Read this article in Hindi to learn about how the rise of Malik Amber lead to the fall of Mughal empire during medieval period.

मुगलों के हाथों अहमदनगर के पतन और बहादुर निजामशाह की गिरफ्तारी के बाद अहमदनगर का संभवत: विघटन हो चुका होता और उसके विभिन्न भागों को पड़ोसी राज्य चबा चुके होते, यदि मलिक अंबर नाम के एक उल्लेखनीय व्यक्ति का उदय न हुआ होता ।

मलिक अंबर इथियोपिया मे जन्मा एक अबीसीनियाई था । उसके आरंभिक जीवन और कृतित्व के बारे में हम कुछ अधिक नहीं जानते । लगता है उसके गरीब माता-पिता ने उसे बगदाद के गुलाम बाजार में बेच दिया था । कालांतर में उसे एक सौदागर ने खरीदा जिसने उसके साथ अच्छा व्यवहार किया और उसे संभावनाओं से भरपूर प्रदेश दकन में ले आया ।

मुर्तजा निजामशाह के प्रसिद्ध और प्रभावशाली अमीरों में से एक चंगेज खान की सेवा में रहकर मलिक अंबर ऊपर उठा । मुगलों ने अहमदनगर पर हमला किया तो अबर अपना भाग्य आजमाने पहले तो बीजापुर चला गया लेकिन जल्द ही वह वापस आ गया और उस शक्तिशाली हब्शी अबीसीनियाई दल में शामिल हो गया जो चाँद बीबी का विरोधी था ।

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अहमदनगर के पतन के बाद मलिक अंबर ने एक निजामशाही शाहजादे का पता लगाया और बीजापुर के शासक की गुप्त सहायता से उसे मुर्तजा निजामशाह द्वितीय के नाम से गद्‌दी पर बिठा दिया । खुद वह उसका पेशवा बन गया । अहमदनगर में यह पद काफी पहले से चलता आ रहा था ।

मलिक अंबर ने अपने आसपास मराठा दस्तों बर्मियों की एक बड़ी संख्या जमा कर ली थी । मराठे तीव्र गति से आगे बढ़ने तथा दुश्मन फौजों को लूटने और उनकी रसद बंद कर देने में सिद्धहस्त थे । दकन में यह छापामार युद्धकला मराठों की पंरपरा थी । लेकिन मुगल इसके अभ्यस्त नहीं थे ।

मराठों की सहायता से अंबर ने बरार अहमदनगर और बालाघाट में मुगलों के लिए अपनी स्थिति को मजबूत बनाना कठिन बना दिया । दकन में तब मुगलों के कमानदार अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना थे जो एक चालाक राजनीतिज्ञ और योग्य सेनापति थे ।

उन्होंने तेलंगाना में नांदेर नामक स्थान पर 1601 में अंबर को करारी मात दी । लेकिन उन्होंने अंबर को दोस्त बनाने का फैसला किया क्योंकि वे मानते थे कि बाकी निजामशाही राज्य में कुछ स्थायित्व तो होना ही चाहिए ।

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अपनी ओर से अंबर ने भी खान-ए-खाना से दोस्ती करना उपयोगी जाना क्योंकि इसके बल पर वह अपने आतरिक विरोधियों से निपट सका । लेकिन अकबर की मृत्यु के बाद जब मुगल कमानदारों के मतभेदों के कारण दकन में मुगलों की स्थिति कमजोर हो गई तो अंबर ने बरार, बालाघाट, और अहमदनगर से मुगलों को बाहर करने के लिए एक भयानक मुहिम छेड़ दी ।

इस उद्यम में उसकी सहायता बीजापुर के शासक इब्राहीम आदिलशाह ने की जो बीजापुर और मुगलों के बीच एक तटस्थ निजामशाही राज्य की मौजूदगी आवश्यक समझता था । उसने अंबर को उसके परिवार के निवास के लिए तथा खजानों साज-समान आदि रखने के लिए तेलंगाना का शक्तिशाली कंदहार का किला सौंप दिया ।

उसने 10,000 घुड़सवार भी भेजे जिनके निर्वाह के लिए एक सुनिश्चित भूभाग को अलग करना तय हुआ । बीजापुर के अग्रणी इथोपियाई अमीरों में एक की बेटी का मलिक अंबर के बेटे से ब्याह करके इस संधि को पक्का बनाया गया । 1609 में हुए इस विवाह पर भारी जश्न मनाया गया । आदिलशाह ने दुल्हन को एक शानदार दहेज दिया तथा सिर्फ आतिशबाजी पर लगभग 80,000 रुपये खर्च किए ।

बीजापुर के समर्थन से लैस होकर और मराठों की सक्रिय सहायता से अंबर ने जल्द ही खान-ए-खाना को पीछे हटकर बुरहानपुर लौटने पर मजबूर कर दिया । इस तरह दकन में अकबर के सारे विजित प्रदेश 1610 तक हाथ से निकल गए । जहाँगीर ने एक बड़ी सेना देकर शाहजादा परवेज को दकन भेजा ।

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पर वह मलिक अंबर की चुनौती नहीं झेल सका । अहमदनगर भी हाथ से निकल गया तथा परवेज को अंबर के साथ एक अपमानजनक शांति-संधि करनी पड़ी । मलिक अंबर का भाग्य मुस्कुराता रहा और जब तक उसे मराठों और दूसरे दकनी तत्त्वों का ठोस समर्थन प्राप्त रहा मुगल फिर से अपनी हस्ती न जता सके । पर आगे चलकर मलिक अंबर दंभी हो गया और अपने सहयोगियों को नाराज कर बैठा ।

खान-ए-खाना ने जिसे दोबारा दकन का मुगल सूबेदार नियुक्त किया गया था इस स्थिति का लाभ उठाया तथा अनेक हब्शियों तथा मराठा सरदारों जैसे ज्यादेवराज बाबाजी काटे उदाजी राम आदि मराठा सरदारों को अपनी ओर खींच लिया । खुद जहाँगीर मराठों के महत्व को अच्छी तरह जानता था क्योंकि उसने तुजुक-ए-जहाँगीरी में कहा है कि मराठे ‘सख्तजान लोग हैं और वे देश में प्रतिरोध के केंद्र हैं ।’

मराठा सरदारों की मदद से खान-ए-खाना ने 1616 में अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा की संयुक्त सेना को करारी मात दी । मुगलों ने नई निजामशाही राजधानी खिड़की पर कब्जा किया और हटने से पहले सारी इमारतों को जला डाला ।

इस हार ने मुगल विरोधी गंठजोड़ को हिला डाला । लेकिन अंबर ने अपना प्रतिरोध जारी रखा । खान-ए-खाना की जीत का सिलसिला आगे बढ़ाने के लिए जहाँगीर ने अपने बेटे शाहजादा खुर्रम (आगे चलकर शाहजहाँ) की कमान में (1618 में) एक भारी सेना भेजी और शाहजादे की सहायता के लिए स्वयं माँडू आकर जम गया ।

इस खतरे के मुकाबले अंबर के पास समर्पण के सिवा कोई चारा नहीं बचा । पर महत्वपूर्ण बात यह है कि इस संधि के द्वारा जहाँगीर ने दकन में अकबर के जीत हुए प्रदेशों के अलावा विस्तार करने का कोई प्रयास नहीं किया । इसका कारण जहाँगीर की कोई सैनिक कमजोरी नहीं थी जैसा कि कभी-कभी कल्पना की गई है बल्कि यह एक सोची-समझी नीति का हिस्सा था ।

लगता है जहाँगीर दकन में मुगलों की व्यस्तता को बढ़ाना या दकन के मामलों में कुछ अधिक फंसना नहीं चाहता था । इसके अलावा अभी भी उसे आशा थी कि उसकी नरमी के कारण दकनी राज्यों में स्थिरता आएगी और वे मुगलों के साथ शांति से रहेंगे । इस नीति के तहत जहाँगीर ने बीजापुर को अपनी ओर खींचने की कोशिश की तथा आदिलशाह को ‘पुत्र’ कहते हुए उसके नाम एक अनुकंपापूर्ण फरमान भेजा ।

इन हारों के बावजूद अंबर मुगलों के खिलाफ दकनी संघर्ष का नेतृत्व करता रहा और दकन में शांति नहीं आई । लेकिन दो साल बाद संयुक्त दकनी सेना को मुगलों के हाथों एक और गहरी मात मिली । अंबर को सारे मुगल क्षेत्र वापस देने पड़े साथ में लगा 14 कोस का क्षेत्र और भी देना पड़ा ।

दकनी राज्यों को पाँच लाख रुपये का हर्जाना देना पड़ा । इन जीतों का सेहरा शाहजादा खुर्रम के सर बाँधा गया । पहली हार के कुछ ही समय बाद दूसरी हार ने दकनी राज्यों के मुगल विरोधी गंठजोड़ को आखिर छिन्न-भिन्न कर दिया । अब दकनी राज्यों की पुरानी शत्रुताएँ फिर उभर आई ।

अंबर ने बीजापुर के खिलाफ अनेक अभियान शोलापुर को वापस पाने के लिए छेड़े जो दोनों राज्यों के बीच टकराव की जड़ था । अंबर तीव्रगति से बीजापुर की राजधानी पहुँचा उसने इब्राहीम आदिलशाह की बसाई नई राजधानी नौरसपुर को जला डाला और आदिलशाह को शरण के लिए भागकर किले में जाने पर मजबूर कर दिया । इसे अंबर की शक्ति का चरम माना जा सकता है ।

हालाकिं अंबर ने उल्लेखनीय सैन्य कौशल, ऊर्जा और संकल्प का परिचय दिया पर मुगलों के साथ समझौता करने में उसकी असमर्थता या अनिच्छा के कारण उसकी उपलब्धियाँ अस्थायी ही रहीं । लेकिन अंबर के उदय का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वह दकनी मामलों में मराठों के महत्व का सुस्पष्ट सूचक था । मलिक अंबर के नेतृत्व में मराठों की सफलता ने उनमें आत्मविश्वास जगाया जिसके चलते उन्होंने बाद में एक स्वतंत्र भूमिका निभाई ।

टोडरमल की मालगुजारी व्यवस्था को लागू करके मलिक अंबर ने निजामशाही राज्य के प्रशासन में सुधार लाने का प्रयास किया । उसने ठेके (इजारा) पर जमीन देने की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी जो किसानों के लिए तबाही का कारण था । उसके स्थान पर उसने जब्ती व्यवस्था को अपनाया ।

1622 के बाद जब जहाँगीर के खिलाफ शाहजादा खुर्रम की बगावत के कारण दकन में उथलपुथल मची थी, मलिक अंबर फिर एक बार ऐसे अनेक क्षेत्रों को वापस पाने में सफल रहा जो मुगलों को सौंप दिए गए थे । दकन में मुगलों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए जहाँगीर का प्रयास इस प्रकार असफल रहा ।

मुगलों के साथ फिर से विवाद आरंभ करके अहमदनगर को भी कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं मिला । इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई जब शाहजहाँ को यह फैसला करना पड़ा कि एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अहमदनगर को समाप्त करने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं है । 80 वर्ष की लंबी उस में मलिक अंबर ने अंतिम साँस ली । लेकिन उसके महत्वाकांक्षी कार्यो के कड़वे फल उसके उत्तराधिकारियों को चखने पड़े ।

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