समय दोनों गुटों के मध्य केवल परम्परागत शस्त्रों को ही नहीं वरन् आणविक शस्त्रों की दौड़ को बढ़ावा मिला । द्वितीय विश्व युद्ध के समय केवल अमेरिका ही परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र था, लेकिन 15 वर्षों के अन्दर अन्य चार देश- सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, व चीन भी घोषित परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बन गये । सोवियत संघ ने अगस्त 1953 में ही परमाणु परीक्षण कर लिया था ।

यद्यपि तनाव शैथिल्य के चरण में 1970 में महाशक्तियों ने परमाणु हथियारों के विस्तार पर रोक लगाने के लिये परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किये लेकिन परमाणु हथियारों के विस्तार को नहीं रोका जा सका । धीरे-धीरे भारत, पाकिस्तान, इजराइल व उत्तरी कोरिया ने भी परमाणु हथियारों की क्षमता अर्जित कर ली । अत: शस्त्रों की दौड़ शीत युद्ध का आवश्यक अंग था ।


2. शीत युद्ध के मुख्य सीमा चिह्न (Main Landmarks of the Cold War):

शीतयुद्ध का काल 1945 से 1991 तक माना जाता है । इस कालखण्ड की महत्वपूर्ण घटनाएँ निम्नलिखित हैं:

1. 1947:

अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एसट्रूमैन द्वारा ट्रूमैन सिद्धान्त की 12 मार्च को घोषणा, जिसके अन्तर्गत अमेरिका विश्व के विभिन्न देशों में साम्यवाद के प्रसार को रोकने की नीति अपनायेगा ।

2. 1947:

23 अप्रैल को अमेरिका के विदेश सचिव जान मार्शल ने ‘मार्शल योजना’ की घोषणा की, जिसके अन्तर्गत यूरोप को साम्यवादी प्रभाव से बचाने के लिये पुनर्निर्माण हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की जायेगी । यह योजना 1952 तक चली ।

3. 1948-49:

सोवियत संघ द्वारा बर्लिन की घेराबन्दी, जिसके कारण अमेरिका तथा उसके सहयोगियों को पश्चिम बर्लिन के लिये आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति वायु मार्ग से करनी पड़ी ।

4. कोरिया युद्ध (1950-53):

युद्ध के परिणामस्वरूप 38वीं अक्षांश रेखा के आधार पर कोरिया का विभाजन उत्तरी कोरिया साम्यवादी प्रभाव में तथा दक्षिण कोरिया पश्चिमी देशों के प्रभाव में आया ।

5. 1953:

अगस्त में सोवियत संघ द्वारा पहला परमाणु परीक्षण ।

6. 1954:

वियतनाम द्वारा फ्रांस की पराजय, वियतनाम समस्या पर जेनेवा समझौता, 17वीं अक्षांश के आधार पर वियतनाम का उत्तरी व दक्षिणी वियतनाम में विभाजन, तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिये सीटो सन्धि संगठन की स्थापना ।

7. 1954-1975:

वियतनाम में अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप अमेरिका को सैनिक असफलता ।

8. 1955:

मध्य एशिया के लिये अमेरिका द्वारा बगदाद पैक्ट अथवा सेण्टो सन्धि संगठन की स्थापना ।

9. 1956:

सोवियत सेनाओं द्वारा हंगरी में सैनिक हस्तक्षेप तथा वहाँ साम्यवादी शासन की स्थापना ।

10. 1961:

अमेरिका द्वारा क्यूबा के पास पिगस की खाड़ी में सैनिक हस्तक्षेप, बर्लिन की दीवार का निर्माण ।

11. 1962:

क्यूबा, मिसाइल संकट, जिसे शीत युद्ध के चरमोत्कर्ष के रूप में जाना जाता है ।

12. 1965:

डोमिनिकन गणराज्य में अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप ।

13. 1968:

चेकास्लोवाकिया में सोवियत सैनिक हस्तक्षेप तथा साम्यवादी शासन की स्थापना ।

14. 1972:

अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा चीन की ऐतिहासिक यात्रा । भारत व चीन के सम्बन्ध अभी तक अच्छे नहीं थे, क्योंकि चीन एक साम्यवादी देश है तथा अमेरिका सुरक्षा परिषद् में चीन की सदस्यता का विरोध कर रहा था । इस परिवर्तन को ‘पिंग पोंग’ कूटनीति का परिणाम माना जाता है, जिसके अन्तर्गत अमेरिका ने चीन से सम्बन्ध सुधारने के लिये 1970 में अपनी टेबल-टेनिस टीम को चीन भेजा था ।

15. 1978-89:

वियतनाम द्वारा कम्बोडिया में सैनिक हस्तक्षेप व वियतनाम युद्ध ।

16. 1979-89:

अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं की तैनाती ।

17. 1985:

मिखाइल गार्बाचेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने तथा आन्तरिक सुधारों हेतु पेरेस्ट्राइका तथा गलैसनास्ट नीतियाँ लागू की ।

18. 1989:

नवम्बर में बर्लिन की दीवार टूटी तथा पूर्वी जर्मनी में सरकार के विरुद्ध व्यापक जन आन्दोलन ।

19. 1990:

3 अक्टूबर को पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण ।

20. 1991:

अगस्त में सोवियत संघ का विघटन तथा शीत युद्ध युग का अन्त ।


3. शीत युद्ध के मंच (Stages of Cold War):

शीत युद्ध में दोनों महाशक्तियों व उनके गुटों का मुख्य उद्देश्य अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर दूसरे को कमजोर करना था । अत: तीसरी दुनिया के देशों से जुड़े मुद्‌दों, विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय मैचों, विश्व के अन्य क्षेत्रों को शीत युद्ध के मैचों के रूप में प्रयोग किया गया ।

शीत युद्ध के मंचों से तात्पर्य उन मुद्‌दों व क्षेत्रों से है जहाँ दोनों महाशक्तियाँ तथा उनके गुट अपने वर्चस्व की लड़ाई में संलग्न थे, जिससे उनके मध्य तनाव तथा युद्ध की आशंका का वातावरण तैयार हुआ । शीत युद्ध के इतिहास में कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं तथा कई ऐसे तत्वों का विकास हुआ है, जिन्होंने शीतयुद्ध के भयावह परिणामों को रेखांकित किया है । कई बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे तीसरे विश्व युद्ध की आशंका बढ़ गयी ।

इनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है:

1. जर्मनी का विभाजन (Germany’s Partition):

जर्मनी का विभाजन शीत युद्ध की एक महत्वपूर्ण घटना है । द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी पराजित हुआ था । जर्मनी के पश्चिमी क्षेत्रों पर पश्चिमी देशों-अमेरिका, ब्रिटेन तथा फ्रांस का कब्जा था, जबकि इसके पूर्वी भाग पर सोवियत संघ का कब्जा था । पश्चिमी देशों तथा सोवियत संघ के बीच जर्मनी के एकीकरण के बारे में कोई सहमति नहीं बन पाई ।

परिणामत: 21 सितम्बर, 1949 को पश्चिमी देशों ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों को मिलाकर पश्चिमी जर्मनी अथवा फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी की स्थापना कर दी । इसके उत्तर में सोवियत रूस ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में पूर्वी जर्मनी अथवा जर्मन प्रजातांत्रिक गणराज्य की स्थापना कर दी । अंतत: शीत युद्ध की समाप्ति के समय 1990 में ही जर्मनी का एकीकरण हो सका ।

2. कोरिया युद्ध (Korea War (1950-53)):

द्वितीय विश्व युद्ध के समय कोरिया पर जापान का नियंत्रण था लेकिन जापान की पराजय के बाद इसके उत्तरी हिस्सों पर साम्यवादी गुटों का नियंत्रण हो गया जबकि इसके दक्षिणी हिस्सों पर गैर-साम्यवादी गुटों का नियंत्रण था । दोनों भागों में युद्ध हुआ जिसमें उत्तरी कोरिया को चीन तथा सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था जबकि दक्षिण कोरिया को पश्चिमी देशों का समर्थन प्राप्त था ।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने सोवियत संघ की अनुपस्थिति में उत्तरी कोरिया को आक्रमणकारी घोषित कर दिया । परिणामस्वरूप अमेरिका के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र की सेनाओं ने उत्तरी कोरिया के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की । 1950-53 के मध्य चले इस युद्ध में जब युद्ध विराम समझौता हुआ तो कोरिया का विभाजन कर दिया गया । आज भी दोनों कोरिया अलग-अलग देश हैं ।

3. क्यूबा मिसाइल संकट, 1962 (Cuban Missile Crisis):

क्यूबा मिसाइल संकट शीत युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण घटना है । यह शीत युद्ध के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है । इसने तीसरे विश्व युद्ध का खतरा उत्पन्न कर दिया था । लेकिन इसके बाद तनाव शैथिल्य के लक्षण दिखाई दिये । क्यूबा अमेरिका के निकट एक छोटा द्वीप है, जहाँ 1959 में फिडेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्रान्ति के उपरान्त साम्यवादी शासन की स्थापना हुई थी ।

अमेरिका ने अपने पड़ोस में साम्यवादी शासन को पसन्द नहीं किया । सोवियत संघ ने क्यूबा की सैनिक व आर्थिक मदद की तथा वहाँ सैनिक अड्‌डे स्थापित किये जिससे अमेरिका की सुरक्षा चिन्तायें बढ़ गई । अन्तत: 22 अक्टूबर, 1962 को अमेरिका ने क्यूबा की नाकेबन्दी की घोषणा कर दी जिससे अब क्यूबा में सोवियत सैन्य सामग्री व आणविक मिसाइल नहीं पहुंच सकती थी ।

इससे दोनों महाशक्तियों के मध्य युद्ध की आशंका बढ़ गयी । अन्तत: सोवियत राष्ट्रपति ख्रुश्चेव ने क्यूबा में आणविक मिसाइलें न भेजने का निर्णय लिया जिससे यह संकट समाप्त हुआ । अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी ने ख्रुश्चेव के निर्णय को ‘एक महान राजनेता का निर्णय’ कहकर उसकी सराहना की । इससे तीसरे विश्व युद्ध का खतरा टल सका ।

4. कांगो संकट व तीसरी दुनिया के अन्य क्षेत्र (Congo Crisis and Other Areas of the Third World):

तीसरी दुनिया के देशों पर प्रभुत्व को लेकर दोनों महाशक्तियों में तनाव की कई घटनाएँ सामने आयी हैं । इनमें कांगो का संकट एक प्रमुख उदाहरण है । कांगो अफ्रीका महाद्वीप स्थित एक छोटा देश है जो 1960 में बेल्जियम के शासन से मुक्त हुआ था । स्वतंत्रता के समय कांगों में विभिन्न जातियों के मध्य गृह युद्ध आरम्भ हो गया ।

बेल्जियम ने कांगो में अपने नागरिकों की रक्षा का तर्क देकर जुलाई 1960 को कांगो में सैनिक हस्तक्षेप कर दिया । कांगो की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ से बेल्जियम की सेनाएँ वापिस करने की माँग की । संयुक्त राष्ट्र की सेना करूंगा प्रान्त को छोड़कर कांगो के सभी प्रान्तों में पहुँच गयी ।

इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष बातचीत के लिये जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कांगो जा रहे थे तो मार्ग में वायु दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी । इस घटना के बाद कांगो में शान्ति स्थापना हो गयी तथा वहाँ महाशक्तियों के बीच संघर्ष को टाला जा सका ।

इसके अतिरिक्त वियतनाम युद्ध 1973, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति का विरोध विभिन्न देशों में स्वतंत्रता आन्दोलनों को समर्थन देने आदि मुद्‌दों पर दोनों देशों द्वारा विरोधी नीतियों को अपनाया गया । प्रत्येक महाशक्ति ने अपने हितों को ध्यान में रखकर इन मुद्‌दों पर समर्थन अथवा विरोध की नीति अपनायी ।

जहाँ सोवियत संघ ने तीसरी दुनिया के देशों में साम्यवादी गुटों को सैनिक व आर्थिक समर्थन दिया वहीं अमेरिका ने गैर-साम्यवादी समूहों को बढ़ावा दिया । दोनों महाशक्तियों का मुख्य उद्देश्य तीसरी दुनिया के देशों में अपने प्रभाव का विस्तार करने के साथ-साथ वहाँ आर्थिक व सैनिक उद्देश्यों की पूर्ति करना था । संक्षेप में तीसरी दुनिया के देशों में महाशक्तियों के अग्रलिखित हित संलग्न थे ।

(i) तीसरी दुनिया के देशों में महत्वपूर्ण संसाधनों जैसे तेल व खनिज पदार्थों को प्राप्त करना ।

(ii) तीसरी दुनिया के देशों में सैनिक सुविधाएं प्राप्त करना तथा सैनिक अड्‌डे स्थापित करना ।

(iii) तीसरी दुनिया के देशों को महाशक्तियों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध गुप्तचर सूचनाएं प्राप्त करने के लिये प्रयोग करना ।

(iv) एक सुरक्षा सहयोगी के रूप में तीसरी दुनिया के देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त करना ।

(v) महाशक्तियों द्वारा तीसरी दुनिया के देशों को अपने वैचारिक समर्थकों के रूप में प्रयोग करना ।

5. संयुक्त राष्ट्र संघ व उसके अभिकरण (United Nations and its Agency):

संयुक्त राष्ट्र संघ व उसके विभिन्न अंग विशेषकर महासभा व सुरक्षा परिषद् शीत युद्ध के प्रमुख मंच थे । महासभा की बैठकों में दोनों ही महाशक्तियों ने एक-दूसरे के विरुद्ध आरोपों का आदान-प्रदान किया तथा सुरक्षा परिषद् की बैठकों में वीटो शक्ति का अपने हितों में प्रयोग किया जिससे संयुक्त राष्ट्रसंघ विश्व शान्ति की अपनी भूमिका में प्रभावी नहीं हो पाया ।

शीत युद्ध काल में वीटो शक्ति का सबसे अधिक प्रयोग सोवियत संघ द्वारा किया गया । सोवियत संघ ने विश्व बैंक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा गैट जैसी संस्थाओं की सदस्यता ग्रहण नहीं की जिससे इन संस्थाओं पर पश्चिमी देशों का प्रभाव बढ़ गया । शीत युद्ध काल में संयुक्त राष्ट्र संघ अधिक प्रभावी नहीं हो सका तथा शीत युद्ध की राजनीति का शिकार हो गया ।


4. शीत युद्ध में तनाव शैथिल्य (Stress Staggering during Cold War):

शीत युद्ध काल में महाशक्तियों के मध्य तनाव की तीव्रता में आयी कमी को तनाव शैथिल्य कहते हैं । यह शीत युद्ध समाप्ति न होकर उसके तनाव में आयी कमी का संकेत है । इसे अंग्रेजी में ‘दितान्त’- (Détente) कहते हैं । तनाव शैथिल्य दोनों महाशक्तियों की इस समझ का परिणाम है कि आणविक युग में किसी भी गुट द्वारा युद्ध निर्णायक रूप में नहीं जीता जा सकता ।

शीत युद्ध काल में तनाव शैथिल्य के तीन चरण स्पष्ट होते हैं- प्रथम 1962 से 1969 तक का निष्क्रिय काल, दूसरा 1970 से 1979 तक का सक्रिय काल तथा पुन: 1985 से 1991 तक का सक्रिय काल जिसमें सोवियत संघ में आये आन्तरिक परिवर्तनों के कारण तनाव में कमी ही नहीं आयी वरन् सोवियत रूस का विघटन व शीत युद्ध का अन्त हुआ ।

पहले चरण में दोनों महाशक्तियों के सहयोग से नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला तथा दोनों के सहयोग से 1963 में सीमित परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि तथा 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि जैसे महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हो सके ।

दूसरे चरण में भी महाशक्तियों के सहयोग से जहाँ 1972 में उत्तरी कोरिया व दक्षिण कोरिया के मध्य तथा पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी के बीच समझौते हुये वहीं इसी वर्ष दोनों महाशक्तियों के मध्य सामरिक हथियारों को सीमित करने के लिये साल प्रथम समझौते पर हस्ताक्षर किये गये ।

1973, 1975 व 1977 में क्रमश: तीन यूरोपीय सुरक्षा सम्मेलन आयोजित किये गये तथा दोनों महाशक्तियों में आर्थिक व अन्य मामलों में सहयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ी । इसी बीच 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं की तैनाती के बाद दोनों महाशक्तियों में पुन: तनाव देखा गया जिसे द्वितीय शीत युद्ध के नाम से जाना जाता है ।

तीसरे चरण में सोवियत संघ में आन्तरिक लोकतांत्रिक बदलाव हुये जो अमेरिका के सामरिक हितों के अनुकूल थे । दोनों के मध्य उच्च स्तरीय शिखर वार्ताओं का सिलसिला आरभ हुआ तथा 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद 1991 में शीत युद्ध के एक गुट का अवसान हो गया एवं शीत युद्ध का अन्त हो गया ।


5. शीत युद्ध का प्रभाव (Influence of the Cold War):

1. विश्व का दो ध्रुवों अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गुट तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट में विभाजन ।

2. विश्व में तनाव, असुरक्षा, शस्त्रों की दौड़ व सैनिक गुटबन्दी को बढ़ावा ।

3. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का उदय ।

4. संयुक्त राष्ट्रसंघ की प्रभावशीलता में कमी तथा शीत युद्ध के कारण वैश्विक समस्याओं का समाधान जटिल ।


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