Read this article in Hindi to learn about the condition of political thought during the medieval age.

1. सामान्य विशेषताएं (General Features):

यूरोप के इतिहास में रोमन साम्राज्य के पतन (476 ई.) से पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक के दौर को मध्य युग कहा जाता है । इस युग के अधिकांश भाग में यूरोप का राजनीतिक जीवन किसी सुचिंतित उद्देश्य या सिद्धांत से प्रेरित नहीं रहा ।

उन दिनों कुछ ऐसे विचार तो प्रचलित रहे जो रोमन परंपरा की देन थे, या मसीही धर्म की शिक्षाओं में से उभर कर सामने आए थे, या सामंतवाद की परिस्थितियों से पैदा हुए थे परंतु उन्होंने राजनीतिक संस्थाओं पर विशेष प्रभाव नहीं डाला ।

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देखा जाए तो रोम के पतन के बाद और आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के उदय से पहले तक यूरोप के राजनीतिक जीवन में रोमन न्यायशास्त्र का थोडा-बहुत प्रभाव तो रहा परंतु उस पर अन्य किसी तत्व की गहरी छाप दिखाई नहीं देती । चूंकि मध्ययुगीन यूरोप में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति नहीं हो पाई, इसलिए इस युग को अंधकार युग की संज्ञा दी जाती है ।

2. धार्मिक विषयों की प्रधानता (Primacy of Religious Subjects):

मध्ययुगीन चिंतन न तो इतिहास पर आधारित था, न विज्ञान पर । उसमें आलोचनात्मक दृष्टिकोण का भी नितांत अभाव था । इसके अंतर्गत आस्था और विश्वास से जुडी हुई मान्यताओं के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते थे-निरीक्षण, अन्वेषण और प्रयोग-विधि के आधार पर नहीं ।

सारी शिक्षा पर पुरोहित-वर्ग का नियंत्रण था, और सारे चिंतन का केंद्र-बिंदु धर्ममीमांसा से संबंधित प्रश्न थे । संगठित चर्च धर्म के विषय में जो भी मान्यताएं निर्धारित करता था, वही संपूर्ण ज्ञान का आधार मानी जाती थीं । इस पर तर्क करने की आज्ञा किसी को नहीं थी । सारा चिंतन कठोर रूढियों से जकड़ा था । किसी भी तरह की असहमति को अपधर्मिता की संज्ञा देकर बेदर्दी से कुचल दिया जाता था ।

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3. चर्च और राज्य का विवाद (Church and State Dispute):

मध्ययुग में चर्च की सत्ता धार्मिक शक्ति की प्रतीक थी, और राज्य की सत्ता लौकिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती थी । इन दोनों का परस्पर संबंध मध्ययुगीन राजनीति-चिंतन का मुख्य विषय था । नवीं से तेरहवीं शताब्दी के दौरान सामान्य प्रवृत्ति यह मानने की थी कि राजनीति में धर्म-संगठन या पोपतंत्र की सत्ता सर्वोच्च है ।

इस सिद्धांत का निर्माण करते समय प्राचीन यूनानी और रोमन लेखकों के विचारों को सांसारिक विषयों का विवेचन मानकर परे रख दिया गया और बाइबल तथा धर्माचार्यों की कृतियों को संपूर्ण ज्ञान के स्रोत के रूप में मान्यता दी गई ।

मध्ययुगीन राजनीति-सिद्धांत के अंतर्गत कुछ बातों के बारे में सब लोग सहमत थे! आर.जी. गेटेल के शब्दों में – ”प्राचीन रोम का प्रेत मनुष्यों के मन पर मंडराता रहता था, और (यूरोप की) एकता का आदर्श अपनी जड़ें जमा चुका था । साधारणतः यह विश्वास किया जाता था कि यूरोप में एक चर्च और एक राज्य होना चाहिए; इन दोनों में प्रत्येक की सत्ता का अपना-अपना एक ही प्रमुख होना चाहिए; चर्च और राज्य को एक ही प्रणाली के अंतर्गत समन्वित हो जाना चाहिए क्योंकि संपूर्ण सत्ता मूलतः एक ही दिव्य स्रोत से जन्म लेती है ।”

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उन दिनों सारे यूरोपवासी ऐसे विश्वजनीन समाज में रहते थे जो रोमन साम्राज्य के दौरान अस्तित्व में आया था । ऐसा लगता था जैसे मसीही जगत के रूप में रोमन साम्राज्य फिर से जी उठा हो ।

वैसे तो चर्च और राज्य एक ही समाज के रूप में जुड़े थे, फिर भी इस समाज की दो सरकारें थीं । ईसाई लेखकों ने आध्यात्मिक और सांसारिक जगत में जिस अंतर का संकेत दिया था, उसने ‘दो शक्तियों के सिद्धांत’ (Doctrine of Two Swords) को जन्म दिया ।

इससे संपूर्ण सत्ता पोप और सम्राट के बीच बंट गई, और यह माना जाने लगा कि ईसाई सम्राट को अमरत्व प्राप्त करने के लिए धर्माध्यक्ष की जरूरत है, और धर्माध्यक्ष को लौकिक मामलों के प्रबंध में सम्राट की सरकार से सहायता लेनी पड़ती है ।

शुरू-शुरू में, धरती पर शासन चलाने के लिए लौकिक और आध्यात्मिक सत्ता के इस सामंजस्यपूर्ण विभाजन को दैवी आदेश की अभिव्यक्ति माना गया, और यह आशा की गई कि ये दोनों एक-दूसरे के सीमाक्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे परंतु मध्ययुगीन परिस्थितियों में व्यवहार के धरातल पर लौकिक और आध्यात्मिक मामलों में इस तरह का अलगाव ज्यादा दिन नहीं चल सकता था ।

अतः कालांतर में दोनों तरह की सताए अपनी-अपनी शक्तियों के विस्तार के उद्देश्य से एक-दूसरे पर अपनी-अपनी सीमाओं के अतिक्रमण का आरोप लगाने लगी । इस तरह चर्च और राज्य का विवाद मध्ययुगीन यूरोपीय चिंतन का मुख्य मुद्दा बन गया ।