Read this article in Hindi to learn about:- 1. सोवियत संघ की पूर्व व्यवस्था (Pre-Arrangement of the Soviet Union) 2. सोवियत संघ की स्थापना  (Formation of Soviet Union) 3. सोवियत नेतृत्व 4. रूस में शॉक थेरेपी अथवा झटका- चिकित्सा (Shock Therapy in Russia) 5. बाल्कन राज्य (Balkan State) 6.पूर्व साम्यवादी देशों व रूस के साथ भारत के सम्बन्ध (India’s Relations with East Communist Countries and Russia).

Contents:

  1. सोवियत संघ की पूर्व व्यवस्था (Pre-Arrangement of the Soviet Union)
  2. सोवियत संघ की स्थापना  (Formation of Soviet Union)
  3. सोवियत नेतृत्व (Soviet Leadership)
  4. रूस में शॉक थेरेपी अथवा झटका- चिकित्सा (Shock Therapy in Russia)
  5. बाल्कन राज्य (Balkan State)
  6. पूर्व साम्यवादी देशों व रूस के साथ भारत के सम्बन्ध (India’s Relations with East Communist Countries and Russia)


1. सोवियत संघ की पूर्व व्यवस्था (Pre-Arrangement of the Soviet Union):

भौगोलिक दृष्टि से सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा देश था । विघटन के बाद इसका उत्तराधिकारी रूस भी आज विश्व का सबसे बड़ा देश है । पूर्व सोवियत संघ अर्थात् यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक- यू. एस. एस. आर. -लेनिन के नेतृत्व में 1917 में आयोजित साम्यवादी क्रान्ति के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया ।

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यह क्रान्ति कार्ल मार्क्स की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थी जो पश्चिम की पूंजीवादी विचारधारा की विरोधी थी । राजनीतिक व्यवस्था का गठन साम्यवादी दल के एकाधिकारवाद के सिद्धान्त के आधार पर किया गया था । किसी अन्य दल का गठन करने व कार्य करने की अनुमति नहीं थी ।

राजनीतिक व नागरिक स्वतंत्रताएं साम्यवादी दल की कार्यप्रणाली से सीमित थी आर्थिक दृष्टि से समानता के सिद्धान्त को सभी सम्पत्ति पर राज्य के नियंत्रण द्वारा लागू किया गया था । सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था के नियंत्रण में संचालित एक नियोजित अर्थव्यवस्था थी । इसमें लाभ की प्रेरणा से काम करने की कोई गुंजाइश नहीं थीं ।


2. सोवियत संघ की स्थापना (Formation of Soviet Union):

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के उन देशों पर अपना राजनीतिक प्रभाव व सैनिक नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिन्हें उसने द्वितीया विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी व इटली के फासीवादी नियंत्रण से मुक्त कराया था । युद्ध समाप्ति के समय सोवियत संघ की सेनाओं ने बर्लिन तक पूर्वी यूरोप में अधिकार कर रखा था । इस क्षेत्र के देशों की जनता भी जर्मन नियंत्रण से उन्हें मुक्त कराने के कारण सोवियत संध के प्रति सहानुभूति रखती थी ।

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इन देशों में सोवियत संघ की देख-रेख में साम्यवादी समूहों के नियंत्रण वाली सरकारों का गठन किया गया । सोवियत ऐसा करके पश्चिमी मोर्चे पर अपनी सुरक्षा को भी सुनिश्चित कर लेना चाहता था । इसी कम में 1945 में पोलैण्ड में पाँच दलों की मिली-जुली सरकार का गठन किया गया, लेकिन इसके सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर साम्यवादी तत्वों का अधिकार था ।

6 मार्च, 1945 को रोमानिया में सोवियत समर्थित साम्यवादी सरकार का गठन किया गया । नवम्बर 1946 में हुये रोमानिया के चुनावों में वहाँ की साम्यवादी पार्टी को बड़ा बहुमत प्राप्त हुआ । अप्रैल 1948 में रोमानिया का जो नया संविधान बनाया गया, उसमें सोवियत मॉडल की स्पष्ट छाप थी ।

इसी तरह नवम्बर 1945 में बुल्गारिया में सीमित चुनाव हुए जिनमें गैर-साम्यवादी दलों की भागीदारी न के बराबर थी । 1946 के चुनावों में बुल्गारिया में साम्यवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ तथा इसी के साथ ही बुल्गारिया में साम्यवादी शासन की स्थापना हो गयी ।

इसी दौरान 1 फरवरी, 1946 को हंगरी में राजतंत्र को समाप्त कर गणतंत्रात्मक शासन की स्थापना की गयी । अगस्त 1947 के चुनावों में साम्यवादी दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा तथा धीरे-धीरे हंगरी में भी साम्यवादी शासन की स्थापना हो गयी ।

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यद्यपि यूगोस्लाविया को मुक्त कराने में सोवियत सेना की कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन वहाँ भी पूर्वी यूरोप के अन्य देशों की भांति मार्शल टीये के नेतृत्व में साम्यवादी शासन की स्थापना की गयी । बाद में यूगोस्लाविया गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में शामिल हो गया ।

मई 1946 में चेकोस्लोवाकिया में निर्वाचन हुये जिसमें साम्यवादियों को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ तथा मिली-जुली सरकार का गठन किया गया । लेकिन 1947 में जब अमेरिका ने मार्शल योजना के अन्तर्गत चेकोस्लोवाकिया को आर्थिक सहायता की पेशकश की तो उसने मना कर दिया तथा स्पष्ट रूप से सोवियत गुट में शामिल होने का संकेत दिया ।

सितम्बर 1947 में प्रमुख उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर सोवियत साम्यवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया । इसी क्रम में जनवरी1947 में अल्बानिया में जो चुनाव हुये उनमें अल्वानिया लोकतांत्रिक मोर्चा नामक साम्यवादी गठबन्धन को विजय प्राप्त हुई । इसी तरह अल्वानिया भी एक साम्यवादी देश बन गया । द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय उसके पूर्वी क्षेत्रों सोवियत संघ का अधिकार था तथा पश्चिमी क्षेत्रों पर अमेरिका तथा पश्चिमी देशों का अधिकार था ।

7 अक्टूबर, 1949 को पूर्वी जर्मनी में सोवियत मॉडल का संविधान लागू किया गया तथा पूर्वी जर्मनी भी एक साम्यवादी देश बन गया । सोवियत संघ सहित पूर्वी यूरोप के उक्त साम्यवादी देशों को ही द्वितीय विश्व के नाम से जाना जाता है । धीरे-धीरे पूर्वी यूरोप के इन देशों में सोवियत मॉडल की राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर दी गयी सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें सोवियत प्रभाव में बनाये रखने के लिये 1955 में वारसा संधि संगठन की स्थापना की गयी इसका नेतृत्व सोवियत संघ के हाथ में रहा है ।

अप्रैल, 1949 में इन देशों द्वारा आर्थिक सहयोग के लिये ‘पारस्परिक आर्थिक सहयोग परिषद’ की स्थापना की गयी । पूर्वी यूरोप के देशों में साम्यवादी नीतियों में समायोजन करने तथा सामान्य नीतियों के क्रियान्वयन के लिये द्वितीय विश्व के देशों द्वारा सितम्बर 1947 में कामिनफार्म- कम्युनिस्ट इनफॉरमेशन ब्यूरो की स्थापना की गयी ।

द्वितीय विश्व युद्ध में जहाँ परम्परागत यूरोपीय शक्तियों का पतन हो रहा था वहीं सोवियत संघ अपने विपुल प्राकृतिक संसाधनों व नियोजित विकास की रणनीति के कारण तेजी से विकास कर रहा था । इस समय सोवियत अर्थव्यवस्था अमेरिका के बाद विश्व की सबसे अधिक विकसित अर्थव्यवस्था थी । सोवियत संघ में विस्तृत संचार प्रणाली का विकास किया गया था ।

उसके पास विपुल ऊर्जा संसाधनों विशेषकर तेल व गैस तथा खनिज पदार्थों का भण्डार है । उसने यातायात साधनों मशीनरी उद्योग तथा उपभोक्ता उद्योगों का तेजी से विकास किया । वहाँ छोटी वस्तु से लेकर बड़ी-से-बड़ी मशीनरी के उत्पादन की क्षमता थी भले ही उसकी गुणवत्ता पश्चिमी देशों की तुलना में कम थी ।

सोवियत व्यवस्था में सभी नागरिकों के लिये जीवन के न्यूनतम साधन सुनिश्चित किये गये थे । सभी आवश्यक नागरिक सुविधाएं राज्य द्वारा रियायती दरों पर उपलब्ध कराई गयी थी । सोवियत राज्य एक कल्याणकारी राज्य था. जहाँ बेरोजगारी की समस्या नहीं थी । सभी भूमि व संपत्ति पर राज्य का अधिकार था ।

उक्त आर्थिक उपलब्धियों तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों के बावजूद राजनीतिक दृष्टि से सोवियत राजनीतिक व्यवस्था एक अत्यंत केन्द्रीकृत व्यवस्था थी । इसमें साम्यवादी पार्टी की राज्य नौकरशाही अत्यधिक अधिनायकवादी हो गयी थी जिसके कारण नागरिकों का जीना दूभर हो गया था ।

विचार अभिव्यक्ति तथा अन्य स्वतंत्रताओं के अभाव में नागरिकों द्वारा अपने असन्तोष की अभिव्यक्ति कार्टूनों आदि के माध्यम से की जाती थी । राजनीतिक व्यवस्था की सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं पर साम्यवादी दल का नियंत्रण था । लेकिन साम्यवादी दल किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं था ।

सोवियत संघ का निर्माण 15 गणराज्यों से मिलकर हुआ था लेकिन साम्यवादी दल इन गणराज्यों की जनता के प्रति संवेदनशील नहीं था । नागरिकों के सांस्कृतिक मामलों पर भी दल का प्रभावी नियंत्रण था । यद्यपि रूस 15 गणराज्यों में से केवल एक गणराज्य था लेकिन अन्य गणराज्यों के मामलों में उसका प्रभुत्व सर्वाधिक था । अन्य गणराज्य अवहेलना तथा घुटन का अनुभव करते थे ।

अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में सोवियत संघ ने दूसरी महाशक्ति अमेरिका की तुलना में लगभग समान सैनिक व शस्त्र क्षमता अर्जित कर ली थी । लेकिन इसके लिये उसे अन्य क्षेत्रों में विकास की भारी कीमत चुकानी पड़ी ।

पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका की तुलना में उसकी तकनीकि क्षमता तथा आधारभूत ढाँचा सुविधाएँ कम थीं । अतः सोवियत व्यवस्था नागरिकों की राजनीतिक व आर्थिक आकांक्षाओं की पूर्ति करने में सफल हो सकी । 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के हस्तक्षेप के उपरान्त सोवियत अर्थव्यवस्था और अधिक कमजोर हो गयी । यद्यपि श्रमिकों का पारिश्रमिक बढ़ता रहा, लेकिन उत्पादकता व तकनीकि का विकास कम होता रहा ।

परिणामत: सभी उपभोक्ता वस्तुओं की कमी आ गयी । खाद्यान्नों व अन्य आवश्यक वस्तुओं का आयात प्रतिवर्ष बढ़ता रहा था अर्थव्यवस्था की स्थिति कमजोर होती रही । 1970 के दशक के तक सोवियत अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी तथा इसमें विकास के स्थान पर जड़ता के लक्षण दिखाई देने लगे । लोकतंत्र के अभाव में आर्थिक विस्फोटक रूप धारण करने लगीं । वैश्वीकरण व उदारीकरण की लहर ने उसमें चिंगारी का काम किया ।


3. सोवियत नेतृत्व (Soviet Leadership):

शीतयुद्ध काल में विश्व के अन्त से लेकर 1991 में अपने विघटन तक सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व अथवा साम्यवादी गुट का नेतृत्व किया । इसकी बागडोर सोवियत संघ के हाथ में थी । अत: सोवियत नेतृत्व किया । इसकी बागडोर सोवियत संघ के हाथ में थी । अत: सोवियत नेतृत्व के स्वरूप तथा उसकी नीतियों की जानकारी आवश्यक है ।

ब्लादिमिर लेनिन, (1870-1924):

सोवियत संघ के शासक साम्यवादी दल ‘बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी’ के संस्थापक, 1917 की रूसी क्रान्ति का सफल नेतृत्व, आधुनिक सोवियत संघ के संस्थापक, मार्क्सवादी विचारधारा के विश्लेषक तथा उसे व्यवहारिक रूप देने में अग्रणी । लेनिन के नेतृत्व में मार्क्स की साम्यवादी विचारधारा को व्यवहारिक रूप देने वाला रूस विश्व में पहला देश बना ।

जोसेफ स्टालिन, (1879-1953):

लेनिन के बाद सोवियत संघ का नेतृत्व सोवियत संघ का आधुनिक राष्ट्र के रूप में पुनर्निर्माण तीव्र औद्योगीकरण तथा कृषि का सामूहिकीकरण, द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ की जीत का नेतृत्व, 1930 के दशक के ग्रेट टैरर के लिये उत्तरवादी, तानाशाही शासन शैली को बढ़ावा तथा साम्यवादी पार्टी के आन्तरिक विरोधियों का सफाया ।

निकिता ख्रुश्चेव, (1894-1971):

स्टालिन के बाद सोवियत संघ का नेतृत्व, स्टालिन की तानाशाही शैली का विरोध किया, 1956 में कतिपय उदारवादी सुधारों का आरंभ, अमेरिका व पश्चिमी पूंजीवादी देशों के साथ ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति का समर्थन, 1956 में हंगरी में लोकतांत्रिक विरोध का दमन, तथा क्यूबा मिसाइल संकट के समय अमेरिका के साथ समझौतावादी रुख का प्रदर्शन ।

लियोनिड ब्रेझनेव, (1906-1982):

1964 से 1982 तक सोवियत संघ के राष्ट्रपति, एशियाई सुरक्षा प्रणाली का प्रस्ताव दिया, तनाव शौथिल्य काल में अमेरिका के साथ कतिपय मामलों में सहयोग 1968 में चेकोस्लोवाकिया में लोकतान्त्रिक विद्रोह का दमन, 1979 में अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप ।

मिखाइल गोर्बाचेव, (1931- अब तक):

सोवियत संघ के 1985 से 1991 तक अन्तिम राष्ट्रपति राजनीतिक व आर्थिक सुधारों की नीतियों-पेरेस्ट्राइका या पुनर्निर्माण तथा गलैसनास्ट अथवा खुलापन को लागू किया, अमेरिका के साथ परमाणु शस्त्रों के परिसीमन पर समझौते, 1989 में अफगानिस्तान से तथा यूरोप से सोवियत सेनाओं की वापिसी, जर्मनी के एकीकरण में सहयोग, शीत युद्ध की समाप्ति में योगदान, सोवियत संघ के विघटन के लिये उत्तरदायी ।

मिखाइल गोर्बाचेव तथा सोवियत रूस का विघटन:

सोवियत संघ के विघटन के तत्व जैसे अत्यधिक केन्द्रीकृत एकदलीय व्यवस्था, कमजोर अर्थव्यवस्था गणराज्यों में असन्तोष आदि पहले से ही विद्यमान थे लेकिन सोवियत रूस का विघटन गोर्बाचेव के कार्यकाल में तेजी से हुआ । इसके विघटन के तात्कालिक कारण भी गोर्बाचेव की आर्थिक व राजनीतिक सुधार नीतियों में निहित थे ।

गोर्बाचेव 1985 में सोवियत संघ की साम्यवादी पार्टी के महासचिव बने तथा 1988 में वहाँ के राष्ट्रपति बने । वैश्वीकरण तथा उदारीकरण की वैश्विक परिस्थितियों के आलोक में सोवियत संघ का विकास करने तथा उसे वैश्विक व्यवस्था से जोड़ने के लिये सुधारों की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी ।

गोर्बाचेव ने वैदेशिक व आन्तरिक दोनों क्षेत्रों में सुधार का कार्यक्रम लागू किया । इन सुधारों का प्रबन्धन प्रभावी ढंग से नहीं हो सका जिसका अवांछित परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी । बाह्य नीतियों की दृष्टि से उन्होंने अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ संबन्धों को सुधारने की नीति अपनायी ।

अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ गोर्बाचेव की नियमित शिखर बैठकों का आयोजन हुआ तथा वैश्विक स्तर पर दोनों देशों में सहयोग की नई लहर आरंभ हुई । दोनों ने 1987 में मध्यम श्रेणी के आणविक शस्त्रों को कम करने के लिये आई एन एफ सन्धि पर हस्ताक्षर किये ।

इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी दोनों ने सहयोग को आगे बढ़ाया जिससे शीत युद्ध के समय से चली आ रही कई समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ । यह दोनों महाशक्तियों के मध्य तनाव शैथिल्य का चरम बिन्दु था ।

इस बदली नीति का एक परिणाम यह हुआ कि साम्यवादी गुट के पूर्वी यूरोपीय देशों ने जहाँ एक ओर सोवियत नियंत्रण का विरोध किया वहीं इन देशों की जनता ने अपनी साम्यवादी सरकारों के विरुद्ध लोकतांत्रिक सुधारों हेतु माँग व प्रदर्शन किये ।

पूर्वी यूरोप की जनता का जीवन स्तर पश्चिम की तुलना में निम्न स्तर का था जिसका कारण उनकी नियंत्रित अर्थव्यवस्था तथा अधिनायकवादी शासन को माना गया । इस कारण पूर्वी यूरोप के देशों में लोकतांत्रिक व उदारवादी सुधारों की लहर सी आ गयी । 1989 में जर्मनी की बर्लिन दीवार का टूटना तथा 1990 में दोनों जर्मनी का एकीकरण इस दिशा में महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं । गोर्बाचेव ने पूर्वी यूरोप के इस घटनाक्रम में कोई हस्तक्षेप नहीं किया तथा एक के बाद एक साम्यवादी व्यवस्थाओं का पतन हो गया ।

आंतरिक सुधारों के लिए गोर्बाचेव ने पेरेस्ट्रॉइका की नीतियों को लागू किया । पेरेस्ट्रॉइका का शाब्दिक अर्थ है- पुनर्निर्माण, जो मुख्यत: राज्य नियंत्रित अर्थव्यस्था में उदारवादी सुधारों से संबन्धित है । इसके अन्तर्गत औद्योगिक व प्रशासनिक क्षेत्र में प्रतियोगिता को प्रोत्साहन दिया गया तथा अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण को कम करने की बात कही गयी ।

ग्लैसनॉस्ट का शाब्दिक अर्थ है- खुलापन जो राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक सुधारों से संबन्धित है । समाचार पत्रों से सेंसर समाप्त किया गया तथा जनता को नागरिक अधिकार देने की बात कही गयी । ये सुधार आन्तरिक विवाद व विरोध का कारण बन गये ।

जहाँ एक ओर सोवियत संघ की जनता अधिक लोकतांत्रिक नगरों की माँग कर रही थी वही साम्यवादी पार्टी का एक प्रभावशाली समूह इन सुधारों का विरोध कर रहा था । साम्यवादी पार्टी के इस कट्टरवादी समूह द्वारा 19 अगस्त, 1991 को गोर्बाचेव के विरुद्ध उन्हें अपदस्थ करने के लिये एक विद्रोह हुआ । यह विद्रोह असफल रहा तथा बोरिस येल्तसिन ने इसका नेतृत्व किया ।

परिणामत: जनता में येल्तसिन की लोकप्रियता बढ़ गयी क्योंकि सोवियत संघ की जनता भी परम्परागत साम्यवादी शासन से छुटकारा पाना चाहती थी । 1988 व 1990 के बीच सोवियत संघ के 15 गणराज्यों में से तीन बाल्टिक गणराज्य- एस्टोनिया, लाटविया तथा लिथुआनिया-अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर चुके थे ।

रूसी गणराज्य के चुनावों में बोरिस येल्तसिन को सफलता मिली । दिसम्बर 1991 में येल्तसिन तथा गोर्बाचेव के बीच हुये एक समझौते के द्वारा सोवियत संघ के सभी केन्द्रीय संस्थानों को समाप्त करने का निर्णय लिया गया । गोर्बाचेव ने पार्टी के महासचिव पद से त्यागपत्र दे दिया पार्टी की केन्द्रीय समिति को का कर दिया ।

गोर्बाचेव ने 25 दिसम्बर, 1991 को राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया तथा 26 दिसम्बर 1991 को औपचारिक रूप से सोवियत संघ के विघटन की घोषणा कर दी गयी । सबसे पहले रूस, यूक्रेन तथा बेलारूस ने विघटन की घोषणा की बाद में सोवियत संघ के सभी गणराज्य स्वतंत्र हो गये । लोकतंत्र तथा पूँजीवाद नये गणराज्यों के गठन का आधार बने । इन 12 गणराज्यों ने ‘स्वतंत्र राज्यों के कॉमनवेल्थ’ की स्थापना की ।

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य घोषित किया गया तथा उसे सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता मिल गयी । रूस ने सोवियत संघ के सभी अन्तर्राष्ट्रीय उत्तराधिकार तथा दायित्व स्वीकार कर लिये । इसके साथ ही रूस को पूर्व सोवियत संघ के सभी आणविक हथियार भी उत्तराधिकार में प्राप्त हुये ।


4. रूस में शॉक थेरेपी अथवा झटका- चिकित्सा (Shock Therapy in Russia):

शॉक थेरेपी शब्दावली चिकित्सा विज्ञान की एक पद्धति का नाम है । जिसके अंतर्गत मानसिक रोगियों को स्वस्थ करने के लिए बिजली के करंट के झटके दिये जाते हैं लेकिन सामाजिक क्षेत्र में इस शब्द का प्रयोग अचानक या तीव्र बदलाव के लिए किया जाता है । रूस के सम्बन्ध में शॉक थेरेपी का तात्पर्य है कि आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अप्रत्याशित और अचानक परिवर्तन किये जाना ।

उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ में अर्थव्यवस्था पूरी तरह सरकार के नियन्त्रण में थी तथा निजी सम्पत्ति के अधिकार का अभाव था । इसके स्थान पर सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में निजी सम्पत्ति के अधिकार को मान्यता दी गयी तथा अर्थव्यवस्था से सरकारी नियन्त्रण हटाकर उन्हें निजी नियन्त्रण में लाया गया यह एक आमूलचूल परिवर्तन था तथा एक कठिन कार्य था ।

बोरिस येल्तसिन के कार्यकाल में जब अर्थव्यवस्था का निजीकरण किया गया तो नौकरशाहों व राजनेताओं ने सरकारी क्षेत्र के उद्योगों व कारखानों को खरीदने का काम किया, लेकिन फिर भी कुशल प्रबन्धन के अभाव में इन उद्योगों का प्रबन्धन उचित तरीके में नहीं हो सका और 1990 के दशक में रूस में मुद्रा स्फीति की दर बहुत अधिक बढ़ गयी तथा 2000 तक रूस के ऊपर विदेशी कर्ज बढ्‌कर 160 अरब डॉलर हो गया । इस बदलाव का परिणाम यह हुआ कि उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों, मजदूरों तथा डॉक्टरों को समय से वेतन नहीं प्राप्त हुआ तथा इन वर्गों ने प्रदर्शन का मार्ग अपनाया ।

इसी तरह राजनीतिक व्यवस्था में सोवियत संघ में साम्यवादी पार्टी के अतिरिक्त किसी अन्य दल को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार नहीं था । इसके स्थान पर बहुदलीय प्रणाली वाले लोकतंत्र की स्थापना करना एक चुनौती भरा कार्य था । 1993 में येल्तसिन ने रूस में आपातकाल की घोषणा कर दी तथा रूस की संसद को भंग करने की चेतावनी दी ।

अगले वर्ष 1994 में चेचन्या क्षेत्र में विद्रोह की आग निकल पडी । चेचेन्या के निवामी रूस से अलग होकर स्वतंत्र देश बनाये जाने की माँग कर रहे थे । 1995 में रूस की संसद के चुनाव हुए । 450 सीटों के चुनाव के लिए 43 राजनीतिक दलो ने चुनाव में भाग लिया । किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला । साम्यवादी पार्टी को सर्वाधिक 157 सीटें मिलीं ।

एक दलीय प्रभुत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था के स्थान पर बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना किसी शॉक थेरेपी से कम नहीं थी । 31 दिसम्बर, 1999 को बोरिस येल्तसिन ने राष्ट्रपति के पद से त्याग-पत्र दे दिया । तत्कालीन प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन को रूस का कार्यभार राष्ट्रपति नियुक्त किया गया ।

जब मार्च 2000 में रूस में आम चुनाव सम्पन्न हुए तो पुतिन विधिवत् राष्ट्रपति चुने गये । इसी के साथ ही रूस की राजनीतिक प्रक्रिया में साम्यवादी दल का प्रभाव कम होने लगा ।

इन चुनावों में साम्यवादी दल को केवल 30 प्रतिशत वोट मिले, जबकि पुतिन को 57 प्रतिशत वोट मिले । इससे रूस में साम्यवादियों के वापस आने की सम्भावना नगण्य हो गयी ।

पुतिन ने अपने कार्यकाल में जहाँ एक ओर चेचेन्या के मुस्लिम विद्रोहियों से निपटने का काम किया तथा विद्रोह को दबाने में सफल रहे वहीं दूसरी ओर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयाम किया वर्तमान में भी पुतिन ही रूस के राष्ट्रपति हैं । 2000 के दशक में तेल और गैस की अन्तर्राष्ट्रीय कीमतें बढ़ने के कारण भी रूस की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई तथा उद्योग धन्धों को भी सुधारका उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिली ।

आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के अलावा शॉक थेरेपी का तीसरा प्रभाव सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में दिखाई दिया विश्व में सोवियत संघ पहला देश था जहाँ नागरिकों को काम का अधिकार प्राप्त था । इसके साथ ही उन्हें निःशुल्क सामाजिक सुरक्षा की सुविधा उपलब्ध थी । जनता को बुढ़ापे व बीमारी की स्थिति में मुफ्त सरकारी सहायता पाने का अधिकार था ।

जब सोवियत संघ में बदलाव की लहर आयी तो सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गयी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ निष्प्रभावी हो गयीं तथा गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई । आर्थिक निजीकरण की नीतियों के चलते बाद में रूस भी गरीबों और अमीरों के बीच बंट गया ।

नये रूस में मध्यम वर्ग का अभाव था, जो समाज में संतुलन स्थापित कर सकता था इस प्रकार । शॉक थेरेपी के अंतर्गत निजी अर्थव्यवस्था की स्थापना बहुदलीय लोकतंत्र की शुरुआत तथा सामाजिक सुरक्षा का विघटन आदि तीन तत्व प्रमुख रूप से शामिल हैं ।


5. बाल्कन राज्य (Balkan State):

बाल्कन राज्यों में 9 देश शामिल हैं, जो बाल्कन प्रायद्वीप में स्थित हैं । ये 9 राज्य हैं- अल्वानिया, बुल्गारिया, ग्रीस, बोस्निया-हर्जेगोवीना, क्रोसिया, मैसेडोनिया, मान्टेनीग्रो, स्लोवानिया तथा सर्बिया । इनमें से सर्बिया, स्लोवानिया, मान्टेनीग्रो, मैसेडोनिया, क्रोसिया तथा बोस्निया-हर्जेगोवीना पूर्व यूगोस्लाविया के विघटन के बाद अस्तित्व में आये हैं । बाल्कन प्रायद्वीप दक्षिणी पूर्वी यूरोप का हिस्सा है ।

बाल्कन प्रायद्वीप का नाम बाल्कन पहाड़ियों के नाम पर है । ये पहाड़ियाँ बुल्गारिया के पूर्व से लेकर सर्बिया के पूर्व तक फैली हुई हैं । बाल्कन राज्यों का कुल क्षेत्रफल 257,400 वर्ग किलोमीटर है, जबकि इनकी जनसंख्या 5,92,57,000 है ।

बाल्कन क्षेत्र में मुख्य रूप से जैविक प्रजाति के लोग निवास करते हैं, जिनमें बुल्गारियन, मैसेडोनियन, सर्व, बोस्निय, क्रोसियन आदि प्रजातियाँ शामिल हैं । इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में ग्रीक, तुर्क तथा अल्बानी प्रजाति के लोग भी निवास करते हैं ।

शीत युद्ध समाप्ति के उपरान्त यूगोस्लाविया के विघटन के बाद बाल्कन क्षेप प्रजातीय संघर्ष तथा राजनीतिक उथल-पुथल का क्षेत्र रहा है । इन राज्यों में ग्रीस अथवा यूनान पश्चिमी गुट का हिस्सा रहा है तथा बुल्गारिया व अल्वानिया साम्यवादी गुट के सदस्य रहे हैं । शेष राष्ट्र पूर्व यूगोस्लाविया के अंग रहे हैं । यूगोस्लाविया गुट निरपेक्ष आन्दोलन का सदस्य रहा है । यूगोस्लाविया के विघटन के उपरान्त अधिकांश नये राज्य यूरोपीय संघ के सदस्य बन रहे हैं ।


6. पूर्व साम्यवादी देशों व रूस के साथ भारत के सम्बन्ध (India’s Relations with East Communist Countries and Russia):

शीत युद्ध के समय सोवियत संघ भारत का भरोसेमंद मित्र रहा है । 1971 में दोनों देशों ने शान्ति व मित्रता की सन्धि पर हस्ताक्षर किये थे । यद्यपि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति का समर्थक रहा है लेकिन इस सन्धि के उपरान्त भारत पर सोवियत संघ की ओर झुकने का आरोप लगाया गया । इस काल में भारत को रक्षा उपकरणों की आपूर्ति में सोवियत संघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

पूर्वी यूरोप के अन्य साम्यवाद देशों के साथ भी भारत के सबन्ध इसी फ्रेमवर्क के आधार पर संचालित होते थे । लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस सहित अन्य साम्यवादी देशों के साथ भारत के संबन्धों में शिथिलता देखने में आयी । इसका प्रमुख कारण यह था कि विघटन के बाद जहाँ रूस अपनी आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं से ग्रस्त था वहीं 1990 के दशक में भारत भी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था ।

भारत 1991 में ही मिश्रित अर्थव्यवस्था का मार्ग छोड़कर निजकरण उदारीकरण की नीतियाँ अपनाईं तथा विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने के प्रयास आरंभ किये । शीत युद्ध की समाप्ति के बाद । 1991 में दोनों देशों ने अपनी विदेश नीतियों में व्यवहारिक परिवर्तन संकेत दिये ।

जहाँ भारत ने अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबन्ध सुधारने का प्रयास किया वहीं रूस को भी पश्चिम गुट ने आर्थिक व सैनिक दृष्टि से समायोजित करने का प्रयास किया । इसका परिणाम यह हुआ कि 1990 के दशक में भारत-रूस संबन्ध सामान्य स्थिति में ही रहे ।

लेकिन 2000 के बाद पुतिन के नेतृत्व में रूस में आर्थिक व राजनीतिक स्थिरता का दौर आरम्भ हुआ । रूस तेल, गैस व अन्य प्राकृतिक संसाधनों से युक्त देश है तथा 2000 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत हुई ।

इसी के साथ भारत व रूस के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता का नया आरंभ हुआ । दोनों के मध्य सैनिक, आर्थिक, विज्ञान व तकनिकी सांस्कृतिक व वैश्विक मामलों में सम्बन्धों की प्रगाढ़ता का नया युग आरंभ हुआ । रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान अक्तूबर 2000 में दोनों ने भारत-रूस सामरिक साझेदारी की घोषणा पर हस्ताक्षर किये ।

इस साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिये यह तय किया गया कि दोनों देशों के शीर्ष नेता प्रतिवर्ष नियमित आधार पर यात्राओं का आदान-प्रदान करेंगे तथा शिखर वार्ताओं का आयोजन करेंगे । तब से लेकर अब तक दोनों देशों के राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री नियमित रूप से एक-दूसरे के यहाँ की यात्राएँ करते आ रहे हैं । इसी क्रम में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने सितम्बर 2012 में भारत की यात्रा की थी । इन शीर्ष वार्ताओं का लाभ यह हुआ कि दोनों के सामरिक सम्बन्धों को आगे बढ़ाने में मदद मिली है ।

आर्थिक क्षेत्र में दोनों के व्यापार में भी बढ़ोत्तरी हुई है । दोनों के बीच 2010 में द्विपक्षीय व्यापार 8.5 बिलियन डॉलर था जिसे 2015 तक 20 बिलियन डॉलर बढ़ाने का निर्णय लिया गया । सैनिक क्षेत्र में अन्य उपकरणों के साथ-साथ रूस भारत को विक्रमादित्य नामक विमान वाहक पोत देने के लिए तैयार है । यह पोत नवम्बर 2013 में भारत को प्राप्त हो गया है ।

2010 में दोनों देशों ने पाँचवीं पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमानों के भारत में संयुक्त उत्पादन हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किए । इसी के साथ 2008 में भारत ने अपने अन्तरिक्ष कार्यक्रम चन्द्रयान को रूस के सहयोग से लागू किया है । रूस भारत को आणविक ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग कर रहा है ।

तमिलनाडु के कुडनकुलम स्थान पर रूस के सहयोग से एक बड़ा परमाणु संयन्त्र लगाया जा रहा है । दोनों देशों ने 2009 में आणविक क्षेत्रों में सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं । इसके साथ ही रूस-भारत के लिए तेल और गैस की आपूर्ति का एक भरोसेमंद स्रोत है । भारत की तेल शोध संस्था ओ. एन. जी. सी. एक समझौते के अंतर्गत रूस में तेल शोधन का कार्य कर रही है ।

जहाँ तक वैश्विक मामलों का सम्बन्ध है, रूस ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है । दोनों ही देश कई अन्तर्राष्ट्रीय मैचों जैसे- जी-20, ब्रिक्स, पूर्व एशिया सम्मेलन आदि के सदस्य हैं । ब्रिक्स विश्व की उभरती हुई पाँच अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है ।

जो कि एक बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की स्थापना हेतु प्रयासरत् है । जिसमें अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों का प्रभाव कम होगा । भारत शंघाई सहयोग संगठन में एक वार्ताकार साझीदार देश है । यह संगठन सेन्ट्रल एशिया में आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने का पक्षधर है । रूस इसका संस्थापक सदस्य है ।

निष्कर्षत: विभिन्न क्षेत्रों में वर्तमान में दोनों के मध्य घनिष्ठ सहयोग की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है । इसी तरह भारत अन्य पूर्व साम्यवादी देशों जैसे- पोलैण्ड, हंगरी, बुल्गारिया, कजाकिस्तान, यूक्रेन आदि के साथ विभिन्न क्षेत्रों में अपने सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहा है ।