Read this article in Hindi to learn about the public control over administration.

किसी भी प्रजातान्त्रिक देश में सरकार और प्रशासन अन्ततः जनता के उत्तरदायी होते हैं अतः लोक प्रशासन न केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – होना चाहिए बल्कि जन नियंत्रण भी होना चाहिए ।

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प्रशासन पर जन नियंत्रण निम्नांकित तरीके से स्थापित किया जा सकता है:

1. निवार्चन:

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स्विट्‌जरलैण्ड के नागरिक प्रत्यक्ष से प्रशासन के सदस्यों और अधिकारियों का चुनाव करते हैं, निर्णय लेते हैं परंतु ऐसा नियन्त्रण बडे राष्ट्रों में संभव नहीं है । इसलिए वहां की जनता अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र के द्वारा प्रशासन पर नियंत्रण रखती है ।

2. जन-प्रतिनिधियों की वापसी:

स्विट्‌जरलैण्ड में निर्वाचकों को जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार है । अतः जनप्रतिनिधि और प्रशासन सामान्यतः की मार्गों के रहते हैं ।

3. सलाहकार समितियाँ:

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जनता और प्रशासन के मध्य प्रत्यक्ष संबंध कायम रखने में सलाहकार समितियाँ भूमिका का करती है, जिनमें सामान्यतः जनता और प्रशासन दोनों के सदस्य शामिल होते हैं । प्रशासन द्वारा जन-समस्याओं से संबन्धित कार्यों के सम्पादन की जानकारी जनता तक ये समितियां पहुँचाती हैं ।

4. हित-समूह और दबाव समूह:

हितों के आधार पर हित समूह और दबाव समूह जनता का वह संगठित वर्ग है जो दबाव डालकर अपने हितों की पूर्ति करते है तथा शासन को अपनी नीतियों में यथासंभव परिवर्तन के बाध्य करते हैं ।

5. जागरूक जनता:

लोक प्रशासन पर जन-नियंत्रण सर्वाधिक प्रभावशाली तरीका है वहाँ की अगर जनता जागरूक रहती है तो प्रशासन उदासीन और निरंकुश नहीं हो पता ।

प्रशासन पर आंतरिक नियंत्रण (Internal Control Over Administration):

प्रशासन पर आंतरिक नियंत्रण के निम्नलिखित साधन हैं:

1. राजनीतिक नियंत्रण:

भारतीय शासन की कार्यपालिका शाखा के शीर्ष पर मौजूद कैबिनेट का प्रत्येक मंत्री व्यक्तिगत रूप से अपने भाग के मुख्य कार्यपालक के रूप में नियंत्रण रखता है ।

2. पदसौपानिक नियंत्रण:

पदसोपानक्रम में अधीनस्थ आ अपने उच्च कर्मचारी के नियंत्रण में कार्य करता है ।

3. बजट एवं लेखा-परीक्षण:

बजट और लेखा परीक्षण, प्रशासन के आन्तरिक नियंत्रण के प्रमुख हैं जो बजट सरकार से विभाग को प्राप्त होता है उन्हें विभिन्न उपविभागों, शाखाओं और इकाइयों में आवश्यकतानुसार बाँट दिया जाता है । यह धन सक्षम अधिकारी द्वारा निर्धारित नियमों के अंतर्गत ही व्यय किया जाता है क्योंकि उन पर वित्त मंत्रालय और नियंत्रक महालेखा परीक्षक का अंकुश रहता है ।

4. कार्मिक प्रबन्ध:

भारत में 1970 स्थापित कार्मिक विभाग, कार्मिक-प्रबन्ध देखभाल करता है । यह विभाग लोक सेवा संबंधी समस्याओं सामान्य के सामान्य नियम बनाता है कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण पदोन्नति, वरिष्ठता, अनुशासन आदि के संबंध में सेवा-शर्तो को निश्चित करता है । यह भारतीय प्रशासनिक सेवा, केन्द्रीय लोक सेवा, केन्द्रीय सचिवालय सेवा आदि के प्रशासन के लिए उत्तरदायी है ।

5. व्यावसायिक मानदण्ड:

सरकारी कर्मचारियों से यह जाती है कि उन्हें विनम्र, ईमानदारी, पक्षपातहीन, दक्ष एवं निष्ठावान होना चाहिए । इससे प्रशासन पर नियंत्रण की समस्या खुद व खुद सुलझ जायेगी ।

नागरिक और प्रशासन (Citizen and Administration):

आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ने राज्य और उसके प्रशासम के कार्य-अधिकारों में अत्यधिक वृद्धि की है । इस बड़ी हुई अधिकार सत्ता ने प्रशासनिक अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि के लिये भी अवसर पैदा किये । अतः यह जरूरी हो जाता है कि प्रशासन के गलत कार्यों के विरुद्ध पीड़ित जनता की सुनवाई का तटस्थ, स्वतंत्र और उचित तंत्र स्थापित किया जाए । इस दिशा में पहल स्केण्डेनेवीयायी देशों ने की ।

आज विश्व के विभिन्न भागों में ऐसे तंत्र के तीन प्रमुख स्वरूप दिखायी देते हैं:

1. आम्बुड्‌समैन (Ombudsman)

2. प्रशासनिक न्यायालय (Administrative Courts)

3. मुख्तार पद्धति (Procurator)

1. आम्बुड्‌समैन (Ombudsman):

प्रशासन के विरूद्ध नागरिकों की शिकायतों को दूर करने के लिये विश्व में पहली संस्था ”स्केंडिनेवियन इंस्टीट्‌यूशन ऑफ ऑम्बुड्समैन” के रूप में स्वीडन में 1809 में जन्मी । ऑम्बुड्समैन मूलतः स्वीडिश शब्द ऑम्बुड से बना है । ऑम्बुड का अर्थ है, ”किसी अन्य व्यक्ति का प्रतिनिधि या प्रवक्ता” । ऑम्बुड्समैन प्रशासनिक दुरुपयोग के विरूद्ध जनता का प्रतिनिधि है ।

स्वीडन में जन्मी और सफल रही यह संस्था अन्य स्केण्डेनिवीयायी देशों में फैल गयी, क्रमशः फिनलैंड (1919), डेनमार्क (1955) और नार्वे (1962) । स्केण्डेनेवीया के बाहर इसे सर्वप्रथम न्यूजीलैंड ने 1962 में ”संसदीय जांच आयुक्त” के रूप में अपनाया । उल्लेखनीय है कि स्वीडन में ऑम्बुड्समैन के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका भी आती हैं ।

आज विश्व के 40 से अधिक देशों में ऑम्बुड्समैन जैसी संस्थाएं कार्यरत है । ब्रिटेन ने 1967 में ”प्रशासकों के लिये संसदीय आयोग” के रूप में इसे अपनाया । भारत में प्रशासनिक सुधार आयोग ने इन्हें लोक पाल और लोकायुक्त के रूप में स्थापित करने की सिफारिश 1966 में की थी ।

डोनाल्ड रोवाट- ”ऑम्बुड्‌समैन नौकरशाही-आतंक के विरूद्ध लोकतांत्रिक सरकार की एक दीवार है ।”

गेराल्ड काईडेन- ”ऑम्बुड्‌समैन संस्थानीकृत जन-जागरूकता है ।”

2. प्रशासनिक न्यायालय (Administrative Courts):

फ्रांस में प्रशासन और नागरिकों के मध्य विवाद-निपटारे की विशेष व्यवस्था है, ”प्रशासनिक न्यायालय” । यद्यपि यह नागरिकों की शिकायतों का निवारण करती है लेकिन प्रशासन को विशेष संरक्षण प्रदान करने के कारण शिकायत-निवारण तंत्र की विशेषताओं से भिन्नता रखती है । फिर भी इसकी सफलता ने इसे बेल्जियम टर्की, ग्रीस और अफ्रीका के कई देशों में लोकप्रिय बना दिया ।

3. मुख्तार पद्धति (Procurator):

प्रशासन के विरूद्ध नागरिक शिकायतों की सुनवाई का समाजवादी मॉडल है ”मुख्तार पद्धति” । पूर्व सोवियत संघ, चीन, पोलेंड रोमानिया हंगरी, चेकोस्लोवाकिया जैसे साम्यवादी राष्ट्रों ने इस पद्धति को अपनाया ।