ब्रिटिश राज के दौरान व्यापार, उद्योग और श्रम | Business, Industries and Labour during British Raj.

व्यापार  (Business):

हम पहले ही कह चुके हैं कि किस प्रकार १८६९ ई॰ के बाद, जब कि स्वेज की नहर जहाजरानी के लिए खोल दी गयी, भारत का वैदेशिक व्यापार तेजी से फैलने लगा । इसके कई सहायक कारण थे, जैसे-शांति एवं व्यवस्था की वृद्धि, परिवहन के साधनों में उन्नति, स्वतंत्र व्यापार की नीति का अपनाया जाना, तथा भारत में आंतरिक लूंगी-बाधाओं एवं गमन-करों का लुप्त हो जाना ।

ग्रेटब्रिटेन ने बहुत समय तक भारतीय बाजार में प्रमुख स्थान बनाये रखा । लेकिन उन्नीसवीं सदी के अंत के बाद जर्मनी, अमेरिका का संयुक्त राज्य और जापान-जैसे अन्य देश भारतीय व्यापार में उसके प्रतिद्वंद्वियों के रूप में प्रकट हुए तथा फलस्वरूप सब मिलाजुला कर इसका परिमाण बढ़ चला ।

ADVERTISEMENTS:

१९१४-१९१८ ई॰ का युद्ध पहले तो इस व्यापार के परिमाण में, विशेषकर आयात-व्यापार के परिमाण में, अस्थायी कमी लाया । लेकिन, युद्ध की समाप्ति के बाद कुछ अनुकूल परिस्थितियों के कारण, भारत में भी अन्य देशों के समान व्यापारिक सरगर्मी आयी । किन्तु फिर इसके बाद व्यापारिक मंदी आ चली ।

अल्पकालीन पुनर्प्राप्ति (पुनरुद्धार) के बाद समस्त संसार में सामान्य आर्थिक मंदी के कारण व्यापार को गहरा धक्का पहुँचा । १९३२-१९३३ ई॰ में निर्यात-व्यापार कीमत में घटकर १३६ करोड़ रुपयों तक पहुँच गया तथा १९३३-१९३४ ई॰ में आयात-व्यापार निम्नतम स्तर तक अर्थात् ११७ करोड़ रुपयों तक आ लगा । तुरंत थोड़ी पुनर्प्राप्ति (पुनरुद्धार) हुई । १९३४-१९३५ में निर्यात-व्यापार की कीमत बढ्‌कर १५५ करोड़ रुपये हो गयी तथा आयात-व्यापार की कीमत १३५ करोड़ हो गई ।

भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार के १९३९ ई॰ के प्रतिवेदन का कहना था कि भारत “१९३८-३९ ई॰ में विश्व-व्यापार, विश्व-उत्पादन तथा अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य-स्तर की पुनर्प्राप्ति की अवधि में अंतिम बिन्दु तक पहुँच गया ।” किन्तु “तिजारती वस्तुओं में भारतीय समुद्रपार के व्यापार की लागत को ११३७-३८ ई॰ की तुलना में १९३८-३९ ई॰ में भारी कमी सहनी पड़ी ।”

हाल में भारत के व्यापार के वितरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं । १९१४-१९१८ ई॰ के युद्ध के पहले भारत के वैदेशिक व्यापार का स्पष्ट रुख यूनाइटेड किंगडम से अन्य यूरोपीय देशों की ओर जाना था । युद्ध के समय में यूनाइटेड किंगडम ने निर्यात- व्यापार में काफी हद तक अपना हिस्सा पुन: प्राप्त कर लिया ।

ADVERTISEMENTS:

मगर बाद में, जहां तक आयात-व्यापार का सम्बन्ध है, यह हिस्सा घट गया इसका कारण हुआ अमेरिका के संयुक्त राज्य, जापान और केंद्रीय यूरोपीय देशों की सक्रिय प्रतियोगिता । आयात-व्यापार में यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा १९१३-१९१४ ई॰ में ३४ प्रतिशत था, जो १९३४-१९३५ ई॰ में ४०.६ प्रतिशत हो गया । तत्पश्चात् उसके हिस्से में कुछ पुनर्प्राप्ति हुई तथा यूनाइटेड किंगडम से आयातों के प्रति ओटावा तरजीहों का मतलब था उसे लाभ पहुँचाना ।

भारत के बाह्य व्यापार के अतिरिक्त, उसका आंतरिक व्यापार भी है । इसमें समुद्रतटीय व्यापार और देश के भी भीतर का व्यापार समिलित हैं । बर्मा से समुद्रतटीय व्यापार विशेष यह च का है ।

व्यापारिक समाचार की बात अधिकाधिक ध्यान आकर्षित करने लगी । १९२२ ई॰ से ‘व्यापारिक समाचार और आँकडों का विभाग’ काम करने लगा । लंडन और हेमबर्ग में भारतीय व्यापार-कमिश्नर रखे गये । यूरोपीय और भारतीय-व्यापार-मंडलों-जैसी गैर-सरकारी संस्थाएँ भी व्यापार के विकास में बहुत दिलचस्पी लेती थीं ।

उद्योग (Industry):

ADVERTISEMENTS:

१८८० ई॰ और १९०१ ई॰ के दुर्भिक्ष-आयोगों ने दुर्भिक्ष की समस्या का सामना करने के एक साधन के रूप में भारत के औद्योगिकीकरण की आवश्यकता पर जौर डाला था । मगर सरकार का उद्योगों की ओर उदासीन रुख ही रहा । इस सम्बन्ध में लार्ड कर्जन के समय में एरक परिवर्तन शुरू हुआ जान पड़ता है, जिसके अनुरोध पर १९०५ ई॰ में एक अलग ‘व्यापार और उद्योगों का साम्राज्यीय विभाग’ खोला गया ।

स्वदेशी आंदोलन ने भी भारत के औद्योगिक पुनर्जीवन के लिए काफी उत्साह पैदा कर दिया । लेकिन १९१० ई॰ में भारत के तत्कालीन राज्य-सचिव लार्ड मार्च ने, जो उद्योगों का एक प्रांतीय विभाग तक खोलने में संदिग्धचित्त रहता था, भारत सरकार को एक सरकारी पत्र लिखा, जिसमें उसने उद्योगों के विकास के प्रयत्नों को निरुत्साह किया । इस प्रकार सरकार पुन: पुरानी स्वतंत्र व्यापार की नीति पर लौट आयी ।

१९१४-१९१८ ई॰ के युद्ध ने आश्चर्यजनक रूप में भारत की औद्योगिक दरिद्रता को प्रकट कर डाला । फलस्वरूप सरकार ने न केवल आर्थिक बल्कि सैनिक दृष्टिकोण से भी औद्योगिकीकरण के महत्व को साफ तौर से महसूस किया । भारत सरकार ने देश की प्रतिरक्षा के लिए नियम निकाले, जिन्होंने कार्यपालिका को अधिकार दे दिया कि वह सभी तरह की आपूर्तियों को नियंत्रित करें तथा भारत के साधनों को संगठित करें ।

इसके बाद ही फरवरी, १९१७ ई॰ में एक युद्ध-सामग्री बोर्ड स्थापित किया गया । यद्यपि इस बोर्ड के प्रधान कृत्य थे सरकारी संचित भोजन-वस्तुओं एवं युद्ध-सामग्री की खरीद और तैयारी को नियंत्रित करना, तथापि, खबर एवं सलाह दे कर, भारतीय तिजारती कोठियों को आर्डर दे कर और कई अन्य रूपों में इसने अप्रत्यक्ष ढंग से भारत में औद्योगिक विकास को बहुत उत्तेजना दी ।

भारतीय सार्वजनिक मांग के उत्तरस्वरूप सरकार ने १९१६ ई॰ में एक औद्योगिक कमीशन नियुक्त किया । इसके काम थे औद्योगिक विकास की संभावनाओं की जाँच करना, भारतीय पूंजी के लिए व्यापार एवं उद्योगों में नवीन क्षेत्र ढूंढना तथा उद्योगों के लिए सरकारी प्रोत्साहन के साधनों की सिफारिश करना ।

औद्योगिक कमीशन ने, १९१८ ई॰ में अपनी रिपोर्ट पेश की । इसने सरकार से निम्नलिखित बातों के लिए सिफारिश की- “औद्योगिक मामलों में शक्तिपूर्ण हस्तक्षेप की नीति” का प्रारंभ साम्राज्यीय और प्रांतीय उद्योगविभागों की स्थापना, वैज्ञानिक एवं टेकनिकल सेवाओं का संगठन, औद्योगिक एवं टेकनिकल शिक्षा के लिए अधिक सुविधाओं की व्यवस्था, भोजन-वस्तुएं खरीदने की नीति में परिवर्तन, उद्योगों को टेकनिकल एवं वित्तीय सहायत प्रदान करना, औद्योगिक सहयोग को प्रोत्साहन तथा आवागमन एवं माल ढोने की सुविधाओं की उन्नति ।

सरकार ने इन सिफारिशों को मान लिया तथा इन्हें व्यावहारिक रूप में देने की कुछ हद तक कोशिश की । सुधारों (१९१९ ई॰) के बाद “उद्योग” हस्तांतरित विषय बन गया । भारतीय उद्योगों की किस्मत सरकार की कर-सम्बन्धी नीति से घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई है । अतएव अब हम उसी का संक्षिप्त परिदर्शन करेंगे ।

राज्यकर-विषयक परिवर्तन (Regimental Changes):

१९१४-१९१८ ई॰ में उद्योगों को जो उत्तेजना प्राप्त हुई वह अस्थायी थी । इसकी समाप्ति के तुरंत बाद वैदेशिक प्रतियोगिता पुन: प्रकट हुई तथा भारतीय उद्योगों के लिए संरक्षण की आवश्यकता महसूस की गयी ।

सच पूछिए तो भारतीय लोकमत ने युद्ध के पहले करीब आधी सदी तक कर-विषयक नीति. के संशोधन की माँग रखी थी । युद्धोत्तर परिस्थितियों के अंतर्गत यह माँग पुन: प्रकट हुई । यह विषय औद्योगिक कमीशन के विचारों से हटाया हुआ था ।

फिर भी मांटेगू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने अपनी कर-नीति स्वयं निर्धारित करने के भारत के दावे का समर्थन किया । इंडिया बिल पर नियुक्त संयुक्त प्रवर समिति ने भारत के लिए कर-विषयक स्वराज्य दे देने की सिफारिश की । १९२१ ई॰ में राज्य-परिषद् में कर विषयक पूर्ण स्वराज्य के लिए एक प्रस्ताव रखा गया ।

इसके उत्तरस्वरूप राज्य-सचिव ने ३० जून, १९२१ ई॰ को एक सरकारी पत्र भेजा, जिसमें उसने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया । उसी वर्ष एक करविषयक आयोग (फिस्कल कमीशन) नियुक्त हुआ, जिसका काम था इस नीति की प्रकृति का निर्णय करना ।

इस आयोग ने “प्रभेदात्मक संरक्षण” की नीति के अपनाने की सिफारिश की, जिसमें संरक्षण के लिए विभिन्न उद्योगों के दावों का निर्णय एक टैरिफ बोर्ड द्वारा किया जाता । सरकार ने इस सिफारिश को मान लिया । तदनुसार जुलाई, १९२३ ईं॰ में एक टैरिफ बोर्ड नियुक्त हुआ ।

सरकार के आदेशानुसार काम करते हुए बोर्ड ने बहुत-से उद्योगों के दावों की परीक्षा की तथा लोहे एवं इस्पात, कपास, कागज, चीनी, नमक, दियासलाई और अन्य उद्योगों को संरक्षण दिया गया ।

आगे चलकर अनेक कानूनों द्वारा टैरिफ (माल पर लगनेवाले करों की तालिका) में कतिपय महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये । इनमें सब से महत्वपूर्ण था भारतीय टैरिफ (ओटावा व्यापार समझौता) संशोधन कानून, १९३२ ई॰ । बात यों हुई कि ओटावा (कैनेडा, उत्तरी अमेरिका) में जुलाई-अगस्त, १९३२ ई॰ में साम्राज्यीय आर्थिक सम्मेलन हुआ था ।

वहीं भारत सरकार और युनाइटेड किंगडम की ब्रिटिश सम्राट् की सरकार के बीच एक व्यापारिक समझौता हुआ । इसने कर-सम्बन्धी परिवर्तन आवश्यक कर दिये । उपर्युक्त कानून ने इन्हीं परिवर्तनों को व्यापारिक समझौता १ जनवंरी, १९३३ ई॰ से लागू हुआ ।

इसमें इसकी व्यवस्था की गयी थी कि युनाइटेड किंगडम से या किसी ब्रिटिश उपनिवेश से भारत को मंगायी गयी कुछ चीजों पर तरजीह दी जाए । कुछ भारतीय राजनीतिज्ञों और व्यापारवादियों के मतानुसार इस समझौते से भारत से होनेवाले ब्रिटिश व्यापार को ही लाभ पहुँचा तथा, जैसा कि श्री जवाहरलाल नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, भारत के “अधिक विस्तृत हितों” की हत्या हुई ।

श्रम (Labour):

जीवन की वर्तमान परिस्थितियों ने श्रम-नियमन को भारत में राज्य का करीब-करीब अपरिहार्य कर्तव्य बना दिया है । लंकाशायर और डंडी के व्यापार-हितों ने जो आंदोलन मचाया, उसके फलस्वरूप १९०८ ई॰ में एक फैक्ट्री कमीशन की नियुक्ति हुई ।

इसने विभिन्न तरह की फैक्ट्रियों में परिस्थितियों की सावधानीपूर्वक जाँच करने के बाद कतिपय महत्वपूर्ण परिवर्तनों की सिफारिश की । ये प्रधानत सरकार द्वारा स्वीकार कर लिये गये तथा अंत में १९११ ई॰ के फैक्ट्री कानून में अंगीभूत कर लिये गये ।

इस कानून ने बच्चों और स्त्रियों के काम के घंटे सीमित करके क्रमश: सात और ग्यारह कर दिये । इसने सभी फैक्ट्रियों में दिन के बीच में आग घंटे के अनिवार्य विराम की व्वयस्था की । बच्चों की उम्र के लिए पुरानी सीमाएँ (नौ से चौदह) कायम रहीं किन्तु उनकी उम्र के उचित तौर से प्रमाणित किये जाने की व्यवस्था हुई ।

खासकर वस्त्र-व्यवसायों में, बच्चों के काम के घंटे छ: और बालिग मदों के बारह कर दिये गये । औद्योगिक कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा के बारे में कई नयी धाराएँ लागू की गयीं ।

१९१९ ई॰ के बाद मजदूर-जगत् में जो हंगामा मचा, उसने भारत में मजदूरों की दशाओं में और परिवर्तन करना आवश्यक बना डाला । इस बार भी इनके लिए प्रेरणा मुख्यत: बाहर से ही आयी । वाशिंगटन के अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (१९२१ ई॰) के ड्राफ्ट समझौते और ड्राफ्ट सिफारिशें सुधरे हुए भारतीय विधान-मंडल में पेश की गयीं तथा १९२२ ई॰ में कानून बनीं ।

इस नये कानून ने फैक्ट्री की परिभाषा को अधिक विस्तृत कर दिया घस्त्रीय और रीर-वस्त्रीय फैक्ट्रियों के पुराने अंतर को उठा दिया बच्चा कार्यकर्त्ता के लिए कम-से-कम उम्र को बढ़ा कर नौ से बारह कर दिया और अधिक-से-अधिक उम्र को बढ़ा कर चौदह से पंद्रह कर दिया, बशर्ते कि बच्चों से प्रति दिन छ: घंटों से अधिक काम न लिया जाए, तथा अनिवार्य विश्राम-काल निश्चित कर दिये सभी बालिगों के काम को सीमाबद्ध कर प्रति दिन ग्यारह घंटे एवं प्रति सप्ताह साठ घंटे कर दिया, छ: घंटों के काम के बाद एक घंटे का विश्राम-काल दिया, नियमित रूप से साप्ताहिक छुट्टी दी, तथा अतिरिक्तकालीन काम के लिए अदायगी-संबन्धी नियम बनाये ।

लेकिन इस कानून की धाराएँ केवल फैक्ट्रियों पर लागू हुई, सभी औद्योगिक कार्यकर्ताओं पर नहीं अधिक अच्छी कार्यवाही को पक्का करने के लिए १९२३ ई॰ और १९२६ ई॰ में इस कानून में किंचित् संशोधन हुए ।

एक कार्यकर्त्ताओं का हर्जाना कानून (वर्कमेंस कंपेंसेशन ऐक्ट) १९२३ ई॰ में पास हुआ, जिसमें विविध वर्गों के औद्योगिक कार्यकर्त्ताओं की खास तरह की हानि या मृत्यु के लिए हर्जाने की व्यवस्था हुई । इन कानूनों के कुछ वर्षों तक चालू रहने से इनमें कुछ त्रुटियाँ मालूम पड़ने लगीं । साथ ही, कई बातों ने और भी आगे सुधार के लिये प्रस्ताव देने की प्रेरणा दी ।

ये बातें थीं-औद्योगिक अशांति मजदूर-आंदोलन का प्रभाव तथा जेनेवा के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (इंटरनेशनल लेबर और्गानिजेशन) में भारत का, राष्ट्रसंघ का एक मौलिक सदस्य होने के नाते, सहयोग । सन् १९२९ ई॰ के मध्य में भारत सरकार ने महान् राजा-सम्राट् द्वारा भारतीय श्रम पर एक राजकीय आयोग की नियुक्ति की घोषणा की । स्वर्गीय राइट औनरेब्ल जे॰ एच॰ ह्विट्‌ले इसके अध्यक्ष हुए ।

इसका काम था “इन पर जांच करके रिपोर्ट करना-ब्रिटिश भारत में औद्योगिक कार्यशालाओं और बागीचों में श्रम की वर्तमान परिस्थितियाँ कार्यकर्ताओं का स्वास्थ्य, क्षमता एवं जीवन का मार्ग नियुक्तकारियों और नियुक्तों के बीच संबंध; तथा सिफारिशें करना” ।

राजकीय आयोग ने भारत में वर्तमान मजदूर कानून एवं श्रम की परिस्थितियों का विस्तुत परिदर्शन ( सिंहावलोकन) किया तथा अपनी रिपोर्ट में, जो जुलाई, १९३१ ई॰ में प्रकाशित हुई, बहुत-सी सिफारिशें की । यहाँ उन सिफारिशों का एक संक्षिप्त सारांश देने की चेष्टा करना भी संभव नहीं है ।

राजकीय आयोग ने जो सिफारिशें दीं, उनमें कुछ पर केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों ने कारवाई की । इस प्रकार के श्रम-कानूनों में सब से महत्वपूर्ण ये थे-१९३३ ई॰ का कार्यकर्त्ताओं के हर्जाना कानून का संशोधन जिसने १९२३ ई॰ के कानून का कार्यक्षेत्र और भी बढ़ा दिया १९३४ ई॰ का भारतीय फैक्ट्री कानून, जिसने औद्योगिक श्रमिकों के काम के घंटों और स्वास्थ्यरक्षा-विषयक एवं अन्य परिस्थितियों के बारे में पहले के फैक्ट्री कानूनों की धाराओं को अधिक विस्तृत कर दिया १९३६ ई॰ का मजदूरी अदायगी कानून, जिसने कार्यकर्त्ताओं की मजदूरी की अदायगी के नियमन की चेष्टा की तथा १९३७ ई॰ का मध्यप्रदेश अनियमित फैक्ट्री कानून (सी॰ पी॰ अन्‌रेगुलेटेड फैक्ट्रीज ऐक्ट ऑफ १९३७) जिसने उन फैक्ट्रियों में, जहाँ १९३४ ई॰ का फैक्ट्री कानून लागू नहीं था, स्त्रियों एवं बच्चों के श्रम का नियमन किया और मजदूरों की भलाई की व्यवस्था की ।

सभी “स्थायी” (बारहमासी) फैक्ट्रियों में काम के घंटे सीमित कर प्रति दिन दस या प्रति सप्ताह पचास कर दिये गये । प्रत्येक प्रांत ने फैक्ट्री कानूनों का पालन करवाने के लिए फैक्ट्री इंस्पेक्टर बहाल किये । भलाई के काम द्वारा मजदूरों की हालत सुधारने की कोशिश की गयी ।

कभी-कभी भलाई का यह काम वाई॰ एम॰ सी॰ ए॰ (यंगमेन्स क्रिस्चियन ऐसोसिएशन या ईसाई नवयुवक संघ) सामाजिक सेवा-समितियों और दलित धर्ग मिशन सोसाइटी-जैसी संस्थाओं द्वारा संगठित होता था ।

सुधरे हुए संविधान के अन्तर्गत कांग्रेस मंत्रिमण्डलों ने अनेक तरीकों से मजदूरों की दशा सुधारने का प्रयत्न किया और औद्योगिक क्षेत्रों में (केन्द्रों में) मजदूरों की दशा की जाँच करने और उसके सुधार के लिए सिफारिश करने के उद्देश्य से (कई) समितियाँ नियुक्त कीं यथा बम्बई सूती मजदूर जाँच समिति (अक्टूबर १९३७ ई॰ में नियुक्त) कानपुर मजदूर जांच समिति (नवम्बर १९३७ ई॰ में नियुक्त) मध्यप्रदेश सूती मजदूर जाँच समिति (फरवरी, १९३६ ई॰ में नियुक्त और बिहार मजदूर-जाँच समिति (मार्च १९३८ ई॰ में नियुक्त) ।

केंद्रीय और प्रांतीय विधान मंडलों में मजदूरों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न ने विशेप महत्व धारण किया तथा यह (प्रश्न) कुछ समितियों द्वारा विचारित हुआ । १९३५ ई॰ में भारतीय सीमानिर्देश-समिति (इंडियन डीलिमिटेशन कमिटी) कायम हुई । सर लौरी हैमंड इसके अध्यक्ष हुए । इसने फरवरी, १९३६ ई॰ में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की ।

इसने प्रस्ताव रखा कि रजिस्टर्ड ट्रेड यूनियनों के आधार पर संघीय एसेंब्ली और प्रांतीय लेजिस्लेटिव एसेंब्लियो में मजदूरों के प्रतिनिधियों के आने के लिए कतिपय निर्वाचन-क्षेत्रों का निर्माण हो । मजदूरों की भलाई के लिए राज्य द्वारा कानून निर्माण और लोकोपकारी कार्यो के अतिरिक्त हमें आयूनिक भारत में स्वयं मजदूर-आंदोलन के प्रभाव को भी देखना है ।

इस आंदोलन के उद्भ के कई कारण थे-प्रथम विश्व-युद्ध के बाद सामान्य जाग्रति तथा जीवन की बिलकुल आवश्यक चीजों के ऊँचे दाम और निश्चित मजदूरी, जिनकी वजह से मुख्यत: जीवन की शोचनीय परिस्थितियाँ आयीं । १९१८ ई॰ में श्री बी॰ पी॰ वाडिया द्वारा निर्मित मद्रास लेबर यूनियन (मद्रास मजदूर-संघ) सही अर्थ में प्रथम ट्रेड-यूनियन माना जा सकता है ।

मजदूरों ने शीघ्र संगठन की कीमत और हड़तालों की प्रभावकारी शक्ति महसूस कर ली । १९२० ई॰ में श्री नारायण मल्हार जोशी ने प्रथम, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का निर्माण किया । अधिकतर औद्योगिक केंद्रों में ट्रेड यूनियन फूट पड़े तथा हड़तालें बार-बार होने लगीं ।

ट्रेड-यूनियन-सम्बन्धी काम कुछ हद तक १९२६ ई॰ के भारतीय ट्रेड यूनियंस ऐक्ट द्वारा कानूनसंमत बन गये । राजकीय आयोग ने इस कानून के खासकर ट्रेड यूनियनों एवं उनके अफसरों (पदाधिकारियों) के कारनामों पर पाबंदी लगाने के सम्बन्ध में पुनर्विचार की सिफारिश की ।

ट्रेड यूनियन आंदोलन का बढ़ना जारी रहा, यद्यपि कार्यकर्त्ताओं के बीच निरक्षरता, योग्य नेतृत्व के अभाव, भारतीय मजदूरों की कृषि-प्रधान दृष्टि एवं इसकी विभिन्न तत्व निर्मित प्रकृति के कारण इसकी प्रगति में काफी बाधा पहुँची ।

१९२९ ई॰ में इसके नेताओं में दरार पड़ गयी । कारण यह हुआ कि कम्यूनिस्ट ‘ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ पर अधिकार करने की कोशिश करने लगे ।

श्री नारायण मल्हार जोशी के नेतृत्व में माडरेट ट्रेड यूनियनवादी ‘कांग्रेस’ से पृथक् हो गये तथा इंडियन देइस यूनियन फेडेरेशन नामक एक नया संगठन चलाया । १९३१ ई॰ में एक और दरार पड़ी । सभी संस्थाओं को मिला एक केंद्रीय संगठन बना कर भारतीय श्रम की विभिन्न श्रेणियों में एकता लाने के प्रयत्न किये गये किन्तु सफलता नहीं मिली । १९३८ ई॰ में संयुक्त “ट्रेड यूनियन कांग्रेस” के कुल ३५४५०० के लगभग सदस्य थे तथा १९१ यूनियन इससे संबद्ध थे ।