भारत- अमेरिका सम्बन्ध पर निबंध! Here is an essay on ‘Indo-America Relations’ in Hindi language.

भारत और अमेरिका दोनों ही बड़े प्रजातान्त्रिक राष्ट्रों का उदाहरण प्रस्तुत करते है जहाँ तक दोनों देशों के मध्य सम्बन्धों की बात है, तो भारत की स्वतन्त्रता के बाद अमेरिका से इसके सम्बन्ध सामान्य थे, चूंकि अमेरिका भी अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुआ था, इसलिए उसका रुख भारत के प्रति सकारात्मक था, किन्तु जब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, तब अमेरिका को भारत का गुटनिरपेक्ष रहना अच्छा नहीं लगा और तब से इन दोनों देशों के सम्बन्धों में जब-तब कटुता दिखाई देती रही है ।

नि:सन्देह प्रारम्भ में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध उतने अच्छे नहीं रहे, जितने होने चाहिए थे इसके कई कारण हैं भारत का झुकाव सोवियत रूस की ओर होने के कारण अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ न केवल अपने सम्बन्धी को बढ़ाया, बल्कि पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों में भी उसकी आर्थिक एवं सैन्य सहायता की ।

इसके पीछे अमेरिका का उद्देश्य भारत-सोवियत रूस के गठजोड़ की काट ढूंढना एवं अफगानिस्तान पर रूस के कब्जे के खिलाफ मुजाहिदीनों का प्रयोग करना था । वर्ष 1971 में भारत और सोबियत रूस के बीच हुई मित्रता की सन्धि ने अमेरिका को पाकिस्तान का समर्थन करने व उसे बडे पैमाने पर सैन्य सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित किया । इसके कारण दोनों देशों के सम्बन्धों में तनाव आ गया एवं दोनों देश एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगे ।

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वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अमेरिका ने पाकिस्तान की हर सम्भव सहायता की । इसके बाद जब वर्ष 1974 में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया, तो अमेरिका ने न केवल इसका खुले तौर पर विरोध किया, बल्कि भारत पर अनेक प्रतिबन्ध भी लगा दिए ।

वर्ष 1998 में अमेरिका ने भारत के तारापुर रिएक्टर को ईंधन की आपूर्ति बन्द कर दी । भारत एवं अमेरिका के सम्बन्धों में तनाव की यह स्थिति शीत युद्ध की समाप्ति तक जारी रही । दिसम्बर, 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत एवं अमेरिका के सम्बन्धों में सुधार आना शुरू हुआ ।

बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब भारत ने भी उदारीकरण की नीति अपनाई, तब इसके अमेरिका से न केवल आर्थिक सम्बन्ध कायम हुए, बल्कि इसके बाद दोनों देशों के राजनीतिक सम्बन्ध भी सुदृढ़ हुए । वर्ष 1997 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिण्टन की भारत यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में मजबूती आई, किन्तु इसका प्रभाव अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सका ।

वर्ष 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण करने से दोनों देशों के सम्बन्धों में एक बार फिर से दरार पैदा हो गई । भारत के इस कदम से क्षुब्ध होकर अमेरिका ने पुन भारत को प्रतिबन्धित देशों की सूची में डाल दिया । इससे हुआ यह कि दोनों देशों के राजनीतिक एवं सामरिक हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा । इसी बीच एक ऐसी अप्रत्याशित घटना घटी, जिसने अमेरिका को झकझोर कर रख दिया ।

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11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर अल-कायदा के हमले के बाद अमेरिका को पहली बार आतंकवाद का खतरा अनुभव हुआ । जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका पहले पाकिस्तान का पक्ष लेता था, लेकिन इस घटना के बाद भारत एवं अमेरिका के सम्बन्धों में नाटकीय परिवर्तन हुआ ।

अमेरिका को आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भारत की महत्ता का अहसास हुआ । 12वीं सदी के प्रथम दशक के दौरान दोनों देशों के बीच न केवल द्विपक्षीय व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई, बल्कि सामरिक क्षेत्र में भी दोनों देशों के सम्बन्धों में पारस्परिक सुधार हुआ है ।

वर्ष 2006 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की भारत यात्रा ने दोनों देशों के सम्बन्धों को एक नया आयाम दिया । 2 मार्च, 2006 को दोनों देशों के बीच हुए असैन्य परमाणु समझौते ने भारत को अमेरिकी विदेश नीति में ऐसा स्थान दिला दिया, जो किसी अन्य देश को हासिल नहीं है ।

इस समझौते के कारण भारत, विश्व का पहला ऐसा देश बन गया, जो एन पी टी पर हस्ताक्षर नहीं करने के बावजूद वैध तरीके से परमाणु ईंधन व तकनीक प्राप्त कर सकेगा । भारत को यह विशेष दर्जा देने के लिए अमोरका को अपने में संशोधन करना पड़ा ।

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इसके अतिरिक्त, अमेरिका ने ऊर्जा, तकनीक, चिकित्सा व कृषि जैसे क्षेत्रों में भी भारत के साथ नए समझौते किए हैं दोनों देशों के बीच मुक्त आकाश समझौता हो चुका है, जिसके तहत दोनों देशों के नागरिक विमानों को एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र में उड़ान भरने की खुली छूट दी गई हे ।

मई, 2007 में भारत और अमेरिका ने जापान एवं ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चार पक्षीय वार्ता की पहली बैठक की, जिसमें चारों देशों द्वारा रणनीतिक मोर्चे पर मिलकर काम करने की बात की गई । अकबर, 2008 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा के कारण दोनों देशों के सम्बन्धों में महत्वपूर्ण सुधार हुआ ।

वर्ष 2008 में मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने पहली बार पाकिस्तान पर कड़ा दबाव बनाया । यह भारत एवं अमेरिका के बीच एक नए मित्रतापूर्ण युग की शुरूआत थी, क्योंकि अब तक अमेरिका को पाकिस्तान का पक्ष लेते देखा गया था ।

नवम्बर, 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए, जिनमें से प्रमुख हैं- स्वच्छ ऊर्जा के लिए संयुक्त अनुसन्धान और विकास केन्द्र की स्थापना, परमाणु ऊर्जा साझेदारी हेतु वैश्विक केन्द्र की स्थापना के लिए सहयोग, ऊर्जा सहयोग के कार्यक्रम, भारत में मानसूनी वर्षा के सटीक पूर्वानुमान के अध्ययन के लिए तकनीकी सहयोग, शैल गैस संसाधन, वैश्विक रोग पहचान के लिए भारत में केन्द्र की स्थापना और उसका संचालन ।

इस ऐतिहासिक भारत यात्रा के दौरान औपचारिक निजी वार्ताओं और सार्वजनिक भाषणों में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिका तथा भारत की वैश्विक साझेदारी को लेकर एक नया दृष्टिकोण रखा । यह दृष्टिकोण व्यापक रणनीतिक महत्व रखता है ।

यह रणनीतिक दृष्टिकोण मानता है कि भारत विश्व शक्ति के रूप में उदित हो चुका है और वह वैश्विक मंचों पर महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली भूमिका निभाने को तैयार है । यह नया दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित है कि अमेरिका और भारत के हितों की बेहतरी आपसी साझेदारी में निहित है ।

पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने इसे बराबरी की साझेदारी कहा है । इस नए नजरिये का लक्ष्य अमोरका और भारत के बीच एक ऐसी साझेदारी कायम करना है, जिसका लाभ न सिर्फ इन दोनों देशों को मिले, बल्कि बह एशिया और पूरी दुनिया के हित में भी हो ।

इधर, भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री चुने जाने पर दोनों देशों के राजनीतिक विशेषज्ञों ने यह आशंका जताई है कि इससे भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में अस्थिरता आ सकती है, क्योंकि अमेरिका गुजरात दगो में नरेन्द्र मोदी की भूमिका सदिग्ध मानता रहा है ।

लेकिन अमेरिका ने न केवल नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री बनने पर बधाई दी, बल्कि उन्हें अमेरिका यात्रा के लिए भी आमन्त्रित किया । सितम्बर, 2014 में हमारे प्रधानमन्त्री अमेरिका गए । वहाँ श्री ओबामा ने गुजराती में ‘केम छो मिस्टर पीएम’ कहकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया ।

श्री मोदी की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार को आगे बढाने हेतु अन्तर एजेंसी सम्पर्क समूह गठित करने का निर्णय किया । हमारे प्रधानमन्त्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति से महत्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बात की, जिसमें व्यापार, निवेश, आर्थिक सहयोग एवं सुरक्षा सम्मिलित हैं ।

उन्होंने विश्व व्यापार सरलीकरण का समर्थन करते हुए, भारत की खाद्य सुरक्षा चिन्ताओं के समाधान किए जाने की चर्चा भी की । अभी हाल ही 26 जनवरी, 2015 में गणतन्त्र दिवस समारोह पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आकर गणतन्त्र दिवस की परेड के मुख्य अतिथि रहे । इस समारोह में उन्होंने आनन्द लिया । इससे दोनों देशों के बीच आपसी प्रेम और सम्बन्धों में अस्थिरता आ सकती है । 

श्री ओबामा ने इस भेंट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा- ”मैं भारत के प्रधानमन्त्री के न सिर्फ देश के गरीबों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने एवं अर्थव्यवस्था को पुर्नजीवित करने के प्रयासों, बल्कि उनके इस दृढ़ विचार से भी प्रभावित हुआ कि वह अपने देश को ऐसी बड़ी शक्ति बनाना चाहते हैं, जो थे विश्व में शान्ति व सुरक्षा लाने में सहयोग कर सके ।”

हमारे नए प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा तथा वहाँ उनका भव्य स्वागत, बहुत से मुद्दों पर आपसी सहमति एवं महत्वपूर्ण निर्णय, भारत-अमेरिका के अच्छे सम्बन्धों तथा उज्ज्वल भविष्य की ओर सकेत करते हैं ।

इससे जाहिर होता है कि अमेरिका भविष्य में भी भारत के साथ मधुर सम्बन्ध रखना चाहता हे और ये दोनों ताकते अमेरिका और भारत की वैश्विक साझेदारी का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए दुनिया के विभिन्न हिस्सों को समृद्ध बनाने के मिलकर काम करेंगी ।

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