Read this article in Hindi to learn about the establishment of Vijayanagar empire during medieval period in India.

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर और बुक्का ने की जो पाँच भाइयों के परिवार के अंग थे । एक कथा के अनुसार वे पहले तो वारंगल के काकितेयों के सामंत रहे और फिर आधुनिक कर्नाटक में स्थित कंपिली राज्य में मंत्री रहे । एक मुस्लिम विद्रोही को शरण देने के कारण जब कंपिली को मुहम्मद तुगलक ने रौंद डाला तब ये दोनों भाई कैद हुए, उन्होंने इस्लाम अपनाया और विद्रोहों से निबटने के लिए वहाँ नियुक्त किए गए ।

मदुरै का मुस्लिम सूबेदार पहले ही अपने को स्वतंत्र घोषित कर चुका था तथा मैसूर का होयसला शासक और वारंगल का शासक भी स्वतंत्र होने का प्रयत्न कर रहे थे । शीघ्र ही हरिहर और बुक्का ने अपने नए मालिकों को और उनके धर्म को त्याग दिया । अपने गुरु विद्यारण्य के निर्देश पर वे फिर से हिंदू धर्म में शामिल किए गए और उन्होंने विजयनगर को अपनी राजधानी बनाया ।

कुछ आधुनिक विद्वान इस्लाम में दीक्षा की इस कथा को स्वीकार नहीं करते बल्कि उनकी गिनती कर्नाटक के उन नायकों में करते हैं जिन्होंमे तुर्क शासन के खिलाफ विद्रोह किया । हरिहर के राजतिलक को 1336 की घटना बताया जाता है । पहले तो मैसूर के होयसला शासक और मदुरै के सुल्तान दोनों से इस नए राज्य को टकराना पड़ा । मदुरै का सुल्लान बहुत महत्वाकांक्षी था ।

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उसने होयसला शासक को हराया तथा बर्बर ढगं से उसे मार डाला । होयसला राज्य के विघटन का लाभ उठाकर हरिहर और बूक्का ने अपने रजवाड़े को फैला लिया । 1346 तक पूरा होयसला राज्य विजयनगर के शासकों के हाथों में आ चुका था । इस संघर्ष में हरिहर और बुक्का की सहायता उनके भाइयों और संबंधियों ने की जिन्होंने विजित प्रदेशों का प्रशासन सँभाल लिया ।

इस तरह विजयनगर साम्राज्य आरंभ में एक तरह का सहकारी राज्यव्यवस्था था । 1356 में बूक्का अपने भाई की मौत के बाद विजयनगर की गद्‌दी पर बैठा और 1377 तक शासन करता रहा । विजयनगर साम्राज्य की बढ़ती शक्ति के चलते दक्षिण में और उत्तर में भी अनेक शक्तियों के साथ उसका टकराव हुआ ।

दक्षिण में मदुरै के सुल्तान उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे । विजयनगर और मदुरै के सुल्तानों का संघर्ष लगभग चार दशकों तक चला । 1377 तक मदुरै की सल्तनत का सफाया हो चुका था । इस समय रामेश्वरम तक पूरा दक्षिण भारत विजयनगर साम्राज्य में शामिल था । इसमें तमिल प्रदेश तथा चेरों के (केरल) प्रदेश भी शामिल थे ।

लेकिन उत्तर में विजयनगर का सामना बहमनी साम्राज्य के रूप में एक शक्तिशाली शत्रु से हुआ । बहमनी साम्राज्य 1347 में अस्तित्व में आया । एक अफगान दुस्साहसी अलाउद्‌दीन हसन उसका संस्थापक था । वह गंगू नामक एक ब्राह्मण की सेवा में रहकर ऊपर उठा था और इसलिए हसन गंगू भी कहलाता था । सत्ता सँभालने के बाद उसने अलाउद्‌दीन हसन बहमन शाह की उपाधि ग्रहण की । कहते हैं कि वह अपने को ईरान के एक अर्ध-पौराणिक नायक बहमन शाह का वंशज बतलाता था ।

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लेकिन फिरिश्ता द्वारा दर्ज एक लोककथा के अनुसार बहमन शाह नाम धारण करने का उद्‌देश्य अपने ब्राह्मण संरक्षक के प्रति श्रद्धा दिखाना था । जो भी हो इसी खिताब के आधार पर इस साम्राज्य को बहमनी साम्राज्य कहा गया ।

विजयनगर के राजाओं और बहमनी के सुलानों के हित तीन अलग-अलग क्षेत्रों में आपस में टकराते थे: तुंगभद्रा के दोआब में कृष्णा-गोदावरी के कछार में और मराठवाड़ा प्रदेश में । तुंगभद्रा का दोआब कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच का क्षेत्र था और इसका क्षेत्रफल 30,000 वर्ग मील था ।

अपनी संपदा और आर्थिक संसाधनों के कारण यह पहले पश्चिमी चालुक्यों और चोलों के बीच तथा बाद में यादवों और होयसलों के बीच टकराव का कारण रह चुका था । कृष्णा-गोदावरी की वादी बहुत उपजाऊ थी तथा इसके अनेक बंदरगाह इस क्षेत्र के विदेशी व्यापार को नियंत्रित करते थे । इस वादी पर अधिकार पाने के संघर्ष को अकसर तुंगभद्रा दोआब के संघर्ष से जोड़ा गया है ।

मराठा प्रदेश में प्रमुख विवाद कोंकण और उसकी ओर जाने के क्षेत्रों पर नियंत्रण से संबंधित था । कोंकण पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच की एक संकरी-सी पट्‌टी है । यह अत्यंत उपजाऊ था तथा इसमें गोवा का बंदरगाह भी आता था जो इस क्षेत्र की पैदावारी की निकासी का एक महत्वपूर्ण रास्ता था तथा ईरान और ईराक से घोड़ों के आयात का भी । जैसा कि कहा गया है उम्दा नस्ल के घोड़े भारत में नहीं मिलते थे । इस तरह गोवा के रास्ते घोड़ों का आयात दक्षिणी राज्यों के लिए भारी महत्व रखता था ।

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विजयनगर और बहमनी साम्राज्यों के टकराव लगभग नियमित घटना थे और ये तब तक जारी रहे जब तक ये साम्राज्य बने रहे । इन सैनिक टकरावों के कारण विवादित क्षेत्रों और पड़ोस के क्षेत्रों में भारी तबाही मचती थी तथा जान-माल की अच्छी-खासी हानि होती थी ।

दोनों पक्ष गाँवों एवं नगरों को रौंदते और जलाते थे; स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों को कैद करके गुलामों की तरह बेचते थे तथा दूसरी बहुत-सी बर्बरताएँ करते थे । उदाहरण के लिए 1367 में बुक्का प्रथम ने विवादित तुंगभद्रा दोआब में मुदकल किले पर हमला किया तो उसने एक आदमी को छोड़ पूरी छावनी को मौत के घाट उतार दिया ।

यह खबर जब बहमनी के सुल्तान को मिली तो वह आग-बबूला हो उठा और कूच के दौरान उसने कसम खाई कि जब तक बदले के तौर पर एक लाख हिंदुओं को मौत की नींद नहीं सुलाएगा, वह तलवार को म्यान में नहीं रखेगा । उसने बरसाती मौसम और विजयनगर की सेनाओं के प्रतिरोध के बावजूद तुंगभद्रा को पार किया ।

यह पहला अवसर था जब किसी बहमनी सुल्तान ने स्वयं विजयनगर के क्षेत्र में कदम रखा हो । युद्ध में विजयनगर का राजा हारा और भागकर जंगलों में चला गया । इस जंग के दौरान हो दोनों पक्षों द्वारा पहली बार तोपों के इस्तेमाल की बात सुनाई पड़ती है । बहमनी सुल्तान की विजय का श्रेय उसके बेहतर तोपखाने और अधिक कारगर सवार सेना को जाता है ।

यह युद्ध महीनों तक खिंचा पर बहमनी सुल्तान तो राजा को पकड़ सका न उसकी राजधानी पर कब्जा जमा सका । इस बीच पुरुषों स्त्रियों और बच्चों का बड़ी संख्या में वध जारी रहा । अंतत: दोनों पक्ष निढाल हो गए और उन्होंने संधि करने का निर्णय किया ।

इस संधि से पुरानी स्थिति बहाल हुई और दोआब दोनों के बीच बाँट दिया गया । इससे भी महत्वपूर्ण बात यह तय हुई कि चूंकि दोनों राज्य लंबे ममय तक पड़ोसी रहेंगे इसलिए बेहतर यही होगा कि युद्ध के दौरान बेरहमी न बरती जाए । इसलिए निश्चय हुआ कि आगे के युद्धों में असहाय और निहत्थे निवासियों का वध न किया जाए । यह समझौता पूरी तरह लाग तो नहीं हुआ पर इसके कारण दक्षिण भारत के युद्धों में निर्मम जनसंहार की घटनाओं में कमी आई ।

मदुरै की सल्तनत को समाप्त करके दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत बनाने के बाद विजयनगर साम्राज्य ने हरिहर द्वितीय के काल (1377-1404) में पूर्वी तट की ओर प्रसार की नीति का आरंभ किया । इस क्षेत्र में अनेक रजवाड़े थे जिनमें सबसे उल्लेखनीय कृष्णा-गोदावरी कछार के ऊपरी भाग में रेड्‌डी तथा निचले भाग में वारंगल के शासक थे ।

उत्तर में उड़ीसा के शासकों और बहमनी सुल्लानों की भी इस क्षेत्र में दिलचस्पी थी । हालांकि दिल्ली के खिलाफ संघर्ष में वारंगल के शासक ने हसन गंगू की सहायता की थी लेकिन हसन के उत्तराधिकारी ने वारंगल पर हमला करके कौलस के दुर्ग और गोलकुंडा के पहाड़ी किले पर कब्जा कर लिया ।

विजयनगर का राजा दक्षिण में इतना व्यस्त था कि वह हस्तक्षेप न कर सका । बहमनी सुल्तान ने गोलकुंडा को अपनी सीमा करार दिया और वादा किया कि वह या उसके उत्तराधिकारी वारंगल में अब आगे अतिक्रमण नहीं करेंगे । इरा समझौते को पक्का करने के लिए वारंगल के शासक ने बहमनी सुल्तान को एक मोती-माणिक जड़ा तख्त भेंट किया ।

कहते हैं कि इसे मूलत: मुहम्मद तुगलक को पेश करने के लिए बनवाया गया था । बहमनी सुल्लान और वारंगल का समझौता 50 वर्षो से अधिक समय तक जारी रहा तथा यह तुंगभद्रा के दोआब पर कब्जा करने में विजयनगर की असमर्थता का या इस क्षेत्र में बहमनी आक्रमण को रोकन वाला प्रमुख कारण था ।

मध्यकालीन लेखकों ने विजयनगर और बहमनी के युद्धों का बहुत विस्तार से वर्णन किया है । पर उनका हमारे लिए कोई अधिक ऐतिहासिक महत्व नहीं है । दोनों पक्षों की स्थिति कमोबेश अपरिवर्तित रही तथा युद्ध का पलड़ा कभी एक ओर तो कभी दूसरे की ओर झुकता रहा ।

बहमनी-वारंगल गठजोड़ के सामने भी हरिहर द्वितीय ने अपनी स्थिति बनाए रखी । बहमनी साम्राज्य से पश्चिम में स्थित बेलगाम और गोवा छीनना उसकी सबसे बड़ी सफलता थी । उसने उत्तरी श्रीलंका में भी एक मुहिम भेजी ।

अनिश्चितता के एक काल के बाद देवराय प्रथम (1404-1422) हरिहर द्वितीय की मृत्यु के बाद सिंहासनारूढ़ हुआ । उसके शासन के आरंभकाल में तुंगभद्रा दोआब को लेकर फिर युद्ध हुआ । वह बहमनी सुन्तान फिरोजशाह के हाथों हारा और उसे हर्जाने के रूप में दस लाख हूण, मोती-माणिक और हाथी देने पड़े ।

सभी भावी विवादों से बचने के लिए उसे सलान से अपनी बेटी ब्याहने तथा दहेज में दोआब में स्थित बाँकापुर देने का वादा भी करना पड़ा । भारी तामझाम के साथ इस व्विाह का जश्न मनाया गया ।

विवाह के लिए फिरोजशाह बहमनी जब विजयनगर के पास पहुँचा तो देवराय नगर से बाहर आकर भारी शानो-शौकत के दिखावे के बीच उससे मिला । नगर के द्वार से महल तक जो दस किलोमीटर की दूरी पर था, सड़क पर जरी, मखमल, साटन और दूसरे कीमती कपड़े बिछाए गए थे ।

दोनों राजा नगर के चौक से घोड़ों पर सवार होकर साथ चले । जुलूस में देवराय के संबंधी भी शामिल हुए और दोनों राजाओं के आगे पैदल चलते रहे । यह जश्न तीन दिनों तक चलता रहा ।

दक्षिण भारत में यह अपने ढंग का पहला राजनीतिक विवाह नहीं था । इससे पहले गोंडवाना क्षेत्र में खेड़ला का राजा शांति स्थापित करने के लिए फिरोजशाह बहमनी से अपनी बेटी ब्याह चुका था । कहते हैं कि यह राजकुमारी फिरोज की खास चहेती पत्नी थी । पर ये विवाह अपने आप में शांति नहीं ला सकते थे ।

कृष्णा-गोदावरी वादी के सवाल पर विजयनगर बहमनी साम्राज्य और उड़ीसा के बीच फिर टकराव हुआ । रेड्‌डी रजवाड़े में अफरातफरी मच गई । उसके बँटवारे के मकसद से देवराय ने वारंगल के साथ गँठजोड़ कर लिया । वारंगल का बहमनी साम्राज्य का साथ छोड़ने से दकन में शक्ति-संतुलन बदल गया । देवराय फिरोजशाह बहमनी को करारी मात देने और कृष्णा नदी के मुहाने तक पूरे रेड्‌डी क्षेत्र को हथियाने में सफल रहा ।

देवराय प्रथम ने शांतिकालीन कलाओं की उपेक्षा नहीं की । उसने तुंगभद्रा पर एक बाँध बनवाया ताकि जल का कमी दूर करने के लिए नगर में नहरें ला सके । इससे पास के खेतों की सिंचाई भी होने लगी क्योंकि कहा गया है कि इन नहरों के कारण उसकी आय में 3,50,000 परादों की वृद्धि हुई । सिंचाई के लिए उसने हरिद्र नदी पर भी एक बाँध बनवाया ।

कुछ अफरातफरी के बाद विजयनगर की गद्‌दी पर देवराय द्वितीय (1425-1466) बैठा, जिसे इस वंश का सबसे महान शासक समझा जाता है । अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए उसने उसका पुनर्गठन किया और उसमें दिल्ली सल्तनत की सेनाओं की अनेक विशेषताओं को शामिल किया ।

फिरिश्ता के अनुसार देवराय द्वितीय को लगता था कि अधिक दमदार घोड़े और घुड़सवार तीरंदाजों की भारी संख्या बहमनी सेना की श्रेष्ठता के कारण हैं । इसलिए उसने 2000 मुसलमान भरती किए उन्हें जागीरें दीं तथा अपने सभी हिंदू सैनिकों और अधिकारियों को उनसे घोड़े पर सवार होकर तीर चलाने की कला सीखने को कहा ।

विजयनगर सेना मे मुसलमानों की भरती कोई नई बात नहीं थी । कहते हैं कि देवराय प्रथम की सेना में भी 10,000 मुसलमान थे । फिरिश्ता का कथन है कि देवराय द्वितीय ने 80,000 घुड़सवारों और दो लाख पियादों के अलावा तीर चलाने में कुशल 60,000 हिंदू भी जमा कर लिए । इन आँकड़ों में अतिशयोक्ति हो सकती है ।

लेकिन एक बड़े घुड़सवार दस्ते और स्थायी सेना के निर्माण ने विजयनगर साम्राज्य को दक्षिण में पहले के किसी भी हिंदू राज्य के मुकाबले अधिक केंद्रीकृत बना दिया भले ही साम्राज्य के संसाधनों पर इसके कारण भारी दबाव पड़ा हो । कारण कि अधिकांशत अच्छे घोड़ों का आयात किया जाता था और इस व्यापार को नियंत्रित करने वाले अरब उनसे भारी दाम वसूला करते थे ।

अपनी नई सेना के साथ देवराय द्वितीय ने 1443 में तुंगभद्रा को पार किया और मुदकल, बाँकापुर वगैरह को फिर से पाने का प्रयास किया जो कृष्णा नदी के दक्षिण मेँ थे और बहमनी सुल्तानों के हाथों में जा चुके थे । तीन कड़ी लड़ाइयाँ लड़ी गई पर आखिरकार दोनों पक्षों को मौजूदा सीमाओं पर सहमत होना पड़ा ।

सोलहवीं सदी के पुर्तगाली लेखक नूनीज का कहना है कि क्वीलोन, श्रीलंका, पुलिकट तथा (बर्मा और मलाया में) पेगू और तेन्नासेरीम के राजा देवराय द्वितीय को खिराज देते थे । विजयनगर के शासक समुद्र में क्या इतने शक्तिशाली थे कि पेगू और तेन्नासेरीम से नियमित रूप से खिराज वसूल सकें, इसमें संदेह है ।

कहने का आशय शायद यह रहा हो कि इन देशों के शासक विजयनगर के संपर्क में थे तथा उसकी सदिच्छा पाने के लिए उसे उपहार और दूत भेजते रहते थे । श्रीलंका पर अनेक आक्रमण अवश्य हुए । एक मजबूत नौसेना के बिना यह संभव नहीं था ।

योग्य शासकों की एक शृंखला के अंतर्गत विजयनगर पंद्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में दक्षिण का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध राज्य बनकर उभरा । इतालवी यात्री निकोलो कोंती ने, जो 1420 में विजयनगर आया था, उसका एक सजीव वृत्तांत दिया है ।

वह कहता है, ‘नगर का घेरा 60 मील है, उसकी दीवारें पहाड़ों तक चली गई हैं और इन पहाड़ों की तराई में पहुँचकर उन्होंने घाटियों के गिर्द घेरा बना दिया है…..इस नगर में शस्त्र धारण करने योग्य नब्बे हजार लोगों के होने का अनुमान है । उनका राजा भारत के दूसरे सभी राजाओं से अधिक शक्तिशाली है ।’

फिरिश्ता का भी कथन है, ‘बहमनी घराने के शाहजादों ने केवल अपनी वीरता के बल पर अपनी श्रेष्ठता बनाए रखी क्योंकि शक्ति संपत्ति और देश के विस्तार में बीजानगर (विजयनगर) के राय उनसे बहुत आगे हैं ।’

फारस का यात्री अब्दुर्रज्जाक, जिसने भारत में और बाहर दूर-दूर तक की यात्राएँ की थीं, देवराय द्वितीय के काल में विजयनगर आया था । वह इस राज्य का एक प्रशंसापूर्ण विवरण पेश करता है । वह कहता है, ‘इस राजा के राज्य में 300 बंदरगाह हैं जिनमें से हर एक कालीकट के बराबर है, और उसका प्रादेशिक विस्तार इतना अधिक है कि थलमार्ग से उसकी यात्रा पूरी करने में तीन महीने लग जाते हैं ।’

सभी यात्रियों का कहना है कि इस प्रदेश की घनी आबादी थी तथा यहाँ अनेक नगर और गाँव थे । अब्दुर्रज्जाक के अनुसार ‘देश के अधिकांश भाग अच्छी खेती वाले और उपजाऊ हैं । सैनिकों की संख्या ग्यारह लाख है ।’

अब्दुर्रज्जाक ने विजयनगर को संसार के ऐसे किसी भी भाग के सबसे शानदार नगरों में एक माना है जिसे उसने देखा या सुना हो । नगर का वर्णन करते हुए वह कहता है, ‘इसे इस ढंग से बनाया गया है कि सात परकोटे और उतनी ही दीवारें एक दूसरे को घेरे हुए हैं ।

सातवाँ किला, जिसे दूसरों के केंद्र में रखा गया है, हेरात नगर के बाजार के दस गुने क्षेत्रफल में फैला हुआ है ।’ नगर की ओर से शुरू करने पर चार बाजार आते थे ‘जो बहुत लंबे और चौड़े’ थे । जैसा कि भारत का रिवाज था एक जाति या पेशे के लोग नगर के एक विशेष भाग में रहते थे । लगता है मुसलमान उनके लिए सुलभ कराए गए अलग मुहल्लों में रहते थे ।

बाजारों में, और राजा के महल में भी, ‘तराशकर पालिश किए गए चिकने पत्थरों से बने अनेक तालाब और नहरें दिखाई देती हैं ।’ बाद का एक और यात्री कहता है कि यह नगर रोम से भी बड़ा था जो उन दिनों पश्चिमी जगत के सबसे बड़े नगरो में एक था ।

विजयनगर के राजा बहुत ही संपत्तिशाली राजाओं के रूप में मशहूर थे । अब्दुर्रज्जाक ने इस कहावत का जिक्र किया है कि ‘राजा के महल में कोठरी जैसे अनेक कुंड हैं जो एक विशाल भंडार के रूप में सोने-चाँदी से भरे थे ।’ एक शासक द्वारा धन का संचय एक प्राचीन परंपरा थी । पर इस तरह जमा किया गया धन परिचालन से बाहर रहता था और कभी-कभी विदेशी आक्रांताओं को दावत देता था ।

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