पाला साम्राज्य: इतिहास साम्राज्य के दौरान इतिहास, उत्पत्ति, कला और वास्तुकला | Read this article to learn about Pala Empire: History, Origin, Art and Architecture During Pala Empire.

पालवंश के इतिहास के साधन (Tools of History of Pala Empire):

पालवंश का इतिहास हमें साहित्य तथा उसके अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है ।

इस वंश के प्रमुख लेख हैं:

(1) धर्मपाल का खालीमपुर लेख ।

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(2) देवपाल का मुंगेर लेख ।

(3) नारायणपाल का भागलपुर ताम्रपत्राभिलेख ।

(4) नारायणपाल का बादल स्तम्भ लेख ।

(5) महीपाल प्रथम के बानगढ़, नालन्दा तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त लेख ।

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उपर्युक्त लेखों के अतिरिक्त अन्य अनेक लेख भी प्राप्त हुए है । इनसे पालवंश की उत्पत्ति तथा उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है । समकालीन गुर्जर-प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट लेखों से पालों का इन राजवंशों के साथ सम्बन्ध ज्ञात होता है । इस काल के ग्रन्थों में सरकार नन्दीकृत ‘रामचरित’ का प्रमुख रूप से उल्लेख किया जा सकता है जिससे इस वंश के शासक रामपाल की उपलब्धियों का ज्ञान प्राप्त होता है ।

पालवंश का उत्पत्ति तथा राजनैतिक इतिहास (Origin and Political History of Pala Empire):

शशांक की मृत्यु के पश्चात् (637 ईस्वी) लगभग एक शताब्दी तक बंगाल में अराजकता और अव्यवस्था का वातावरण व्याप्त रहा । आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य अशान्ति एवं अव्यवस्था से ऊब कर बंगाल के प्रमुख नागरिकों ने गोपाल नामक एक सुयोग्य सेनानायक को अपना राजा बनाया ।

गोपाल ने जिस नवीन राजवंश की स्थापना की उसे ‘पालवंश’ कहा जाता है । यह एक क्षत्रिय राजवंश था जिसने बंगाल में लगभग चार वर्षों तक राज्य किया । इस दीर्घकालीन शासन में राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से बंगाल की अभूतपूर्व प्रगति हुई ।

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i. गोपाल:

पालवंश के संस्थापक गोपाल के प्रारम्भिक जीवन तथा कार्यों के विषय में हमें बहुत कम पता है । उसका पितामह दीयतविष्णु एक विद्वान् था तथा उनका पिता वप्यट एक योग्य सैनिक था । धर्मपाल के खालीमपुर लेख में कहा गया है कि ‘मात्स्यन्याय से छुटकारा पाने के लिये प्रकृतियों (सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण कराई ।’

तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने भी इस विवरण की पुष्टि की है । गोपाल ने बंगाल में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित की तथा अपने शासन के अन्त तक सम्पूर्ण बगल पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया । देवपाल के मुंगेर लेख में वर्णन मिलता है कि गोपाल ने समुद्रतट तक की पृथ्वी की विजय की थी किन्तु यह विवरण मात्र आलंकारिक प्रतीत होता है ।

वर्तमान स्थिति में हम गोपाल की राजनैतिक उपलब्धियों के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कह सकते । वह बौद्ध मतानुयायी था तथा नालन्दा में उसने एक विहार का निर्माण करवाया था । गोपाल ने लगभग 750 ईस्वी से 770 ईस्वी तक शासन किया ।

ii. धर्मपाल:

गोपाल के पश्चात उसका पुत्र और उत्तराधिकारी धर्मपाल (770-810 ईस्वी) पालवंश का राजा हुआ । इस समय उत्तर भारत का राजनैतिक वातावरण बड़ा विक्षुब्ध था । राजपूताना तथा मालवा में गुर्जर-प्रतिहार वंश की स्थापना हो चुकी थी तथा इस वश का शासक वत्सराज पूर्व की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा था ।

दक्षिण में राष्ट्रकूट शक्तिशाली थे और उनकी लोलुप दृष्टि कन्नौज पर गड़ी हुई थी । धर्मपाल को इन दोनों शक्तियों के साथ संघर्ष करना पड़ा । सर्वप्रथम उसका प्रतिहार नरेश वत्सराज से युद्ध हुआ जिसमें उसकी पराजय हुई । राधनपुर लेख से इस बात की सूचना मिलती है जिसके अनुसार वत्सराज ने धर्मपाल को हराकर उसके दो श्वेत राजछत्रों को ग्रहण कर लिया था ।

परन्तु वत्सराज को राष्ट्रकूट ध्रुव ने हरा दिया और वह डरकर राजपूताना के रेगिस्तान की ओर भाग गया । पूने धर्मपाल को पराजित किया और फिर दक्षिण लौट गया । राष्ट्रकूट- आक्रमण का प्रभाव धर्मपाल पर बहुत कम पड़ा उसने शीघ्र ही अपनी शक्ति संगठित कर अपने को सम्पूर्ण उत्तर भारत का स्वामी बना लिया ।

सर्वप्रथम धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ वत्सराज द्वारा मनोनीत शासक इन्द्रायुद्ध को हराया तथा अपनी ओर से वहाँ चक्रायुद्ध को राजा बनाया । उसने कन्नौज में एक बड़ा दरबार किया जिसमें भोज मल, मद, कुरु, बहु, यवन, अवन्ति, गन्धार तथा कीर के शासकों ने भाग लिया ।

उसकी इस विजय का उल्लेख खालीमपुर तथा भागलपुर के लेखों में मिलता है । किन्तु हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते कि कन्नौज के दरवार में उपस्थित शासकों को उसने किसी युद्ध में जीता अथवा उन्होंने धर्मपाल की शक्ति के डर से ही उसकी अधीनता मान ली थी । इससे ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि धर्मपाल कुछ समय के लिये उत्तर भारत का सार्वभौम शासक बन बैठा ।

उसका साम्राज्य सम्पूर्ण बंगाल और विहार में विस्तृत हो गया तथा कनौज का राज्य उसके नियन्त्रण में आ गया । तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार धर्मपाल का साघाक्य बंगाल की खाड़ी से लेकर दिल्ली तक तथा जालधर से लेकर विम्मपर्वत तक फैल गया था । ग्यारहवीं शती के गुजराती कवि सोड्‌ढल ने धर्मपाल को ‘उत्तरापथस्वामी’ की उपाधि से सम्बोधित किया है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि धर्मपाल जीवनपर्यन्त अपने साम्राज्य को अक्षुण्ण नहीं रख सका तथा प्रतिहारों ने धर्मपाल की सत्ता को पुन चुनौती दी । वत्सराज के पुत्र तथा उत्तराधिकारी नागभट्ट द्वितीय ने पुन अपनी शक्ति सगंठित की । उसने कनौज पर आक्रमण कर वहाँ अपना अधिकार दृढ़ किया तथा चक्रायुध को भगा दिया ।

तत्पश्चात् मुंगेर के समीप एक घमासान युद्ध में उसने धर्मपाल को बुरी तरह परास्त किया । परन्तु अपने पिता के ही समान नागभट्ट भी अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सका । राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय ने पुन उस पर आक्रमण कर उसे परास्त किया ।

धर्मपाल तथा चक्रायुध ने भी गोविन्द की अधीनता मान ली । गोविन्द तृतीय के वापस लौटने के बाद धर्मपाल ने पुन अपनी खोई हुई शक्ति और प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली । अन्त तक वह एक विस्तृत साम्राज्य का शासक घना रहा । उसके अधीन वकल का राज्य अचानक उत्तर भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य बन गया । अपनी महानता के अनुरूप उसने परमेश्वर, परमभट्टारक, महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ ग्रहण किया ।

इस प्रकार धर्मपाल अपने समय का एक महान् शासक था । धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध था । उसके लेखों में उसे ‘परमसौगत’ कहा गया है । उसने विक्रमशिला तथा सोमपुरी (पहाड़पुर) में प्रसिद्ध विहारों की स्थापना की । उसकी राजसभा में प्रसिद्ध वौद्ध लेखक हरिभद्र निवास करता था ।

तारानाथ के अनुसार उसने 50 धार्मिक विद्यालयों की स्थापना करवायी थी । किन्तु राजा के रूप में उसमें धार्मिक असहिष्णुता एवं कट्टरता नहीं थी । खालीमपुर लेख में उसे सभी सम्प्रदायों विशेष रूप से ब्राह्मणों का आदर करने वाला कहा गया है ।

उसने भगवान मननारायण के मन्दिर के निर्वाह के लिये चार ग्राम दान में दिये थे । भागलपुर लेख से पता चलता है कि वह एक कुशल तथा न्यायप्रिय शासक था जिसने अपनी प्रजा पर उचित कर लगाये थे । वह शास्त्रों का ज्ञाता था तथा सभी जाति के लोगों का सम्मान करता था ।

iii. देवपाल:

धर्मपाल की मृत्यु के बाद उसका सुयोग्य पुत्र देवपाल पालवंश की गद्दी पर बैठा । खालीमपुर लेख से पता चलता है कि त्रिलोचनपाल नामक उसका एक बड़ा भाई भी था । किन्तु धर्मपाल के जीवन-काल में ही उसकी मृत्यु हो चुकी थी ।

देवपाल धर्मपाल की राष्ट्रकूटवंशीया पत्नी रन्नादेवी से उत्पन्न हुआ था । देवपाल ने अपने पिता के ही समान परमेश्वर, परमभट्टारक, महाराजाधिराज जैसी उच्च सम्मानपरक उपाधियाँ धारण की । वह पालवंश का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक था । उसने न केवल अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा, अपितु उसे विस्तृत भी किया ।

मुंगेर लेख से पता चलता है कि उसने विन्ध्यपर्वत तथा कम्ब्रोज तक सैनिक अभियान किया । नारायणपाल के समय के वादल लेख से भी देवपाल की विजयों पर कुछ प्रकाश पड़ता है । बताया गया है कि उसका योग्य अमात्य दर्भपाणि था जो धर्मपाल के अमात्य वीरदेव का पुत्र था ।

उसकी कूटनीति ने रवा (नर्मदा) के पिता विनयाचल तथा गौरी के पिता हिमांचल के बीच बसे हुए पश्चिमी समुद्र (अरब सागर) से पूर्वी समुद्र (बंगाल की खाड़ी) तक के सम्पूर्ण क्षेत्र को देवपाल का करद बना दिया था ।

इसी लेख में आगे बताया गया है कि उसने उत्कलों को उखाड़ फेंका, हूणों के गर्व को चूर्ण किया तथा द्रविड़ और गुर्जर राजाओं के अभिमान को विदीर्ण कर समुद्रों से घिरी हुई समस्त पृथ्वी पर शासन किया था (उत्कीलितोत्कलकुलं हृतहूणगर्वख र्वीकृतद्रविडगुर्ज्जरनाथदर्पम्) ।

भागलपुर लेख में कहा गया है कि देवपाल के भाई तथा सेनापति जयपाल के सामने उत्कल का राजा अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया तथा असम-नरेश ने उसकी आशा का पालन करते हुए अपने राज्य का शासन किया ।

इन विवरणों को हम कोरी कल्पना नहीं मान सकते । ज्ञात होता है कि इस समय राष्ट्रकूट तथा प्रतिहार दोनों ही निर्बल पड़ गये थे । गोविन्द की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट राज्य में आन्तरिक कलह उत्पन्न हो गया जिससे वे उत्तर की ओर से उदासीन हो गये । प्रतिहारवंश में नागभट्ट का उत्तराधिकारी रामभद्र भी निर्वल शासक हुआ ।

ऐसी परिस्थिति में देवपाल को अपनी शक्ति के विस्तार का सुनहला अवसर मिला और उसने स्थिति का भरपूर लाभ उठाया था । उसने गुर्जर-प्रतिहार वश के रामभद्र तथा भोज को पराजित किया था और इस प्रकार उत्तरी भारत में अपना प्रभुत्व कायम रखा । बादल लेख के हूणों से तात्पर्य संभवत: मालवा के हूणों से है ।

लेखों में मालवा के ‘हूणमण्डल’ का उल्लेख मिलता है । तिब्बती लेखक तारानाथ भी देवपाल द्वारा उड़ीसा की विजय की बात पुष्ट करता है । देवपाल ने जिस उत्कल राजा को जीता वह संभवत करवशी शिवकर द्वितीय था । द्रविड़ नरेश की पहचान सदिग्ध है ।

अल्तेकर द्रविड़ की पहचान राष्ट्रकूटों से करते हुए यह प्रतिपादित करते हैं कि देवपाल ने राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष के ऊपर आक्रमण कर उसे परास्त किया था । किन्तु यह समीकरण तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि तत्कालीन लेखों में द्रविड़ तथा राष्ट्रकूट का उल्लेख पृथक्-पृथक् मिलता है । बी॰पी॰ सिनहा द्रविड़ की पहचान कान्ची के पल्लवों से करते है जो उचित लगता है ।

देवपाल के मुंगेर लेख से पता चलता है कि उसने मेतुबन्ध रामेश्वरम् तक के प्रदेश पर शासन किया था । इससे ऐसा लगता है कि उत्कल अभियान के बाद उसने सुदूर दक्षिण में जाकर कान्ची के पल्लवों को भी नतमस्तक किया है । उसके सुदूर दक्षिण में अभियान का उद्देश्य राष्ट्रकूटों को उनकी सीमा में रहने के लिये विवश करना प्रतीत होता है ।

देवपाल द्वारा पराजित कामरूप का शासक भास्करवर्मा कोई निर्वल उत्तराधिकारी रहा होगा । इस प्रकार देवपाल अपने वश का महानतम शासक था जिसके नेतृत्व में पाल साम्राज्य अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर पहुंच गया । पाल इतिहास में यह पहला अवसर था जबकि उसका प्रभाव असम, उड़ीसा तथा सुदूर दक्षिण में व्याप्त हो गया । अपने जीवनपर्यन्त उसने इस विस्तृत साम्राज्य पर शासन किया ।

प्रशासन के कार्यों में उसने अपने योग्य तथा अनुभवी मन्त्रियों दर्भपाणि और केदार मिश्र से पर्याप्त सहायता प्राप्त की थी जबकि उसका चचेरा भाई जयपाल उसकी सैनिक विजयों में प्रमुख सहायक था । अपने पिता की भाँति देवपाल भी बौद्ध मतानुयायी था । लेखों में उसे भी ‘परमसौगत’ कहा गया है । तारानाथ उसे वौद्ध धर्म की पुन स्थापना करने वाला कहता है ।

उसने वौद्ध विहारों के निर्माण में योगदान दिया । कुछ विद्वानों के अनुसार उसने ओदन्तपुरी (विहार) के प्रसिद्ध वीद्धमठ का निर्माण करवाया था । जावा के शैलेन्द्रवंशी शासक वालपुत्रदेव के अनुरोध पर देवपाल ने उसे नालन्दा में एक वौद्ध विहार बनवाने के लिये पांच गाँव दान में दिया था । उसने नगरहार (जलालाबाद) के प्रसिद्ध विद्वान् वीरदेव का सम्मान किया तथा उन्हें नालन्दा महाविहार का अध्यक्ष बनाया ।

नालन्दा तथा उसके सीमावर्ती क्षेत्र से उसके समय के अनेक लेख प्राप्त होते हैं जो उसके नैष्ठिक बौद्ध होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं । उसका चालीस वर्षों का शासन बंगाल के इतिहास में शान्ति एवं समृद्धि का काल रहा ।

धर्मपाल तथा देवपाल का शासन-काल बंगाल के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली युग का निर्माण करता है । ब्रिटिश काल तक भारतीय राजनीति में इसके पूर्व अथवा बाद में कभी भी बंगाल का इतना अधिक महत्व नहीं रहा ।

देवपाल के उत्तराधिकारी तथा पाल-साम्राज्य का विनाश:

देवपाल का शासन-काल पाल-शक्ति के चर्मोत्कर्ष को व्यक्त करता है । इसके वाद पाल साम्राज्य की अवनति प्रारम्भ हुई । देवपाल का उत्तराधिकारी विग्रहपाल (850-854 ईस्वी) हुआ जिसने अल्पकालीन शासन के बाद अपने पुत्र नारायणपाल के पक्ष में सिंहासन त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया । नारायणपाल की भी सैनिक जीवन की अपेक्षा साधु जीवन व्यतीत करने में अधिक रुचि थी ।

इन दोनों नरेशों के निर्बल शासन-काल में प्रतिहारों को पालों के विरुद्ध महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई । प्रतिहार शासक भोज तथा महेन्द्रपाल ने इन्हें पराजित कर पूर्व की ओर अपना साम्राज्य विस्तृत किया । महेन्द्रपाल के समय में तो मगध तथा उत्तरी बंगाल के ऊपर प्रतिहारों का अधिकार स्थापित हो गया । इसके अतिरिक्त असम और उड़ीसा के सामन शासकों ने अपनी-अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी ।

इस प्रकार नारायणपाल का राज्य केवल बंगाल के एक भाग में संकुचित हो गया । परन्तु अपने शासन के अन्त तक उसने किसी प्रकार मगध तथा उत्तरी बंगाल पर पुन अपना अधिकार स्थापित कर सकने में सफलता प्राप्त कर लिया । उसकी मृत्यु 908 ईस्वी के लगभग हुई ।

908 ईस्वी से 988 ईस्वी तक के 80 वर्षों के समय में तीन राजाओं-राज्यपाल, गोपाल द्वितीय तथा विग्रहपाल द्वितीय-ने पालवंश में शासन किया । इन राजाओं के काल में पाल-शक्ति का उत्तरोत्तर हास होता गया । बंगाल के पाल राज्य के भीतर ही दो स्वतन्त्र वशों ने अपनी सत्ता स्थापित की-पश्चिमी बंगाल में कम्ब्रोज तथा पूर्वी बंगाल में चन्द्रवंश ।

विग्रहपाल द्वितीय के समग -तक आते- आते पाली का बंगाल पर से शासन समाप्त हो गया तथा अब पालवशी शासक केवल विहार में शासन करने लगे । इस प्रकार पाल साम्राज्य लगभग समाप्त-प्राय होने वाला था कि इस वंश की गद्दी पर महीपाल प्रथम जैसा एक शक्तिशाली शासक आसीन हुआ ।

महीपाल पुन अपने वश की लुप्त हुई प्रतिष्ठा स्थापित करने में जुटा । उसने शीघ्र ही बंगाल के विद्रोहियों का दमन कर सम्पूर्ण उत्तरी तथा पूर्वी बंगाल को जीत लिया । उसने कम्ब्रोजों को बंगाल से बाहर निकाल दिया । उत्तरी बंगाल के वानगढ से उसके शासन-काल के नवे वर्ष का लेख मिलता है जिसमें कहा गया है कि महीपाल ने ‘अपने सभी शत्रुओं को मारकर उनसे अपना पैतृक राज्य पुन छीन लिया जिन्होंने अपना अधिकार न होते हुए भी अपने बाहुबल के गर्व से उस पर अधिकार कर लिया था ।’

उत्तरी तथा दक्षिणी बिहार से भी महीपाल के शासन-काल के कई लेख मिलते है जो उन भागों पर उसके अधिकार की पुष्टि करते है । पता चलता है कि अपने शासन-काल के अन्त में उसने अंग को भी जीत लिया था । सारनाथ लेख (1026 ईस्वी) काशी क्षेत्र पर उसके अधिकार का सूचक है ।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि महीपाल प्रथम देवपाल के पश्चात् पात्स्वश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा सिद्ध हुआ । 1023 ईस्वी के लगभग उसे राजेन्द्र चोल प्रथम के हाथों पराजित होना पड़ा परन्तु इससे उसकी कोई विशेष क्षति नहीं हुई ।

इस प्रकार अपनी विजयों द्वारा महीपाल ने अपने प्राचीन राज्य के अधिकांश स्थानों को पुन अपने अधिकार में कर लिया जिसके परिणामस्वरूप दसवीं शती के अन्त में बंगाल का पाल राज्य पुन पूर्वी भारत का अत्यन्त शक्तिशाली राज्य वन गया । महीपाल ने 1038 ईस्वी तक शासन किया । उसने अनेक मन्दिर तथा विहार बनवाये थे । उसके शासन-काल में बौद्ध धर्म को पुन प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हो गया ।

महीपाल की मृत्यु के बाद पालवंश की अवनति प्रारम्भ हुई । उसका उत्तराधिकारी जयपाल (1038-1055 ईस्वी) हुआ । उमे कलचुरि-चेदि नरेश कर्ण ने पराजित किया । इसके वाद उसका पुत्र विग्रहपाल तृतीय (1055 – 1070 ईस्वी) राजा बना । वह अपने राज्य को कलचुरि तथा चालुक्य आक्रमणों से सुरक्षित रख सकने में सफल रहा ।

उसका विवाह कलचुरि नरेश कर्ण की कन्या यौवनश्री के साथ हुआ था । विग्रहपाल के वाद उसके तीन पुत्रों-महीपाल द्वितीय, शुरपाल तथा रामपाल-के बीच संघर्ष हुए । महीपाल ने अपने दोनों भाईयों को कारागार में डाल दिया । उसके समय में अशान्ति और अव्यवस्था बनी रही ।

चाशिकैवर्त माहिष्य जाति के लोगों ने अपने नेता दिव्य दिव्योक) के नेतृत्व में विद्रोह किया । उसने महीपाल की हत्या कर दी तथा उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया । दिव्य के वाद उसका भतीजा भीम शासक बना । इसी समय रामपाल ने किसी तरह अपने को कारागार से मुक्त कर लिया ।

उसने राष्ट्रकूटों की मदद से एक सेना तैयार की तथा भीम को मारकर अपने पैतृक राज्य पर पुन अधिकार कर लिया । उसने उत्तरी विहार तथा सम्भवत असम की भी विजय की तथा 1120 ईस्वी तक शासन करता रहा । कुछ विद्वान उसे ही पालवंश का अन्तिम शासक मानते हैं ।

अभिलेखों में इसके बाद कुमारपाल, गोपाल तृतीय तथा मदनपाल के नाम मिलते है जो अयोग्य तथा निर्वल शासक थे । मटनपाल ने 1161 ईस्वी तक राज्य किया । इस समय तक पाल राज्य के विघटन की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी । वारहवीं शताब्दी के अन्त में बंगाल का पाल राज्य सेनवंश के अधिकार में चला गया ।

पालशासन का महत्व (Importance of Pala Empire):

पाल राजाओं का शासन-काल प्राचीन भारतीय इतिहास के उन राजवंशों में से एक है जिन्होंने सबसे लम्बे समय तक राज्य किया । चार सौ वर्षों के उनके दीर्घकालीन शासन में बंगाल का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से अभूतपूर्व विकास हुआ ।

पाल नरेश वौद्ध मतानुयायी थे तथा उन लोगों ने उस समय बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय दिया जबकि उसका भारत से पतन हो रहा था । उन्होंने बिहार और बकल में अनेक चैत्य, विहार एवं मूर्तियाँ वनवायीं । परन्तु वे धर्मसहिष्णु शासक थे और उन्होंने ब्राह्माणों को भी दान दिया तथा मन्दिरों का निर्माण करवाया ।

पालवंशी शासकों ने शिक्षा और साहित्य के विकास को भी प्रोत्साहन प्रदान किया । सोमपुरी, उदन्तपुर तथा विक्रमशिला में शिक्षण संस्थाओं की स्थापना हुई । इनमें विक्रमशिला कालान्तर में एक ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बन गया । इसकी स्थापना धर्मपाल ने की थी । पूर्वमध्यकाल के शिक्षा केन्द्रों में उसकी ख्याति सबसे अधिक थी ।

यहाँ अनेक बौद्ध मन्दिर तथा विहार थे । बारहवीं शताब्दी में यहाँ लगभग 3000 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे । दौड़ धर्म तथा दर्शन के अतिरिक्त यही व्याकरण, न्याय, तन्त्र आदि की भी शिक्षा दी जाती थी । यहाँ विद्वानों की एक मण्डली थी जिसमें टीपकर का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है । उन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार का कार्य किया ।

अन्य विद्वानों में रक्षित, विरोचन, शनपाद, ज्ञानश्री, रलवज, अभयकर आदि के नाम उल्लेखनीय है। इस समय विक्रमशिला ने नालन्दा विश्वविद्यालय का स्थान ग्रहण कर लिया था। यहाँ विभिन्न देशों, विशेषकर तिब्बत के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिये आते थे ।

उनके आवास तथा भोजन की व्यवस्था और विश्वविद्यालय का खर्च राजाओं तथा कुलीन नागरिकों द्वारा दिये गये दान से चलता था । बारहवीं शती तक इस शिक्षा केन्द्र की उन्नति होती रही । 1203 ईस्वी में मुस्लिम आक्रान्ता बख्तियार खिलजी ने इसे ध्वस्त कर दिया ।

इस काल के प्रमुख विद्वानों में संध्याकर नन्दी का नाम भी उल्लेखनीय है । उन्होंने ‘रामचरित’ नामक ऐतिहासिक काव्य-गन्ध की रचना की । अन्य विद्वानों में हरिभद्र, चक्रपाणि दत्त, वजदत्त आदि के नाम प्रसिद्ध हैं ।

पालकालीन कला एवं स्थापत्य (Art and Architecture during Pala Empire):

पालवंशी नरेश महान निर्माता थे । नालन्दा, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी, सोमपुरी आदि में उनके द्वारा वौद्ध विहार एवं भवन वनवाये गये । तारानाथ के अनुसार इस वश के संस्थापक राजा गोपाल ने नालन्दा में बौद्ध विहार वनवाया था । उसने सोमपुरी तथा ओदन्तपुरी में भी मठों का निर्माण करवाया था ।

सारनाथ लेख (वि॰ सं॰ 1083 = 1016 ई॰) से पता चलता है कि महीपाल ने काशी में सैकड़ों भवन एवं मन्दिर स्थापित करने के लिए अपने भाइयों स्थिरपाल और वसन्तपाल को रखा था । रामपाल ने रामावती नामक एक नया नगर वसाकर वहीं भवन तथा मन्दिर बनवाये थे । आठवीं शती के वाद धर्मपाल ने विक्रमशिला महाविहार की स्थापना करवायी तथा वहाँ अनेक व्याख्यान कक्ष बनवाये ।

पालयुगीन भवन एवं स्मारकों के अवशेष पहाड़पुर राजाशाही-बंगलादेश) की खुदाई में प्राप्त होते है । यहाँ से एक विशाल मन्दिर का अवशेष मिलता है जो उत्तर-दक्षिण में 356 फुट तथा पूरव-पश्चिम में 314 फुट लम्बा है । इसी स्थान पर मोमपुर विहार स्थित था । इन मन्दिर में कई चबूतरे हैं ।

भवन के चारों ओर चौड़े मुंडेरे से घिरा हुआ प्रदक्षिणापथ है । प्रथम दो चबूतरों पर चढ़ने के लिये सीढियां बनाई गयी हैं । मध्य भाग में वर्गाकार मिट्टी का आ था जो चबूतरों से ऊपर उठा हुआ है । दीवारें सूखे ईंट की बनी है जिसे गारे से जोड़ा गया है । ईंट-गारे के मन्दिर आज भी भूतल से 70 फुट की ऊंचाई पर विद्यमान है ।

इस मन्दिर का निर्माण धर्मपाल के शासनकाल में करवाया गया था । मार्शल के अनुसार यह ‘गर्भचैत्य’ से युक्त था जवकि आर॰डी॰ वनर्जी ने इसे ‘खुले छत वाला प्रकोष्ठ’ कहा है । इस प्रकृति का दूसरा मन्दिर इतिहास में नहीं दिखाई देता । वी॰ डी॰ चट्टोपाध्याय हमारा ध्यान बृहत्संहिता एवं मक्यपुराण में उल्लिखित जर्वतोधद्य नामक भवन की ओर आकर्षित करते हैं जिसमें चौकोर गर्भगृह, प्रत्येक दिशा में प्रवेश द्वार तथा चारों कोनों में छोटे कक्ष बने होते थे ।

इसे ‘चतुशाला गृह’ कहा जाता था । पहाड़पुर का मन्दिर इसी प्रकार का लगता है । इसमें कई चवूतरे है । प्रत्येक एक मंजिल की ऊंचाई वाला है तथा इसके चारों ओर पूजागृह निर्मित है । इस मन्दिर का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तथा वर्मा के मन्दिरों पर भी पड़ा । पाल शासकों ने वर्दवान जिले में भी मन्दिर बनवाये थे ।

इस जिले के बरकर नामक स्थान पर मन्दिरों का समूह है जिनका निर्माण दसवीं-ग्यारहवीं शती में करवाया गया था । इस समूह में ‘सिद्धेश्वर’ मन्दिर सबसे अलंकृत है । ये ईटों के बने हैं तथा इनका समस्त बाहरी भाग भी ईंटों से ही ढका है । दीवारों की सम्पूर्ण सतह पर मृण्मूर्तिर्यो उत्कीर्ण है । प्रचुर सज्जा केवल रेखाओं का लालित्य प्रकट करती है ।

कुछ मन्दिर बंगाल की देशी शैली जिसमें बास की सहायता से झोपड़िया तैयार की जाती थीं, के अनुकरण पर भी बनाये गये है । मन्दिर के बाहरी भाग में उभरी हुई मिट्टी की मूर्तियों के चौकोर खण्ड (फलक मूर्तियों) लगाये गये हैं । वक्र कंगूरे तथा ओतली इनकी खास विशेषता है जिन्हें बास निर्मित झोपड़ियों से सीधे ग्रहण किया गया है ।

सामान्य लोग बांस के छप्पर वाली झोपड़ियों के ऊपर दोनों ओर ढालू छज्जे निकालते थे ताकि बार-बार होने वाली वर्षा के पानी को आसानी से बहाया जा सके । यह प्रथा दक्षिणी बंगाल में अधिक प्रचलित थी । इसी का अनुकरण मन्दिरों में भी किया गया । ऐसे मन्दिरों का निर्माण संभवत: मल्ल राजाओं के समय में करवाया गया जो मन्दिर निर्माण के प्रेमी थे ।

विष्णुपुर में इस प्रकार के मन्दिर समूह के ध्वंसावशेष मिले हैं । इनके वाह्य दीवारों में खुदी हुई मृण्मूर्तियाँ लोक-जीवन एवं अभिरुचि के विविध पक्षों पर सुन्दर प्रकाश डालती हैं । इस प्रकार पाल वास्तुकला इतिहास में सर्वथा नया प्रतिमान स्थापित करती है ।

तक्षण कला के क्षेत्र में भी पालकालीन कलाकारों ने एक सर्वथा नवीन शैली का सूत्रपात किया जिसे ‘मगध जंग शैली’ कहा जाता है । तारानाथ इसे ‘पूर्वी भारतीय शैली’ की संज्ञा देते हैं तथा इसका प्रवर्त्तक धीमान् तथा विपत्तपाल को मानते है । इसकी विशेषता यह है कि इसमें चिकने काले रंग के कसौटी बाले पाषाण तथा धातुओं की सहायता से मूर्तियों का निर्माण किया गया है ।

बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्म से संबंधित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियों बनाई गयीं । ये बिहार तथा बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से मिलती हैं । नालन्दा, बोधगया, राजगृह, कुर्कीहार, भागलपुर, दिनाजपुर, पहाड़पुर आदि विभिन्न स्थानों से प्राप्त की गयी उत्‌सख’ क मूर्तियों कलकत्ता, पटना, लखनऊ तथा लन्दन, पेरिस, आदि संग्रहालयों में सुरक्षित है । मूर्तियों अधिकांशत: हाथ से बनाई जाती थीं ।

यद्यपि कलाकारों ने अपने शिल्प में अधिकतम रूप गरिमा को समेटने का प्रयास किया तथापि इसमें वह सहज सौन्दर्य दिखाई नहीं देता जो गुप्तयुगीन मूर्तियों में था। पाल मूर्तियों में मौलिकता का भी अभाव है । मूर्तियों को आभूषणों से लाद दिया गया है जिससे कृत्रिमता का स्पष्ट आभास मिलता है ।

यहाँ तक कि विरागी बुद्ध की मूर्तियों भी आभूषणों से अलंकृत है जिससे उनका भाव पक्ष आवृत हो गया है । पाल शैली की मूर्तियों में किरीट, मुकुट, हार, कंगन, बाजूवन्द आदि दिखाये गये है । अंग-प्रत्यगों में झुकाव के माध्यम से मूर्तियों को सजीव बनाने का प्रयास किया गया है । वस्तुत: अलंकरण की अधिकता तथा अंग-प्रत्यंग का चपल आभा इस शैली की विशेषता बन गयी है ।

देव मूर्तियों में मानवीय मौन्दर्य को आकर्षक ढंग से उभारने का प्रयत्न किया गया है । तन्त्रपान के प्रभाव से पुरुष मूर्तियों के शरीर में नारी सुलभ कमनीयता को प्रदर्शित करने का प्रयास हुआ है । बोधिसत्व तथा दूसरे देवताओं की मूर्तियों में नारी सौन्दर्य तथा शक्ति का समावेश दिखाई देता है ।

कुछ मूर्तियों को देखने से धार्मिक असहिष्णुता एवं कट्टरता का आभास मिलता है । अनेक बुद्ध मूर्तियों को हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित करते हुए दिखाया गया है । गणेश, पार्वती, भैरव जैसे देवता बौद्ध मूर्तियों द्वारा मर्दित होते हुए प्रदर्शित किये गये है जिससे द्वेष एवं कट्टरता की भावना उजागर होती है ।

इस दृष्टि से पाल कला में भारतीय संस्कृति में व्याप्त सहिष्णुता एवं समन्वयवादिता नहीं दिखाई देती है । इस प्रकार पालकालीन वास्तु रख तक्षण कला के जो थोड़े बहुत नमूने मिलते है उनके आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि यह साधारण कोटि की थी ।

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