Read this article in Hindi to learn about:- 1. प्रत्यायोजन के प्रकार (Types of Delegation) 2. प्रत्यायोजन के मार्ग में बाधाएं (Difficulties of Delegation) 3. सीमाएं (Limitations) 4. पार्किन्सन थ्योरी (Parkinson Theory).

प्रत्यायोजन के प्रकार (Types of Delegation):

1. मौखिक व लिखित प्रत्यायोजन:

मौखिक प्रत्यायोजन संगठन में परंपरा पर आधारित होता है और यह अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि इसमें उत्तरदायित्व तय करने में परेशानी होती है । प्रत्यायोजन जब लिखित रूप में दिया जाये तो वह अधिक श्रेष्ठ होता है अधिकांशतया यही होता है ।

2. औपचारिक और अनौपचारिक:

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नियम, आदेश के अनुरूप किया जाने वाला प्रत्यायोजन औपचारिक होता है । इसके निश्चित सिद्धांत होते है, जबकि अनौपचारिक प्रत्यायोजन में अधीनस्थ स्वप्रेरणा से ही उच्च अधिकारी की शक्ति का प्रयोग करने लगते हैं और उसकी मौन स्वीकृति भी मिल जाती है । यह परंपरा और रीति-रिवाजों पर आधारित होता है ।

3. पूर्ण व आंशिक प्रत्यायोजन:

वैसे तो प्रत्यायोजन आंशिक ही होता है जिसमें उच्च शक्तियों द्वारा कुछ कम महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रत्यायोजन कर दिया जाता हैं तथापि कुछ विशेष परिस्थितियों में संपूर्ण शक्तियां सौंप दी जाती है जैसे राजदूतों को । (पूर्ण प्रत्यायोजन का ”आल्टर इगो” कहते हैं ।)

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4. अशर्त व सशर्त प्रत्यायोजन:

सामान्यतया अशर्त प्रत्यायोजन होता है अर्थात ऊपर का अधिकारी अधीनस्थ को कार्य सौंपते समय कोई शर्त नहीं लगाता, लेकिन कभी कुछ शर्तें लगा दी जाती हैं, जिनकी पूर्ति होने पर ही अधीनस्थ सौंपे गये कार्यों को करेगा । इसमें अधीनस्थ के कार्य/निर्णय उच्च के अधीन रहते हैं ।

5. ऊर्ध्वगामी, अधोगामी व समतल:

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ऊपर से नीचे (उच्च से निम्न) सौंपी गयी शक्ति अधोगामी प्रत्यायोजन है । इसके विपरीत ऊर्ध्वगामी प्रत्यायोजन कहलाता है जैसे जनता द्वारा राष्ट्रपति को चुनना । एक ही स्तर के अधिकारी को प्रत्यायोजन, समतल प्रत्यायोजन कहलाता है । समतल प्रत्यायोजन को टेरी ने पार्श्व प्रत्यायोजन कहा है । आजकल बाहर की ओर भी प्रत्यायोजन का चलन बढ़ रहा है । इसके अन्तर्गत सरकार बाहरी एजेन्सीयों को अपना काम सौंप रही है ।

6. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रत्यायोजन:

एक अधिकारी दूसरे को जब अधिकार व कर्तव्य सीधे सौंपता है तो वह प्रत्यक्ष प्रत्यायोजन कहलाता है जबकि मध्यस्थ के माध्यम से सौंपने पर अप्रत्यक्ष प्रत्यायोजन कहलाता है । मूने ने अप्रत्यक्ष प्रत्यायोजन के दो उदाहरण दिये हैं-अमेरिकी राष्ट्रपति तथा पोप का चुनाव ।

7. बिखरा हुआ प्रत्यायोजन:

जब निर्णयन के लिए दो या अधिक व्यक्तियों की अधिकार सत्ता को संयुक्त करना पड़े ।

प्रत्यायोजन के मार्ग में बाधाएं (Difficulties of Delegation):

प्रत्यायोजन में व्यक्तिगत बाधाएं और संगठनात्मक बाधाएं आती हैं ।

a. व्यक्तिगत बाधाएं:

1. उच्च अधिकारी की ओर से बाधाएं:

i. निर्देशन की योग्यता का अभाव – अधीनस्थों को कार्य सौंपने पर उसके निर्देशन की समस्या उत्पन्न होती है । उच्च अधिकारी में इसका अभाव होने पर वह प्रत्यायोजन नहीं करना चाहता ।

ii. प्रत्यायोजन से उसकी शक्ति कम हो जाती है जिससे उसके अहम को ठेस पहुंचती है ।

iii. अधीनस्थों से भय कि वे शक्तिशाली बन जाऐगें ।

iv. अधीनस्थों में उसका अविश्वास कि वे कार्य कर सकेंगे या नहीं ।

2. अधीनस्थों की ओर से बाधाएं:

i. आत्मविश्वास की कमी ।

ii. प्रेरणाओं व प्रोत्साहन का अभाव ।

iii. योग्यता का अभाव ।

iv. ”करने से पूछना भला” की भावना ।

b. संगठनात्मक समस्याएं या बाधाएं:

संगठन में प्रत्यायोजन परंपरा का अभाव, दूरदर्शिता का अभाव, संगठन का छोटा आकार कार्यों की भिन्नता प्रत्यायोजन व संचार की उपयुक्त व्यवस्था का अभाव आदि भी प्रत्यायोजन के मार्ग में बाधाएं हैं ।

प्रत्यायोजन की प्रभावी प्रणाली:

1. स्पष्ट प्रत्यायोजन – जिसमें हरेक बात का खुलासा होता है ।

2. अधीनस्थों को आवश्यक प्रशिक्षण देना ।

3. उनके कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप न किया जाये ।

4. प्रत्यायोजन के बाद नियंत्रण रखा जाना चाहिए लेकिन सकारात्मक दृष्टि से होना चाहिए ।

5. कार्य, सत्ता व उत्तरदायित्व में समानता हो ।

6. आदेश की एकता का पालन किया जाये ।

7. प्रत्यायोजन, पद-सोपानिक व्यवस्था के अनुरूप अर्थात् बीच वाले की उपेक्षा न की जाए ।

8. प्रत्यायोजन लिखित और विशिष्टकृत हो ।

9. प्रत्यायोजन व्यक्ति या पद का नहीं अपितु कार्य और अधिकार का हो ।

10. अधीनस्थों की योग्यता को ध्यान में रखकर प्रत्यायोजन हो ।

11. प्रत्यायोजन एक निश्चित योजनानुसार हो ।

12. स्वतंत्र और खुली संचार व्यवस्था अपनायी जाए और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था हो ।

13. प्रत्यायोजन के उपरांत कार्य निष्पादन का मूल्यांकन हो ।

14. प्रत्यायोजन को सफल बनाने हेतु पर्याप्त साधन-सहायता उपलब्ध ।

प्रत्यायोजन की सीमाएं (Limitations of Delegation):

किन बातों का प्रत्यायोजन नहीं किया जाना चाहिए:

1. अधीनस्थों पर नियंत्रण और अधीक्षण की शक्ति नहीं त्यागी जानी चाहिए ।

2. वित्तीय अधिकार का प्रत्यायोजन नहीं किया जाना चाहिए (आवश्यक होने पर सीमित मात्रा में) ।

3. कार्मिकों की नियुक्ति करने का प्रत्यायोजन नहीं होना चाहिए ।

4. संपूर्ण शक्ति का प्रत्यायोजन कभी नहीं करना चाहिए ।

5. मात्र कम महत्वपूर्ण शक्ति का प्रत्यायोजन करना चाहिए, उस शक्ति का नहीं जिससे उच्च अधिकारी की स्थिति का ह्रास होता है ।

6. एक निश्चित सीमा तक ही प्रत्यायोजन हो अन्यथा समन्वय की समस्या उत्पन्न होती है ।

7. उपलब्ध संचार साधनों, नियन्त्रण के तरीकों के अनुरूप ही प्रत्यायोजन हो ।

8. नियम और कानून बनाने की शक्ति ।

9. ठीक नीचे के अधीनस्थों के निर्णयों के विरूद्ध अपील की शक्ति ।

10. नई नीतियों की अनुमोदन की शक्ति ।

11. पुरानी नीतियों से हटने की शक्ति ।

प्रत्यायोजन की पार्किन्सन थ्योरी (Parkinson Theory of Delegation):

पार्किन्सन ने प्रत्यायोजन के बाद उच्च अधिकारी के पर्यवेक्षण में किस तरह के बदलाव आते हैं, इसकी तुलना पक्षियों के व्यवहार से की है, ऐसे 10 व्यवहार उन्होंने बताये:

(1) धूसर छप्परवाली सूत्रधारक चिड़िया:

ऐसा पर्यवेक्षक जो लालफीताशाही के घोसलें में विकसित होता है । इसे धूसर छप्पर वाली चिड़िया कहा है ।

(2) पीले पेट वाली श्रेय छीनने वाली चिड़िया:

ऐसा पर्यवेक्षक जो संगठन में लोकप्रिय हो जाता है और सम्मानित होने लगता है । इसे पीले पेट वाली, श्रेय छीनने वाली चिड़िया कहा ।

(3) छोटी सफेद मुकुट वाली कोयल:

दूसरे के घोसलें में अण्डे देने वाली चिड़िया । अर्थात् ऐसा प्रबंधक जो अपना प्रभाव, दूसरे क्षेत्रों में दिखाने की कोशिश करता है, छोटी-छोटी सफेद मुकुट कोयल की संज्ञा दी ।

(4) लाल सिर बाली अग्निशामक चिड़िया:

ऐसा प्रबन्धक अधिकारों का प्रत्यायोजन तो करता है और अधीनस्थ साधारण विषयों पर भी उससे पूछकर निर्णय लेते हैं ।

(5) मृत सिंह को लतियाने वाला गिद्ध:

ऐसे पर्यवेक्षक जो चाहते हैं कि अधीनस्थ गलती करें और ऐसे मृत सिंहों को गिद्ध की भांति झपट्‌टा मारे । इसे सिंह को लतियाने वाला गिद्ध कहा ।

(6) धारियों वाली चीखती चिड़िया:

ऐसे पर्यवेक्षक जो अधिनस्थों की छोटी सी गलती में भी कर्कश आवाज वे गरजते हैं इन्हें चीखने वाली चिड़िया कहते हैं ।

(7) सफेद कमीज वाली आसपास मंडराने वाली चिड़िया:

ऐसे प्रबन्धक जो अधीनस्थों को अधिकार दायित्व सौंपते हैं लेकिन उनके आस पास बने रह कर ध्यान भी रखते हैं, कि उनका प्रयोग उनकी इच्छानुसार हो रहा है, या नहीं ।

(8) बतख की चोंच की भांति दोहरी बात करने वाली चिड़िया:

ऐसे प्रबन्धक को कहा जो कभी भी यह स्पष्ट नहीं करता कि वह क्या अधिकार प्रत्यायोजित करेगा ।

(9) स्वर्ण मुकुट धारी विलाप करने वाली चिड़िया:

उस प्रबन्धक को कहा जो एक तो विश्वसनीय व्यक्तियों का रोना रोते हैं, फिर भी अधीनस्थों को कुछ भी निर्णय नहीं लेने देते हैं ।

(10) कृष्ण श्वेत संगठन में रेंगने वाली चिड़िया:

ऐसे प्रबन्धक होते है जो प्रत्यायोजन तो करते हैं, लेकिन निम्न स्तर के अधीनस्थों तक रेंगते रहते हैं ।