कांग्रेस पार्टी पर निबंध | Essay on Congress Party in Hindi!

Essay # 1. कांग्रेस के वर्चस्व की प्रकृति (The Nature of Congress Supremacy):

1952 से 1967 के बीच कांग्रेस को भारतीय राजनीति में जो वर्चस्व प्राप्त था, वह अन्य कई देशों में व्याप्त एक दलीय प्रभुत्व से भिन्न था । उदाहरण के लिए चीन, क्यूबा तथा सीरिया में भी एक दलों का शासन था क्योंकि वहाँ दूसरे दलों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं थी ।

इस प्रकार कांग्रेस का यह वर्चस्व एक दलीय शासन प्रणाली से भिन्न है, क्योंकि यहाँ पर अन्य दलों को भी चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति प्राप्त थी । यह बात अलग है कि विपक्षी दल अपनी शैशवावस्था में होने के कारण चुनावों में कांग्रेस को प्रभावी चुनौती नहीं दे सके । अत: भारतीय राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व लोकतांत्रिक तरीके से हासिल किया गया था ।

कई अन्य देशों में यद्यपि अन्य दलों को भाग लेने की अनुमीत् होती है लेकिन इस तरह का वर्चस्व तानाशाही तरीकों से स्थापित किया जाता है । उदाहरण के लिए मिस्त्र, म्यांमार, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, ताईवान आदि में अन्य दलों को राजनीति में भाग लेने की अनुमति है, लेकिन सत्ताधारी दल सैनिक साधनों या अन्य गैर-कानूनी उपायों के माध्यम से अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं । इस संबंध में मैक्सिको की राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टी अर्थात् पी.आर.आई. का उदाहरण उल्लेखनीय है । पी. आर. आई. की स्थापना 1929 में हुई थी । यह मैक्सिको की क्रांति का प्रतिनिधित्व करती है ।

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मैक्सिको में अन्य पार्टियों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति प्राप्त है, लेकिन वर्ष 2000 तक चुनाव का संचालन इस तरह किया गया कि पार्टी को हर बार बहुमत प्राप्त होता रहा । इस प्रकार मैक्सिको में पी. आर. आई. का वर्चस्व लोकतांत्रिक परिस्थितियों में नहीं हासिल किया गया था ।

Essay # 2. कांग्रेस के चुनाव चिन्ह (Election Symbol of Congress):

भारत में मतदाताओं की साक्षरता की कमी के कारण चुनाव में प्रत्याशियों व दलों के लिये चुनाव चिह्न आबंटित किये जाते हैं । कांग्रेस पार्टी के चुनाव चिह्न आजादी के बाद एक से नहीं रहे ।

1952 से लेकर 1969 तक कांग्रेस का चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ थी । 1969 में काग्रेस के विभाजन के बाद काग्रेस का चुनाव चिह्न 1969 से 1978 तक ‘गाय व बछड़ा’ था । आपातकाल के बाद 1977 में काग्रेस का पुराना चिहन रोक दिया गया था तथा 1978 में नया चुनाव चिह्न ‘हाथ का पंजा’ दिया गया । 1978 से वर्तमान तक यही चुनाव चिह काग्रेस को प्राप्त है । चुनाव चिह्नों का आबंटन चुनाव आयोग द्वारा किया जाता है ।

जैसे भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती गयीं तथा विपक्षी दलों का जनाधार बढ़ता गया, वैसे-वैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में कांग्रेस का वर्चस्व भी कम होता रहा । 1967 से 1989 तक कांग्रेस के वर्चस्व को विपक्षी दलों द्वारा कई बार चुनौती मिली लेकिन वह इस प्रभाव को बचाने में सफल रही । 1989 के बाद राष्ट्रीय विपक्षी पार्टियों के क्षेत्रीय पार्टियों का भी प्रभाव बढ़ा है । अंत: कांग्रेस के वर्चस्व स्थान पर वर्तमान में गठबन्धनों की राजनीति का संचालन हो रहा है ।

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कोइ भी राष्ट्रीय पार्टी वर्तमान में अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने की स्थिति में नहीं है । फिर भी यह मानना पड़ेगा कि आज भी संगठनात्मक विस्तार की दृष्टि से कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी है । उसकी उपस्थिति देश के सभी राज्यों व क्षेत्रों में है । देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का विस्तार अभी तक देश के कई क्षेत्रों में नहीं हो पाया ।

Essay # 3. कांग्रेस का वर्चस्व (Reasons for Congress Domination):

1952 से 1967 के काल में कांग्रेस को प्राप्त वर्चस्व के लिए कई कारण उत्तरदायी हैं, जिनका उल्लेख निम्नलिखित है:

(i) राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत (Legacy of National Movement):

कांग्रेस को अपना वर्चस्व बनाने में सफलता इसलिए प्राप्त हुई कि राष्ट्रीय आन्दोलन के समय उसे सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त था यह समर्थन उसे विरासत में प्राप्त हुआ । स्वतंत्रता संग्राम के महत्त्वपूर्ण नेता जैसे- जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. भीम राव अम्बेडकर आदि को देश में व्यापक लोकप्रियता प्राप्त थी । चूंकि कांग्रेस ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था, अंत: देश की जनता की सहानुभूति उसे प्राप्त थी ।

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(ii) कांग्रेस का देशव्यापी संगठनात्मक विस्तार (Congressional Organizational Expansion of Congress):

राष्ट्रीय आन्दोलन के समय ही कांग्रेस का देशव्यापी ढाँचा तैयार हो चुका था । उसके संगठन की इकाईयाँ प्रदेश जिला तथा ग्रामीण स्तर तक देश के सभी भागों में विद्यमान थी । किसी भी पार्टी को चुनावों में जीत के लिए मजबूत संगठन की आवश्यकता होती है । इसके विपरीत विपक्षी दलों का संगठनात्मक ढाँचा अत्यन्त सीमित था तथा देश के एकाध क्षेत्रों तक ही सीमित था ।

(iii) कांग्रेस का व्यापक सामाजिक समर्थन (Congress’s Comprehensive Social Support):

कांग्रेस एक पार्टी के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों का एक गठबन्धन था । उच्च वर्गों के साथ-साथ निम्न वर्गों मुसलमानों किसानों व जर्मीदारों सभी का समर्थन इसे प्राप्त था । इस व्यापक सामाजिक समर्थन की जड़ें तो राष्ट्रीय आन्दोलन में निहित थीं लेकिन इसका पूरा फायदा कांग्रेस को चुनाव के दौरान प्राप्त हुआ ।

(iv) विपक्षी दलों की शैशवावस्था (Rival Party):

दूसरी तरफ विपक्षी दलों को लोकतांत्रिक राजनीति का न तो अनुभव प्राप्त था और न ही उनकी संगठनात्मक क्षमता देशव्यापी थी । अत: भारतीय लोकतंत्र के आरम्भिक वर्षों में उनका प्रभाव मजबूत नहीं हो पाया । फिर भी चुनाव तथा संसद में उनकी उपस्थिति लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक थी । इस दृष्टि से कांग्रेस के वर्चस्व काल में भी विपक्षी दलों ने भारत में लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।

कामराज योजना, 1963 (Kamaraj Yojana, 1963):

कामराज योजना को पार्टी के संगठन को मजबूत करने के लिये कांग्रेस द्वारा लागू गया था । इस योजना को कामराज योजना इसलिये कहते कि इसका प्रस्ताव ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी समक्ष 8 अगस्त, 1963 को मद्रास के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज द्वारा प्रस्तुत किया गया था ।

इस योजना में यह प्रस्ताव रखा गया था कि कांग्रेस केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सभी कैबिनेट मंत्री तथा कांग्रेस शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री अपने पदों से स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दें तथा कांग्रेस के संगठन को मजबूत बनाने का कार्य करें ।

प्रस्ताव में कहा गया था कि इससे पार्टी के अन्दर पनप रही गुटबन्दी को रोकने तथा संगठन को मजबूत बनाने में सहायता मिलेगी । ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी ने इस योजना को स्वीकार कर लिया तथा तदानुसार कांग्रेस के सारे कैबिनेट मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों ने अपना इस्तीफा पार्टी की वर्किंग कमेटी को सौंप दिया ।

वर्किंग कमेटी ने प्रधानमंत्री को अधिकृत किया कि वे तय करें कि किन मंत्रियों अथवा मुख्यमंत्रियों का त्यागपत्र स्वीकर कर पार्टी के कार्य में लगाया जाना है । नेहरू के फैसले के अनुसार निम्न छ: मंत्रियों तथा दस मुख्यमंत्रियों के इस्तीफों को स्वीकार कर उन्हें पार्टी संगठन के कार्य में लगाया गया ।

कैबिनेट मंत्री:

मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, एस के पाटिल, वी. गोपाल रेड्‌डी, तथा के. एल. श्रीमाली ।

मुख्यमंत्री:

मद्रास से के. कामराज, उड़ीसा से बीजू पटनायक, कश्मीर से बख्सी गुलाम मोहम्मद, उत्तर प्रदेश से सी. बी. गुप्ता, बिहार से विनोदानन्द झा, तथा मध्य प्रदेश से बी. ए. मण्डलोई ।

कामराज प्लान लागू होने से कांग्रेस का संगठन तथा सरकार की तुलना में उसका महत्त्व भी बढ़ा । लेकिन आलोचकों का मानना है कि 1962 में चीन के हाथों पराजय के बाद कांग्रेस पार्टी व नेहरू की लोकप्रियता में जो कमी आयी थी, उसके आलोक में इस योजना को लागू किया गया । ताकि संगठन पर शीर्ष नेताओं की पकड़ पुन: मजबूत हो सके ।

(v) मतदान प्रणाली का स्वरूप (Format of Voting System):

1952 से 1967 के बीच कांग्रेस के वर्चस्व के अन्य कारणों में एक प्रमुख कारण भारत की निर्वाचन प्रणाली भी थी । इस निर्वाचन प्रणाली में मतदान की जिस पद्धति को अपनाया जाता है, उसे First Past the Post पद्धति कहते हैं । इस पद्धति में जिस पार्टी को किसी क्षेत्र में सबसे अधिक वोट मिलते हैं, उस सीट में उसे ही विजयी घोषित कर दिया जाता है ।

भले ही उस क्षेत्र के मतदाताओं के बहुमत का समर्थन उसे प्राप्त न हो । उदाहरण के लिए 1952 के चुनावों में कांग्रेस ने देश के कुल मतों के 45 प्रतिशत मत प्राप्त किये, लेकिन उसे लोकसभा के कुल सीटों में 74 प्रतिशत सीटों पर सफलता मिली । वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को देश के कुल मतों का 10 प्रतिशत प्राप्त हुआ, लेकिन उसकी सीटों संख्या 3 प्रतिशत से भी कम रही ।

इस प्रकार यद्यपि देश के कुल मतों का बहुमत गैर-कांग्रेस दलों को प्राप्त हुआ, लेकिन उनके वोट विभाजित हो गये तथा सीटों की संख्या कम हो गयी । मतदान की यह प्रणाली भारत में आज भी लागू है । कई बार आलोचकों द्वारा इसके स्थान पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाये जाने की वकालत की जाती है । समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में किसी पार्टी को लोकसभा में उतने ही प्रतिशत स्थान प्राप्त होंगे, जितने प्रतिशत मत उसे चूनाव में प्राप्त होते हैं ।

(vi) नेहरू का व्यक्तित्व (Nehru’s Personality):

कांग्रेस का नेतृत्व आजादी के समय से ही जवाहरलाल नेहरू के हाथों में था तथा आरंभ से है उन्हें महात्मा गांधी का भी समर्थन प्राप्त था । उनके उदारवादी व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस में एक करिश्माई नेतृत्व उत्पन्न हो गया । इसका दूर लाभ कांग्रेस पार्टी को प्राप्त हुआ । नेहरू को आधुनिक भारत का निर्मल कहा जाता है तथा वैदेशिक मामलों में उन्हें विशेष ज्ञान प्राप्त था ।

Essay # 4. कांग्रेस एक सामाजिक और वैचारिक गठबंधन के रूप में (Congress as a Social and Ideological Coalition):

कांग्रेस की स्थापना एक दबाव समूह के रूप में दिसम्बर 1885 में बम्बई में हुई थी । उस समय इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रस्तुत करके उसका समाधान करना था । उस समय यह पार्टी शिक्षित उच्च मध्यम वर्ग की पार्टी थी, लेकिन 20वीं शताब्दी में जब गांधी जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन बनाने का प्रयास किया तो कांग्रेस पार्टी का स्वरूप भी बदला ।

1920 के असहयोग आन्दोलन तथा 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के परिणामस्वरूप कांग्रेस पार्टी उच्च ऊ शिक्षित वर्गों की पार्टी के स्थान पर आम जनता की पार्टी बन गयी । 1920 में कांग्रेस पार्टी का संगठनात्मक विस्तार किया गया तथा तभी से इसमें विभिन्न वर्गों जैसे- किसान, मजदूर, ग्रामीण, युवा, महिलाओं आदि की भागीदारी बढ़ने लगी ।

इस प्रकार कांग्रेस के सामाजिक आधार में व्यापकता आयी भारत की जाति व्यवस्था के आलोक में भी कांग्रेस को उच्च जातियों मध्यम जातियों व निम्न जातियों सभी का समर्थन प्राप्त था अत: आजादी के समय कांग्रेस पार्टी का स्वरूप एक सामाजिक गठबन्धन की तरह था । जिसमें भारत के सभी वर्गों तथा हितों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था ।

वैचारिक दृष्टि से भी राष्ट्रीय आन्दोलन के समय कांग्रेस एक गठबन्धन का रूप धारण कर गयी थी क्योंकि इसमें सभी तरह की विचारधारा जैसे- समाजवादी, पूँजीवादी, उग्रवादी, उदारवादी, रूढिवादी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग विद्यमान थे ।

भारत में समाजवादी पार्टी की स्थापना ही 1934 में कांग्रेस के एक अंग के रूप में हुई कांग्रेस के नियमों में परिवर्तन के कारण 1948 में अलग समाजवादी पार्टी का गठन हुआ । इसीलिए बाद में भी भारत में जितनी विपक्षी पार्टियाँ बनी हैं, उनके नेताओं का आधार कांग्रेस ही रहा है कांग्रेस की राजनीति छोड़कर इन नेताओं ने नई पार्टियों का गठन किया है । इनमें जयप्रकाश नारायण, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, तथा डा. भीमराव अम्बेडकर के नाम प्रमुख हैं ।

मतभेदों व विरोधी हितों का प्रबन्धन:

जैसे अभी ऊपर बताया गया है कि कांग्रेस में विरोधी सामाजिक हितों तथा विभिन्न विचारधाराओं को प्रतिनिधित्व प्राप्त था । इस तरह के मतभेदों और विरोधी हितों का समायोजन किया जाना आवश्यक है ।

इस संबंध में कांग्रेस शैली की कुछ विशेषतायें निम्न है:

(i) प्रथम, विरोधी हितों में समायोजन के लिए किसी भी मुद्दे पर अतिरेक स्थिति से बचने का प्रयास किया जाता है तथा सभी मुद्दों पर समझौते व सन्तुलन की नीति अपनाई जाती है । कांग्रेस ने इसी नीति के आधार पर गठबन्धन को मजबूती प्रदान की ।

(ii) दूसरा, कांग्रेस में विरोधी दृष्टिकोण तथा हितों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई गयी, ताकि सभी में समन्वय स्थापित किया जा सके और विरोधी हितों को सन्तुष्ट किया जा सके ।

कई बार कांग्रेस पार्टी के अन्दर कई ऐसे समूह रहे हैं जो पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं थे । ऐसे समूहों को गुटों की संज्ञा दी जाती है । कांग्रेस ने ऐसे असन्तुष्ट गुटों को भी प्रश्रय दिया है तथा उनके प्रति सहनशीलता का परिचय दिया है । इस सहनशीलता के कारण गुटबन्दी का प्रबन्धन पार्टी के अंदर ही हो जाता है तथा पार्टी में टूट-फूट नहीं हो पाती । कांग्रेस के राज्य स्तरीय संगठन में इस तरह के असन्तुष्ट गुटों का अस्तित्व अधिक पाया जाता है ।

इस तरह के असन्तुष्ट गुटों का अस्तित्व अधिक पाया जाता है । यह सब केन्द्रीय नेतृत्व की जानकारी में होता है तथा केन्द्रीय नेतृत्व इन असन्तुष्ट गुटों के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाए उनके मध्य संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है ।

कांग्रेस सिस्टम:

इस प्रकार कांग्रेस के वर्चस्व काल में पार्टी के अन्दर ही विभिन्न असन्तुष्ट गुटों द्वारा राजनीतिक प्रतियोगिता चलती रहती थी । ये गुट एक-दूसरे पर दबाव डालने के साथ-साथ आलोचना भी करते रहते थे । इस प्रकार कांग्रेस के अन्दर गुटों के बीच विरोध व प्रतियोगिता की जो प्रवृत्ति थी रजनी कोठरी ने उसे कांग्रेस सिस्टम की संज्ञा दी है ।

कांग्रेस सिस्टम में कांग्रेस के बाहर विपक्षियों का विरोध नगण्य होता है । विरोध की प्रक्रिया पार्टी के अन्दर पाये जाने वाले विभिन्न गुटों के बीच चलती है । इस प्रकार कांग्रेस सिस्टम में कांग्रेस पार्टी शासक दल के साथ-साथ विपक्षी दस की भूमिका भी निभाती रही है ।

राज्य स्तर पर कांग्रेस का वर्चस्व अधिक प्रभावी नहीं था:

यद्यपि 1952 से 1967 के काल में केन्द्रीय स्तर पर कांग्रेस का वर्चस्व विवाद रहित था तथा उसको किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा । लेकिन राज्य स्तर पर कई क्षेत्रीय राजनीतिक समूहों (दलों) के उदय के कारण कई राज्यों में उसे प्रभावी विरोध का सामना करना पड़ा ।

उदाहरण के लिये मद्रास प्रान्त में 1917 में जस्टिस पार्टी की स्थापना हुई थी जिसमें गैर-ब्राह्मण जातियों को संगठित करने का प्रयास किया गया था । मद्रास की गैर-ब्राह्मण जातियों का रुझान कांग्रेस विरोधी था । बाद में 1944 में रामास्वामी नायकर ने जस्टिस पार्टी को मिलाकर डी. एम. अर्थात् द्रविड कडगम पार्टी की स्थापना की ।

नायकर को पेरियार नाम से जाना जाता है । 1949 में डी. एम. पार्टी से अलग होकर सी. एन. अन्नादुराई ने डी. एम. के. अर्थात् द्रविण मुनेत्र कडगम पार्टी की स्थापना की । बाद में यह पार्टी राज्य स्तर पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरी । 1972 में डी. एम. के. पार्टी में फूट पड़ दी तथा एक नई पार्टी ऑल इण्डिया अन्ना द्रविण मुनेत्र कडगम- ए. आई. ए. डी. एम. के. की स्थापना हुई । तमिलनाडु में आज ये दोनों पार्टियों सर्वाधिक प्रभावशाली भूमिका में हैं ।

पंजाब प्रान्त में 1920 के दशक से ही अकाली दल के नेतृत्व में अकाली आन्दोलन मजबूत हो गया था । उसने पंजाबी सूबा की माँग की । अकाली दल पंजाब के सिखों की पार्टी है । इसकी माँग पर 1966 में पंजाबी भाषा के आधार पर अलग पंजाब प्रान्त की स्थापना हुयी । अकाली दल ने राज्य स्तर पर कांग्रेस के वर्चस्व को समय-समय चुनौती दी है ।

इसी तरह जम्मू व कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में देशी रियासत के शासन के विरुद्ध लोकतांत्रिक आन्दोलन चलाया गया था । 1939 में शेख अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेन्स नामक अलग पार्टी की स्थापना की । यह पार्टी भी बाद में इस राज्य में अपना जनाधार मजबूत करने में सफल रही तथा कांग्रेस के राजीतिक वर्चस्व को चुनौती प्रदान की ।

लेकिन कांग्रेस को इस काल में सबसे प्रभावी चुनौती केरल राज्य में साम्यवादी पार्टी द्वारा प्रस्तुत की गयी । 1957 में साम्यवादी पार्टी केरल में सरकार बनाने में सफल हो गयी । इसका उल्लेख अलग से किया गया है । यद्यपि केरल की साम्यवादी सरकार दो साल बाद अपदस्थ हो गया थी, लेकिन राज्य स्तर पर यह पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी ।

केरल में प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार (First Non-Congress Government in Kerala):

मार्च 1957 में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में केरल की विधानसभा में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा । इन चुनावों में भारतीय साम्यवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ । इस पार्टी को 126 विधानसभा सीटों में से 60 सीटों पर विजय प्राप्त हुई तथा उन्हें 5 निर्दलीय सदस्यों का भी समर्थन प्राप्त था ।

इस पार्टी के नेता ई.एम.एस. नम्बुदरीपाद केरल के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने । वास्तव में भारत में केरल की साम्यवादी सरकार देश पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी तथा विश्व में पहली बार ऐसा हुआ था कि चुनावों के आधार पर साम्यवादी पार्टी की सरकार का गठन हुआ हो ।

यह कांग्रेस के वर्चस्व को पहला झटका था अत: कांग्रेस पार्टी ने केरल में साम्यवादी पार्टी के शासन के विरुद्ध ‘मुक्ति संघर्ष’ आरंभ कर दिया । साम्यवादियों ने प्रगतिशील व उग्र आर्थिक सुधारों को लागू करने के वायदे के आधार पर जन समर्थन प्राप्त किया था साम्यवादियों का मानना था कि कांग्रेस समर्थित सरकार विरोधी आन्दोलन निहित स्वार्थी तत्वों व धार्मिक संगठनों द्वारा चलाया जा रहा है ।

अन्तत: 1959 में केन्द्र सरकार ने संविधान की धारा 356 के आधार पर केरल की साम्यवादी सरकार को भंग कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया केन्द्र सरकार का उक्त निर्णय समीक्षकों में विवाद का विषय बन गया तथा इस निर्णय को अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के पहले उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ।

कांग्रेस के वर्चस्व काल में अन्य महत्वपूर्ण विपक्षी दल (Other Key Opposition Parties during the Congress’s Domination Period):

भारतीय राजनीति में आजादी के बाद सक्रिय दलों में यदि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़ दिया जाये तो सभी प्रमुख विपक्षी दलों का उदय व विकास आजादी के बाद हुआ है । इनमें से कई दल कांग्रेस पार्टी से ही टूट कर अलग हुये हैं । यद्यपि 1960 और 1970 के दशक में कई नई पार्टियों का उदय हुआ है, लेकिन उनकी जड़ें 1950 के दशक में अस्तित्व में आईं विपक्षी पार्टियों में ही निहित है ।

यद्यपि 1950 और 1960 के दशक में विपक्षी पार्टियों को लोकसभा में नाममात्र का प्रतिनिधित्व प्राप्त था लेकिन अपनी उपस्थिति से तथा लोकसभा के अन्दर सक्रिय भूमिका निभाकर भारत में लोकतंत्र को मजबूत बनाने में इन पार्टियों ने योगदान दिया है । कई बार संख्या कम होने के बाजबूद भी कांग्रेस पार्टी की तार्किक आलोचनाओं द्वारा उसकी मनमानी पर रोक लगाने का प्रयास किया है । इन पार्टियों के कारण तानाशाही प्रवृत्तियों पर रोक लगाने में सफलता मिली है ।

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