कुकब्रिट फसलों के खरबूजे को कैसे नियंत्रित करें? | Read this article in Hindi to learn about how to control weeds of cucurbit crops.

कद्‌दूवर्गीय अधिकांश सब्जियाँ लतायुक्त होती हैं । जिनका विकास शीघ्र एवं खरपतवारों को दबा देती है । फिर भी प्रारंभिक अवस्था में यदि खरपतवारों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो लताओं की बढ़वार रुक जाती है एवं सब्जियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।

कद्‌दूवर्गीय सब्जियों को खरपतवार निम्नलिखित रूप से हानि पहुँचाते हैं:

(1) पोषक तत्वों का उदग्रहण:

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सब्जियों में उगे हुए खरपतवार भूमि से पोषक तत्त्व ले लेते हैं जिसके फलस्वरूप सब्जियों के पौधों को पोषक तत्त्व कम मिलते हैं । इसका सीधा प्रभाव पौधों की वृद्धि पर पड़ता है ।

(2) उपज पर प्रभाव:

खरपतवारों के कारण कद्‌दूवर्गीय सब्जियों की उपज में लगभग 10-15 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है, जबकि अन्य सब्जियों में इसका असर 20-70 प्रतिशत तक का होता है। इसकी मुख्य वजह इनकी लतायें शीघ्र बढ़ने वाली होती हैं जिसके कारण ये जल्दी ही खरपतवारों को दबा देती है ।

(3) कीट व्याधियों को बढ़ावा:

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खरपतवार पर अनेक प्रकार के कीट दिखाई देते हैं जिनके कारण इन कीटों को इन खरपतवारों पर पनपने का मौका मिलता है जिसके फलस्वरूप कद्दूवर्गीय सब्जियों के पौधों को कीट व्याधियाँ इत्यादि क्षति पहुँचाते हैं ।

(4) स्थान एवं प्रकाश की कमी:

खरपतवारों की वृद्धि अधिक होने से सब्जियों के पौधों को आवश्यकतानुसार स्थान एवं प्रकाश उपलब्ध नहीं हो पाता है, जिसके परिणामस्वरूप सब्जियों की वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ता है ।

(5) फलों की गुणवत्ता पर प्रभाव:

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खरपतवारों की वृद्धि से फलों की गुणवत्ता में कमी आती है । इनका आकार छोटा रह जाता है एवं इन फलों पर छोटे-छोटे धब्बे बन जाते हैं जिसके फलस्वरूप बाजार में इनकी उचित कीमत नहीं मिल पाती है ।

(6) व्यय की अधिकता:

खरपतवार के कारण कद्‌दूवर्गीय सब्जियों में ज्यादा निराई-गुड़ाई करनी पड़ती है जिससे निराई-गुड़ाई पर व्यय अधिक होता है जिसके फलस्वरूप प्रति इकाई खर्चा बढ जाने से आमदनी घट जाती है ।

खरपतवारों पर नियंत्रण पाने के लिए अनेक विधियाँ अपनाई जाती हैं:

i. नियंत्रण हेतु निराई-गुड़ाई:

यह विधि बहुत प्रचलित है । सब्जियों में जब भी खरपतवार दिखाई देते हैं निराई-गुड़ाई कर दी जाती है । छोटे किसान इस विधि को अपनाकर खरपतवारों की रोकथाम करते हैं । इस विधि में लागत अधिक आती है एवं श्रमिक उपलब्ध नहीं होने की वजह से समय पर रोकथाम नहीं कर पाते हैं । साथ में इस विधि द्वारा समय पर कार्य नहीं हो पाता है । इसके अलावा बड़े पैमाने पर इस विधि द्वारा खरपतवार पर नियंत्रण पाना सम्भव नहीं हो सकता है ।

यदि निराई-गुड़ाई का कार्य मशीनों से किया जाए तब जाकर व्यावसायिक स्तर पर खरपतवार नियंत्रण संभव है । कद्‌दू वर्ग की सब्जियां पंक्तियों में लगाई जाती हैं जिनकी लतायें लगभग 30-40 दिनों के बाद फैलना आरम्भ करती हैं । उस स्थिति में खरपतवारों को ट्रैक्टर चलाकर नष्ट किया जा सकता है ।

दो पंक्तियों के बीच में इतनी जगह होती है जिसमें कि आसानी से ट्रैक्टर चलाया जा सकता है । पौधों के थालों को खुर्पी की सहायता से साफ किया जा सकता है । इस विधि से पौधों में वृद्धि भी अच्छी होती है क्योंकि मिट्‌टी भुरभुरी होने की वजह से जड़ों को बढ़ने का भरपूर मौका मिलता है ।

फलस्वरूप जड़ें जमीन से अधिक मात्रा में पोषक तत्व लेकर पौधों तक पहुंचाती है और उत्पादन में वृद्धि होती है । यदि सब्जियों में 30-40 दिन तक खरपतवार पर नियंत्रण कर लिया जाए तो निश्चित ही इस समस्या का समाधान पाया जा सकता है ।

ii. पलटवार डालकर अथवा मल्चिंग द्वारा:

खरपतवार को रोकने के लिए यह एक अच्छी विधि है । इस विधि के अंतर्गत सब्जियों की पंक्तियों के बीच में घास-फूस अथवा पुआल की एक परत या पलवार बिछा दी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप खरपतवार दबकर नष्ट हो जाते हैं । कभी-कभी बड़े पैमाने पर यह विधि संभव नहीं हो पाती है क्योंकि इतनी अधिक मात्रा में घास-फूस एवं पत्तियाँ उपलब्ध नहीं हो पाती हैं ।

यदि इनको दूसरी जगह से उपलब्ध भी कराया जाए तो इनकी कीमत इतनी अधिक हो जाती है कि आर्थिक दृष्टि से यह लाभकारी सिद्ध नहीं हो पाती है। इस विधि के प्रयोग से खरपतवारों का जमाव कम होता है तथा साथ ही उनको प्रकाश एवं वायु नहीं मिलने के कारण वे कमजोर एवं पीले रंग के हो जाते हैं तत्पश्चात मर जाते हैं ।

इस विधि के प्रयोग में जमीन की सम्पूर्ण सतह ढकी रहती है, जिसकी वजह से नमी उड़ने नहीं पाती है एवं सिंचाइयों की आवश्यकता नहीं रहती है, परिणामस्वरूप सिंचाई की संख्या में भी कमी हो जाती है । इस तरीके से पलवार में हुआ खर्च सिंचाईयों में हुई कमी से पूरी हो जाती है ।

इस विधि के प्रयोग से फल सीधे भूमि के संपर्क में नहीं आते हैं, जिससे फल कम सड़ते हैं एवं गुणवत्ता के दृष्टिकोण से उत्तम होते हैं । फलस्वरूप ऐसे फलों का बाजार में अधिकतम मूल्य होता है । पलवार के सड़ने से मिट्‌टी की गुणवत्ता में भी सुधार होता है एवं पोषक तत्वों की मात्रा में वृद्धि होती है । यदि संभव हो सके तो किसान भाइयों को इस विधि का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इस विधि द्वारा कम सिंचाई यों में उत्तम उपज प्राप्त हो जाती है ।

iii. रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण विधि:

कद्दूवर्गीय सब्जियों में सामान्यतया निम्न रसायनों का प्रयोग करने से खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।

कुछ मुख्य रसायनों का प्रभाव निम्नलिखित है:

1. प्रारम्भिक अवस्था में जब तक लतायें फैलना शुरू नहीं करें तब ग्रैमैक्सान नामक रासायनिक दवा से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है । इस रसायन का 0.2 प्रतिशत घोल बनाकर के जमीन पर उगे खरपतवारों पर छिड़क देते हैं, जिसके फलस्वरूप वे पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं । लेकिन इन रसायनों का पौधों पर कदापि छिड़काव नहीं करना चाहिए अन्यथा इसके प्रभाव से पौधे भी नष्ट हो जाएंगे ।

2. एक किलोग्राम ट्राइफ्‌लूरोलिन नामक रसायन को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर भूमि में बुआई से पहले छिड़काव करते हैं । तत्पश्चात इसको भूमि की ऊपरी सतह में मिला देते हैं । इसके बाद बीजों की बुआई की जाती है । इस रसायन से 50 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं । बाद में लतायें बढ्‌कर फैल जाती हैं, जिसके बाद खरपतवार आने की चिंता नहीं रहती है ।

3. कद्‌दू वर्ग की सब्जियों की फसलों के लिए उपयोगी खरपतवारनाशी निम्नलिखित हैं- एलाक्लोर (लासो) ब्यूटाक्लोर (मैचैटि) नाइट्रोफेन (टोक-ई-25), फल्युक्लेरैलिन (बी.ए.एस.एस) ऑक्सीफलोफरैन (गोल) ऑस्नाडायाजोन (रोनस्टार)

4. लौकी के लिए फ्लूक्लोरैलिन एक किलोग्राम सक्रिय अव्यव प्रति हैक्टेयर या ब्यूटाक्लोर 1.5 किलोग्राम सक्रीय अव्यव प्रति हैक्टेयर उपयुक्त रहता है इनको अंकुरण से पहले छिड़काव के लिए प्रयोग किया जाता है तथा बीज की बुआई के एक दिन बाद तक छिड़का जाता है । फ्‌लूक्लोरोलिन से द्विबीजपत्री खरपतवारों की 10 दिन तक एवं एक बीजपत्री खरपतवारों की 60 दिन तक रोकथाम की जा सकती है । ब्यूटाक्लोर दोनों ही प्रकार के खरपतवारों की 60 दिन तक रोकथाम करने में सक्षम होता है ।

5. तोरई के लिए एलाक्लोर या ब्यूटाक्लोर 2 किलोग्राम सक्रीय अवयव प्रति हैक्टेयर अथवा फ्लूक्लोरैलिन एक किलोग्राम सक्रीय अवयव प्रति हैक्टेयर की दर से अंकुरण पूर्व छिड़काव के रूप में प्रयोग करना उचित रहता है । इसका छिड़काव बीज की बुआई के एक दिन बाद किया जाता है । एलाक्लोर तथा ब्यूटाक्लोर से सभी प्रकार के खरपतवारों पर नियंत्रण 60 दिनों तक तथा फ्लूक्लोरैलिन से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की 90 दिन तथा घासकुलीन खरपतवारों की 60 दिन तक रोकथाम हो जाती है ।

6. करेले के लिए एलाफ्‌लोर या ब्यूटाक्लोर 2 किलोग्राम तथा फलूलेरैलिन या ऑक्जाडायाजून एक किलोग्राम सक्रीय अवयव प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग किया जाता है । इन सभी का छिड़काव बुवाई के एक दिन बाद अंकुरण-पूर्व छिड़काव के रूप में किया जाता है । ऑक्जाडायाजोन सभी प्रकार के खरपतवारों का 60 दिन तक नियंत्रण कर देता है ।

7. सीताफल, काशीफल, कद्‌दू एवं तरबूज आदि के लिए अंकुरण पूर्व छिड़काव के रूप में बुआई के एक दिन बाद 2 किलोग्राम सक्रीय अवयव प्रति हैक्टेयर की दर से ब्यूटाक्लोर का प्रयोग करना फायदेमंद होता है । जो सभी प्रकार के खरपतवारों की 60 दिन तक रोकथाम कर देती है ।