उत्पादन के लिए तकनीक का विकल्प: मतलब और कारक | Read this article in Hindi to learn about:- 1. उत्पादन के तकनीक के चुनाव का अर्थ (Meaning of Choice of Techniques for Production) 2. तकनीक के चुनाव में अर्न्तनिहित कारक (Factors Underlying Choice of Techniques for Production) 3. निष्क्रिय तकनीकी प्रगति (Neutral Technical Progress) and Other Details.

Contents:

  1. तकनीक के चुनाव का अर्थ (Meaning of Choice of Techniques for Production)
  2. तकनीक के चुनाव में अर्न्तनिहित कारक (Factors Underlying Choice of Techniques for Production)
  3. निष्क्रिय तकनीकी प्रगति (Neutral Technical Progress)
  4. हैरोड की निष्क्रियता दशा के अधीन साधन शेयर की स्थिरता (Constancy of Factor Shares Under Harrod’s Neutrality)
  5. सोलोव की निष्क्रिय दशा (Slow Bias or Slow Neutrality)

1. उत्पादन के तकनीक के चुनाव का अर्थ (Meaning of Choice of Techniques for Production):

विकासशील देशों के सम्मुख वैकल्पिक उत्पादन की तकनीक के मध्य चुनाव महत्वपूर्ण समस्या है । तकनीक मुख्यतः पूंजीगत एवं श्रम-गहन तकनीक के रूप में वर्गीकृत की जाती है ।

तकनीक का चुनाव बहुधा समय के आधार पर किया जाता है जिसके अनुरूप श्रम-गहन तकनीक अधिक उत्पादन एवं उपभोग बढ़ाने में सहायक होती है तो दीर्घकाल में पूंजी-गहन तकनीक के द्वारा अधिक उत्पादन एवं उपभोग हो पाना सम्भव बनता है ।

ADVERTISEMENTS:

इसका कारण यह है कि श्रम-गहन तकनीक को अपनाए जाने से उत्पादन में होने वाली वृद्धि उपभोग में होने वाली वृद्धि की अपेक्षा कम होती है जिससे विनियोजित अतिरेक गिरता है । अतः यदि नीतिगत उद्देश्य वृद्धि दर का अधिकतमीकरण हो तो पूंजी गहन तकनीक को प्राथमिकता दी जाएगी जिसमें प्रति इकाई विनियोग करने पर उत्पादन में शीघ्र वृद्धि होगी ।


2. उत्पादन के तकनीक के चुनाव में अर्न्तनिहित कारक (Factors Underlying Choice of Techniques for Production):

तकनीक का चुनाव मात्र सरल अंकगणितीय गणना नहीं है । यह काफी जटिल समस्य है तथा इस चुनाव में कई कारकों व उनकी अक्रिया को ध्यान में रखना पडता है ।

इन कारकों को स्पष्ट करने के लिए मुख्यतः निम्न पक्षों का अवलोकन आवश्यक है:

(i) पूँजी गहनता का चुनाव (Choice of Capital Intensity):

ADVERTISEMENTS:

तकनीक के चुनाव की समस्या वास्तव में पूंजी गहनता के चुनाव की समस्या है । इससे अभिप्राय पूंजी से श्रम का अनुपात या पूंजी का सकल उत्पादन से अनुपात या पूंजी से वैल्यू ऐडेड का अनुपात है ।

सामान्यतः यह पूंजी से श्रम के अनुपात द्वारा व्यक्त किया जाता है अर्थात् प्रति इकाई श्रम में प्रयोग की गई पूंजी का अनुपात । तात्पर्य यह है कि हमें पूंजी-गहन एवं श्रम-गहन तकनीक के मध्य या मशीन द्वारा किए जा रहे और मशीन के बिना किए जा रहे उत्पादन के मध्य चुनाव करना है ।

(ii) लागतों एवं लाभ की गणना (Calculating Costs and Profits):

वैकल्पिक तकनीकों के मध्य चुनाव करते हुए हम दो पक्षों को ध्यान में रखते है । पहला जो लागतों से सम्बन्धित है तथा दूसरा जो लाभों से सम्बन्धित है । इस प्रकार हम कुल लागतों एवं सामाजिक लाभों के मध्य सन्तुलन स्थापित करते है । हमें ऐसी तकनीक का चुनाव करना होगा जिसमें लागतें न्यूनतम हों तथा लाभ अधिकतम हों ।

ADVERTISEMENTS:

सामाजिक लाभ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो सकते हैं । प्रत्यक्ष सामाजिक लाभों का मापन उत्पादन प्रवाह के द्वारा मापा जा सकता है अर्थात् प्राप्त होने वाली वस्तु एवं सेवाओं के द्वारा । इन वस्तु और सेवाओं की गणना प्रत्याशित बाजार कीमतों के सब्सिडी, कस्टम एक्साइज इत्यादि के समायोजन द्वारा होती है ।

अप्रत्यक्ष सामाजिक लाभ उत्पादन द्वारा पडने वाले प्रभावों से सम्बन्धित किए जाते है । प्रत्यक्ष सामाजिक लाभ प्राथमिक होते है तथा अप्रत्यक्ष सामाजिक लाभ द्वितीयक होते है तथा एक विशिष्ट स्कीम से अप्रत्यक्ष प्रवाह की भाँति उत्पन्न होते है । अप्रत्यक्ष सामाजिक लाभों को मापना काफी कठिन कार्य है यद्यपि अर्थव्यवस्था पर पडा उनका प्रभाव महत्वपूर्ण होता है ।

सामाजिक लागतें तकनीक वस्तुतः उत्पादन से सम्बन्धित है तथा उत्पादन करते समय यह चुना जाना आवश्यक है कि उत्पादन इस प्रकार हो कि उत्पादन की कुल सामाजिक लागतें न्यूनतम हों ।

एक परियोजना के दो पक्ष होते हैं:

पहला पक्ष निर्माण है तो दूसरा उत्पादन अब हम इन दोनों पक्षों की लागत को ध्यान में रखेंगे । निर्माण लागतें उपरिमद व्यय हैं जो स्थिर लागतों के कारण उत्पन्न होती हैं । निर्माण लागतें एक बार लग जाती है तथा यह पूंजी पर लिए जाने वाले ब्याज, स्थिर परिसम्पत्तियों पर ह्रास को समाहित करती हैं ।

स्थिर लागतों के अतिरिक्त परिवर्ती लागतें है जो उत्पादन के बदलने के साथ-साथ परिवर्तित होते है । यह उत्पादन के संचालन की लागतें हैं जिसमें कच्चे माल की लागत एवं श्रमिक को किया गया भुगतान तथा अन्तिम व अन्य उपभोग की लागतों की सूचना सम्मिलित है । कुल लागतों में स्थिर एवं परिवर्तनशील लागतें शामिल होती है ।

ऐसी तकनीक का चुनाव किया जाए जो सामाजिक लाभों के उत्पादन प्रवाह में उत्पादन की सामाजिक लागतों की दर लगातार कम करने में सहायक हों । भविष्य में प्रति इकाई उत्पादन की प्रत्याशित सामाजिक लागतें तब न्यूतम होंगी, जबकि सही तकनीक का चुनाव किया जाए ।

कम होती जाती सामाजिक लागतों से तात्पर्य है अधिक मशीनों पर आश्रित व उत्पादन की पूंजी गहन तकनीक । भारी व आधारभूत उद्योगों के सन्दर्भ में इसे ध्यान में रखा जा सकता है, क्योंकि इन उद्योगों में उत्पादन की औसत लागत में परिवर्ती लागत का अंश काफी अधिक होता है ।

लेकिन ऐसी दशा जहाँ उत्पादन की औसत लागतों का परिवर्ती लागतें काफी छोटा हिस्सा होती हैं वहाँ पर बेहतर होगा कि उपरिमद व्ययों को न्यूनतम किया जाए । इससे अभिप्राय है कि एक श्रम-गहन तकनीक का चयन किया जाए ।

तकनीक का चुनाव करने में व्यावहारिक दृष्टिकोण से विचार करना आवश्यक है । एक अर्द्धविकसित देश में जहाँ श्रम सस्ता व बहुल है वहाँ श्रम-गहन तकनीक को अपनाना आर्थिक दृष्टि से हितकारी व दृश्य होता है । ऐसा देश धीरे-धीरे मशीनीकरण एवं पूंजी-गहन विधियों को लागू करके औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है ।

(iii) सामाजिक मूल्य (Social Values):

सामाजिक मूल्य एवं सामाजिक आर्थिक प्रवृत्तियों पर इस दृष्टि से विचार आवश्यक है क्योंकि एक देश में होने वाला विकास मात्र उत्पादक संसाधनों की उपलब्धता पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि उस देश के निवासियों के दृष्टिकोण पर भी निर्भर करता है ।

उत्पादन के साधनों की सामाजिक लागतें (Social Costs of Factors of Production):

सामाजिक लागतों की गणना करते हुए हम उत्पादन के सामाजिक साधनों की लागतों को ध्यान में रखते है ।

इनके विविध प्रकार निम्न हैं:

(a) भूमि की सामाजिक लागत ।

(b) श्रम की सामाजिक लागत ।

(c) पूँजी की सामाजिक लागत ।

(d) समय की सामाजिक लागत ।

(e) ह्रास की सामाजिक लागत ।

(f) परिचालन एवं उत्पादन लागत ।

(a) भूमि की सामाजिक लागत:

भूमि की सामाजिक लागत की गणना अवसर लागत के आधार पर की जाती है । इसके श्रेष्ठ वैकल्पिक उपयोग में भविष्य में होने वाली प्राप्तियों के वर्तमान मूल्य की गणना है ।

(b) श्रम की सामाजिक लागत:

श्रम की प्रत्यक्ष सामाजिक लागतों की गणना भी इसकी अवसर लागतों के द्वारा की जाती है । कृषि प्रधान अर्द्धविकसित देशों में व्यापक स्तरीय छद्‌म बेकारी की दशा विद्यमान होती है जिसकी सीमान्त उत्पादकता शून्य होती है ।

(c) पूंजी की सामाजिक लागत:

तकनीक का चयन करने में पूंजी की सामाजिक लागत को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों को ध्यान में रखा जाता है । पूंजी की प्रत्यक्ष सामाजिक लागत उन व्ययों को शामिल करती है जो पूंजी संयन्त्रों पर व्यय होते है; जैसे- प्लांट, मशीनरी, कच्चे माल की लागत, ईधन एवं विद्युत इत्यादि ।

इस लागत का मापन भी अवसर लागत के आधार पर होता है अर्थात् अगला बेहतर विकल्प जिसे चुना नहीं गया । पूंजी निर्माण की प्रत्यक्ष सामाजिक लागतें भी होती है जो व्यक्तियों की बचत व विनियोग क्रियाओं के सामाजिक, आर्थिक परिणामों से प्राप्त होते है; जैसे पूंजी निर्माण के परिणामस्वरूप आर्थिक विषमताएँ बढ सकती है ।

प्लाण्ट एवं मशीनरी में किए गए नए विनियोग तकनीकी बेरोजगारी के रूप में दिखाई देते हैं । जिसे अवश्य ही एक सामाजिक हानि के रूप में देखा जाएगा । इसके साथ ही औद्योगिक केन्द्रीयकरण के भी बुरे प्रभाव उत्पन्न होते है; जैसे तकनीकी सुधार होने के साथ श्रम-शक्ति का विस्थापन एवं उनके अर्न्तमन में पनपता हुआ असन्तोष । यद्यपि इनका मात्रात्मक मापन करना कठिन है किन्तु यह वास्तविकता है । मशीनीकरण होने पर पूंजी निर्माण की दर जितनी अधिक होगी अप्रत्यक्ष लागतों के प्रभाव भी उतने ही अधिक पडेंगे ।

(d) समय की सामाजिक लागत:

साधनों की सामाजिक लागत के साथ ही समय की लागत भी महत्वपूर्ण है । इसे हम विनियोग एवं उपभोग के मध्य के समय अन्तराल के द्वारा जान सकते हैं । यदि विनियोग बचतों के स्तर से आगे न हो पाए तब उपभोग के स्तर में कमी नहीं होती ।

इस दशा में विनियोग किसी प्रकार का सामाजिक तनाव या दबाव उत्पन्न नहीं करता । ठीक ऐसी ही दशा को किंज के अर्थ में समझें तो उन्होंने कहा कि अर्द्धरोजगार सन्तुलन की दशा में घाटे की वित्त व्यवस्था किसी सामाजिक लागत को शामिल नहीं करती ।

एक अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्था जो पूंजी की कमी का अनुभव कर रही है, में कुल विनियोग कुल बचत से अधिक होता है । ऐसे में विनियोग योग्य एवं उत्पादन योग्य उत्पादन में एक अन्तर उत्पन्न हो जाता है जिससे उपभोग का स्तर संकुचित होता है तथा सामाजिक लागत कम होने लगती है । इस सामाजिक लागत का मापन उस मूल्य पर निर्भर करता है जिसे समुदाय भविष्य में उपभोग कर पाएगा लेकिन अभी वह उपलब्ध नहीं है ।

(e) ह्रास की सामाजिक लागत:

ह्रास की सामाजिक लागत का अनुमान प्लाण्ट एवं मशीनरी जैसी परिसम्पत्तियों के भौतिक जीवन के आधार पर आकलित किया जाता |

(f) परिचालन एवं उत्पादन लागतें:

एक इकाई की परिचालन एवं उत्पादन लागतें कुल सामाजिक लागतों का भाग होती हैं । उत्पादन की तकनीक के बदलने से परिचालन लागतें भी बदलती हैं । श्रम-गहन तकनीक की परिचालन लागत उच्च मशीनीकृत तकनीक की अपेक्षा अधिक होती है भले ही मजदूरी की दर कम हो । इसका कारण यह है कि सस्ते श्रम की कुशलता अल्प होती है ।

दूसरी ओर कुशल श्रम दुर्लभ होता है अतः पूंजी प्रधान तकनीक में इसकी सामाजिक लागत अधिक होती है । उत्पादन की इन प्रत्यक्ष सामाजिक लागतों से हटकर अप्रत्यक्ष सामाजिक लागतें भी है, जैसे-प्रदूषण, संक्रामक रोगों की अधिकता के बचाव पर वहन की गई लागतें ।


3. निष्क्रिय तकनीकी प्रगति (Neutral Technical Progress):

व्यक्तिगत साधन उत्पादकतों को निर्धारित करने में तकनीकी प्रगति का महत्वपूर्ण योगदान है । एक विशिष्ट प्रकार की तकनीकी प्रगति सभी साधनों की उत्पादकता में एक समानुपाती परिवर्तन करती है ।

वस्तुतः वास्तविक जीवन में तकनीकी प्रगति ऐसी हो सकती है कि वह किसी एक विशिष्ट साधन को दूसरे के सापेक्ष अधिक पसन्द करें अर्थात् तकनीकी प्रगति श्रम बचत या पूंजी बचत करने वाली हो सकती है ।

तकनीकी प्रगति के इस एकतरफा रुझान को स्पष्ट करने के लिए अर्थशास्त्रियों ने Neutral Technical या निष्क्रिय तकनीकी प्रगति का प्रयोग किया । वास्तविकता में निष्क्रिय तकनीकी प्रगति एक दिए हुए तकनीकी परिवर्तन से एकतरफा रुझान के गुणात्मक परिवर्तन को अभिव्यक्त करती है ।

सामान्यतः एक निष्क्रिय नवप्रवर्तन न तो पूंजी बचत वाला और न ही श्रम बचत वाला होता है अर्थात यह अपने प्रभावों में इस अर्थ में निष्क्रिय है कि दोनों में से कोई भी कारक सीमान्त पर प्रभावकारी नहीं रहते ।

निष्क्रिय तकनीकी वृद्धि का विश्लेषण मुख्यतः निम्न अर्थशास्त्रियों द्वारा दिया गया:

(i) जे॰ आर॰ हिक्स की व्याख्या ।

(ii) आर॰ एफ॰ हैरोड की व्याख्या ।

(iii) राबर्ट सोलोव की व्याख्या ।


4. हैरोड की निष्क्रियता दशा के अधीन साधन शेयर की स्थिरता (Constancy of Factor Shares Under Harrod’s Neutrality):

हैरोड ने पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में निफियता के अधीन यह स्पष्ट किया कि लाभ एवं मजदूरी के मध्य आय का वितरण नहीं बदलता । ऐसा इस कारण होता है, क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता में साधनों को उनकी सीमान्त उत्पादकता के अनुरूप भुगतान किया जाता है ।

चूंकि हैरोड के निष्क्रिय तकनीकी परिवर्तन की दशा में पूंजी की सीमांत उत्पाद अपरिवर्तित रहता है इसलिए पूंजी व श्रम के मध्य साधन शेयर अपरिवर्तित ही रहेंगे ।

हैरोड की तकनीकी प्रगति की निष्क्रियता की दशा में साधन शेयरों की स्थिरता को निम्न प्रकार भी समझाया जा सकता है । यदि P लाभ हो तो आय में लाभ का अनुपात (P/Y) होगा, अर्थात्-

 

 

हम जानते हैं कि हैरोड की निष्क्रिय तकनीकी प्रगति की दशा में पूंजी का सीमान्त उत्पाद अर्थात् (δY/δK) एवं पूँजी उत्पादन अनुपात (K/Y) स्थिर रहते हैं इसलिए P/Y भी स्थिर होता है । अतः आय में लाभों का शेयर भी स्थिर रहता है ।

आय में मजदूरी का अंश W/Y = 1(P/Y)

चूंकि (P/Y) स्थिर है इसलिए W/Y भी स्थिर होगा ।

अतः यदि साधनों को उनके सीमान्त उत्पाद के बराबर भुगतान किया जाए तो हैरोड की निष्क्रियता की धारणा स्थिर साधन शेयरों को सूचित करेगी ।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि हिक्स की निष्क्रियता की दशा में साधनों के अंश स्थिर रहते हैं लेकिन यह भिन्न मान्यताओं पर आधारित है ।

हिक्स की निष्क्रियता की धारणा में साधन अंश की स्थिरता तब होगी जब साधन अनुपात एवं तब सापेक्षिक साधन पुरस्कार स्थिर होंगे लेकिन हैरोड की निष्क्रियता की दशा में साधनों के अंश तब स्थिर होंगे जब पूंजी गुणांक एवं तब लाभ की दर स्थिर रहे ।


5. सोलोव की निष्क्रिय दशा (Slow Bias or Slow Neutrality):

सोलोव के द्वारा स्पष्ट की गई तकनीकी निष्क्रियता उस दशा से अभिव्यक्त की जा सकती है जहां सीमांत उत्पादों के अनुपात तब स्थिर रहते हैं जब इन्हें श्रम अनुपातों के प्रति मापा जाए ।

समाविष्ट तकनीकी परिवर्तन एवम् पक्षपात का मापन (Embodied Technological Change and Measurement of Bias):

तकनीक के प्राचलों या विशिष्टताओं का अध्ययन अभी तक हमने उन स्थितियों में किया है जब वह एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं । तकनीकी परिवर्तन में पक्षपात का मापन करने के लिए प्राचलों को एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं छोडा जा सकता । वस्तुतः प्रतिस्थापन की सीमान्त दर (r) तथा प्रतिस्थापन की लोच के मध्य एक निकट सम्बन्ध विद्यमान होता है ।

समाविष्ट तकनीकी परिवर्तन का विश्लेषण उत्पादन में होने वाले गुणात्मक परिवर्तन है । एक ऐसा परिवर्तन जो परम्परागत रूप से मापी जा रही आदाओं की मात्रा की वृद्धि नहीं है । आदाओं में गुणात्मक परिवर्तनों को आदा बडाने वाले प्रभावों की भाँति देखा जाता है ।

सामान्य रूप से यह वृद्धि सभी आदाओं के बराबर नहीं होती । विभिन्न आदाओं की सीमान्त उत्पादकताओं का अनुपात समय के रहते बदलता है और यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि तकनीकी परिवर्तन निष्क्रिय नहीं होता ।

समाविष्ट तकनीकी परिवर्तन की धारणा को समझाने के लिए हम निष्क्रिय एवं गैर निष्क्रिय तकनीकी परिवर्तन की धारणाओं को ध्यान में रखते हैं । समाविष्ट तकनीकी परिवर्तन उस विशिष्ट तरीके को बताता है जिसमें किसी तकनीकी परिवर्तन को उत्पादन फलन में समावेशित कराया जाता है ।

हिक्स की निष्क्रिय तकनीकी परिवर्तन को उत्पादन फलन के स्थिर रूप में समावेशित करने पर-

इस दशा में दो साधनों पूंजी व श्रम के सीमान्त उत्पाद स्थिर है और उनके अनुपातों में कोई परिवर्तन नहीं होता ।


Home››Economics››Production››