कार्बन: मतलब और प्रपत्र | Carbon: Meaning and Forms in Hindi. Read this article in Hindi to learn about:- 1. Meaning of Carbon 2. Presence of Carbon on Earth 3. Forms.

कार्बन का अर्थ (Meaning of Carbon):

कोयले से हम सभी भली भांति परिचित हैं, जिसका उपयोग ईधन के रूप में किया जाता है । यही कोयला विभिन रूपों में हमारे जीवन का आधार है । इसके विभिन रूप जीव जन्तुओं के शरीर में तथा अनेक भोज्य पदार्थों जैसे- अनाज, चावल, दाल, शक्कर, चाय आदि में पाए जाते हैं ।

सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हम जितनी चीजों का उपयोग करते हैं उनमें अधिकांशत: कार्बन होता है । प्रकृति में पाए जाने वाले अमूल्य हीरे तथा पेंसिल की लीड भी कार्बन के ही रूप हैं । कार्बन विशिष्ट गुणों वाला एक अद्वितीय तत्व है, जो पृथ्वी पर केवल 0.03 प्रतिशत ही पाया जाता है किन्तु अपने विशेष गुणों के कारण इसके यौगिक अत्यधिक संख्या में (लगभग 4 लाख) ज्ञात हैं, जो अधिकांशत: पौधों एवं जन्तुओं द्वारा निर्मित हैं । प्रकृति में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के बाद कार्बन तीसरा जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व है ।

कार्बन की उपस्थिति (Presence of Carbon on Earth):

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कार्बन एक अधातु तत्व है, जिसका संकेत C है तथा जो प्रकृति में स्वतंत्र रूप में तथा यौगिकों के रूप में पाया जाता है ।

 

तत्व रूप में:

1. हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के शुद्ध रूप हैं ।

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2. भूपर्पटी में कार्बन कोयले के रूप में पाया जाता है ।

3. फुलरीन आकाश में पाया जाने वाला कार्बन का रूप है जिसमें 60 कार्बन परमाणु एक-दूसरे से जुडे रहते हैं जो फुटबाल के समान संरचना बनाते हैं ।

यौगिकों के रूप में:

1. पौधों तथा जन्तुओं के शरीर में जटिल कार्बनिक यौगिकों जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा आदि के रूप में ।

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2. भोज्य पदार्थों में विभिन्न कार्बनिक यौगिकों के रूप में ।

3. ईधनों में- रसोई गैस, सम्पीडित प्राकृतिक गैस (CNG) तथा बायोगैस आदि में ।

4. खनिजों में कार्बोनेटों के रूप में- जैसे संगमरमर तथा चूना पत्थर आदि में ।

5. वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस के रूप में ।

कार्बन तत्व तथा यौगिकों के रूप में पृथ्वी पर उपस्थित है । प्रकृति में कार्बन की उपलब्धता मुख्यत: प्रकाश संश्लेषण एवं श्वसन द्वारा बनी रहती है । ठोस ईधनों के दहन से भी वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है । हम जानते हैं कि अधिकांश पदार्थ जलने पर ठोस, काला अवशेष छोड़ते हैं, यह काला ठोस पदार्थ क्या है ?

हमारे आसपास पाए जाने वाले अन्य कौन-कौन से ऐसे पदार्थ हैं जो जलने पर काला अवशेष छोड़ते हैं । उनके नाम सूचीबद्ध कीजिए । ये सभी पदार्थ सामान्यत: कार्बनिक यौगिक कहलाते हैं (कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बोनेटों तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि को छोड्‌कर) ।

ये कार्बन के यौगिक होते हैं तथा वायु में धुएँदार ज्वाला से जलते हैं । कार्बनिक यौगिकों के अत्यधिक संख्या में पाए जाने का कारण कार्बन परमाणुओं का आपस में तथा अन्य तत्वों के साथ जुड़कर यौगिक बनाने की अद्‌भुत क्षमता है ।

अपररूपता:

कार्बन परमाणु विभिन विधियों द्वारा आपस में जुड़कर अलग-अलग संरचनाएं बनाते हैं जिस कारण भिन्न-भिन्न गुणों वाले पदार्थ बनते हैं जिन्हें अपररूप कहते हैं तथा तत्व का यह गुण अपररूपता कहलाता है । अपररूपों के भौतिक गुण भिन्न होते हैं तथा रासायनिक गुण समान होते हैं ।

कार्बन के अतिरिक्त फास्फोरस, गंधक (सल्फर) तथा ऑक्सीजन भी अपररूपता दर्शाते हैं । ओजोन ऑक्सीजन का अपररूप है । हीरा, ग्रेफाइट, चारकोल, कोयला, काजल आदि कार्बन के अपररूप है । इन्हें हाथ से छूने पर कुछ पदार्थ रवेदार तथा कुछ चिकने प्रतीत होते हैं । रवेदार पदार्थ कार्बन के क्रिस्टलीय रूप है जैसे हीरा तथा ग्रेफाइट । चिकने पदार्थ कार्बन के अक्रिस्टलीय रूप है,जैसे- कोयला, चारकोल, काजल आदि ।

 

कार्बन के रूप (Forms of Carbon):

कार्बन के क्रिस्टलीय रूप:

कार्बन के क्रिस्टलीय रूप में परमाण निश्चित ज्यामितीय में होते हैं । कार्बन के मख्य क्रिस्टलीय रूप हीरा एवं ग्रेफाइट हैं जो पृथ्वी के भीतर गहराई में पाए जाते हैं ।

हीरा-  अभी तक ज्ञात पदार्थों में हीरा सबसे कठोर पदार्थ है ।

उपस्थिति  यह दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, तंजानिया संयुक्त राज्य अमेरिका तथा भारत में पाया जाता है । भारत में मध्यप्रदेश की पन्ना तथा आंध्रप्रदेश की बज्रकरूर की खानों में पाया जाता है ।

संरचना  हीरे में प्रत्येक कार्बन परमाण अन्य चार कार्बन परमाणुओं से शक्तिशाली बंधों द्वारा जुड़कर एक दृढ, स्थायी, त्रिविमीय संरचना बनाते हैं जिस कारण हीरा अत्यन्त कठोर होता है, चतुष्फलकीय संरचना में चारों कार्बन परमाणु चतुष्फलक के चारों कोनों पर होते हैं । हीरे के भार को कैरेट में व्यक्त किया जाता है । ( 1 कैरेट = 200 मिली ग्राम)

गुण:

1. खदानों से प्राप्त प्राकृतिक हीरों में चमक नहीं होती । तराशने तथा पॉलिश करने के बाद उनमें विशेष चमक उत्पन्न होती है । यह चमक हीरे के भीतर प्रकाश के कई बार परावर्तन के कारण उत्पन होती है ।

2. यह रंगहीन, पारदर्शी, क्रिस्टलीय ठोस है । अशुद्धियों के कारण हीरों में विशेष रंग पाए जाते हैं ।

3. दृढ़ संरचना के कारण इनका घनत्व अधिक (3.5 gm/cm3) होता है । दृढ़ एवं भंगुर होता है । अर्थात चोट मारने पर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है ।

4. विद्युत का कुचालक है अर्थात इसमें विद्युत प्रवाहित नहीं की जा सकती ।

5. ऊष्मा का अच्छा चालक है ।

6. वायु की अनुपस्थिति में उच्च ताप पर (लगभग 3500C) गर्म करने पर सीधे ठोस से वाष्प में बदल जाता है ।

7. वायु की उपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है ।

C + O2 → CO2

उपयोग:

1. गहनों में, रत्नों के रूप में प्रयुक्त होता है ।

2. दृढ़ संरचना के कारण हीरा अत्यन्त कठोर होता है जिस कारण इसका उपयोग कांच काटने वाले औजारों तथा पत्थर में छेद करने वाले औजारों में किया जाता है ।

3. मोतियाबिन्द जैसे आँख के आपरेशनों में प्रयुक्त चाकू की नोक हीरे की बनी होती है ।

4. ऊष्मा से प्राप्त विकिरणों के लिए हीरा अत्यन्त संवेदनशील होता है, जिस कारण इनका उपयोग अन्तरिक्ष यानों की खिड़कियों में तथा अत्यन्त सुग्राही थर्मामीटर बनाने में किया जाता है ।

ग्रेफाइट:

उपस्थिति:

यह श्रीलंका, मैक्सिको, उत्तर कोरिया, चीन तथा भारत में पाया जाता है । भारत में ग्रेफाइट आंध्रप्रदेश, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, कश्मीर तथा उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में पाया जाता है ।

संरचना:

ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन परमाण अन्य तीन कार्बन परमाणओं से जुड़कर षट्‌कोणीय (छ: कोणों वाली) आकृति बनाते हैं । विभिन्न षट्‌कोणीय आकृतियाँ मिलकर जाली के समान संरचना बनाती हैं जो परतों के रूप में एक दूसरे के ऊपर व्यवस्थित रहती हैं । परतों के बीच दुर्बल बंध होने के कारण ये परतें एक-दूसरे के ऊपर फिसल सकती हैं जिस कारण ग्रेफाइट चिकना एवं मुलायम होता है तथा इसका उपयोग मशीनों के पुर्जों को चिकना करने के लिए (स्नेहक के रूप में) किया जाता है ।

गुण:

1. यह काले-भूरे रंग का क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ है ।

2. यह चिकना, अपारदर्शी तथा मुलायम होता है ।

3. इसका घनत्व 1.9 से 2.3 gm/cm3 होता है ।

4. विद्युत का सुचालक होता है अर्थात इसमें से विद्युत प्रवाहित होती है ।

5. गलनांक बहुत उच्च लगभग 3700C होता है ।

6. ऑक्सीजन की उपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करने पर मुख्यत: कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है ।

उपयोग:

1. ग्रेफाइट के चूर्ण का उपयोग भारी मशीनों के पुर्जों को चिकना करने के लिए किया जाता है ।

2. विद्युत का सुचालक होने के कारण शुष्क सेलों तथा विद्युत भट्टियों में इलेक्ट्रोड के रूप में प्रयुक्त किया जाता है । शुष्क सेल को तोड़ने पर उसके बीच में से प्राप्त काली छड़ ग्रेफाइट की ही बनी होती है ।

3. ग्रेफाइट का उपयोग पेंसिल की ‘लीड’ बनाने में किया जाता है ।

4. ग्रेफाइट को प्लास्टिक के साथ मिलाकर विशेष पदार्थ बनाया जाता है जिसका उपयोग अन्तरिक्ष यान के पुर्जे, डिश एण्टीना तथा टेनिस के रैकेट बनाने में किया जाता है ।

5. काला-भूरा रंग होने के कारण इसका उपयोग काला पेंट एवं स्याही बनाने में किया जाता है ।

 

हीरे तथा ग्रेफाइट के गुणों की तुलना:

ग्रेफाइट:

1. मौखिक रूप- चमकदार, काला-भूरा ठोस अपारदर्शी पदार्थ है ।

2. कठोरता- मुलायम, चिकना एवं फिसलनदार पदार्थ है ।

3. विद्युत चालकता- विद्युत का सुचालक होता है ।

4. ऊष्मीय चालकता- सामान्य ऊष्मीय चालक ।

5. घनत्व- 1.9-2.3 gm/cm3 लगभग ।

हीरा:

1. मौखिक रूप- रंगहीन, पारदर्शी ठोस है ।

2. कठोरता- अत्यन्त कठोर पदार्थ है ।

3. विद्युत चालकता- विद्युत का कुचालक होता है ।

4. ऊष्मीय चालकता- अत्यधिक ऊष्मीय चालक ।

5. घनत्व- 3.5 gm/cm3 लगभग

अक्रिस्टलीय कार्बन:

चारकोल, काजल एवं कोक कार्बन के प्रमुख अक्रिस्टलीय रूप हैं ।

चारकोल:

क्रियाकलाप:1 के अंतर्गत विभिन पदार्थों से प्राप्त काला पदार्थ वास्तव में चारकोल है । यह काला छिद्रयुक्त ठोस पदार्थ है जो आसानी से टूट जाता है । विभित्र स्रोत जिनसे चारकोल बनाया जाता है के अनुसार तीन रूप ज्ञात हैं- लकड़ी का चारकोल, जन्तु चारकोल एवं शर्करा चारकोल ।

चारकोल के उपयोग:

i. लकड़ी से प्राप्त चारकोल ईधन के रूप में प्रयोग किया जाता है ।

ii. लकड़ी से प्राप्त चारकोल (काष्ठ चारकोल) छिद्रदार होने के कारण गैसों को सोख लेता है अत: इसका उपयोग गैस मास्क में किया जाता है ।

iii. पानी छानने के लिए उपयोगी है ।

iv. जन्तुओं की हड्डियों से प्राप्त चारकोल का उपयोग शक्कर उद्योग में शक्कर को साफ करने (रंगहीन करने) के लिए किया जाता है ।

v. शक्कर से प्राप्त चारकोल का उपयोग धातु ऑक्साइडों से धातु प्राप्त करने में किया जाता है ।

कोक:

i. वायु की अनुपस्थिति में कोयले को गर्म करने पर जो ठोस अवशेष प्राप्त होता है वह कोक है तथा यह क्रिया भंजक आसवन कहलाती है ।

ii. कोक का उपयोग विभिन्न उद्योगों में ईधन के रूप में किया जाता है ।

iii. यह बिना धुए के जलता है अत: वायु प्रदूषण नहीं होता ।

iv. धातु ऑक्साइडों से धातु प्राप्त करने में कोक का उपयोग किया जाता है ।

काजल: 

घरेलु कार्यों  में प्रयुक्त विभिन तेलों जैसे सरसों का तेल मूंगफली का तेल तथा घासलेट या कैरोसीन एवं पेट्रोलियम तथा उसके अनेक उत्पादों को यदि वायु की कम मात्रा में जलाया जाए तो प्राप्त काला पदार्थ काजल होता है । आइए काजल प्राप्त करने हेतु एक क्रियाकलाप करें ।

काजल का उपयोग:

i. काजल का उपयोग स्याही तथा काले पेंट बनाने में किया जाता है ।

ii. काजल का उपयोग टायर तथा प्लास्टिक निर्माण में भी होता है ।

iii. कार्बन पेपर तथा जूतों की पॉलिश बनाने में भी काजल का उपयोग होता है ।

उपरोक्त अध्ययन से हमने जाना कि हीरा तथा ग्रेफाइट कार्बन के क्रिस्टलीय अपररूप हैं । यह पृथ्वी के भीतर विभिन गहराइयों पर अलग-अलग ताप एवं दाब पर उत्पन हुए हैं । कोयले की खानों में भी अत्यन्त सूक्ष्म आकार के हीरे पाए जाते हैं । हीरे एवं ग्रेफाइट की संरचना में अंतर के कारण उनके भौतिक गुण भिन्न लेकिन रासायनिक गुण एक समान हैं ।

काजल कोक तथा चारकोल कार्बन के अक्रिस्टलीय रूप हैं । यदि इन अपररूपों को वायु में जलाया जाए तो कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न होगी । जिसकी पहचान चूने के पानी द्वारा की जा सकती है । कार्बन डाइऑक्साइड की उत्पत्ति इस बात का प्रमाण है कि ये सभी अपररूप कार्बन से बने हैं । कार्बन को वायु में जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस प्राप्त होती है जिसका सूत्र CO2 है ।

कार्बन को वायु की उद्दम मात्रा में जलाने पर कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस (CO) प्राप्त होती है जो अत्यन्त विषैली होती हैं ।

2C + O2 → 2CO

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