Read this article in Hindi to learn about the six major challenges of trade policy reforms in India. The challenges are:- 1. विश्व व्यापार में मुख्य खिलाड़ी बनने की चुनौती (Challenge of becoming a Major Player in World Trade) 2. भारत के निर्यातों की वास्तविक विविधता की चुनौती (Challenges of Real Diversification of India’s Exports) and a Few Others.

मध्यम और दीर्घ काल में भारत के व्यापार क्षेत्र के लिए कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों को निम्न में दिया गया है:

1. विश्व व्यापार में मुख्य खिलाड़ी बनने की चुनौती (Challenge of Becoming a Major Player in World Trade):

भारत के लिए चुनौती विश्व व्यापार में इसके हिस्से को इसके आकार के साथ प्राप्त करना है । 2002-03 से 2007-08 तक निरन्तर 20% की वृद्धि इसके निर्यात विकास में हुई है, भारत ने विश्व व्यापार में हिस्से के सम्बन्ध में ज्यादा प्रगति को प्राप्त नहीं किया है जबकि भारत का निर्यात 1954 तक चीन से ज्यादा था, परन्तु इसके बाद यह पिछड़ने लगा ।

1990 में, चीन और भारत का विश्व निर्यात में हिस्सा 1.8% और 0.5% क्रमवार था और 2009 में, उनका हिस्सा 9.7% और 1.3% है । यदि भारत विश्व के निर्यातों में चीन के कम-से-कम आधे हिस्से को प्राप्त कर लेता है, तो इसका रोजगार और निर्माण सुविधा, कर पर प्रभाव अत्यधिक होगा ।

जबकि व्यापार नीति माप, कुछ बाजारों और कुछ उत्पादों, व्यापार सुविधा, कर सुधारों आदि की ओर मुड़ा है । यह कुछ उपायों को करने में सहायक होगा, यदि भारत को विश्व निर्यात में पर्याप्त हिस्सा प्राप्त हो, इसके लिए बड़े धक्के की जरूरत होगी ।

2. भारत के निर्यातों की वास्तविक विविधता की चुनौती (Challenges of Real Diversification of India’s Exports):

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यद्यपि भारत पिछले कुछ सालों से इसके निर्यात में विविध हुआ है, विश्व मांग के साथ पर्याप्त विविधता ने स्थान नहीं लिया है । इसे छ: अंकों को US स्तर पर विश्व के शीर्ष 100 आयातों के साथ भारत के निर्यात मिलान को देखा जा सकता है ।

PCTAS डेटा 2010 पर आधारित प्रणाली दिखाती है कि विश्व मांग की इन शीर्ष वस्तुओं में भारत की उपस्थिति नगण्य है सिवाय कुछ वस्तुओं को छोड़कर जैसे हीरा और आभूषण, तेल, टी-शर्ट, आदमी, लड़कों के ट्राऊकर, कोने, लोहे के उत्पाद । विश्व के शीर्ष 100 आयातों में कई इलैक्ट्रानिक, इलैक्ट्रिकल और इंजीनियरिंग वस्तुएं हैं जहां भारत की उपस्थिति नगण्य है ।

3. बढ़ती निर्यात प्रतियोगिता की चुनौती (Challenge of Increasing Export Competitiveness):

भारत की निर्यात प्रतियोगिता न केवल चीन और दक्षिणी पूर्वी एशियन देशों से चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है बल्कि यह नये बढ़ते एशियन देशों, कम विकसित देशों जैसे बांग्लादेश और छोटे देशों जैसे वियतनाम में भी वस्तुओं जैसे कपड़ों में है । सूक्ष्म स्तर पर, निर्यात प्रतियोगिता के दो प्रमुख निर्धारकों की विनिमय दर और मुद्रास्फीति वास्तविक प्रभावी विनिमय दर में प्रभावित होती है ।

RBI के अनुसार, छ: मुद्रा की गतिशीलता और 36-मुद्रा REER के बीच विभिन्न विचलन 2010-11 में हो चुका है । जबकि छ: मुद्रा REER 16 से 20% के मुख्य स्तर के आगे हैं जिनकी इन अर्थव्यवस्थाओं के साथ उच्च मुद्रा स्फीति भिन्नता है, 36 मुद्रा REER प्रमुख स्तर के आस-पास या नीचे है ।

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भारत में मुद्रास्फीति विकासशील संसार में इसके व्यापारिक साझेदारों में मौजूदा स्तरों से नीचे या से तुलनीय है । इन देशों की मुद्राओं की नगण्य विनिमय दर एप्रीसिएशन/मूल्य हाव का परिमाण विभिन्न है जो 36 मुद्रा सूचक से 6 मुद्रा सूचक के समावेश के बाद के लिए 30 मुद्रा REER में प्रभावित है ।

निर्यातों में लेन-देन की लागत पर कार्य बल की हाल ही की वाणिज्य विभाग की रिपोर्ट इस मुद्दे को उजागर करती है । वर्ल्ड बैंक के शब्दों में, ‘Doing Business’ रिपोर्ट कहती है कि यह भारत से निर्यात कंटेनर के लिए 17 दिन लेता है, जो मलेशिया और चीन में US$450 और US$500 की तुलना में US$945 प्रति कंटेनर लागत है ।

डेनमार्क, ब्राजील, मैक्सिको और चीन 5 दिन, 12 दिन, 14 दिन और 21 दिन इन देशों से कंटेनरों को निर्यात के लिए लेते हैं । रिपोर्ट का अनुमान लेन-देन लागत के परिमाण पर लगभग US $ 13 बिलियन है । यह कार्यवाही के लिए 44 मुद्दों की पहचान करती है जिसमें 21 मुद्दों को लागू किया जा चुका है और मुद्दे जो लागूकरण की प्रक्रिया के अधीन है ।

21 मुद्दों और अन्य 2 मुद्दों का लागूकरण रु. 2100 करोड़ की लेन-देन की लागत को कम करता है । आगे लेन-देन की लागत को कम करने का प्रयास भारत के निर्यात प्रतियोगिता को बढ़ाता है ।

4. शुल्क सुधार से संबंधित चुनौतियां (Challenges Related to Tariff Reforms):

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भारत प्रगतिवान रूप में शीर्ष सीमा शुल्क को कम करता है । शीर्ष कर में गिरावट का संबंध आय एकत्रित करने में पतन की आशंका जताने से नहीं था । वित्तीय वर्ष 2009-10 में केवल 41.7% नोशनल कर को 2008-09 और 2007-08 में 44.6% और 51.5% के मुकाबले इकट्‌ठा किया गया । विभिन्न निर्यात प्रचार स्कीमों के कारण पर्याप्त आय पहले से है ।

2010-11 में, आय पहले से ज्यादा जारी होगी । विदेशी व्यापार नीति 2009-14 (FPS/FMS/VKGUY) के तहत स्कीमों के क्षेत्र के विस्तार के कारण 50,000 करोड़ और Duty Entitlement Passbook में निर्यात प्रचार दरों में सुधार को निर्यातों के साथ जोड़ा गया । अन्तिम उपयोगकर्ता छूटो से आय नुकसान भी आयातों के साथ जाएगा । इसमें विभिन्न स्कीमों की दशा में जवाबदेही का प्रश्न भी है जिसमें पर्याप्त छूटे शामिल होती हैं । कुछ छूटों की जरूरत विशेष तौर पर निर्यात को बढ़ावा देने के समय पर होती है ।

इसमें इन स्कीमों का अभिसरण और युक्तिकरण द्वारा पहले के कर को कम करने का क्षेत्र होता है । एक ऐसी उदाहरण का सम्बन्ध निर्यात प्रोत्साहन पूजी वस्तुओं की स्कीम से होता है । साधारण पूंजी वस्तुओं को आयात करों के साथ निरन्तर घटाया गया, कुल EPCG के साथ यह अन्तर पिछले पांच वर्षों के दौरान 35.4% से 21.5% तक नीचे आया है ।

5. सफल WTO बातचीत की गैर-मौजूदगी में व्यापक आर्थिक सहयोग अनुबंध/FATs से संबंधित चुनौतियां (Challenges Related to FTAs/Comprehensive Economic Co-Operation Agreement in the Absence of Successful WTO Negotiations):

विश्व में FTAs का प्रसार ‘Spaghetti Bowl’ के रूप में किया गया जिसमें व्यापार सकट देशों के बीच विभिन्न शुल्कों के और उत्पत्ति के जटिल नियमों के आधार पर जटिल फैशन में व्यापार संकट को पार किया । हाल ही में, भारत भी कई प्रादेशिक और द्वि-पक्षीय समूहों का हिस्सा है ।

भारतीय निर्यातों के लिए इन FATs से लाभ है, कुछ दशाओं में साझेदार देशों के लिए लाभ भारत से बढ़ते निर्यातों के कुल लाभों के साथ काफी ज्यादा है । उदाहरण के लिए भारतीय सैटों पर साधारण सीमा शुल्क 10% है, परन्तु थाईलैंड और सिंगापुर से आयातों की दशा में उत्पत्ति जरूरत के नियमों के अधीन शुल्क जीरो है ।

कृषि वस्तुओं में भी समान मुद्दे हैं । उदाहरण के लिए सुपारी नट और बीटल नट की 100% की मूल शुल्क सीमा थी । परन्तु यह शुल्क शून्य होता है या इसे श्रीलंका हाथ और दक्षिणी एशियन मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) अनुबंध और FTA साझेदारी जैसे मियांमार, भूटान और नेपाल से आयात के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट की कम दर पर होता है ।

यह कुछ क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है जो जीविका के लिए सुपारी की खेती पर निर्भर करते हैं । FTA के अधीन छूट वाले करों पर आयात की अनुमति जिन वस्तुओं को कुछ राज्यों द्वारा प्रतिबंधित किया गया है उन्हें उन पर दुबारा विचार करने की जरूरत है । FTAs/CECAs से संबंधित नीति चुनौती को घरेलू क्षेत्र के विशेष तौर पर लिया जाना चाहिए ।

6. व्यापार सेवाओं से संबंधित चुनौतियां (Challenges Related to Services Trade):

सेवा व्यापार कई सारे अवसरों और चुनौतियों के साथ अज्ञात क्षेत्र है । सेवाओं में व्यापार के लिए ज्यादा अनुकूल वातावरण को सेवाओं में उदारीकृत सेवाओं द्वारा बनाया जा सकता है । FDI अन्तर्बहाव और सेवाओं में व्यापार बहुराष्ट्रीय मूल फर्मों के अन्तर फर्म की प्रकृति की सहयोगी कम्पनियों में नजदीकी सम्बन्ध होता है, सेवाओं जैसे शिपिंग और टेलीकॉम में तर्कसंगत कर; पूर्ण अनुबंधों के साथ आगे जाना; घरेलू नियमों जैसे लाइसेंस जरूरतों और प्रक्रियाओं, तकनीकी मानकों और अधिनियमित पारदर्शिता को व्यवस्थित बनाना जो सेवाओं के निर्यात और विकास में सहायता कर सकती है और बहु-भाषा और द्वि-पक्षीय बातचीत में सेवाओं पर फोकस जारी रखती है ।

विभिन्न एजेंसियों द्वारा सिंक्रनाइक नीति और ज्यादा फोकस थी, समन्वय की और सेवा डेटा प्रणाली को व्यवस्थित करने, सेवाओं के लिए पोर्टल को स्थापित करके बाजार सूचना के फैलाव और एकत्रीकरण, सेवा के व्यवस्थित विपणन को करना, जो आगे अध्ययन में सेवा क्षेत्र में सहायता कर सकता है ।

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