Read this article in Hindi to learn about the causes that lead to the downfall of Vijayanagar empire during medieval period in India.

जैसा कि कहा गया है, देवराज द्वितीय की मृत्यु (1446) के बाद विजयनगर साम्राज्य में अफरातफरी रही । चूंकि विजयनगर में ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार का नियम स्थापित नहीं हुआ था अत: गद्‌दी के विभिन्न दावेदारों के बीच गृह युद्धों का एक सिलसिला चल पड़ा ।

इस प्रक्रिया में अनेक जागीरदार स्वतंत्र हो गए । मंत्रीगण बहुत शक्तिशाली हो गए तथा जनता को काफी कष्ट पहुँचाते हुए उनसे जबरन उपहार और भारी कर वसूल करने लगे । राय की सत्ता कर्नाटक तक और पश्चिमी आध के कुछ भागों तक सिमटकर रह गई ।

शासकगण मौज-मस्ती में खोए थे और राज्य के मामलों की उपेक्षा कर रहे थे । कुछ समय बाद मंत्री सालुवा ने गद्‌दी हड़प ली । इस तरह पहले वाला राजवंश समाप्त हो गया । सालुवा ने कानून और व्यवस्था को बहाल किया और एक नए राजवंश की स्थापना की । जल्द ही इस राजवंश का भी अंत हो गया ।

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अंतत कृष्णदेव ने एक नया राजवंश, जिसे तुलूवा राजवश कहते हैं, का आरंभ किया । कृष्णदेव राय (1509-30) इस राजवंश का सबसे महान व्यक्ति था । कुछ इतिहाकार उसे विजयनगर के सभी शासकों में सबसे महान मानते हैं । कृष्णदेव राय को न सिर्फ कानून और व्यवस्था को बहाल करना पड़ा बल्कि विजयनगर के पुराने विरोधियों से भी निबटना पड़ा अर्थात बहमनी साम्राज्य के उत्तराधिकारी राज्यों से और उड़ीसा राज्य से जिसने विजयनगर के अनेक इलाके हड़प लिए थे ।

साथ ही इसे पुर्तगालियों का सामना भी करना पड़ा जिनकी शक्ति धीरे-धीरे बढ़ रही थी । वे आर्थिक और राजनीतिक रियायतें पाने के लिए समुद्र पर अपने नियंत्रण का उपयोग तटीय क्षेत्रों में विजयनगर के छोटे-छोटे अधीन राज्यों को डराने-धमकाने के लिए कर रहे थे । उन्होंने बीजापुर से गोवा वापस पाने में राय की सहायता का वचन देकर और उसे घोड़ों की आपूर्ति का एकाधिकार देकर उसको तटस्थ रखने का प्रयास भी किया था ।

सात वर्षों तक चली युद्धों की एक शृंखला में कृष्णदेव राय ने पहले उड़ीसा के शासक को कृष्णा नदी के सभी क्षेत्र विजयनगर को वापस सौंपने पर मजबूर कर दिया । इस तरह स्वयं को मजबूत बनाकर उसने तुंगभद्रा के दोआब पर नियंत्रण का पुराना संघर्ष फिर से आरंभ कर दिया ।

कृष्णदेव ने टकराव के लिए भारी तैयारियाँ की । उसने रायचूर और मुद्‌कल को रौंदकर दुश्मनी का आरंभ किया । इसके बाद हुई लड़ाई में बीजापुर का शासक (1570 में) पूरी तरह हारा । उसे कृष्णा नदी के पार धकेल दिया गया और वह मुश्किल से जान बचाकर भागा । पश्चिम में विजयनगर की सेनाएँ बेलगाम जा पहुँचीं ।

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उन्होंने बीजापुर पर कब्जा करके अनेक दिनों तक उसे लूटा और संधि होने से पहले गुलबर्गा को नष्ट कर दिया । इस तरह कृष्णदेव के काल में विजयनगर दक्षिण की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बनकर उभरा । लेकिन पुरानी शत्रुताओं को फिर से उभारने की उत्सुकता में दक्षिण शक्तियों ने पुर्तगालियों के उदय से अपने लिए और अपने व्यापार के लिए उत्पन्न हो रहे खतरों की अधिकतर उपेक्षा की । चोल और विजयनगर के कुछ आरंभिक शासकों के विपरीत कृष्णदेव राय ने लगता है नौसेना के विकास पर कम ही ध्यान दिया ।

इस काल में विजयनगर की दशा का बहुत-से विदेशी यात्रियों ने वर्णन किया है । इटली के पेस ने, जिसने कृष्णदेव के दरबार में अनेक वर्ष गुजारे थे, उसके व्यक्तित्व का प्रशंसापूर्ण वर्णन किया है । लेकिन वह यह भी कहता है, ‘वह एक महान शासक और अत्यंत न्यायप्रिय व्यक्ति है पर एकाएक क्रोध के दौरों का शिकार हो जाता है ।’

वह अपनी प्रजा का ध्यान रखता था तथा उसके कल्याण के प्रति उसकी फिक्र किस्से कहानियों का विषय बन चुकी है । उसने तुंगभद्रा के दोआब से तमाम नायकों को बाहर करके और उसे प्रत्यक्ष प्रशासन में लाकर एक अधिक केंद्रीकृत प्रशासन खड़ा करने का प्रयास किया था ।

कृष्णदेव एक महान निर्माता भी था । उसने विजयनगर के पास एक नया नगर बसाया और विशाल तालाब खुदवाए जिनका प्रयोग सिंचाई के लिए भी किया जाता था । वह तेलुगू और संस्कृत का विद्वान था । उसकी अनेक रचनाओं में तेलुगू में राजव्यवस्था पर एक ग्रंथ और संस्कृत में एक नाटक ही आज उपलब्ध है ।

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उसके शासन में तेलुगू साहित्य का एक नया युग आरंभ हुआ जब संस्कृत रचनाओं की नकल की जगह स्वतंत्र रचनाओं ने ले ली । उसने तेलुगू कन्नड़ और तमिल कवियों को एकसमान सरक्षण दिया । बारबोसा, पेस और नूनीज़ जैसे विदेशी यात्रियों ने उसके कुशल प्रशासन तथा उसके काल में साम्राज्य की समृद्धि की चर्चा की है ।

विजयनगर के शासकों को हिंदू धर्म का महान संरक्षक माना जाता है । उनकी देखरेख में बड़ी संख्या में मंदिर विद्यालय और मठ बनाए गए । इस काल में मंदिरों के ढाँचे और गठन में काफी विस्तार आया । खंभों वाले पंडाल, मंडप और दूसरे गौण ढाँचे जोड़कर पुराने मंदिरों के आकार को फैलाया गया ।

कृष्णदेव के साम्राज्य मैं जो व्यापक सहिष्णुता पाई जाती थी उसके बारे में बारबोसा कहता है, ‘राजा इतनी स्वतंत्रता देता है कि चाहे ईसाई हों या यहूदी, हब्शी हो या विधर्मी हर व्यक्ति अपनी इच्छानुसार आ-जा सकता है और अपने धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है । उसे इसके लिए किसी प्रकार की नाराजगी नहीं झेलनी पड़ती है और न उसके बारे में यह जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है ।’ बारबोसा ने कृष्णदेव राय के साम्राज्य में व्याप्त न्याय और समता के लिए उसकी प्रशंसा भी की है ।

1530 में कृष्णदेव की मृत्यु के बाद उसके संबंधियों में उत्तराधिकार का संघर्ष चल पड़ा क्योंकि उसके सभी बेटे अवयस्क थे । अंतत: 1543 में सदाशिव राय गद्‌दी पर बैठा और 1567 तक उसने शासन किया । लेकिन वास्तविक शक्ति एक त्रिमूर्ति के हाथों में थी जिसमें अग्रणी व्यक्ति रामराजा था ।

रामराजा विभिन्न मुस्लिम शक्तियों को एक दूसरे से लड़ाने में सफल रहा । उसने पुर्तगालियों से एक व्यापारिक संधि की जिसके अनुसार बीजापुर के शासकों को घोड़ों की आपूर्ति रोक दी गई । युद्धों की एक शृंखला में उसने बीजापुर के शासक को पूरी तरह हराया तथा गोलकुंडा और अहमदनगर को भी अपमानजनक मातें दी ।

लगता है कि इन तीन शक्तियों के बीच विजयनगर के अनुकूल एक शक्ति-संतुलन बनाए रखने से अधिक रामराजा का कोई उद्‌देश्य भी नहीं था । आखिर उन्होंने एक होकर 1565 में तालिकोटा के पास बन्नीहट्‌टी में विजयनगर को एक करारी शिकस्त दी । इसे तालिकोटा की लड़ाई या राक्षसतंगड़ी की लड़ाई भी कहते हैं ।

रामराजा घिर गया, कैद किया गया और तुरंत मार डाला गया । कहते हैं कि इस युद्ध के दौरान एक लाख हिंदू मारे गए । विजयनगर को पूरी तरह लूटकर खंडहर बना दिया गया । बन्नीहट्‌टी की लड़ाई को सामान्यत विजयनगर के महायुग का अंत माना जाता है । यूँ तो यह राज्य जैसे-तैसे लगभग सौ वर्षो तक घिसटता रहा, पर उसका क्षेत्र लगातार घटता गया ।

दक्षिण भारत के राजनीतिक मामलों में राय अब किसी गिनती में नहीं रहा । विजयनगर के शासकों में राजत्व की धारणा बहुत ऊँची थी । राज्य-व्यवस्था पर अपनी पुस्तक में कृष्णदेव राय राजा को सलाह देता है कि ‘जो कुछ तुम देखो या सुनो उसे उपेक्षित किए बिना बहुत सावधानी के साथ और अपनी क्षमता के अनुसार तुम्हें (सज्जनों की) रक्षा और (दुर्जनों को) दंड देने के काम पर ध्यान देना चाहिए ।’ उसने राजा को ‘अपनी प्रजा से हलका कर वसूल करने की’ सलाह दी है ।

विजयनगर साम्राज्य में राजा को सलाह एक मंत्रिपरिषद देती थी जिसमें साम्राज्य के बड़े कुलीन शामिल होते थे । साम्राज्य को राज्यों या मंडलम (प्रांतों) में बाँटा गया था । उसके नीचे नाडु (जिले), स्थल उप-जिले और ग्राम (गाँव) होते थे ।

ग्रामीण स्वशासन की चोल परंपराएँ विजयनगर साम्राज्य में काफी कमजोर हुई । पुश्तैनी नायक-पद के विकास ने उनकी स्वतंत्रता और पहल को सीमित किया । आरंभ में राजकुमार प्रांतों के अधिपति होते थे । बाद में अधीनस्थ शासक परिवारों के सदस्यों और कुलीनों को प्रांतपति बनाया जाने लगा ।

इन प्रांतपतियों को काफी स्वायत्तता प्राप्त थी । वे अपने दरबार लगाते अपने अधिकारी नियुक्त करते और सेनाएँ रखते थे । उन्हें अपने सिक्के जारी करने की अनुमति थी हालांकि ये छोटे मूल्यों के ही होते थे ।

एक प्रांतपति का कोई नियमित कार्यकाल नहीं होता था । उसका कार्यकाल उसकी योग्यता और शक्ति पर निर्भर होता था । प्रांतपति को नए कर लगाने या पुराने कर समाप्त करने का अधिकार था । हर प्रांतपति केंद्र सरकार को सैनिकों और धन के रूप में एक निश्चित योगदान देता था । अनुमान लगाया गया है कि जहाँ साम्राज्य की आय 12,000,000 पराडो थी, वहीं केद्र सरकार को उसका आधा भाग ही मिलता था ।

विजयनगर साम्राज्य में ऐसे अनेक क्षेत्र थे जो अधीन शासकों के अंतर्गत थे, अर्थात जो युद्धों में हारे पर उनके राज्य उन्हें वापस कर दिए गए । केंद्र-प्रशासित एक बहुत बड़े क्षेत्र में राजा सैन्य सरदारों को निश्चित राजस्व वाले आमरम (क्षेत्र) देता था । ये सरदार पलैयागर (पालेगार) या नायक कहलाते थे ।

उन्हें राज्य की सेवा के लिए निश्चित संख्या में पियादे सैनिक, घोड़े और हाथी रखने पड़ते थे । नायकों या पालेगारों को केंद्रीय कोष में एक निश्चित राशि भी जमा करानी पड़ती थी । ये बहुत शक्तिशाली लोग थे और कभी-कभी सरकार के लिए उनको नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता था ।

विजयनगर साम्राज्य की इन अंदरूनी कमजोरियों का भी बन्नीहट्‌टी के युद्ध में उसकी हार और बाद में उसके विघटन में हाथ रहा था । उसके बाद अनेक नायक तो स्वतंत्र ही हो गए जैसे तंजावुर और मदुरै के ।

विजयनगर साम्राज्य में किसानों की आर्थिक दशा पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं क्योंकि अधिकांश यात्रियों को ग्रामीण जीवन का बहुत कम ज्ञान था और इसलिए वे बहुत चलताऊ ढंग से उसके बारे में बातें करते थे । सामान्यत: ऐसा माना जा सकता है कि जनता का आर्थिक जीवन कमोबेश अपरिवर्तित रहा उनके घर अधिकतर फूस के और छोटे दरवाजों वाले होते थे ।

आम तौर पर वे नंगे पैर चलते और कमर से ऊपर शायद ही कुछ पहनते थे । उच्चवर्गो के लोग कभी-कभी कीमती जूते पहनते और सरों पर रेशमी पगड़ियाँ बाँधते थे पर कमर से ऊपर अपने आपको नहीं ढँकते थे । जनता के सभी वर्ग आभूषणों के शौकीन थे तथा उन्हें ‘अपने कानों अपने गलों और अपनी बाँहों आदि में’ पहनते थे । किसानों को फसल का कितना भाग देना पड़ता था, इसके बारे में हमें बहुत कम ज्ञान है ।

एक अभिलेख के अनुसार करों की दरें इस प्रकार थीं:

जाड़ों में कुरुवई (एक प्रकार के धान) की फसल का एक-तिहाई, तिल, रागी, चना आदि का एक-चौथाई, असिंचित भूमि पर उपजे ज्वार-बाजरे और दूसरी फसलों का छठा भाग ।

इस तरह फसल के पकार मिट्‌टी सिंचाई की विधि आदि के अनुसार दर अलग-अलग थी । भू-कर के अलावा दूसरे बहुत-से कर भी थे जैसे संपत्ति कर फसल की बिक्री कर व्यवसाय कर (आपातकाल में) सेना के लिए योगदान विवाह कर आदि । सोलहवीं सदी का यात्री निकितिन कहता है, ‘धरती लोगों से भरी पड़ी है, पर गाँवों के लोग बहुत बदहाल हैं जबकि कुलीन अत्यंत समृद्ध है और विलासिता का सुख लूटते हैं ।’

साम्राज्य में नगरीय जीवन का विकास हुआ और व्यापार फला-फूला । नगर बढे और अनेक तो मंदिरों के इर्दगिर्द बड़े । मंदिर बहुत बड़े-बड़े थे तथा उन्हें यात्रियों को प्रसाद बाँटने, प्रभु के भोग पुजारियों आदि के लिए खाद्य पदार्थो एवं अन्य वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती थी । ये मंदिर समृद्ध थे तथा आतरिक और विदेशी दोनों प्रकार के व्यापार में भी भाग लेते थे ।

विजयनगर शासन में नगरों की अच्छी-खासी वृद्धि हुई और नगरीकरण हुआ । अनेक इतिहासकार इसी अर्थ में विजयनगर साम्राज्य के काल को पुरानी से नई अर्थव्यवस्था में संक्रमण का काल मानते हैं।

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