Here is an essay on the ‘Soils of India’ especially written for school and college students.

Essay # 1. जलोढ़ मिट्‌टी (Alluvial Soils):

जलोढ़ मिट्‌टी बहुत उपजाऊ होती है । भारत में 43 प्रतिशत मिट्‌टियाँ इसी प्रकार की हैं । नदियों द्वारा बनी इन मिट्‌टियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- (1) खादर तथा; (2) भागर ।

खादर की मिट्‌टियाँ नदियों के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में पाई जाती हैं । खादर मिट्‌टी के क्षेत्रों में चावल गन्ना गेहूँ सब्जियाँ उगाई जाती हैं । भांगर मिट्‌टी सामान्यतः बाढ़ग्रस्त नहीं होती । ये मिट्‌टियाँ भी उपजाऊ होती हैं । इनमें कैल्शियम कार्बोनेट के कक्कड़ पाये जाते हैं । भांगर मिट्‌टी में चावल, गेहूँ, जौ, तिलहन, दलहन, गन्ना, चारा और सब्जियों की खेती की जाती हैं (Fig. 10.15) ।

Essay # 2. लाल मिट्‌टी (Red Soils):

लाल मिट्‌टी ऐसी चट्‌टानों पर विकसित होती हैं जिनमें लोहे की मात्रा होती है । वर्षा होने पर जंग लगने के कारण इनका रंग लाल पड़ जाता है । इस प्रकार की मिट्‌टी आन्ध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसग,ढ़ झारखण्ड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडीशा, तमिलनाडु एवं त्रिपुरा में पाई जाती है ।

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समतल धरातल की लाल मिट्‌टी में चावल, मक्का, ज्वार, दलहन तथा तिलहन की खेती की जाती है । तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश में मूँगफली की खेती भी इन मिट्‌टियों में की जाती है । कुल मिट्‌टी के लगभग 18 प्रतिशत भाग पर लाल मिट्‌टियाँ फैली हुई हैं ।

Essay # 3. रेगुर या काली मिट्‌टी (Regur or Black Soils):

दक्कन के लावा पठार पर विकसित मिट्‌टी को रेगुर अथवा काली मिट्‌टी कहते है । भारत के लगभग 15 प्रतिशत भाग पर रेगुर मिट्‌टियाँ फैली हुई हैं । रेगुर मिट्‌टी महाराष्ट्र गुजरात मध्य प्रदेश आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक के कुछ भाग में फैली हुई है । वर्षा होने पर यह मिट्‌टी चिपचिपी हो जाती है, परन्तु यदि मिट्‌टी सूख जाए तो लोहे के समान कठोर हो जाती है । रेगुर मिट्‌टी में कपास, ज्वार, मक्का, दलहन, संतरे खट्‌टे फल इत्यादि की खेती होती है ।

Essay # 4. पर्वतीय मरुस्थली मिट्टी (Desert Mt. Soils):

इस प्रकार की मिट्‌टी अरावली पर्वत तथा शुष्क मरुस्थल के ऊँचे भागों में पाई जाती है । इसका उपयोग बाजरे, दलहन तथा तिलहन की फसलों के लिये किया जाता है ।

Essay # 5. लेटेराइट मिट्‌टी (Lateritic Soils):

लेटेराइट शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ईट’ है । यह मिट्‌टी मानसूनी जलवायु में पाई जाती हैं । इनमें ह्यूमस (Humas) की मात्रा कम होती । परन्तु लौ. ह-ऑक्साइड (Iron-Oxide) की मात्रा अधिक होती है । लैटेराइट ऊटी, प. बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, झारखण्ड, तामिलनाडु तथा केरल के कुछ भागों में पाई जाती । चावल इसकी मुख्य फसल है, परन्तु प्रति एकड़ उत्पादन कम होता है । इस मिट्‌टी के बगीचों में उत्तम प्रकार का काजू होता है ।

Essay # 6. लाल एवं काली मिट्‌टी (Red and Black Soils):

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लाल एवं काली मिट्‌टी, परिवर्तित एवं लावा की चट्‌टानों पर विकसित होती है । यह मिट्‌टी गुजरात तथा प. मध्य प्रदेश के भागों में फैली हुई है । इसका उपयोग मक्का, ज्वार, दलहन, तिलहन के लिये होता है ।

Essay # 7. मरुस्थली अथवा रेतली मिट्‌टी (Desert or Sandy Soil):

संरचना की दृष्टी से इस प्रकार की मिट्‌टियों में रेत की मात्रा अधिक होती है । इनमें वर्षा का पानी तेजी से नीचे छन जाता है । राजस्थान, गुजरात तथा हरियाणा के पश्चिमी भाग में रेतीली मिट्‌टी फैली हुई है । इनमें मुख्य रूप से बाजरा, दलहन तथा तिलहन की खेती की जाती है ।

Essay # 8. अन्य मिट्टियाँ (Other Soils):

अन्य मिट्‌टियों में:

(i) घूसर-भूरी मिट्‌टी:

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ये मिट्‌टियां ग्रेनाइट तथा क्वार्टजाईट चट्‌टानों पर विकसित होती हैं जिन पर बाजरा तथा दलहन की खेती को जा रही है । यह राजस्थान एवं गुजरात में पाई जाती है ।

(ii) पर्वतीय मिट्‌टियाँ:

ये मिट्‌टियाँ हिमालय अण्डमान निकोबार तथा पश्चिमी घाट के ढलानों पर पाई जाती है । इनमें ह्यूमस (Humus) की पर्याप्त मात्रा होती है । इनमें मक्का दलहन तथा तिलहन की खेती की जाती है । इस मिट्‌टी का अपरदन इनकी मुख्य समस्या है ।

(iii) करेवा मिट्टियाँ:

कश्मीर एवं भद्रवा की घाटियों में पाई जाती है । इनमें मुख्यतः केसर (Saffron) की खेती की जाती है । बादाम, अखरोट के बगीचे भी करेवा मिट्‌टी में उगाये जाते हैं । करेवा मिट्‌टी में रेत, सिल्ट तथा बोल्डर इत्यादि का मिश्रण पाया जाता है ।

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