Read this article in Hindi to learn about the achievements and failures of the league of nations.

राष्ट्रसंघ के सफलताएँ (Achievements of League of Nations):

अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के नियमन के लिए प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त राष्ट्रसंघ की स्थापना एक महत्वपूर्ण घटना तथा पेरिस शान्ति-सम्मेलन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी । बहुत अंशों तक इसकी स्थापना का श्रेय राष्ट्रपति विल्सन को दिया जाता है । युद्धकाल में ही वह इसके लिए योजना बना रहा था और उसके चौदह सूत्रों में भी इसका उल्लेख था ।

पेरिस सम्मेलन में जब राष्ट्रसंघ की रूपरेखा तैयार हुई तो अमेरिकी राष्ट्रपति उडरो विल्सन की माँग पर ही इसे वर्साय-संधि का अभिन्न अंग बनाया गया । वर्साय संधि की प्रथम छब्बीस धाराएँ राष्ट्रसंघ की रूपरेखा से ही सम्बन्धित हैं । 10 जनवरी, 1920 को राष्ट्रसंघ का जीवन विधिवत् प्रारम्भ हुआ ।

अंतरराष्ट्रीय सद्‌भाव में वृद्धि करना, युद्ध के कारणों को मिटाना तथा विश्व में शान्ति स्थापित रखना राष्ट्रसंघ के मुख्य उद्देश्य थे । शान्ति की रक्षा के हेतु वह कोई भी कदम उठा सकता था । राष्ट्रसंघ का निर्माण सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त के आधार पर हुआ था । सभी सदस्य-राज्यों ने अपने साथी सदस्य राज्यों की प्रादेशिक अखण्डता बनाये रखने की शर्त स्वीकार की थी तथा यह वचन दिया था कि किसी एक राज्य पर आक्रमण को सभी सदस्य राज्यों पर आक्रमण माना जायेगा ।

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अंतरराष्ट्रीय युद्धों को छिड़ने से रोकने के लिए राष्ट्रसंघ के विधान में कई व्यवस्थाएँ की गयी थीं । पंच-निर्णय, परस्पर विचार-विमर्श, कोंसिल के हस्तक्षेप आदि के द्वारा राष्ट्रसंघ युद्धों को छिड़ने से रोकता था यदि कोई राज्य इन कदमों की अवहेलना करके युद्ध कर देता तो राष्ट्रसंघ को आक्रामक के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार था यह कार्यवाही कूटनीतिक, आर्थिक और सैनिक होती थी ।

राष्ट्रसंघ पहले अपने सदस्यों को आक्रामक राज्य से दौत्य-सम्बन्ध तोड़ लेने की सिफारिश कर सकता था । यदि इसका भी कोई असर आक्रामक राज्य पर नहीं पड़ा तो वह आर्थिक प्रतिबन्ध लगा सकता था । अंत में वह आक्रामक राज्य के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही कर सकता था । इसके लिए सदस्य राज्य राष्ट्रसंघ को सेना प्रदान करते थे ।

युद्ध के निवारण के लिए राष्ट्रसंघ विधान के अंतर्गत शस्त्रास्त्रों को घटाने की बात आती थी । शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने के लिए शस्त्रास्त्रों की होड़ मिटाने की बात को आवश्यक बताया गया । इसके लिए विस्तृत योजना बनाने का कार्य राष्ट्रसंघ को सौंपा गया । इस दिशा में कई कदम भी उठाये गये, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें सफलता नहीं मिली ।

शान्ति-संस्थापक के रूप में राष्ट्रसंघ:

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अपने जीवन के प्रारम्भ से ही राष्ट्रसंघ ने शान्ति-संस्थापक के रूप में काम करना शुरू किया । उसके समक्ष अनेक अंतरराष्ट्रीय विवाद आये और कुछ अंशों में उनको सुलझाने में वह सफल भी रहा छोटे-छोटे राज्यों के झगड़ो को हल करने में राष्ट्रसंघ को पर्याप्त सफलता मिली । 1922 ई॰ में आलैण्ड के टापुओं पर अधिकार करने के सम्बन्ध में स्वीडन और फिनलैण्ड में झगड़ा उपस्थित हुआ । राष्ट्रसंघ ने ये द्वीप फिनलैण्ड को दिलवा दिए ।

एक अंतरराष्ट्रीय संधि के द्वारा इन द्वीपों को तटस्थ घोषित कर दिया गया । इसी तरह 1921 ई॰ में यूनान तथा युगोस्लाविया के बीच अल्देनिया की सीमा के विषय में झगड़ा आरम्भ हुआ, परन्तु राष्ट्रसंघ ने शान्तिपूर्ण ढंग से झगड़े का निबटारा करा दिया । 1923 ई॰ में लेटेशिया नगर के सम्बन्ध में झगड़ा प्रारम्भ हुआ ।

1922 ई॰ में इस नगर पर से पेरू का अधिकार समाप्त करके कोलम्बिया को अधिकार कायम कराया गया था । परख 1923 ई॰ में पेरू ने लेटेशिया पर अधिकार करने के लिए अपनी सेनाएँ भेज दीं ।

राष्ट्रसंघ ने मध्यस्थता करके लेटेशिया पुन: कोलम्बिया को दिलवा दिया । 1923 ई॰ में पोलैण्ड और चेकोस्तोवाकिया में सीमा-सम्बन्धी झगड़ा प्रारम्भ हुआ, जिसे शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने में राष्ट्रसंघ सफल रहा । 1923 ई॰ में हंगरी तथा रूमानिया के मध्य सीमा-सम्बन्धी झगड़ो का निपटारा भी राष्ट्रसंघ ने सफलतापूर्वक किया । 1925 ई॰ में सीमा-सम्बन्धी विवाद के कारण यूनान ने बुल्गेरिया पर आक्रमण कर दिया ।

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राष्ट्रसंघ ने यूनान को आर्थिक बहिष्कार की धमकी दी, जिससे भयभीत होकर यूनान ने युद्ध बंद कर दिया तथा अपनी सेनाओं को वापस बुला लिया । इन उपलब्धियों से राष्ट्रसंघ की प्रतिष्ठा में भारी वृद्धि हुई । 1922 से 1930 ई॰ की अवधि में राष्ट्रसंघ अपनी उन्नति के चरम शिखर पर रहा लेकिन, उसके तुरंत बाद उसके पतन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी शस्त्रास्त्रों की होड़ को नियन्त्रित करने के लिए राष्ट्रसंघ ने अनेकानेक प्रयास किये, लेकिन इस क्षेत्र में उसे लेशमात्र भी सफलता नहीं मिली ।

कोई भी बड़ा राज्य इस मामले में सहयोग करने को तैयार नहीं था ओर जब जेनेवा में निरस्त्रीकरण सम्मेलन समाप्त हुआ तो पुन: राष्ट्रों के बीच शस्त्रीकरण की घोर प्रतियोगिता चल पड़ी जिसने अंतरराष्ट्रीय वातावरण को दूषित करके द्वितीय विश्वयुद्ध के मार्ग को प्रशस्त किया ।

राष्ट्रसंघ की असफलताएँ (Failures of League of Nations):

राजनीतिक विवादों में भी जब बड़े राष्ट्रों के स्वार्थ परस्पर टकराने लगे तब उन्हें रोकने में राष्ट्रसंघ सर्वथा असफल रहा । यदि राष्ट्रसंघ बड़े देशों के मामलों को भी छोटे देशों के मामलों के समान हल करने में सफल हो जाता तो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या हमेशा के लिए हल हो जाती परन्तु, जब किसी बड़े राज्य का मामला उसके समुख उपस्थित हुआ तो राष्ट्रसंघ ने स्वयं को असहाय महसूस किया शुरू में विला नगर को लेकर पोलैण्ड और लियुएनिया के बीच झगड़ा शुरू हुआ ।

1920 ई॰ में पोलैण्ड ने उसे बलपूर्वक छीन लिया लिथुएनिया के राष्ट्रसंघ को अपील करने पर दो वर्ष तक बराबर इसके समाधान का प्रयल किया जाता रहा, परन्तु पोलैण्ड को फ्रांस आदि बड़े देशों का समर्थन प्राप्त था तथा उसका कुछ भी न बिगाड़ा जा सका । इस प्रकार, इस कार्य में राष्ट्रसंघ एकदम असफल रहा ।

1923 ई॰ में इटली तथा यूनान में अल्वेनिया की सीमा के सम्बन्ध में झगड़ा हो गया । यूनानी आतंकवादियों ने सीमा निश्चित करनेवाले कमीशन के इटालवी अधिकारियों की हत्या कर दी । इस पर इटली ने यूनान से क्षतिपूर्ति की माँग की, परन्तु यूनान इसके लिए तैयार नहीं हुआ ।

यद्यपि यह मामला राष्ट्रसंघ के द्यर्द कर दिया गया था, परन्तु इटली की सरकार ने यूनान के कीर्फ्यू नगर पर बम वर्षा करके उसे नष्ट कर डाला तथा यूनान को क्षतिपूर्ति करने के लिए बाध्य किया । यूनान द्वारा राष्ट्रसंघ में अपील किये जाने पर राइसघ इटली को दंड देने में असमर्थ रहा तथा उसकी निर्बलता स्पष्ट हो गयी ।

1931 ई॰ में राष्ट्रसंघ के पतन का सिलसिला प्रारम्भ हुआ । इस वर्ष राष्ट्रसंघ के एक सदस्य जापान ने एक दूसरे सदस्य चीन पर आक्रमण करके उसके एक प्रदेश मंचूरिया पर अपना अधिकार कायम कर लिया चीन ने आक्रमण के विरुद्ध राष्ट्रसंघ में शिकायत की और सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त की दुहाई देते हुए जापान के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करने की माँग की राष्ट्रसंघ में इस प्रश्न पर कई दिनों तक वाद-विवाद होता रहा, लेकिन जापान ने निन्दा की परवाह किये बिना अपना आक्रमण जारी रखा तथा मंचूरिया के एक विशाल भूभाग पर अधिकार करके मंचूकाओं नामक एक स्वतंत्र राज्य का निर्माण कर दिया, जो पूर्णतया जापान के प्रभाव में था ।

1930 ई॰ तक राष्ट्रसंघ को कई राजनीतिक झगड़ों को सुलझाने में सफलता मिली थी, क्योंकि इन झगड़ों का संबंध छोटे-छोटे राज्यों से था इस बार एक महान और शक्तिशाली राज्य ने आक्रमण का सिलसिला शुरू किया था और राष्ट्रसंघ के लिए यह कठिन परीक्षा का समय था । लेकिन, राष्ट्रसंघ को इस मामले में अपने प्रमुख सदस्य-राज्यों का सहयोग नहीं मिल सका ।

जापान कहा करता था कि मंचूरिया पर आधिपत्य जमाने का उसका मुख्य उद्देश्य रूस की साम्यवादी व्यवस्था को समाप्त करना था । इस कारण, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे पूँजीवादी-साम्राज्यवादी राज्य उसकी हरकतों को अनदेखा करने के पक्ष में थे । अत: उन्होंने जापान की आक्रामक कार्यवाही के प्रति उदासीन रवैया अपनाया और राष्ट्रसंघ निष्क्रिय बना रहा ।

जापान अपने इच्छानुसार चीन की भूमि को रोदता रहा और राष्ट्रसंघ एक मूकदर्शक की तरह देखता रहा । 1933 ई॰ में जापान ने राष्ट्रसंघ की सदस्यता का भी परित्याग कर दिया । 1937 ई॰ में जापान ने पुन: चीन पर आक्रमण किया और राष्ट्रसंघ उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सका । सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त की यह बहुत बड़ी पराजय थी ।

जापान के मामले में राष्ट्रसंघ की निर्बलता स्पष्ट हो गयी थी । अत: अन्य राष्ट्रों ने भी उसकी अवहेलना की । 1933 ई॰ में पैरागुए ने ग्रेनचेकों का प्रदेश प्राप्त करने के लिए बोलेविया पर आक्रमण कर दिया । राष्ट्रसंघ ने जब उससे जवाब माँगा तो पेरागुए राष्ट्रसंघ से अलग हो गया ।

जब एक बार किसी आक्रामक प्रवृति को छूट मिल जाती है तो दूसरे आक्रामक राष्ट्रों का हौसला और उत्साह बहुत बढ़ जाता हे । 1935 ई॰ में ऐसी ही बात हुई जब राष्ट्रसंघ के एक सदस्य राज्य इटली ने दूसरे सदस्य-राज्य अबीसीनिया पर आक्रमण कर दिया ।

चीन की तरह अबीसीनिया भी शिकायत लेकर राष्ट्रसंघ पहुँचा और सामूहिक सुरक्षा की दुहाई देते हुए रक्षा की माँग की लेकिन, इस बार भी आक्रामक राष्ट्र एक महान राज्य था और ब्रिटेन तथा फ्रांस इटली के तानाशाह मुसोलिनी को अप्रसन्न करना नहीं चाहते थे । अत: अबीसीनिया को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया और अबीसीनिया पर इटली का आक्रमण जारी रहा ।

इसी बीच इंग्लैण्ड और फ्रांस का जनमत बहुत उद्विग्न हो उठा और जनता ने अपनी सरकारों पर दबाव डाला कि मुसोलिनी की आक्रामक कार्यवाही के विरुद्ध वे राष्ट्रसंघ का भरपूर समर्थन करें । स्थिति ऐसी हो गयी कि खुले तौर पर ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों के लिए इस लोकमत की अवहेलना करना संभव नहीं था ।

अत: ब्रिटेन और फ्रांस के सहयोग से राष्ट्रसंघ ने इटली के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिया । उधर चुपके से फ्रांस और ब्रिटेन के प्रधान मन्त्रियों ने एक गुप्त समझौता (होर-लावाल समझौता) कर लिया, जिसके द्वारा यह निश्चित किया गया कि इटली के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध को कारगर नहीं होने दिया जाए ।

यह ध्वंसन (सैबोटाज) सफल रहा । राष्ट्रसंघ के आर्थिक प्रतिबन्ध के बावजूद अबीसीनिया पर इटालवी आक्रमण जारी रहा और वह इटालवी साम्राज्य में मिला लिया गया । इस प्रकार, राष्ट्रसंघ के एक सदस्य-राज्य का अस्तित्व ही मिट गया । इटली की विजय का राष्ट्रसंघ के जीवन पर घातक प्रभाव पड़ा और इसके फलस्वरूप राष्ट्रसंघ की प्रतिष्ठा धूल में मिल गयी । छोटे-छोटे निर्बल राष्ट्रों का-जो राष्ट्रसंघ की सुरक्षा पद्धति और सामूहिक सुरक्षा के सिद्धान्त पर आश्रित थे-राष्ट्रसंघ पर से विश्वास उठ गया । वस्तुत: यह अबीसीनिया की स्वतन्त्रता की नहीं, वरन् राष्ट्रसंघ की हत्या थी ।

1935 ई॰ के पश्चात् घटित होनेवाली सभी घटनाओं से राष्ट्रसंघ की निर्बलता पूर्णत: प्रगट हो गयी । जापान ने 1937 ई॰ में चीन पर आक्रमण कर दिया, परन्तु राष्ट्रसंघ जापान के विरुद्ध कोई कार्य करने में असमर्थ रहा । इसी प्रकार, 1937 ई॰ में स्पेन में गृहयुद्ध छिड़ गया तथा जनरल फ्रैंको ने स्पेन के गणतन्त्र के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया ।

हिटलर और मुसोलिनी ने खुलेआम फ्रैंको की सहायता की तथा स्पेन में तानाशाही कायम हो गयी । इस झगड़े में राष्ट्रसंघ ने अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण किया, जो अत्यन्त अन्यायपूर्ण थी । राष्ट्रसंघ स्पेन के गणतन्त्र की रक्षा करने में असमर्थ रहा ।

इसी बीच 1933 ई॰ में जर्मनी में हिटलर का उत्कर्ष हुआ और उसने शुरू से ही अपनी आक्रामक कार्यवाहियाँ शुरू कर दीं । उसने एक-एक करके वर्साय-सन्धि की शर्तों को तोड़ना शुरू किया और राष्ट्रसंघ उसके अनुचित कार्यों को रोकने में सर्वथा असमर्थ रहा । सर्वप्रथम 1933 ई॰ में हिटलर ने बिना विधिवत् सूचित किये ही राष्ट्रसंघ की सदस्यता का परित्याग कर दिया और जेनेवा के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में भाग लेना बंद कर दिया ।

इस कार्यवाही से निरस्त्रीकरण की सारी योजना खटाई में पड़ गयी । फिर, उसने जर्मनी में सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी । सभी समझौतों को भंग करते हुए उसने राइनलैण्ड में फौज भेजकर उस पर अधिकार कर लिया । 1938 ई॰ में उसने बल-प्रयोग करके आस्ट्रिया को जर्मन साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया । इसके तुरंत बाद ही उसने चेकोस्लोवाकिया स्थित सुडटेन जर्मन अल्पसंख्यकों का प्रश्न उठाया और एक घोर अंतरराष्ट्रीय संकट उत्पन्न कर दिया । धौंस दिखाकर उसने ब्रिटेन और फ्रांस को मजबूर कर दिया कि सुडटेनलैण्ड को जर्मनी को दिये जाने की बात वे मान लें ।

कुछ ही दिनों में शेष चेकोस्लोवाकिया भी हिटलर की आक्रामक कार्यवाही का शिकार हो गया और यूरोप के ओझल हो गया । इस संकट के समय राष्ट्रसंघ राष्ट्रसंघ का गला अत्यन्त असम्मानपूर्वक धोंटा गया । सितम्बर, 1938 में चेकोस्लोवाकिया की छुट्टी करने के बाद हिटलर ने पोलैण्ड और डान्सिंग पर ध्यान दिया जो शीघ्र ही उसके आक्रमणों का शिकार होने वाले थे । सितम्बर, 1939 को उसने पोलैण्ड को हड़पने के निमित्त उस पर आक्रमण शुरू कर दिया ।

जब स्थिति काबू से बाहर हो गयी तो ब्रिटेन और फ्रांस की आँखें खुलीं और अब उन्हें एहसास हुआ कि राष्ट्रसंघ का समर्थन न करके उन्होंने कैसी गलती की थी । लेकिन, इस समय तक काफी विलम्ब हो चुका था । पोलैण्ड को जर्मन आक्रमण से बचाने के लिए इंग्लैण्ड और फ्रांस ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया । सितम्बर, 1939 के इन तूफानी दिनों में राष्ट्रसंघ असहाय और प्राणहीन होकर पड़ा रहा ।

राष्ट्रसंघ की असफलता के कारण (Reasons for Failure of League of Nations):

इस प्रकार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महान प्रयास अल्पकाल में ही असफल हो गया यह असफलता अनिवार्य थी । किसी भी संगठन की सफलता उसके सदस्यों के रवैये पर निर्भर करती है । लेकिन, राष्ट्रसंघ के प्रमुख सदस्यों ने इसके सिद्धान्तों पर विश्वास नहीं किया ओर इस कारण यह असफल रहा ।

व्यावहारिक राजनीति में इसकी सफलता मुख्य रूप से बड़े राष्ट्रों के सहयोग पर निर्भर करती थी । लेकिन, राष्ट्रसंघ शुरू से ही इस सहयोग से वंचित रहा । संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के अनवरत प्रयासों के फलस्वरूप राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई थी । लेकिन, बाद में वह स्वयं इसका सदस्य नहीं रहा ।

अमेरिकी सीनेट को यह सदस्यता मान्य नहीं थी और राष्ट्रपति विल्सन के प्रयासों के बावजूद अमेरिका संघ से अलग ही रहा । अमेरिका के सहयोग से वंचित हो जाने के कारण राष्ट्रसंघ एक दुर्बल संस्था हो गयी । संयुक्त राज्य अमेरिका की अनुपस्थिति में आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना या आक्रामक तानाशाहो को आक्रामक कार्यवाही से रोकना असम्भव हो गया ।

दूसरा महान राज्य सोवियत संघ राष्ट्रसंघ को शुरू से ही शंका की निगाहों से देखता रहा । सोवियत संघ को संघ की सदस्यता शुरू में नहीं दी गयी थी और वह इसे पूँजीवादी राष्ट्रों का एक संगठन-मात्र मानता रहा । बाद में जब हिटलर के उत्कर्ष से यूरोपीय शान्ति पर खतरा पैदा हो गया तो सोवियत संघ राष्ट्रसंघ में शामिल हुआ लोकन, उस समय तक राष्ट्रसंघ एक व्यर्थ की संस्था बन गया था और कारगर ढंग से कार्यवाही करने की क्षमता उसमें नहीं रह गयी थी ।

इसी तरह, जर्मनी से सहयोग की अपेक्षा करना भी व्यर्थ था । 1925 ई॰ में लोकार्नो समझौते के अनुसार जर्मनी को राष्ट्रसंघ की सदस्यता प्रदान की गयी थी । पर, जर्मनी कभी राष्ट्रसंघ का वफादार सदस्य नहीं हो सकता था, क्योंकि राष्ट्रसंघ उस धृणित वर्साय संधि का एक अभिन्न अंग था जिसको हिटलर मिटाने का उद्देश्य रखता था ।

एक दूसरा महान राज्य इटली अपने को मुसोलिनी की फासिस्टवादी विचारधारा के समक्ष समर्पित कर चुका था और इस विचारधारा को विश्वशान्ति के सिद्धान्त में कतई विश्वास नहीं था । मुसोलिनी मानव-सभ्यता की प्रगति के लिए युद्ध को आवश्यक मानता था । इस हालत में केवल ब्रिटेन और फ्रांस ही बच रहे थे, जिनके रवैये पर राष्ट्रसंघ का भविष्य निर्भर करता था ।

लेकिन, वे अपने साम्राज्यवादी-पूँजीवादी हितों के कायल थे और आक्रामकों के विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाही करना नहीं चाहते थे जिससे कि उनके हितों को धक्का लगे । ऐसी हालत में, यानी बड़े राष्ट्रों के सहयोग के अभाव में, राष्ट्रसंघ को असफल होना ही था । अपने स्वार्थों से वशीभूत होकर बड़े राष्ट्र बहुधा निर्बल राष्ट्रों के हित का ध्यान नहीं रखते थे ।

अबीसीनिया पर इटली के आक्रमण का राष्ट्रसंघ के पचास सदस्यों ने विरोध किया और उस पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने की माँग की, परंतु मुसोलिनी की धमकी से डरकर इंग्लैण्ड और फ्रांस आर्थिक बहिष्कार को असफल बनाते रहे । इससे राष्ट्रसंघ की निर्बलता स्पष्ट रूप से प्रकट हो गयी । हिटलर की अवहेलनापूर्ण नीति का भी राष्ट्रसंघ में कोई विरोध नहीं हुआ ।

संघ के सदस्यों के बीच परस्पर सहयोग की भावना के अभाव का हिटलर ने अत्यधिक लाभ उठाया । यद्यपि फ्रांस राष्ट्रसंघ को यूरोपीय सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन समझता था, परंतु जब कार्यवाही करने का अवसर आया तो उसने सबसे अधिक शिथिलता दिखायी । अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए उसने अनेक बार इटली का विरोध करने में संकोच प्रदर्शित किया ।

1930 ई॰ की आर्थिक मंदी के बाद तो सभी देश अपने हितों की चिन्ता में ही व्यस्त हो गये । महाशक्तियों का परस्पर विरोधी दृष्टिकोण भी राष्ट्रसंघ की सफलता के मार्ग में एक बहुत महत्वपूर्ण बाधा थी । फ्रांस राष्ट्रसंघ का उद्देश्य केवल जर्मनी को दबाये रखना ही मानता था इंग्लैण्ड को अपने व्यापारिक हितों की चिन्ता सबसे अधिक थी । इस कारण वह जर्मनी के प्रति कठोर नीति का पक्ष-समर्थक नहीं था ।

सोवियत संघ पूँजीवादी देशों को धृणा की दृष्टि से देखता था तथा राष्ट्रसंघ को उनका खिलौना-मात्र समझता था । कोई भी देश सच्चे अर्थों में राष्ट्रसंघ के सिद्धान्तों में विश्वास नहीं करता था । ऐसी हालत में राष्ट्रसंघ के सफल होने की आशा करना ही बेकार था ।

पर, इस असफलता के बावजूद राष्ट्रसंघ के महत्त्व को कम नहीं किया जा सकता है । इसने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सौहार्द्र की एक नयी परम्परा का सूत्रपात किया, जो अंतरराष्ट्रीय जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया । इसने गुप्त कूटनीति के दुर्गुणों को दूर कर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक नया मार्ग दिखाया । इसके अतिरिक्त, इसने विश्व को एक बहुमूल्य अनुभव प्रदान किया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना इसी अनुभव और परीक्षण का परिणाम था ।