Read this article in Hindi to learn about how to control pests of oilseed crops.

(1) संपुट बेधक कीट (Capsule Borer):

इस कीट का वैज्ञानिक नाम एन्टीगैस्ट्रा कैटेलानेलिस है । यह लेपिडोप्टेरा गण के पाइरेलिडिडी कुल का कीट है ।

पहचान:

इस कीट का शलभ मध्यम आकार का होता है । अगले पंख लाल-पीले रंग के होते हैं तथा उन पर लाल रंग के टेढ़े मेढ़े निशान होते हैं । यह पंख फैलाकर 16 मि.मी. लम्बा होता है ।

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क्षति:

इस कीट की लारवा कोमल तने एवं पत्तियों को खाती है । बाद में नई फली में छेद भी कर देती है एवं अपरिपक्व बीजों को खाती है । लार्वा कोमल पत्तियों को रेशमी तंतु से मोड देती है तथा उनके अन्दर रहकर पत्तियों को खाती हैं । इस कीट का प्रकोप जुलाई से अकबर तक रहता है ।

जीवन-चक्र:

मादा कीट लगभग 150 अण्डे देती है जो कि अलग-अलग पौधे के कोमल भागों में दिए जाते हैं । अण्डे चमकीले हरे रंग के होते हैं । अण्डकाल 2 से 5 दिनों का होता है । लार्वा पहले पत्तियों की बाहत्वचा को खाता है तथा बाद में यह कई पत्तियों को बाँधकर उनको खाता है । लार्वा अवस्था 15-20 दिनों की होती है ।

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लार्वा 5 बार निर्मोचन करता है । पूर्ण विकसित लार्वा भूमि में जाकर रेशमी ककून बनाकर प्यूपा में बदल जाता है । प्यूपाकाल 4 से 20 दिनों का होता है । ग्रीष्म ऋतु में एक पीढ़ी लगभग 23 दिनों में तथा सर्दियों में 10 सप्ताह में पूरी होती है । एक वर्ष में इस कीट की लगभग 14 पीढ़ियाँ पायी जाती हैं ।

समन्वित प्रबन्धन उपाय:

I. ग्रसित पत्तियों, तनों व फलियों को तोड़कर नष्ट करें ।

II. तिल की वी.एस. 350, टी.के.सी. 21 किस्में इस कीट के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं अतः इन्हें बुवाई के काम में लेना चाहिये ।

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III. मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 1.0 लीटर या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें । आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिनों बाद इसे पुन: दोहरायें ।

(2) तिल का हॉक माथ (Hawk Moth):

इस कीट का वैज्ञानिक नाम ऐकेरॉकिया स्टिक्स है । यह लेपिडोप्टेरा गण के स्फिन्जिडी कुल का कीट है ।

पहचान:

इस कीट का वयस्क शलभ बड़ा सुगठित शरीर वाला होता है, इसका पंख विस्तार लगभग 10-12 से.मी. तक होता है । इसका रंग लाली लिये हुए भूरा होता है । प्रत्येक पंख पर एक पीले रंग का धब्बा दिखाई देता है । शलभ कम उड़ने वाला होता है ।

क्षति:

इस कीट की लार्वी पत्तियों को खाती है तथा कभी-कभी पूरी की पूरी पत्तियों को खा जाती है । भारतवर्ष में यह कीट तिल की फसल को भारी नुकसान पहुँचाता है ।

जीवन चक्र:

वयस्क मादा शलभ पत्तियों की निचली सतह पर अलग-अलग अण्डे देती है जोकि गोलाकार, काफी-बड़े व सफेद-हरे रंग के होते हैं ये बाद में पीले रंग में बदल जाते हैं । अण्डे का ऊष्मायन काल 2-5 दिनों का होता है । लार्वा को पूर्ण विकसित होने में 2 माह का समय लगता है । प्यूपा काल 2-3 सप्ताह का होता है । इस कीट की एक वर्ष में 3 पीढ़ियाँ पायी जाती हैं ।

समन्वित प्रबन्धन उपाय:

I. ग्रसित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिये ।

II. क्षतिग्रस्त फसल पर एण्डोसल्फान 35 ई.सी. का 1.25 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिये ।

(3) गाल मिज (Gall Midge):

इस कीट का वैज्ञानिक नाम डैसीन्यूरा लाइनाई है । यह डिप्टेरा गण के सेसिडोमाइडी कुल का कीट है ।

पहचान:

इस कीट की प्रौढ़ मक्खी आकार में छोटी होती है । यह मक्खी नारंगी रंग की होती है ।

क्षति:

इस कीट की हानिकारक अवस्था मैगेट है जो कि कलियों एवं फूलों को खाती है । इस प्रकार क्षतिग्रस्त कलियों तथा फूलों में दानें नहीं आते हैं । इस कीट के द्वारा फसल में 20 प्रतिशत तक हानि होती है ।

जीवन-चक्र:

मादा मक्खी 60-100 अण्डे फूलों की हरी पत्तियों के बाह्य दलपुँज की तहों में देती है । अण्डे से 2-5 दिन में मैगट निकलते हैं । मैगट कलियों को भीतर ही भीतर खाते रहते हैं और उनके अन्दर का सम्पूर्ण भाग खा जाते हैं । मैगट 3 निर्मोचनों से गुजरता है ।

पूर्ण विकसित मैगट गहरा गुलाबी होता है । पूर्ण विकसित मैगट भूमि में जाकर कोकून बनाकर प्यूपावस्था में परिवर्तित हो जाता है । प्यूपाकाल 4 से 10 दिनों का होता है । इस कीट की वर्ष में कई पीढ़ियाँ पायी जाती हैं ।

समन्वित प्रबन्धन-उपाय:

I. खेतों में प्रकाश प्रपंच लगाने चाहिये जिससे वयस्क मक्खियों को आकर्षित कर नष्ट किया जा सके ।

II. अलसी की प्रतिरोधी किस्में, जैसे- आर-552, आर-958, आर-156, एल.सी.-103, जवाहर-1, एवं नीला को बुवाई में काम लेना चाहिये ।

III. एण्डोसल्फॉन 4 प्रतिशत चूर्ण 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिये ।

(4) सेमीलूपर (Semilooper):

इस कीट का वैज्ञानिक नाम ऐकिया जेनेटा है । यह लेपिडोप्टेरा गण के नोक्टुइडी कुल का कीट है ।

पहचान:

वयस्क शलभ हल्के लाल भूरे रंग का होता है जिसका पंख विस्तार 60-70 मि.मी. होता है । अग्र व पश्च दोनों पंखों पर टेडी-मेढ़ी हल्की और गहरी रेखायें पायी जाती हैं ।

क्षति:

इस कीट की लार्वा अवस्था हानिकारक होती है जो अरंडी की पत्तियों को खाती है । ये एक सिरे से पत्ती खाना प्रारम्भ करके पूरी पत्ती को खा जाती है । प्रथम निमौक रूप की लार्वी केवल पत्ती को किनारे से खाती है । दूसरे निर्मोकरूप की लार्वी पत्तियों पर छोटे-छोटे छेदकर खाती है ।

तीसरे निर्मोकरूप की लार्वी पूरी पत्ती को चट कर जाती है । इस कीट का वयस्क शलभ फलों का रस चूसता है । कभी-कभी इस कीट द्वारा अरंडी को इतनी हानि पहुँचायी जाती है कि पत्तियों तथा फलों को खाने के उपरान्त ये कीट तनों को भी खाने लगता है ।

जीवन-चक्र:

मादा कीट कोमल पत्तियों पर बिखरे हुए अण्डे देती है । एक मादा लगभग 450 तक अण्डे देती है । इनका रंग गहरा नीला होता है । इनका ऊष्मायन काल 2-5 दिनों का होता है । अण्डे से निकली लार्वी 4 बार भूरे रंग की होती है एवं इसके शरीर पर सफेद हल्की धारियाँ पायी जाती हैं ।

लारवा काल 15 से 20 दिनों का होता है । पूर्ण विकसित लार्वी भूमि में जाकर प्यूपा में बदल जाती है । प्यूपा काल 8-12 दिनों का होता है । एक वर्ष में इस कीट की 5-6 पीढ़ियाँ पायी जाती हैं ।

समन्वित प्रबन्धन उपाय:

1. प्रकाश प्रपंच को खेतों में लगाकर वयस्क कीटों को आकर्षित करके नष्ट करना चाहिये ।

2. कीटग्रस्त फसल पर एण्डीसल्फॉन 35 ई.सी. 1.5 लीटर का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।

3. अण्ड परजीवी ट्राइकोग्रामा का प्रयोग करके इसकी संख्या को कम किया जा सकता है ।

(5) प्ररोह तथा सम्पुट बेधक (Stem and Capsule Borer):

इस कीट का वैज्ञानिक नाम डाइक्रोइसिया पंक्टीफिरेलिस है । यह लेपिडोप्टेरा गण के पाइरेलिडी कुल का कीट है ।

पहचान:

वयस्क शलभ आकार में छोटे, चमकीले पीले रंग के होते है इसके पंखों पर छोटे-छोटे काले धब्बे पाये जाते हैं ।

क्षति:

इस कीट की लार्वी पहले प्ररोह को बेधती है एवं बाद में बीज संपुट को बेध कर उसमें स्थित बीजों को भी खाती है । इसके द्वारा 16.6 प्रतिशत तक फल-फूल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं । इस कीट की हानियों का पता इसलिए लगाया जा सकता है कि प्ररोह के आधार पर एक गुच्छे में गुँथा पदार्थ पाया जाता है । इस तरह फसल की उपज में आधी कमी आ जाती है ।

जीवन-चक्र:

वयस्क मादा कीट पौधे की पत्तियों पर अण्डे देती है । ये अण्डे एक सप्ताह में पूर्ण विकसित हो जाते हैं एवं इससे लार्वा निकल आते हैं । ये नरम प्ररोह में छेद करना प्रारम्भ कर देते है और उन्हें खाते हैं । लार्वा 4-5 बार निर्मोचन करता है एवं पूर्ण विकसित होता है । पूर्ण विकसित लार्वा लाल रंग का होता है एवं इसके शरीर पर बाल होते है ।

पूर्ण विकसित लार्वा प्ररोह व संपुट के अन्दर ही प्यूपा में परिवर्तित हो जाता है । प्यूपाकाल लगभग 7 दिनों का होता है । इस कीट के एक जीवन-चक्र को पूर्ण होने में 28-35 दिनों का समय लगता है । एक वर्ष में इसकी 3 पीढ़ियाँ पायी जाती हैं ।

समन्वित प्रबन्धन उपाय:

1. प्रभावित पौधों के भागों को काटकर जला देना चाहिये ।

2. गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये ।

3. प्रभावित पौधों पर एण्डोसल्फॉन 35 ई.सी. 1.5 लीटर या मोनोकोटीफॉस 36 एस.एल. 1.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिये ।