लोक प्रशासन का विकास | Evolution of Public Administration in Hindi.

‘लोक प्रशासन’ शब्द के दो निहितार्थ हैं । पहला, यह सरकार के मामलों जैसे कानून और व्यवस्था कायम रखना आदि को प्रशासित करने की गतिविधि से जुड़ा है । दूसरा, यह अध्ययन के अनेक क्षेत्रों जैसे समाजशास्त्र, राजनीति-विज्ञान, अर्थशास्त्र और दर्शन आदि से भी जुड़ा है ।

सरकारी गतिविधि के एक पहलू के रूप में लोक प्रशासन उतना ही पुराना है जितना की राजनीतिक समाज, यानी राजनीतिक निर्णयकर्ताओं द्वारा निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए यह राजनीति व्यवस्थाओं के साथ सह-अस्तित्व कायम रखता है ।

किंतु एक व्यवस्थित अध्ययन के क्षेत्र के रूप में, लोक प्रशासन काफी नया अर्थात् सिर्फ सौ साल पुराना है । फिर भी, प्राचीन काल से ही तमाम चिंतकों ने प्रशासकीय विचार और व्यवहार में अपना योगदान दिया है ।

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उदाहरणार्थ प्राचीन भारत में कौटिल्य के अर्थशास्त्र, प्राचीन पश्चिम में अरस्तु के पॉलिटिक्स और मध्यकालीन पश्चिम में मैकियावेली के दि प्रिंस में सरकार के संगठन और काम करने के तरीकों के बारे में महत्त्वपूर्ण टीका-टिप्पणियाँ हैं ।

18वीं सदी में, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में ‘कैमरलवाद’ सरकारी मामलों के व्यवस्थित प्रबंधन से जुड़ा हुआ था । कैमरलवादियों ने लोक प्रशासन के अध्ययन में गौरतलब दिलचस्पी दिखाई । उन्होंने लोक प्रशासन से जुड़े मामलों पर व्यवस्थित शोधकार्यों को हाथ में लिया ।

उनके अध्ययन और शोध का उद्देश्य लोक सेवा के लिए प्रत्याशियों को प्रशिक्षित करना था । इसीलिए उन्होंने लोक प्रशासन की संरचनाओं सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के विवरणात्मक अध्ययनों और लोक अधिकारियों के पेशेवर प्रशिक्षण पर बल दिया ।

जॉर्ज जिन्के कैमेरलवादी समूह के सबसे प्रतिष्ठित विद्वान थे । 18वीं सदी के आखिरी वर्षों में अमेरिका में, पहली बार लोक प्रशासन के अर्थ और उद्देश्य को हैमिंल्टन के दि फेडरलिस्ट (अंक 72) में परिभाषित किया गया ।

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चार्ल्स ज्यां बूनिन के फ्रेंच में लिखे प्रिसिपलेस दे एदमिनिस्त्रेशन पब्लिक (1812) को लोक प्रशासन के विषय पर पहला पृथक शोध माना जाता है । फिर भी, अध्ययन के एक अलग विषय के रूप में लोक प्रशासन अमेरिका में पैदा और विकसित हुआ ।

रूमकी बसु के अनुसार, इसमें 10वीं सदी में निम्न कारकों ने योगदान दिया है:

(i) वैज्ञानिक प्रबंधन आंदोलन जिसकी वकालत एफ. डब्ल्यू. टेलर ने की ।

(ii) 19वीं सदी का औद्योगिकीकरण जिसने विशाल स्तर के संगठनों को जन्म दिया ।

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(iii) पुलिस राज्य (मुक्त व्यापार) को प्रतिस्थापित करते हुए कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का उदय ।

(iv) ‘स्पॉइल्स सिस्टम’ के नकारात्मक परिणामों के कारण पैदा हुआ सरकारी सुधारों का आंदोलन ।

लोक प्रशासन एक अकादमिक अनुशासन के रूप में कई परस्पर आच्छादित रूपांतरणों के क्रम से होकर विकसित हुआ है जो निम्न प्रकार से हैं:

चरण 1 : राजनीति-प्रशासन द्विभाजन (1887-1926),

चरण 2 : प्रशासन के सिद्धांत (1927-1937),

चरण 3 : चुनौती का युग (1938-1947),

चरण 4 : पहचान का संकट (1948- 1970),

चरण 5 : लोकनीति परिप्रेक्ष्य (1970-जारी) ।

राबर्ट टीं गोलेम्बीनस्की के अनुसार लोक प्रशासन के ऐतिहासिक विकास के चार चरण हैं:

चरण 1 : विश्लेषणात्मक राजनीति/प्रशासन,

चरण 2 : ठोस व सुदृढ़ राजनीति/प्रशासन,

चरण 3 : प्रबंधन का एक विज्ञान,

चरण 4 : लोकनीति उपागम ।

चरण 1 : राजनीति-प्रशासन द्विभाजन (1887-1926) | Stage I : Politics-Administration Dichotomy (1887-1926):

यह लोक प्रशासन के एक अनुशासन के रूप में उद्भव का आरंभ है । इस चरण का मूलभूत विषय था प्रशासन का राजनीति से प्रथक्करण जिसे सामान्यत: ‘राजनीति-प्रशासन द्विभाजन’ के रूप में जाना जाता है ।

यह चरण 1887 में राजनीति विज्ञान चातुर्मासिक में बुडरो विल्सन के निबंध दि स्टडी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के साथ शुरू हुआ । इस निबंध ने लोक प्रशासन के एक पृथक, स्वतंत्र और व्यवस्थित अध्ययन की बुनियाद डाली । इसीलिए विल्सन को ‘लोक प्रशासन का पिता’ कहा जाता है ।

विल्सन ने प्रशासन को राजनीति से अलग किया । उन्होंने तर्क दिया कि राजनीति का सरोकार नीति-निर्माण से है जबकि प्रशासन का सरोकार नीति निर्णयों को लागू करने से होता है । उनके शब्दों में ”…कि प्रशासन राजनीति के निश्चित क्षेत्र से बाहर पड़ता है । प्रशासनिक सवाल राजनीतिक सवाल नहीं होते । हालाँकि राजनीति ही प्रशासन के लक्ष्य तय करती है, लेकिन इसे प्रशासन के कार्यालयों को प्रभावित करने की जहमत नहीं उठानी चाहिए ।”

विल्सन ने लोक प्रशासन का वर्णन व्यापार के एक क्षेत्र के रूप में किया । उन्होंने टिप्पणी की- ”प्रशासन का क्षेत्र एक व्यापार का क्षेत्र है । यह राजनीति की जल्दबाजी और दिक्कतों के अध्ययन से हटकर है ।” उन्होंने आगे कहा- ”यह (प्रशासन) राजनीतिक जीवन का हिस्सा उसी तरह है जैसे घर गिनने की पद्धतियाँ समाज के जीवन का एक हिस्सा है; उसी तरह जैसे निर्मित उत्पाद का एक हिस्सा यंत्र होता है ।”

विल्सन मानते थे कि प्रशासन एक विज्ञान है । इसलिए उन्होंने कहा कि- ”प्रशासन का विज्ञान राजनीति के विज्ञान के उस अध्ययन का नवीनतम फल है जो लगभग बाइस सौ साल पहले शुरू हुआ था । यह हमारे देश में ही उत्पन्न हुआ, लगभग हमारी अपनी पीढ़ी में । अब हमारे पास वह है जो हमारे पास कभी नहीं था प्रशासन का एक विज्ञान ।”

उन्होंने लोक प्रशासन के एक पृथक अध्ययन का आह्वान किया । उनका बुनियादी तर्क था- ”एक संविधान की रचना करने से ज्यादा मुश्किल उस संविधान को चलाना होगा ।”

इसीलिए प्रशासन का एक विज्ञान होना चाहिए, जो निम्नलिखित प्रयास करेगा:

(i) सरकार के रास्तों को आसान करना,

(ii) अपने कार्य को ज्यादा व्यापार-सा बनाना,

(iii) अपने संगठन को मजबूत और शुद्ध बनाना,

(iv) अपने कर्त्तव्यों को कर्त्तव्यपरायणता के साथ निभाना विल्सन की विचार पद्धति को फ्रैंक जे. गुडनॉव ने 1900 में प्रकाशित अपनी पुस्तक पॉलिटिक्स एंड एडमिनिस्ट्रेशन में आगे बढ़ाया । उन्होंने सरकार के दो कार्यों राजनीति और प्रशासन में भारी अंतर दिखलाया । गुडनॉव के शब्दों में- ”राजनीति का मतलब नीतियों या राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति से होता है” जबकि ”प्रशासन का नाता इन नीतियों को लागू करने से होता है ।”

इस अंतर का आधार शक्तियों के क्लासिकीय पृथक्करण से मिला । विल्सन की तरह गुडनॉव ने भी एक स्वतंत्र और पृथक अनुशासन के रूप में लोक प्रशासन को प्रोत्साहित करने की वकालत की । उन्हें ‘अमेरिकी लोक प्रशासन का पिता’ माना जाने लगा ।

बीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने लोक सेवा आंदोलन (सरकारी सुधारों के लिए चलाए गए आंदोलन) में काफी दिलचस्पी दिखाई । परिणामत: लोक प्रशासन पर अध्येताओं का ध्यान पहली बार गंभीरता से गया ।

अमरीकी राजनीति विज्ञान संघ ने अपनी 1914 की रिपोर्ट में कहा कि राजनीति विज्ञान का एक सरोकार सरकारी पदों के लिए विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करना है । 1926 में एल.डी.व्हाइट की इंट्रोडक्शन टू दि स्टडी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन प्रकाशित हुई ।

यह लोक प्रशासन पर पहली पाठ्य पुस्तक थी । इसके प्रकाशन के साथ ही इस विषय को अकादमिक वैधता हासिल हो गई । यानी अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने लोक प्रशासन के निर्देश पाठ्यक्रमों को उपलब्ध कराना शुरू कर दिया ।

चरण 2 : प्रशासन के सिद्धांत (1927-1937) | (Stage II : Principles of Administration):

इस चरण के दौरान, विद्वान मानते थे कि प्रशासन के कुछ निश्चित सिद्धांतों को खोजा जा सकता है और लोक प्रशासन के प्रभाव और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है ।

वे मानते थे कि प्रशासन, प्रशासन होता है भले ही उसकी प्रकृति और कार्य का परिवेश कैसा भी हो, क्योंकि प्रशासन के सिद्धांत तो सार्वभौमिक वैधता और प्रासंगिकता वाले होते हैं । इसीलिए उन्होंने दावा किया कि लोक प्रशासन एक विज्ञान है ।

यह चरण 1927 में डब्ल्यू. एफ. विलोबी की पुस्तक प्रिंसिपल्स और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के प्रकाशन के साथ शुरू हुआ । उन्होंने बलपूर्वक कहा- ”प्रशासन में कुछ निश्चित सिद्धांत होते हैं, जो सामान्यत: उसी प्रकार लागू होते हैं, जिस प्रकार किसी भी विज्ञान में होते हैं ।” प्रशासन के सिद्धांत अप्रोच को प्रतिबिंबित करते हैं ।

इस चरण के अन्य महत्त्वपूर्ण प्रकाशन इस प्रकार हैं:

(i) हेनरी फेयॉल की इंडस्ट्रियल एंड जनरल मैनेजमेंट (1916),

(ii) एम.पी. फॉलेट की क्रिएटिव एक्सपीरियंस (1924),

(iii) मूनी और रेली की ऑनिवर्य इंडस्ट्री (1931),

(iv) गुलिक और अरविक की पेपर्स ऑन दि साइंस ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (1937),

(v) मूनी और रेली की प्रिंसिपल्स ऑफ ऑर्गनाइजेशन (1939) ।

लोक प्रशासन के उद्भव का यह चरण गुलिक और अरविक के पेपर्स ऑन दि साइंस ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (1937) के साथ अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा । गुलिक और अरविक ने कहा- ”इस शोध पत्र की सामान्य थीसिस यह है कि मानव संगठन के अध्ययन द्वारा ऐसे सिद्धांतों पर आगमनात्मक (Inductive) तरीके से अध्ययन पर पहुँचा जा सकता है जो किसी भी प्रकार के मानव संघों की व्यवस्थाओं को नियमित कर सकते हैं । एक तकनीकी प्रश्न की तरह इन सिद्धांतों का यह सोचे बिना अध्ययन किया जा सकता है कि उद्यम का उद्देश्य क्या है, उसमें कौन-सा कर्मचारी वर्ग है, या इसकी रचना के आधार में मौजूद कोई भी संवैधानिक, राजनीतिक या सामाजिक सिद्धांत क्या है ।”

जैसा कि मोहित भट्टाचार्य द्वारा ठीक ही कहा है- ”लोक प्रशासन का ‘लोक’ वाला पहलू इस दौर में एक तरह से पूर्ण ह्रास का शिकार था और पूरा ध्यान प्रभाविता पर था । इस चरण को कट्टरपंथी दौर कहा जा सकता है, जबकि ‘प्रबंधन’ को एक नए अनुशासन की सीमाओं में दृढ़ता से रेखांकित करने के प्रयास प्रगति पर थे । लोक प्रशासन नए विज्ञान से मिल गया ।” इस चरण के दौरान लोक प्रशासन अपनी प्रतिष्ठा के शीर्ष पर पहुँचा ।

चरण 3 : चुनौती का युग (1938-1947) | (Stage III : Era of Challenge):

इस चरण का मुख्य विषय था-लोक प्रशासन के अध्ययन के मानव संबंध व्यवहार उपागम की वकालत । लोक प्रशासन के दोनों ही निर्धारक स्तंभों को चुनौती दी गई । तर्क दिया गया कि प्रशासन को राजनीति से, इसकी राजनीतिक प्रकृति और राजनीतिक भूमिका के कारण अलग नहीं किया जा सकता ।

प्रशासन न केवल राजनीतिक नीति निर्णयों को लागू करने से सरोकार रखता है, बल्कि नीति के निर्धारण में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो कि राजनीति का क्षेत्र है । दूसरे शब्दों में, राजनीति-प्रशासन द्विभाजन के विचार को खारिज कर दिया गया ।

उसी प्रकार प्रशासन के सिद्धांतों को भी वैज्ञानिक वैधता और सार्वभौमिक प्रासंगिकता की कमी के आधार पर चुनौती दी गई और आलोचना की गई । इस प्रकार उन्हें ‘कहावत’ और ‘प्रकृतिवादी भ्रांति’ की उपाधियाँ दी गईं ।

इसके अतिरिक्त, संगठनात्मक विश्लेषण के सिद्धांत-उपागम की संगठन के औपचारिक ढांचे पर इसके जोर और संगठनात्मक व्यवहार के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहलुओं की उपेक्षा के कारण एक यांत्रिक उपागम के रूप में आलोचना की गई ।

पल्टन मेयो के नेतृत्व में हुए हॉथोर्न अध्ययनों (1924-32) ने यह दिखाते हुए संगठनात्मक विश्लेषण की बुनियादों को हिला दिया कि संगठनात्मक प्रभाविता का निर्धारण करने में अनौपचारिक संगठन का महत्व क्या है । इन अध्ययनों ने संगठन के ‘मानव संबंध’ उपागम को जन्म दिया ।

इस दौर के प्रमुख प्रकाशन जिन्होंने क्लासिकीय लोक प्रशासन को चुनौती दी, वे थे:

(i) सी.आई. बेर्नार्ड- दि फंक्शन ऑफ दि एक्जिक्यूटिव (1938),

(ii) एफ. मॉर्सटीन मार्क्स (सं.)- एलिमेंट्‌स ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (1946),

(iii) हरबर्ट ए. साइमन- दि प्रोवर्बस ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (1946),

(iv) हरबर्ट ए. साइमन- एडमिनिस्ट्रेटिव बिहेवियर (1947),

(v) रॉबर्ट डाल- दि साईस ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन: थ्री प्रॉब्लम्स (1947),

(vi) ड्‌वाइट वाल्- दि एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेट (1948) ।

हरबर्ट ए. साइमन प्रशासन के सिद्धांतों के सबसे अहम आलोचक थे । उन्होंने इन्हें ‘कहावत’ कहा । उन्होंने लोक प्रशासन को और अधिक वैज्ञानिक अनुशासन बनाने के लिए व्यवहार संबंधी उपागम की वकालत की । उन्होंने सिद्धांत उपागम के विकल्प के रूप में निर्णय निर्माण पर ध्यान दिया ।

साइमन के शब्दों में- ”अगर कोई ‘विचारधारा’ है, तो निर्णय निर्माण ही प्रशासन का मर्म है और प्रशासनिक विचारधारा की शब्दावली मानव चयन के तर्क और मनोविज्ञान से निकाली जानी चाहिए ।” साइमन ने राजनीति-प्रशासन द्वैधता को खारिज किया और लोक प्रशासन के अध्ययन के लिए आनुभविक उपागम का सुझाव दिया ।

इस तरह, जैसा कि मोहित भट्टाचार्य कहते हैं- ”वह नीति-निर्माण, माध्यम और लक्ष्य के संबंध के अध्ययन में तर्कसंगत प्रत्यक्षवाद के परिप्रेक्ष्य को ले आए । मनोविज्ञान और सामाजिक मनोविज्ञान में ‘व्यवहारवाद’ के परिप्रेक्ष्य और पद्धति को प्रतिबिंबित करते हुए, प्रशासनिक व्यवहार ने लोक प्रशासन में वैज्ञानिक दृढ़ता को बढ़ाने की वकालत की ।”

रॉबर्ट डाल ने तर्क दिया कि लोक प्रशासन में विज्ञान का उद्भव (या प्रशासन के सार्वभौमिक सिद्धांतों का विकास) तीन समस्याओं से बाधित था:

(i) लोक प्रशासन की समस्याओं से आदर्शों की चिंता को हटाने की बारंबार होने वाली असंभाव्यता । लोक प्रशासन का अध्ययन लक्ष्यों के थोड़े स्पष्टीकरण पर आधारित होने चाहिए ।

(ii) मानव व्यवहार के निश्चित पहलुओं के अध्ययन की आवश्यकता लोक प्रशासन के किसी विज्ञान की संभावनाओं को सीमित कर देती है । उन्होंने संगठन को औपचारिक तकनीकी शब्दावली में समझने की आलोचना की । संगठन का निर्माण करने वाले उन मनुष्यों को भी कुछ महत्व न देने की आलोचना की ।

(iii) प्रशासन के सिद्धांतों की अवैज्ञानिक प्रकृति जो सीमित राष्ट्रीय और ऐतिहासिक परिदृश्य की चंद मिसालों पर आधारित है ।

रॉबर्ट डाल ने टिप्पणी की- “हम लोक प्रशासन के किसी विज्ञान से बहुत दूर हैं । लोक प्रशासन का कोई विज्ञान संभव नहीं है, जब तक कि (क) आदर्शवादी मूल्यों के स्थान को स्पष्ट नहीं किया जाता; (ख) लोक प्रशासन के क्षेत्र में मनुष्य की प्रकृति को बेहतर तरीके से समझा नहीं जाता और उसका व्यवहार अधिक अनुमाननीय नहीं बनता; और (ग) एक तुलनात्मक अध्ययनों का संग्रह नहीं होता जिससे कि उन सिद्धांतों और सामान्यताओं को खोजा जा सकेगा जो राष्ट्रीय सीमाओं और विशिष्ट ऐतिहासिक अनुभवों से परे हैं ।”

रॉबर्ट डाल ने प्रशासनिक व्यवहार पर परिवेशीय प्रभाव को स्पष्ट किया । वह मानते थे कि लोक प्रशासन राष्ट्रीय मनोविज्ञान और उस सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश के प्रभाव से नहीं बच सकता जिसमें यह विकसित होता है । इसीलिए, उन्होंने संस्कृति-पारीय अध्ययनों अर्थात तुलनात्मक अध्ययनों का सुझाव दिया ।

उनके शब्दों में ”…लोक प्रशासन के तुलनात्मक पहलुओं की काफी उपेक्षा की गई है । जब तक लोक प्रशासन का अध्ययन तुलनात्मक नहीं है, तब तक ‘लोक प्रशासन के विज्ञान’ के दावे खोखले प्रतीत होते हैं । बोधगम्य रूप से एक अमरीकी लोक प्रशासन का विज्ञान, एक ब्रिटिश लोक प्रशासन का विज्ञान और एक फ्रांसीसी लोक प्रशासन का विज्ञान भी हो सकता है; मगर क्या अपने विशिष्ट राष्ट्रीय परिदृश्य से स्वतंत्र सामान्यीकृत सिद्धांतों के एक निकाय के अर्थों में क्या कोई ‘लोक प्रशासन का विज्ञान’ हो सकता है ? लोक प्रशासन के अध्ययन को अनिवार्य रूप से कहीं ज्यादा व्यापक रूप से अनुशासन आधारित होना ही चाहिए, जो तकनीकों और प्रक्रियाओं के संकीर्ण रूप से परिभाषित ज्ञान पर आधारित न हो, बल्कि अलग-अलग ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय, आर्थिक और अन्य निर्धारक कारकों तक विस्तृत होता हो…” ।

चरण 4 : पहचान का संकट (1948-1970) | (Stage IV : Crisis of Identity):

राजनीति-प्रशासन द्विभाजन और प्रशासन के सिद्धांतों को नकारने के साथ, लोक प्रशासन को पहचान के संकट का सामना करना पड़ा ।

परिणामस्वरूप लोक प्रशासन के विद्वानों ने दो तरह से प्रतिक्रिया दी:

(i) उनमें से कुछ राजनीतिक विज्ञान की तरफ लौट गए (जो मातृ विज्ञान था) । लेकिन उन्हें राजनीति वैज्ञानिकों द्वारा समर्थन नहीं मिला । जॉन गास ने 1950 में प्रकाशित अपने लेख ट्रैंड्स इन दि थ्योरी ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एक सिद्धांत विकसित किया कि ”हमारे समय में लोक प्रशासन की किसी विचारधारा का मतलब राजनीति की भी एक विचारधारा होना है ।” आगे रॉस्को मार्टिन ने 1952 के अपने लेख में लोक प्रशासन पर राजनीति विज्ञान के प्रभुत्व को जारी रखने का आह्वान किया ।

(ii) कुछ अन्य प्रशासनिक विज्ञान की ओर बढ़े । उन्होंने दलील दी कि प्रशासन, प्रशासन होता है, भले ही कोई भी परिवेश हो । उन्होंने 1956 में चतुर्मासिक पत्रिका जर्नल ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव साइंस की स्थापना की । इस परिप्रेक्ष्य से प्रभावित प्रमुख रचनाएं हैं- मार्क व साइमन कृत ऑर्गनाइजेशसं (1958), सीयर्ट व मार्क कृत बिहेवियरल थ्योरी ऑफ दि फर्म (1963) और मार्क कृत हैंडबुक ऑफ ऑर्गनाइजेशसं (1965) ।

लेकिन दोनों ही मामलों (यानी, राजनीति विज्ञान की ओर या प्रशासनिक विज्ञान की और) में, लोग प्रशासन ने अपनी अलग पहचान और भिन्नता खो दी और इसे विशालतर क्षेत्र में घुल-मिल जाना पड़ा । इसीलिए लोक प्रशासन के उद्भव के इस चरण को ‘पहचान के संकट का चरण’ कहते हैं ।

लोक प्रशासन के उद्भव के इस चरण में कई बदलाव हुए । ये हैं:

(i) क्रिस एर्गिरिस, डगलस मैकग्रेगर, रेंसिस लिकर्ट, वॉरेन बेनिस व अन्य द्वारा समर्थित नए मानव संबंधी उपागम का उदय ।

(ii) तुलनात्मक लोक प्रशासन का विकास ।

(iii) एफ. डब्ल्यू. रिग्स द्वारा लोक प्रशासन के अध्ययन के लिए परिवेशीय उपागम की वकालत ।

(iv) एडवर्ड वीडनर, एफ. डब्ल्यू. रिग्स व अन्य द्वारा विकास प्रशासन की अवधारणा का विकसित किया जाना ।

(v) एफ. डब्ल्यू. रिग्स द्वारा प्रशासनिक विकास की अवधारणा को ठोस रूप दिया जाना ।

(vi) नव लोक प्रशासन का उदय ।

(vii) विंसेंट ओस्ट्रोम व अन्य द्वारा लोक चयन उपागम की वकालत ।

(viii) लोक प्रशासन के आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य का उदय ।

चरण 5 : लोक नीति परिप्रेक्ष्य (1971-जारी) | (Stage V : Public Policy Perspective):

इस चरण का मुख्य विषय ‘लोक नीति विश्लेषण का सरोकार’ था । लोक प्रशासनविद नीति विज्ञान, राजनीतिक अर्थशास्त्र, नीति-निर्माण, नीति विश्लेषण के संबंधित क्षेत्रों में बहुत रूचि दिखला रहे थे ।

लोक नीति उपागम को प्रशासनिक विश्लेषण में स्वीकार्यता मिल गई क्योंकि राजनीति-प्रशासन द्विभाजन के पारंपरिक विचार को त्यागा जा चुका था । ड्‌वाइट वाल्डो ने नतीजे निकालते हुए कहा कि राजनीति और प्रशासन के बीच पृथक्करण एक ”घिसापिटा मंच” बन चुका है ।

रॉबर्ट टी. गोलम्बीव्स्की के अनुसार, लोक प्रशासन के उद्भव में लोक नीति चरण दो मुख्य विषयों पर आधारित हैं:

(i) राजनीति और प्रशासन की सभी या कई स्तरों पर व्याख्या और

(ii) संपूर्ण प्रशासन का कार्यक्रमरूपी चरित्र ।

इन सभी विषयों में लोक प्रशासन में राजनीतिक या नीति-निर्माण प्रक्रियाओं एवं विशिष्ट लोक कार्यक्रमों की तरफ ध्यान आकर्षित किया गया । लोकनीति उपागम अपनाने के साथ, लोक प्रशासन अंतर अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) बन गया है, इसने सामाजिक प्रासंगिकता हासिल कर ली है और अपने उद्देश्यों को भी विस्तारित कर लिया है ।

डिमॉक और कोएनिंग के शब्दों में- ”एक अध्ययन के रूप में ‘लोक प्रशासन’ कानून लागू करने और लोकनीति को प्रभावी बनाने के लिए सरकार के प्रयासों के हर पहलू की जाँच करता है ।”