Read this article in Hindi to learn about the political thoughts of Aristotle.

अरस्तू प्राचीन यूनानी दार्शनिक था जिसे ‘राजनीति-शास्त्र का जनक’ माना जाता है । वह महान दार्शनिक प्लेटो का शिष्य और विश्व प्रसिद्ध योद्धा एवं सम्राट सिकंदर महान का गुरू था ।

अरस्तू का जन्म 384 ई॰पू॰ में मैसीडोनिया के एक नगर रटेगिरा में हुआ था । उसके पिता मैसीडोन के राजा (सिकंदर महान के पितामह) के राजवैद्य थे । अरस्तू का पालन-पोषण भी औषधियों की गंध से महकते हुए वातावरण में हुआ, जहाँ उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए उचित अवसर और प्रोत्साहन मिला ।

18 वर्ष की अवस्था में उसने एथेंस जाकर प्लेटो की छत्रछाया में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया । प्लेटो उसकी कुशाग्र बुद्धि से इतना प्रभावित था कि वह अरस्तू को अपनी ‘अकादमी का मस्तिष्क’ कहा करता था । वैसे अरस्तू ने आगे चलकर अपना चिंतन स्वतंत्र दिशा में विकसित किया और प्लेटो के विचारों की तीव्र आलोचना भी की, फिर भी उसके विचारो पर प्लेटो की अमिट छाप है ।

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प्लेटो और अरस्तू दोनों ही प्रतिभावान थे, और जैसा कि सामान्य अनुभव से सिद्ध होता है, दो प्रतिभावान व्यक्ति कभी एकमत नहीं होते ।

कुछ समय पश्चात् मैसीडोन के राजा फिलिप ने अरस्तू को सिकंदर की शिक्षा के लिए अपने राज-दरबार में आमंत्रित किया । सिकंदर उस समय 13 वर्ष का उत्साही और उद्धत युवक था । उसे संयत करने में अरस्तू को विशेष सफलता नहीं मिली । विश्व-विजय की महत्वाकांक्षा दर्शनशास्त्र को औषधि से ठंडी नहीं हो पाई ।

देखा जाए तो अरस्तू ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संपूर्ण विश्व को एक ही प्रणाली से बांधना चाहता था, परंतु सिंकदर संपूर्ण विश्व पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करके उसे एक-जैसे नियमों के अधीन लाना चाहता था ।

राजनीतिक चिंतन की चर्चाओं में प्रायः प्लेटो और अरस्तू के मतभेदों पर विशेष बल दिया जाता है, परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने शिक्षक का तीव्र आलोचक होते हुए भी अरस्तू कई बातों में प्लेटो का ऋणी था, और दोनों में अनेक समानताएं भी हैं । दोनों ने यूनानी नगर-राज्यों की अस्थिरता को खतरे की सूचना के रूप में देखा, और इसके लिए नैतिक अराजकता को उत्तरदायी ठहराया ।

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दोनों का मानना था की राज्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अस्तित्व में आता है और सदजीवन की सिद्धि के लिए बना रहता है । दोनों ने शासकों और नागरिकों के लिए समुचित शिक्षा की आवश्यकता को स्वीकार किया और शारीरिक श्रम का भार दारनों पर डालने का समर्थन किया परंतु इन सभी मान्यताओं को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करके अरस्तू ने प्लेटो की तुलना में नई अंतर्दृष्टि का परिचय दिया है ।  

अरस्तू के राजनीतिक सिद्धांतों का दार्शनिक आधार (Philosophical Basis of Aristotle’s Political Principles):

प्लेटो और अरस्तू (Plato and Aristotle):

ऐसी बहुत-सी बातें थीं जिन्होंने अरस्तू को प्लेटो से, शिष्य को अपने गुरु से भिन्न बनाया । उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न था । उनकी विश्व की परिकल्पना भिन्न थी । उनकी कार्य-पद्धतियाँ अलग-अलग थीं और इसलिए उनके निष्कर्ष भी अलग-अलग थे ।

मैक्सी ने लिखा है कि ‘जहाँ प्लेटो ने अपनी कल्पना को उडाने भरने दी वहीं अरस्तू तथ्यपरक और नीरस है, जहाँ प्लेटो वाक्‌पटु है, वहीं अरस्तू स्पष्ट वक्ता है, जहाँ प्लेटो तार्किक निष्कर्षों की सामान्य धारणाओं से छलांग लगाता है वहीं अरस्तू तथ्यों की विविधता का विश्लेषण करते हुए निष्कर्षों पर पहुँचता है जो तर्कसंगत है किंतु अंतिम नहीं हैं, जहाँ प्लेटो हमें एक आदर्श गणराज्य देता है, जोकि उसके द्वारा कल्पनीय सर्वोत्तम राज्य है, वहीं अरस्तू हमारे सामने उसकी भौतिक आवश्यकताएँ प्रस्तुत करता है जिन्हें परिस्थितियों के अनुरूप बनाकर एक आदर्श राज्य का निर्माण किया जा सकता है ।’

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अरस्तू प्लेटो का शिष्ट था किन्तु वह उसका आलोचक भी था । इसलिए यह एक सामान्य-सी बात है कि उसे प्लेटो विरुद्ध खड़ा कर दिया जाए, जैसा कि एंड्रयू हैकर (पॉलिटिकल थ्योरी, 1961) ने वास्तव में किया । एक को जहां एक वैज्ञानिक के रूप में, लिया गया तो दूसरे को एक को सुधारक तो दूसरे को उग्र परिवर्तनवादी के रूप में, एक वास्तविक राज्य पर काम करके उसे बनाने के लिए इच्छुक तो दूसरा पूरे राज्य को फिर से नए सिरे से नए रूप में निर्मित करने को आकुल ।

सबसे दूर संभव चरम सीमाओं पर एक राजनीतिक यथार्थवाद का समर्थक तो दूसरा राजनीतिक आदर्शवाद का पालनकर्ता, एक विशेष से प्रारंभ करके सामान्य पर समाप्त करने वाला तो दूसरा सामान्य से शुरू करके विशेष तक पहुँचने वाला ।

अरस्तू द्वारा प्लेटो की आलोचना कई आधारों पर की गई । आलोचना के इन आधारों पर आगे विचार किया जाएगा । अरस्तू की प्लेटो से सबसे बडी शिकायत यह थी कि उसने अनुभव को बिल्कुल महत्व नहीं दिया । अरस्तू कहता है – ”हमें यह याद रहना चाहिए कि हमें कालों से प्राप्त अनुभव को छोड़ नहीं देना है । इतने वर्षों में, ये चीजें अगर अच्छी होतीं तो अन्य तक अज्ञात नहीं रहतीं ।”

उसने स्वीकार किया कि प्लेटो की लेखनी प्रतिभावान और सुझावात्मक है किंतु साथ ही वह ”उग्र रूप में परिवर्तनवादी और अनुमानात्मक भी है ।” (सेबाइन, ए हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी, 1973).

अरस्तू ने प्लेटो के राज्य की, एक अकृत्रिम निर्माण के रूप में आलोचना की जो कि क्रमिक रूप में तीन चरणों में बना जिसमें पहले उत्पादक वर्ग आया, उसके बाद सहायक और फिर शासक वर्ग आया । एक वास्तुविद् की तरह प्लेटो ने राज्य का निर्माण किया । इसके विपरीत, अरस्तू ने राज्य को एक प्राकृतिक संगठन के रूप में लिया जो उदभव और विकास का परिणाम था ।

प्लेटो के साथ अरस्तू भी व्यक्ति लिए राज्य के महत्व को पहचानता था और प्लेटो की तरह राज्य को एक मानव शरीर की तरह भी मानता । अरस्तू के लिए राज्य अनेकता में एकता था ।

अरस्तू प्लेटो की न्याय की धारणा से सहमत नहीं था । प्लेटो से भिन्न उसके मत में न्याय व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते जाने की अपेक्षा अपने अधिकारों उपयोग में अधिक था । अरस्तू के लिए न्याय एक व्यावहारिक क्रिया का गुण था न कि अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करने का ।

प्लेटो का न्याय नैतिक प्रकार का जबकि अरस्तू का कानूनी प्रकार का । प्लेटो का न्याय, कि अरस्तू मानता था, अधूरा था क्योंकि यह मुख्य रूप से केवल कर्तव्यों से संबंधित था और अधिकारों को लगभग अनदेखा करता था । दूसरे शब्दों में अरस्तू ने प्लेटो के न्याय पर नैतिक प्रकार का होने का ठप्पा लगा दिया क्योंकि वह व्यक्ति के कर्तव्यों को प्राथमिकता देता था ।

अरस्तू प्लेटो के आदर्श राज्य की तीन वर्गों की धारणा का भी पक्षधर नहीं था, विशेष रूप से संरक्षक वर्ग द्वारा सारी शक्ति अपने हाथों में रखने का । वह इस विचार से सहमत नहीं था कि एक ही वर्ग (संरक्षक, जोकि शासकों और सहायकों से मिलकर बना था) सारी शक्तियों का लाभ उठाए ।

वर्गों के बीच एक वर्ग से दूसरे वर्ग में जाने की अनुमति न होने के कारण डेविड यंग कहता है कि ‘वे व्यक्ति जो महत्वाकांक्षी और बुद्धिमान थे किंतु समाज के सही वर्ग में नहीं थे, वे किसी भी प्रकार की राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से वंचित रह जाते थे ।’

यंग का यह भी कहना है कि इसी कारण अरस्तू इस शासक वर्ग प्रणाली को एक गलत रूप में विचारित राजनीतिक ढाँचे के रूप में देखता था । प्लेटो ने अपने ‘रिपब्लिक’ में कानून को महत्वपूर्ण नहीं माना है । उसका मत था कि जहाँ शासक सद्‌गुणी थे वहाँ कानून की कोई आवश्यकता नहीं थी और जहाँ शासक सद्‌गुणी नहीं थे वही कानून बेकार थे किंतु अरस्तू ने कानूनों के महत्व को समझा और कहा कि कानून का शासन व्यक्ति के शासन से कहीं अच्छा है, चाहे वे शासक (व्यक्ति) कितने ही बुद्धिमान क्यों न हों । फिर प्लेटो ने भी कानून के महत्व को समझा और बाद में अपनी ‘लॉज’ (Laws) में स्थिति को बदल दिया ।

अरस्तू को इसमें संदेह था कि प्लेटो की सामुदायिक पत्नियों और संपत्ति की परिकल्पना अपेक्षित एकता विकसित कर पाएगी । इसके विपरीत उसने कहा कि यह तरीके अव्यावहारिक हैं क्योंकि संपत्ति के साम्यवाद/समाजीकरण से टकराव उत्पन्न होंगे जबकि परिवारों के समाजीकरण से ऐसी व्यवस्था विकसित होगी जिसमें परिवार में से प्रेम और अनुशासन गायब हो जाएगा ।

सेबाइन करता है कि – ”परिवार एक चीज है और राज्य उससे भिन्न चीज है और यही अच्छा होगा कि इनमें से कोई भी दूसरे को समाप्त करने का प्रयत्न न करे ।”

अरस्तू द्वारा की गई प्लेटो की आलोचना यद्यपि आगे बताए गए आधारों पर कभी-कभी बहुत प्रखर है, किंतु वह तथ्यपरक है । फोस्टर (मास्टर्स ऑफ पोलिटिकल थॉट, 1969) कहता है कि अरस्तू जो प्लेटोवादियों में सबसे बड़ा प्लेटोवादी है, प्लेटोवाद से जिस स्तर तक बिंधा हुआ है उस स्तर तक शायद उसके अतिरिक्त और कोई दार्शनिक किसी दूसरे के विचारों से इतना आच्छादित नहीं हुआ ।’

प्रत्येक वह पृष्ठ जो अरस्तू ने लिखा है उस पर प्लेटो की छाप लगी है । वास्तव में अरस्तू वहीं से प्रारंभ करता है जहाँ प्लेटो समाप्त करता है । ‘अरस्तू ने प्लेटो द्वारा सुझावों, भ्रांतियों या दृष्टांतों के रूप में व्यक्त किए गए विचारों को अपने विषय के रूप में लिया, उन पर चर्चा की है ।’ (डनिंग: ए हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरीज, 1966) ।

ऐसे में यह अनुचित नहीं होगा यदि शिष्य को गुरु का ही विस्तार मान लिया जाए । अरस्तू, प्लेटो के आदर्शों को नुकसाने पहुँचाने की अपेक्षा उन्हीं के ऊपर निर्माण करता है । रॉस (एरिस्टोटल, 1923) ने लिखा है कि ‘उसकी (अरस्तू की) दर्शन संबंधी पुस्तकों में, उसकी वैज्ञानिक पुस्तकों से भिन्न, कोई पृष्ठ ऐसा नहीं है जिस पर प्लेटोवाद की छाप न हो ।’

अपने गुरु प्लेटो के समान ही अरस्तू भी सोचता था कि मनुष्य की नैतिक उत्कृष्टता केवल एक राज्य में ही संभव है तथा राज्य का हित ही उनका भी हित है जिन्हें मिलाकर राज्य बना है ।

फिर भी, अरस्तू द्वारा की गई प्लेटो की आलोचना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है और वास्तव में उसे इसके लिए कोई अफसोस भी नहीं था । विल डूरेंट ठीक ही कहता है कि ‘ब्रूटस (शेक्सपियर के ‘जूलियस सीजर’ का एक पात्र) सीजर को कम प्यार नहीं करता लेकिन रोम को अधिक प्यार करता था । इसी प्रकार अरस्तू कहता है कि प्लेटो भी बहुत प्रिय है लेकिन सत्य उससे भी अधिक प्रिय है ।’

इसलिए इबेनरटाइन (ग्रेट पॉलिटिकल थिकर्स) का यह कहना है कि – ‘प्लेटो को अपने विचारो को ठीक करने वाला अपने ही शिष्य में मिल गया ।’

राजनीति और नैतिकता (Politics and Ethics):

अरस्तू, प्लेटो की तरह का दार्शनिक नहीं था किंतु उसके राजनीतिक विचारों के दार्शनिक आधार की उपेक्षा नहीं की जा सकती । उसके सारे राजनीतिक सिद्धांतों का एक दार्शनिक आधार है । अरस्तू को ईश्वर में विश्वास है, जो उसे एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण उपलब्ध कराता है । वह मानता है कि ईश्वर ही प्रत्येक वस्तु का सर्जक है ।

उसके अनुसार हर दृश्य वस्तु के दो पहलू होते हैं- आकार और तत्व (सामग्री) । प्लेटो के विपरीत, अरस्तू उसे महत्व देता है जो तत्व को बनाता है जबकि प्लेटो मानता है कि जो भी दिखाई देता है वह आकार की छाया मात्र है । अरस्तू यह भी मानता है कि मनुष्य की आत्मा के दो हिस्से हैं- तार्किक और अतार्किक । उसका यह कहना है कि नैतिक सद्‌गुणों के माध्यम से मनुष्य तर्कसंगतता प्राप्त करता है जो आत्मा का तार्किक भाग है ।

अरस्तू एक राजनीतिक यथार्थवादी है किंतु इससे उसका उस राजनीति से बिल्कुल ध्यान नहीं हटा है जो नैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विद्यमान है । वास्तव में अरस्तू राजनीति को, नैतिकशास्त्र से अलग एक विषय के रूप में देखता ही नहीं, राजनीति नैतिकता की पूर्णता और उसका प्रमाणन है । इसी को अन्य शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि अरस्तू के मत में राजनीति नैतिकता के साथ नैतिकता की निरंतरता है ।

यदि कोई अरस्तू का दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहे तो यह कहेगा कि चूँकि खुशी प्राप्त करना मनुष्य की प्रकृति का एक भाग है इसलिए समुदाय में रहना भी मनुष्य की प्रकृति का ही एक भाग है । हम सामाजिक प्राणी हैं और राज्य परिवार से ही ग्राम-समुदाय के माध्यम से विकसित हुआ ।

प्रारंभ में मनुष्य की प्राकृतिक आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए बना राज्य, नैतिक उद्देश्यों और उच्चतर जीवन के विकास के लिए विद्यमान रहता है । राज्य मनुष्य के विकास के लिए बना एक वास्तविक नैतिक संगठन है । ‘निकोमेकियन एथिक्स’ (Nicomachean Ethics) में अरस्तू ने स्पष्ट रूप में कहा है कि ‘हम राजनीति के उद्देश्य को सर्वोच्च मानते हैं जो समुदाय के सदस्यों के लिए अच्छा और सम्माननीय जीवन प्राप्त करवाता है ।’

उसके राजनीतिक सिद्धांत को नैतिकता, राजनीतिक और नैतिक जीवन को समन्वित करके निर्देशित करती है ।

उसकी ‘निकोमेकियन एथिक्स’ उसकी ‘पॉलिटिक्स’ की एक प्रेरणा है:

1. अरस्तू के लिए, राज्य मात्र एक राजनीतिक समुदाय ही न होकर उसके साथ एक सरकार, एक शिक्षालय, एक नैतिकता और संस्कृति भी है । यह वह संगठन है जो मनुष्य के पूरे जीवन को अभिव्यक्त करता है, मनुष्य को एक अच्छा जीवन देता है जिसका अर्थ है- एक नैतिक एवं सदाचारी जीवन ।

2. अपने ‘निकोमेकियन एथिक्स’ में अरस्तू उन नैतिक गुणों के विषय में बताता है जो एक मनुष्य में होने चाहिए । ‘पॉलिटिक्स’ में भी अरस्तू एक नागरिक के गुणों के विषय में बताता है और मानता है कि केवल एक अच्छा मनुष्य ही एक अच्छा नागरिक हो सकता है क्योंकि जैसे एक अच्छे मनुष्य में सहयोग, सहनशीलता, आत्म-नियंत्रण जैसे आवश्यक गुण होने चाहिए वैसे ही एक अच्छे नागरिक में भी ये गुण होने चाहिए ।

3. नैतिकता और राजनीति आपस में इतने करीब से संबंधित हैं कि अरस्तू कहता है कि राजनीति के माध्यम से ही हम सदाचारी जीवन व्यतीत करते हैं । वह आगे कहता है कि जैसे राजनीति एक अभ्यास का विज्ञान है और जैसे अपने क्रियाकलापों के माध्यम से हम अपने नैतिक सद्‌गुणों की उपलथियाँ प्राप्त करते हैं वैसे ही वह निष्कर्ष निकालता है कि यह हमारे अपने हाथ में है कि हम सद्‌गुण अपनाते हैं या अवगुण ।

4. अरस्तू के राजनीतिक सिद्धांतों के आधार नैतिक नियम हैं । नीतिशास्त्र पर लिखी अपनी पुस्तकों में उसने प्रभावपूर्ण ढंग से कहा है कि मनुष्य पशुओं से भिन्न है क्योंकि वह पशुओं से अधिक सक्रिय और तर्कसंगत है । अरस्तू के मत में मनुष्यों को सदाचार/नैतिकता का पाठ मिला है न कि पशुओं को ।

5. अरस्तू का राजनीतिक सिद्धांत घनिष्ठ रूप से उसके सदाचार के सिद्धांतों से संबंधित है । उदाहरण के लिए, उसका न्याय का सिद्धांत, नीतिशास्त्र की ओर उन्मुख है । अरस्तू के लिए न्याय, एक सद्‌गुण, एक संपूर्ण सद्‌गुण नैतिकता का मूर्त रूप और जो कुछ भी अच्छा है वह सब है ।

उसकी ‘पॉलिटिक्स’ में न्याय के संबंध में धारणा विवरणात्मक है जो उसकी तुलनात्मक समानता की धारणा से जुडी हुई है और जिसका अरस्तू के लिए अर्थ है- एकसमान के प्रति समानता का व्यवहार करना और असमानों के साथ असमानता का ।

नैतिकता न केवल उसके राजनीतिक सिद्धांतों का आधार है बल्कि यह मनुष्य को प्रेरित करने के लिए उसका अग्रदूत भी है । अपने राजनीतिक विचारों की चर्चाओं में कहीं भी अरस्तू ने कोई भी ऐसी चीज नहीं कही है जोकि नैतिक न हो ।

अरस्तू के राजनीतिक सिद्धांतों का मूल्यांकन (Evaluation of Aristotle’s Political Principles):

अरस्तू के ज्ञान-गर्भित मस्तिष्क ने भौतिकी, जीव विज्ञान से लेकर नीतिशास्त्र, राजनीति विज्ञान तक मानव ज्ञान की लगभग सभी शाखाओं को छुआ है । यद्यपि उसका सर्वोत्तम राज्य प्लेटो का दूसरा सर्वोत्तम राज्य है, लेकिन अरस्तू की ‘पॉलिटिक्स’ के वर्णन का तरीका और लहजा ‘रिपब्लिक’ की संकल्पना से पर्याप्त भिन्न है ।

इस स्पष्ट अंतर का एक महत्वपूर्ण कारण यह तथ्य है कि ‘पॉलिटिक्स’ ‘रिपब्लिक’ से भिन्न अरस्तू द्वारा व्याख्यान के लिए तैयार किए गए नोट्‌स और निबंधों का संकलन है । इन्हें अरस्तू ने लंबी समयावधि में समय-समय पर लिखा था ।

प्लेटो की ‘रिपब्लिक’ जोकि पेलोपोनेशियन युद्ध (Peloponnesian) में एथंस की स्पार्टा (Sparata) से हार और एथेंस के प्रजातंत्र द्वारा सुकरात को फांसी दिए जाने की पृष्ठभूमि में लिखी गई थी, से भिन्न अरस्तू की पुस्तकें विचार और विश्लेषण में नपी-तुली थीं और एक दार्शनिक के चिंतन और मस्तिष्क के स्थान पर एक वैज्ञानिक के मस्तिष्क को प्रदर्शित करती थीं ।

अरस्तू को ठीक ही राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है क्योंकि उसने बड़ी सावधानी से और पूरा ध्यान रखकर राजनीतिक संस्थाओं और व्यवहारों के किए गए अध्ययन तथा खोज से उसने राजनीति विज्ञान का अनुभव और विज्ञान के आधग्र पर अध्ययन करने का प्रथम ढाँचा प्रस्तुत किया । उसके संविधानों के वर्गीकरण ने राजनीति विज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रथम प्रमुख बढ़त उपलब्ध कराई ।

राजनीति विज्ञान की प्रमुखता पर सबसे प्रभावी चर्चा तब हुई जब उसने टिप्पणी की कि मनुष्य स्वभाव से ही सामाजिक प्राणी है और उसने अलग-अलग रहने वाले शेर-चीते जैसे पशुओं में और मनुष्य, हाथी, चींटी, मधुमक्खी एवं भेड़ आदि जैसे समूहप्रिय प्रकार के जीवों में अंतर किया ।

उसका सबसे अधिक प्रभावी और स्थायी महत्व उसके द्वारा लिए गए कानून के शासन के पक्ष में है न कि सबसे बुद्धिमान और सर्वोत्तम व्यक्ति के शासन में । आधुनिक समाज की पूरी इमारत संविधान के प्रावधानों के प्रति निष्ठा और ठीक से परिभाषित किए गए नियमों पर आधारित है । इन दोनों का ही उद्‌गम अरस्तू के चिंतन में देखा जा सकता है ।

इस रूप में अधिक महत्वाकांक्षी न होने लेकिन प्लेटो से अधिक व्यावहारिक वास्तविकतावादी होने के कारण अरस्तू के व्यावहारिक समस्या निदान प्लेटो के परिवर्तनवादी और भड़काने वाले विचारों से कहीं अधिक स्थायी तथा प्रभावशाली बने हैं ।

न्याय का सिद्धांत (Principle of Justice):

अपने गुरु प्लेटो की भाँति, अरस्तू विश्वास करता था कि न्याय राज्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार है और कोई राज्य बहुत समय तक नहीं चल सकता है जब तक कि वह न्याय की उपयुक्त प्रणाली पर आधारित न हो । इस तथ्य को मानने के कारण अरस्तू अपने न्याय के सिद्धांत को प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ।

उसका मत था कि न्याय राज्य के लिए एक उद्देश्य प्रस्तुत करता है और मनुष्य के लिए एक लक्ष्य । इसमें निपुण होने पर मनुष्य सर्वोत्तम पशु बन जाता है किंतु जब कानून और न्याय से अलग हो जाता है तब वह उन सबसे खराब बन जाता है ।

अपने गुरु प्लेटो के समान ही अरस्तू ने भी न्याय को राज्य/शासन-तंत्र का आधार माना । उसके अनुसार न्याय एक सद्‌गुण; एक संपूर्ण सद्‌गुण और सभी अच्छाइयों का मूर्त रूप है । यह मात्र सद्‌गुण के समान नहीं है किंतु यह सद्‌गुण है और यह कार्य-रूप में सद्‌गुण है ।

न्याय सद्‌गुण है किन्तु यह सद्‌गुण से कुछ अधिक है । यह कार्य-रूप में सद्‌गुण है अर्थात व्यवहार में सद्‌गुण । उदाहरण के तौर पर, तर्कबुद्धि एक सद्‌गुण है किंतु तर्कसंगत आचरण न्याय है । सच्चाई एक सद्‌गुण है किंतु सच्चा होना न्याय है । जो सद्‌गुण को न्याय बनाता है वह है- सद्‌गुण को व्यवहार में लाना ।

अतः अरस्तू कहता है कि ‘राजनीति के क्षेत्र में अच्छाई न्याय है और न्याय वह है जो सभी के हित को समाहित करता है ।’ रॉस कहता है कि अरस्तू न्याय शब्द के दो अर्थ पहचानकर शुरुआत करता है । न्याय से हम यह अर्थ लगा सकते हैं कि न्याय वह है जो विधि-सम्मत है या जो निष्पक्ष और समान है ।

अरस्तू के लिए न्याय या तो सामान्य है या यह सामान्य न्याय के भाग के रूप में विशेष न्याय है, एक संपूर्ण सद्‌गुण का एक भाग यदि सामान्य न्याय से हमारा तात्पर्य संपूर्ण सदगुण हो तो । अरस्तू के अनुसार, ”सामान्य न्याय संपूर्ण अच्छाई है…यह अपने अधिकतम अर्थ में संपूर्ण है, क्योंकि यह संपूर्ण अच्छाई का न केवल अपने प्रति वरन अपने पडोसी के प्रति भी व्यवहार में प्रयोग है ।’

विशेष न्याय संपूर्ण या सामान्य न्याय का एक भाग है, इसलिए यह संपूर्ण अच्छाई का केवल एक भाग है, उसका एक पहलू है । विशेष न्याय प्राप्त करने का प्रयत्न करने वाला व्यक्ति वह होता है जो नियमों का तो पालन करता है किंतु समाज में जितना उसे मिलना चाहिए, उससे अधिक की माँग नहीं करता है ।

विशेष न्याय दो प्रकार का होता है- वितरणात्मक (Distributive) और सुधारात्मक (Corrective) । अरस्तू के लिए वितरणात्मक न्याय प्राप्तकर्ता के गुणों के अनुसार उन्हें पदक, सम्मान आदि देना है अर्थात् समान लोगों के प्रति समान व्यवहार तथा असमान लोगों के प्रति असमान व्यवहार करना ।

सुधारात्मक न्याय संबंधित व्यक्तियों के पद, स्थिति को ध्यान में नहीं रखता । यह साधारण रूप में दो लोगों में समानता लाने का प्रयत्न करता है । यह एक व्यक्ति से उसके द्वारा प्राप्त लाभ को उससे लेकर दूसरे को, जो अलाभकारी स्थिति में है, देने का प्रयत्न करता है अर्थात वह उसे न्याय दिलाने का प्रयास करता है जो उससे वंचित रह गया है और उसे दंड देता है जिसने दूसरों को न्याय से वंचित रखा है ।

प्लेटो और अरस्तू द्वारा दी गई न्याय की अवधारणाओं की निम्न प्रकार से तुलना की जा सकती है:

1. श्नेटो के लिए न्याय किसी व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार अपने दायित्वों का सर्वोत्तम निर्वाह है जबकि अरस्तू के लिए न्याय व्यक्ति के अनुसार उसे प्रतिदान देना है ।

2. प्लेटो का न्याय सिद्धांत ‘कर्तव्यों’ से जुडा है, जबकि अरस्तू का न्याय ‘अधिकार’ से संबंधित है ।

3. प्लेटो का न्याय सिद्धांत आवश्यक रूप में नैतिक और दार्शनिक है, जबकि अरस्तू का विधिक ।

4. दोनों में वितरणात्मक न्याय की अवधारागा है । प्लेटो के लिए इसका अर्थ व्यक्तिगत उत्कृष्टता और अपने दायित्वों का निर्वाह है, जबकि अरस्तू के लिए इसका अर्थ है- व्यक्ति जिसका अधिकारी है उसे प्राप्त करने का अधिकार ।

5. प्लेटो का न्याय आध्यात्मिक है, जबकि अरस्तू का व्यावहारिक ।

6. प्लेटो का न्याय व्यक्ति की अंतः प्रेरणा से संबंधित है अर्थात यह उससे प्रेरित होता है जो सीधे आत्मा से आता है किंतु अरस्तू का न्याय मनुष्य के कर्मों से संबंधित है अर्थात उसके बाह्य क्रियाकलापों से ।

अरस्तू का न्याय का सिद्धांत सांसारिक है, मनुष्य के व्यावहारिक जीवन में उसके आचरण से संबंधित है किंतु निश्चय ही इस आचरण में सभी नैतिक मान्यताएं उसका मार्गदर्शन करती हैं लेकिन वह न्याय के नैतिक स्वरूप को उसके विधायी स्वरूप से जोड़ने में असमर्थ रहा ।

संपत्ति, परिवार और दासता (Property, Family and Slavery):

अरस्तू का संपत्ति का सिद्धांत उसके द्वारा की गई प्लेटो के ‘संपत्ति के साम्यवाद’ के सिद्धांत की आलोचना पर आधारित है । प्लेटो ने संपत्ति को राज्य के उपयुक्त कार्य-संचालन में बाधा के रूप में लिया । इसलिए प्लेटो ने संरक्षक वर्ग के लिए साम्यवाद का सुझाव दिया किंतु अरस्तू के मत में संपत्ति मनुष्य के स्वामित्व और अपने अधिकार में करने की मूल प्रवृत्ति की संतुष्टि करके उसे मनोवैज्ञानिक आत्मदोष प्रदान करती है ।

अरस्तू को प्लेटो के विरुद्ध सबसे बडी शिकायत यह थी कि वह उत्पादन और वितरण के दावों में संतुलन स्थापित करने में असफल रहा । प्लेटो के ‘संपत्ति के साम्यवाद’ में उत्पादन करने वाले लोगों को उनके प्रयत्नों का प्रतिदान नहीं मिलता और उत्पादन नहीं करने वाले लोगों (शासक वर्ग और सहायक वर्ग) को जीवन की सभी सुविधाएँ मिलती हैं ।

इसलिए अंत में उसका निष्कर्ष यही है कि संपत्ति का साम्यवाद अंततः संघर्षों और टकरावों की ओर ले जाता है । उसका मत था कि संपत्ति उसके लिए आवश्यक है जो उस पर उत्पादन करता है और इसलिए यह सभी के लिए आवश्यक है ।

प्रो॰ मैक्सी उस समय अरस्तू के मत को ही उद्‌घाटित करते हैं, जब वह यह बताते हैं कि ‘मनुष्य के लिए भोजन करना, वस्त्र धारण करना, शरण-स्थल प्राप्त करना आवश्यक है और यह सब करने के लिए उसका संपति प्राप्त करना आवश्यक है । यह सब करने की मूल प्रवृत्ति उतनी ही स्वाभाविक और उपयुक्त है जितना कि प्रकृति द्वारा की गई वन्य पशुओं की अर्प्रित और उनके भरण-पोषण तथा उत्पादन की आवश्यकताओं की पूर्ति/संतुष्टि के लिए साधनों की व्यवस्था ।’

जहाँ तक संपति के स्वामित्व का प्रश्न है, अरस्तू ने:

(1) व्यक्तिगत स्वामित्व और व्यक्तिगत उपयोग की चर्चा की जो अरस्तू के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है ।

(2) साझे स्वामित्व और व्यक्तिगत उपयोग की स्थिति वह है जो समाजवाद से प्रारंभ हो सकती है किंतु जिसका अंत पूँजीवाद होगा और यह स्थिति भी उसे स्वीकार्य नहीं थी,

(3) साझा स्वामित्व और साझा उपयोग, एक ऐसा तरीका जो लगभग हमेशा ही व्यावहारिक नहीं होता,

(4) व्यक्तिगत स्वामित्व और साझा उपयोग, एक तरीका .जो सामान्य रूप से संभव है और समान रूप से स्वीकार्य भी ।

अरस्तू कहता है कि ‘संपत्ति सामान्य रूप से और मुख्यतः निजी होनी चाहिए किंतु उपयोग में वह साझा होनी चाहिए ।’

निजी संपत्ति आवश्यक है और इसलिए यह उचित है । यही अरस्तू का सिद्धांत भी है किंतु इस संपत्ति का अर्जन सम्मानित साधनों से किया जाना चाहिए । संपत्ति अर्जन के सभी साधनों में से सन्-बाज लेना सबसे अप्राकृतिक तरीका है ।’

अरस्तू बहुत अधिक संपत्ति एकत्रित करने के पक्ष में भी नहीं था । इसलिए उसने कहा- ‘बहुत अधिक संपत्ति एकत्रित करना उसी प्रकार की गलती होगी जैसी कि बहुत भारी हथौडा बनाना ।’

प्लेटो के विपरीत, अरस्तू ने व्यक्तिगत (निजी) पारिवारिक प्रणाली का पक्ष लिया । अरस्तू के अनुसार परिवार सामाजिक जीवन की प्रथम इकाई है जो न केवल समाज का निर्माण करती है बल्कि उसे बनाए भी रखती है ।

प्लेटो के परिवार के साम्यवाद की आलोचना करते हुए अरस्तू लिखता है कि – ‘वह चीज जो अधिकतर लोगों के लिए साझी होती है उसकी सबसे कम देखभाल की जाती है । प्रत्येक व्यक्ति मुख्य रूप से अपने हित की ही सोचता है, और वह भी तब सोच पाता है जब वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से उससे संबंधित होता है, सामान्य हित की बात कभी मुश्किल से ही वह सोच पाता है ।

क्योंकि अन्य बातों को ध्यान में रखने के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति उस काम को छोड़ने का अधिक इच्छुक रहता है जिसे वह दूसरों से पूरा करवाने की आशा करता है, जैसे कि किसी परिवार में बहुत-से सहायकों की अपेक्षा कम सहायक अधिक उपयोगी होते है । प्रत्येक नागरिक के हजारों पुत्र होंगे जो व्यक्तिगत रूप से उसके पुत्र नहीं होंगे किंतु कोई भी समान रूप से किसी का भी पुत्र होगा और इसलिए वह सभी के द्वारा समान रूप से उपेक्षित होगा ।’

अरस्तू का विश्वास था कि परिवार ही वह संस्था है जहाँ व्यक्ति का जन्म होता है, उसका पालन-पोषण होता है, उसकी पहचान बनती है, उसे नाम दिया जाता है और सबसे अधिक यह कि वही उसका बौद्धिक विकास होता है ।

वह बल देकर कहता है कि परिवार ही सामाजिक सद्‌गुणों की प्राथमिक पाठशाला है जहाँ उसे सहयोग, प्रेम, सहनशीलता तथा बलिदान आदि के पाठ पढाएँ जाते हैं । यह केवल एक प्रारंभिक संबंध ही न होकर समाज की आवश्यक क्रिया है ।

यदि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, जैसा कि अरस्तू आग्रहपूर्वक कहता है, तो परिवार मनुष्य की प्रकृति का विस्तार बन जाता है, ग्राम परिवारों का विस्तार और राज्य परिवारों और ग्रामों का विस्तार तथा संघ बन जाता है । अरस्तू का कहना है कि एक परिवार में पति, पत्नी, संतान, दास तथा संपत्ति आती है ।

इसमें तीन प्रकार के संबंध होते हैं- स्वामी और दास के संबंध, दाम्पत्य (पति और पत्नी के बीच) संबंध, और पैतृक (पिता और संतान के बीच) संबंध । अरस्तू के मत के अनुसार स्वामी दासों के ऊपर शासन करता है, पति पत्नी पर शासन करता है अरस्तू ने स्त्रियों को पुरुष की तुलना में निम्न कोटि का माना, एक अपूर्ण पुरुष तथा पिता पुत्र पर शासन करता है ।

पितृसत्तात्मक समाज में विश्वास के कारण वह स्त्रियों को घर की चारदीवारी में ही बंद रखना चाहता था । उसके अनुसार वे केवल घर के काम के लिए और प्रजनन तथा बच्चों की देखभाल के लिए ही उपयुक्त थीं । उसके अनुसार पुरुष परिवार का मुखिया था ।

अरस्तू के परिवार संबंधी विचार प्लेटो के विचारों से बहुत भिन्न हैं किंतु फिर भी अरस्तू दार्शनिक रूप में प्लेटो से बहुत बेहतर नहीं है । प्लेटो संतान संबंधी संबंधों को आदर्श राज्य के हितों के विरुद्ध मानता है, अरस्तू परिवार को राज्य का प्रमुख आधार ही बना देता है क्योंकि उसके अनुसार निजी और सार्वजनिक क्षेत्र अलग-अलग हैं । बाद में इस मत को मैरी बूलस्टोनक्राफ्ट और जे.एस. मिल सरीखे उदार स्त्री-स्वातंन्यवादी विचारकों द्वारा परिष्कृत और समायोजित किया गया ।

अरस्तू दासता को उचित ठहराता है, जो वास्तव में उस समय का विधान था । वह लिखता है कि, ‘कुछ लोगों को शासन करना चाहिए और अन्य लोगों को शासित होना चाहिए । यह न केवल अनिवार्य चीज है बल्कि युक्तिसंगत भी है क्योंकि जन्म के समय से ही यह निश्चित हो जाता है कि किन पर शासन किया जाएगा और कौन शासन करेंगे ।’

इसलिए फॉस्टर ने ठीक ही कहा है कि ‘वास्तव में, अरस्तू युक्तिसंगत होने के आधार पर दासता को उचित ठहराता है ।’ बार्कर के अनुसार, ‘अरस्तू की दासता की धारणा एक आवश्यकता का औचित्य निर्धारण है न कि तथ्यों को निष्पक्षता से देखते हुए निष्कर्ष निकालना ।’

अरस्तू के दासता को उचित ठहराने संबंधी विचारों के बारे में मैक्सी अन्य बहुत से विचारकों से अधिक स्पष्ट है । उसके शब्दों में अरस्तू कहता है कि कुछ व्यक्ति सोचते हैं कि दासता अन्यायपूर्ण है और प्रकृति के विरुद्ध है, किंतु उसके मत में यह प्रकृति के नियमों और न्याय के सिद्धांतों के अनुसरण में है ।

वह कहता है कि बहुत से व्यक्ति स्वभाव से ही दारन बनने के लिए उपयुक्त होते हैं, जन्म के समय से ही वह शासित किए जाने के लिए निर्दिष्ट कर दिए जाते हैं । ऐसा नहीं है कि वह आवश्यक रूप से शारीरिक या मानसिक शक्ति में औरों से कम होते हैं, किंतु वह दासोचित वृत्ति के होते हैं और इसलिए वे दूसरों द्वारा शासित किए जाने पर अच्छी तरह से रह पाते हैं ।

उनमें आत्मा की वह शक्ति नहीं होती जो स्वतंत्र व्यक्ति या शासक को उनसे अलग करती है….. परिणामस्वरूप उन्हें संपत्ति के समान ही रखना और अन्य संपत्तियों की तरह से जीवन-यापन के एक साधन के रूप में उनका उपयोग करना उचित है ।

किसी एक व्यक्ति को दास और दूसरे को स्वामी क्यों होना चाहिए? अरस्तू का उत्तर है – ‘वह व्यक्ति जो कर सकता है इसलिए कर्ता है । वह सिद्धांत बनाता है और वह जो न्यायोचित सिद्धांतों में इतना ही भाग लेता है कि उनको समझ सके, किंतु उस प्रकार का सिद्धांत न रखे, वह प्रकृति से ही दास है ।’

और वह जो अपना ही स्वामी है और न्यायोचित सिद्धांतों में इसलिए भाग लेता है क्योंकि उसके वैसे ही सिद्धांत हैं, वह शासक है । एक शासक या स्वतंत्र व्यक्ति को दास से जो चीज भिन्न बनाती है वह क्या है?

अरस्तू कहता है कि – ‘प्रकृति स्वतंत्र मनुष्यों और दासों के शारीरिक गठन में अंतर करती है, वह एक को (दास को) बलिष्ठ बनाती है ताकि वह दासवृत्ति और मजदूरी का काम कर सके जबकि दूसरे (स्वतंत्र व्यक्ति) को ऊँचा, सीधा बनाती है । यद्यपि वह मजदूर के समान काम करने के लिए बेकार होता है, किंतु राजनीतिक जीवन और युद्ध तथा शांति के नौ ही कलाओं के लिए उपयोगी होगा ।’

इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि – ‘फिर यह स्पष्ट है कि कुछ मनुष्य प्रकृति से ही स्वतंत्र होते हैं और अन्य दास । इन बाद वालों के लिए दासता युक्तिसंगत और ठीक है ।’ अरस्तू के तर्क के समर्थन में, उसके अपने ही शब्दों में कहा गया है कि ‘जहाँ इस प्रकार का अंतर होता है, जैसा कि आत्मा और शरीर में है या जैसा मनुष्य और पशु में है, निम्न कोटि के लोग प्रकृति से ही दास होते हैं और उनके लिए यही उत्तम होता है जैसा कि अन्य सभी निम्न कोटि के लोगों के लिए भी है कि वह किसी स्वामी के नियंत्रण में रहें ।’

दासता न केवल स्वाभाविक ही है वरन यह आवश्यक भी है । अरस्तू तर्क देता है कि यह स्वाभाविक इसलिए है क्योंकि प्राकृतिक समानता नहीं करती है । वह कहता है कि यह आवश्यक है क्योंकि यदि स्वामी को एक दास की आवश्यकता है जिससे कि वह स्वतंत्र जीवन का आनंद उठा सके तो दास को भी एक स्वामी की आवश्यकता है जिससे कि वह स्वतंत्र जीवन के सद्‌गुणों को एक स्वतंत्र व्यक्ति की संगत में रह कर प्राप्त कर सके ।

अरस्तू के अनुसार – एक दास पूर्ण व्यक्ति नहीं है । वह उप-मनुष्य, अपूर्ण और बर्बर है । फिर भी वह कार्य करने के लिए एक सजीव साधन है और उत्पादन के लिए वह अभिप्रेत नहीं है क्योंकि वह घर के अंदर ही कार्यों में सहायता करता है ।

वह स्वामी की संपत्ति है किंतु अरस्तू ने दासों के साथ अमानवीय व्यवहार को अस्वीकृत किया और उनके अच्छे व्यवहार के लिए पुरस्कारस्वरुप उनकी बंधन- मुक्ति का पक्ष लिया । अरस्तू ने अपने दासों को अपनी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व ही बंधन-मुक्त कर दिया था ।

अरस्तू के विपरीत, कहा जाता है कि प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दासता को समाप्त किया किंतु वास्तविकता संभवतः यह है कि प्लेटो ने इसे दिए हुए रूप में स्वीकार कर लिया था क्योंकि उस समय यह एक सब जगह विद्यमान संस्था थी और उसे समाप्त करना आर्थिक रूप में विनाशक होता । इसके विपरीत, अरस्तू ने केवल उसी रूप में तथ्यों का विवरण दिया जिस रूप में वे प्राचीन पाश्चात्य जगत में विद्यमान थे ।

फिर भी उसने एक ऐसे समय की पूर्व-कल्पना की जब किसी प्रकार की दासता नहीं होगी, जब घूमने वाला पहिया अपने आप चलेगा, जब काम करने वाले मनुष्यों के स्थान पर मशीनों से काम लिया जाएगा और वास्तव में बिल्कुल ऐसा ही हुआ । दासता औद्योगिक क्रांति के आने पर समाप्त हो गई ।

क्रांति का सिद्धांत (Theory of Revolution):

‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तू ने समस्याओं की सबरने महत्वपूर्ण समस्या पर चर्चा की है जिसने इसे आने वाले समयों के लिए राजनयिकों की निर्देश पुस्तिका बना दिया । जिस समस्या पर इसमें अरस्तू ने विचार किया वह थी- राजनीतिक अस्थिरता से जुडी समस्या या क्रांति के कारण और निवारण । अरस्तू ने इसके अनेकों कारण बताये हैं जो राज्य के जीवन को प्रभावित करेंगे ।

जिस प्रकार एक चिकित्सक अपने रोगी का परीक्षण करता है और फिर रोग दूर करने के उपाय बताता है । उसी प्रकार अरस्तू उन कारणों को निश्चित करने का प्रयत्न करता है जो राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी होते हैं और फिर उनके निदान के उपाय बताता है ।

गैटेल (Gettel) कहता है कि – ‘पॉलिटिक्स राजनीतिक दर्शन का व्यवस्थित अध्ययन न होकर शासन की कला पर लिखी पुस्तक है । इसमें अरस्तू ने उस समय के यूनान में प्रचलित बुराइयों तथा राजनीतिक प्रणालियों के दोषों का विश्लेषण किया है और उनके परिणामस्वरूप आ सकने वाले खतरों से बचने के सबसे अच्छे तरीकों के रूप में व्यावहारिक सुझाव दिए हैं ।’

डनिंग (Dunning) ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘पॉलिटिक्स में अरस्तू ने विस्तार से उन कारणों का वर्णन किया है जिनके कारण क्रांति आती है और उसके बाद उतने ही अच्छे तरीके से उन्हें रोकने के उपायों का भी वर्णन किया है ।’

अरस्तू के अनुसार, क्रांति का अर्थ है- संगठन में परिवर्तन, शासकों में परिवर्तन अर्थात् एक परिवर्तन चाहे वह छोटा हो या बडा । उसके लिए राजतंत्र से कुलीनतंत्र में परिवर्तन, एक बड़े परिवर्तन का उदाहरण है, एक क्रांति-जब लोकतंत्र कम लोकतांत्रिक बन जाता है तो वह भी एक क्रांति है, यद्यपि यह एक छोटा परिवर्तन है ।

अतः अरस्तू के क्रांति के विचारों को बताने के लिए कहा जा सकता है कि क्रांति का अर्थ है:

(1) शासक वर्ग में परिवर्तन,

(2) राजनीतिक अस्थिरता या राजनीतिक रूपांतरण,

(3) हिंसा, विनाश और खून-खराबे के उपरांत आया परिवर्तन ।

अरस्तू यथास्थिति (Quo Status) का समर्थक था क्योंकि राजनीतिक परिवर्तन अपने साथ विध्वंसात्मक और हिंसक परिवर्तन लाते हैं इसीलिए अपनी ‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तू ने क्रांति के सामान्य और विशिष्ट कारणों की बडे विस्तार से की और उसके बाद उनसे बचने के लिए सुझाव दिए ।

प्रोफेसर मैक्सों ने क्रांति के उन सामान्य कारणों को हरमानने का प्रयास किया है जो अरस्तू द्वारा अपनी ‘पॉलिटिक्स’ में बताए गए है, ‘यह है (1) सर्वोच्चाधिकार और विशेषाधिकारों के प्रति अनुरक्ति जो मनुष्य को ऐसी परिस्थितियों से घृणा एवं विद्रोह करने के लिए प्रेरित करती है जो अन्य व्यक्तियों को प्रतिष्ठा या समृद्धि में उनसे ऊपर, उनके बराबर स्थित कर देती है । (2) शासकों का या शासक वर्ग का औरों को बेवकूफ बनाने वाला अक्खड़पन और लोलुपता जो लोगों को उनके प्रति विद्रोह करने को विवश कर देती है (3) एक या एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा दूसरों को भयभीत करने के लिए सत्ता हथियाना और राजा या कुलीनों के समान आचरण करना (4) गलत काम करने के दोषी व्यक्ति द्वारा अपने दोषों को छिपाने के लिए निरंतर क्रांति के लिए प्रयास करते रहने या दूसरों के आक्रमण से स्वतंत्र हुए व्यक्तियों द्वारा क्रांति प्रारंभ करना ताकि वह अपने शत्रुओं का पूर्वानुमान लगा सके (5) राज्य के किसी भाग की अनुपातहीन वृद्धि जिसके कारण अन्य भागों को इस बाहुल्य/वृद्धि को रोकने/प्रतिकार के लिए उग्र उपायों का प्रयोग करना पड़े (6) विभिन्न जाति के लोगों का विरोध और आपसी प्रतिद्वंद्विताएँ (7) पारिवारिक कलह और झगडे; और (8) पदों और राजनीतिक सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धी वर्गों और राजनीतिक गुटों तथा दलों में संघर्ष ।’

क्रांति के सामान्य कारणों में अरस्तू विभिन्न प्रकार की क्रांतियों के विशिष्ट कारणों को सम्मिलित करता है । लोकतंत्र में क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण लोकप्रिय नेता की असैद्धांतिक विशिष्टताएँ हैं । स्वार्थी नेताओं की ओर से अमीरों पर आक्रमण होता है जिससे कि वह जनता को बलपूर्वक कुलीनतंत्र के उदय से बचाने के साधन उपलब्ध करा सके ।

कुलीनतंत्रों को उखाड फेंकने के कारण आंतरिक भी हो सकते हैं (जैसे जब सत्ता प्राप्त वर्ग का एक समूह दूसरों को अलग छोड़कर अधिक प्रभावशाली या समृद्ध बन जाता है) अथवा बाह्य भी हो सकते हैं (जैसे शासक दल का सामान्य जनता के साथ बुरा व्यवहार आदि) ।

कुलीनतंत्रों में कुछ ही लोग सत्ता का भोग करते हैं । जब उससे लाभ उठाने वालों की संख्या कम हो जाती है या जब शासक और शासित वर्ग के बीच का अतर बढ़ जाता तब वह क्रांति का कारण यन जाता है । राजतंत्र, बादशाहत और तानाशाही संगठन के खराब स्वरूप है । इन पर आधारित शासन के प्रति बहुत शीघ्र ही विरोध प्रारंभ होने की संभावना रहती है ।

क्रांति के इन कारणों को बताने के साथ ही अरस्तू इनसे बचने के उपायों का भी सुझाव देता है । इस संबंध में मैक्सी कहना है कि ‘अरस्तू के लिए कानून के प्रति आज्ञाकारिता की भावना बनाए रखने के लिए सबसे आवश्यक है- ईर्ष्या को दूर रखना, उससे बचना क्योंकि कानून का उल्लंघन अलक्षित रूप में प्रारंभ होता है और अंत में राज्य की बागडोर थाम लेता है ।’

…. ‘दूसरी चीज है सरकार से अलग के किसी भी वर्ग के व्यक्तियों के साथ बुरा व्यवहार करने की अपेक्षा अच्छा व्यवहार करना और उनके पथ प्रदर्शकों को उपयुक्त मान देना…. अरस्तू के मत में क्रांति को रोकने का तीसरा तरीका है देशभक्ति को सदैव सर्वोच्च भावना बनाए रखना, जन-सामान्य को देश के प्रति उत्तेजित करके रखना । उस शासक को, जिसके पास राज्य की देखभाल का कार्य है, दूरगामी खतरों को पास लाना होगा ताकि नागरिक सदैव सतर्क रहें और रात में चौकीदारी करने वालों की तरह हमेशा चौकन्ने रहें और कभी भी सावधानी कम न करे ।’

चौथा साधन है असंतोष को दूर करना जो पदों की असमानता से जन्म लेता है । इस प्रकार की व्यवस्था करना जिससे कि मजिस्ट्रेट को अपने पद का दुरुपयोग करके धन अर्जित करने से रोका जा सके । पाँचवाँ और अंतिम उपाय यह है कि ‘मेरे द्वारा बताई गई सभी बातों में से जो चीज संगठन के स्थायित्व में सबसे अधिक सहायक होती है वह है- विद्यमान शासन व्यवस्था के अनुरूप शिक्षा प्रणाली को अपनाना ।’

दूसरे शब्दों में नवयुवकों को संगठन/संविधान की भावना के प्रति प्रशिक्षित करना, उन्हें सामाजिक व्यवहारों के लिए अनुशासित करना और उन्हें अपनाई गई राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग के रूप में सोचना और कार्य करना सिखाना ।

क्रांति के सामान्य और विशेष कारणों के गहन एवं व्यवहारिक विश्लेषण के साथ उस समय की रोगग्रस्त प्रणालियों की बीमारी दूर करने के उपायों में गंभीर कमियों को अरस्तू ने प्रस्तुत किया है । क्रांति के विषय पर की गई टिप्पणियाँ गंभीर दोषों से मुक्त नहीं हैं ।

उसने क्रांति को बहुत ही संकीर्ण अर्थ में लिया है । इससे उसका अभिप्राय केवल राजनीतिक परिवर्तन है । वह यह भूल गए हैं कि क्रांति सदैव संपूर्ण प्रणाली के ताने-बाने में किया गया एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन होती है । उन्होंने क्रांति की एक नकारात्मक, अस्वीकृतात्मक भूमिका भी बताई है अर्थात् यह अपने साथ विनाश, हिंसा और खून-खराबा भी लाती है ।

उन्होंने क्रांति के इस पहलू को, जैसा कि मादा ने कहा है, नहीं देखा कि यह इतिहास को आगे चलाने वाला इंजन है । अरस्तू के मत में, क्रांति को दूर ही रखना चाहिए । इसीलिए वह अपने समय का, स्थिति को जैसी है वैसी ही बनाए रखने के मत का पक्षपाती था ।

राज्य का सिद्धांत (Theory of State):

प्लेटो के समान ही अरस्तू के लिए भी राज्य (पॉलिस- Polis) सबसे महत्वपूर्ण था । प्लेटो और अरस्तू, दोनों का ही ‘पॉलिस’ का अर्थ राज्य की संकल्पना से व्यापक था । दोनों के लिए ‘पॉलिस’ एक समुदाय के साथ ही राज्य भी है, राज्य के साथ-साथ सरकार भी है, सरकार के साथ-साथ एक विचारधारा भी है और एक विचारधारा के साथ-साथ एक धर्म भी है, इसके अतिरिक्त वह ‘पॉलिस’ को संपूर्ण जीवन व्यतीत करने के साधन के रूप में भी लेते हैं ।

दोनों के लिए ही राज्य का आरंभ मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो हुआ किंतु यह अच्छे जीवन के लिए आवश्यक अन्य उच्च उद्देश्यों की पूर्ति का भी काम करने लगा ।  अरस्तू का कहना है कि – ‘एक राज्य अच्छे जीवनयापन के लिए होता है न कि केवल जीवनयापन के लिए ।’

अरस्तू के राज्य के सिद्धांत की विशिष्टताएँ संक्षेप में निम्न प्रकार वर्णित की जा सकती हैं:

1. अरस्तू का राज्य संरचित या निर्मित नहीं है, यह बनाया नहीं गया है बल्कि विकसित हुआ है । यह धीरे-धीरे ग्राम से विकसित होता है, ग्राम परिवार से विकसित होता है और परिवार मनुष्य की प्रकृति से, उसकी सामाजिक वृत्ति से विकसित होता है । राज्य एक वृक्ष के समान विकसित होता है ।

2. राज्य व्यक्ति से पहले था । यह उसी प्रकार से है जैसे समग्र उसके भाग (अंश) से पहले था । अरस्तू कहता है कि ‘राज्य स्वाभाविक रूप में ही परिवार और व्यक्ति से पहले विद्यमान था । चूँकि जिस प्रकार भाग (अंश) के लिए आवश्यक है कि उससे पहले समग्र विद्यमान हो, उदाहरण के लिए यदि संपूर्ण शरीर नष्ट हो जाए तो न वहाँ कोई पैर होगा न हाथ-केवल अनेकार्थक रूप को छोड़कर अर्थात् हम कह सकते हैं कि पत्थर का हाथ हो सकता है किंतु जब वह नष्ट हो जाएगा तो वह हाथ नहीं रहेगा ।

चीजों की परिभाषा उनके काम और उनकी शक्तियों से की जाती है ‘और हमें यह नहीं कहना चाहिए कि वह अपने उपयुक्त गुण न होने पर भी होते हैं क्योंकि उस रूप में उनका केवल नाम समान हो सकता है किंतु गुण नहीं ।’ वह जो समाज में नहीं रह पाता है, या जिसकी कोई आवश्यकताएँ नहीं हैं क्योंकि वह अपने पर ही निर्भर है, वह या तो कोई पशु होगा या ईश्वर, वह राज्य का भाग नहीं हो सकता ।

3. अरस्तू का कहना है कि राज्य केवल एक संगठन या यूनियन न होकर संगठनों का संगठन है । अन्य संगठन उतने बड़े नहीं है जितना बडा राज्य है । वह विशिष्ट है और इसलिए अपने उद्देश्य तथा तत्व में सीमित है । दूसरी ओर, राज्य के सामान्य और सबके लिए एक से उद्देश्य होते हैं और इसलिए इसका सरोकार अन्य किसी संगठन की तुलना में व्यापक होता है ।

4. राज्य एक मानव शरीर के समान है । अरस्तू का विचार था कि राज्य के मानव शरीर की भाँति अपने भाग होते हैं अर्थात् व्यक्ति होते हैं । वह तर्क देता है कि जैसे शरीर से अलग उसके अंगों का कोई जीवन नहीं है उसी प्रकार राज्य से अलग व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है ।

5. अरस्तू का कहना है कि राज्य एक इकाई नहीं है, जबकि प्लेटो ने राज्य को एक इकाई कहा है । प्लेटो राज्य के अंदर एकता प्राप्त करना चाहता है । अरस्तू भी एकता प्राप्त करना चाहता है किंतु उसके लिए यह अनेकता में एकता है । अरस्तू के लिए राज्य एक समरूपता नहीं है बल्कि यह सभी विविधताओं को एक साथ लाने वाली इकाई है ।

6. सेबाइन के अनुसार, अरस्तू का सबसे अच्छा व्यावहारिक राज्य वह है जिसे प्लेटो ने दूसरा सर्वोत्तम राज्य कहा है । अरस्तू का राज्य सर्वोत्तम संभव राज्य है सर्वोत्तम व्यावहारिक राज्य ।

यह वह राज्य है:

(i) जो छोटा नगर राज्य है,

(ii) जिसका भूभाग उसकी जनसंख्या के अनुरूप है

(iii) जो भौगोलिक रूप में नदी के किनारे स्थित है, जहाँ अच्छा मौसम रहता है,

(iv) जहाँ विधि का विधान लागू है; और

(v) जहाँ शक्ति/सत्ता अमीरों के हाथों में निहित है ।

अपने 158 संविधानों के अध्ययन के आधार पर अरस्तू ने एक वर्गीकरण दिया, जो सरकारों को वर्गीकृत करने का प्रयास करने वाले परवर्ती विद्धानों के लिए एक मार्गदर्शी वर्गीकरण बन गया । उसके लिए, एक व्यक्ति का और सबके हित में किया जाने वाला शासन राजतंत्र (Monarchy) है और उसका विकृत रूप तानाशाही (Tyranry) जहाँ इस प्रकार का शासन केवल शासक के हित के लिए विद्यमान होता है ।

सभी व्यक्तियों के हित के लिए कुछ व्यक्तियों का शासन कुलीन-तंत्र (Aristocracy) है और इसका विकृत रूप है – अल्पतंत्र (Oligarchy) जहाँ कुछ थोड़े से लोग अपने ही हित में शासन करते हैं ।

बहुत से लोगों द्वारा सभी के हित में किया गया शासन बहुतंत्र (Polity) है और इसका विकृत रूप है- प्रजातंत्र तट (Democracy) जहाँ पर शासन का लाभ सत्ता प्राप्त व्यक्तियों को होता है । अरस्तू भी वर्गीकरण के चक्र का संदर्भ लेता है- राजतंत्र के बाद तानाशाही आता है, तानाशाही के बाद कुलीनतंत्र, उसके बाद अल्पतंत्र, अल्पतंत्र के बाद बहुतंत्र और बहुतंत्र के बाद प्रजातंत्र और प्रजातंत्र के बाद राजतंत्र और इसी प्रकार वर्गीकरण का चक्र चलता रहता है ।

अरस्तू का वर्गीकरण अब पुराना पड़ गया है क्योंकि इसे विद्यमान प्रणालियों पर लागू नहीं किया जा सकता है । जिसे वह राज्यों का वर्गीकरण कहता है, वह वास्तव में सरकारों का वर्गीकरण है क्योंकि सभी प्राचीन यूनानियों के समान अरस्तू भी राज्य और सरकारों के बीच दिग्भ्रमित है ।