Here is an essay on ‘Babur’ for class 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on ‘Babur’ especially written for school and college students.

Essay # 1. बाबर (Babur):

सोलहवीं सदी एशिया और भारत में भारी परिवर्तनों की सदी थी । उस्मानी साम्राज्य, जिसका पंद्रहवीं सदी के मध्य में पुनरूत्थान हुआ सोलहवीं सदी के मध्य में अपने शिखर पर जा पहुँचा । सीरिया और अनातोलिया में आधारित उस्मानी मध्य यूरोप को जीतने के आकांक्षी थे ।

उन्होंने मिस्र और मेसोपोटामिया पर अपना अधिकार जमा लिया था तथा ईराक और ईरान को अपने प्रभुत्व में लाने का प्रयास किया था । ईरान में शिया मतावलंबी सफवी साम्राज्य पंद्रहवीं सदी की आखिरी चौथाई में सत्ता में आया । ईराक और बगदाद पर अधिकार के लिए वह उस्मानी बादशाहों से भी टकराया तथा उसने उस्मानी क्षेत्रों में शिया मत को फैलाने का भी प्रयास किया ।

पंद्रहवीं सदी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के बाद तैमूर ने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अंतर्गत एकजुट किया । तैमूर का साम्राज्य वोल्गा नदी की निचली वादी से लेकर सिंधु नदी तक फैला था और इसमें एशिया माइनर (आज का तुर्की), ईरान, आक्सस-पार के क्षेत्र अफगानिस्तान और पंजाब का एक भाग शामिल था ।

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तैमूर 1405 में मरा पर उसका पोता शाहरुख मिर्जा (मृत्यु 1448) उसके साम्राज्य के एक भाग को बचाए रखने में सफल रहा । उसने कला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया और उसके काल में समरकंद और हेरात पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केंद्र बन गए । समरकंद के शासक की पूरी इजामी दुनिया में भारी इज्जत थी ।

पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में एक बड़ी सीमा तक साम्राज्य को बाँटने की तैमूरियों की परंपरा के कारण उनकी शक्ति तेजी से कम हुई । अब जन्म लेनेवाले विभिन्न तैमूरी रजवाड़े हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे । इसके कारण दो नए तत्त्वों को सामने आने का अवसर मिला । उत्तर से उजबेक लोगों का एक तुर्क मंगोल-कबीला आक्सस-पार के क्षेत्र में घुस आया ।

उजबेक मुसलमान तो बन चुके थे पर तैमूरी उन्हें हीन समझते थे क्योंकि वे उन्हें असंस्कृत और बर्बर मानते थे । और भी पश्चिम में सफवी नाम का एक नया राजवंश ईरान पर वर्चस्व जमाने लगा । सफवी सुल्तान सूफियों के एक ऐसे सिलसिले के वंशज थे जो पैगंबर को अपना पूर्वज ठहराता था ।

उन्होंने मुसलमानों के शिया फिरके का समर्थन किया और उन लोगों को उत्पीड़ित किया जो शिया रीति-रिवाज अपनाने को तैयार न थे । दूसरी ओर, उजबेक सुन्नी थे । इस तरह इन दोनों तत्त्वों के राजनीतिक टकराव में फिरकाई टकराव ने जहर घोला ।

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इस तरह सोलहवीं सदी में एशिया में तीन शक्तिशाली साम्राज्यों-उस्मानी, सफवी और उजबेक-के टकराव की जमीन तैयार हो चुकी थी । भारत में गगा की वादी के पुन एकीकरण की दशाएँ तैयार हो रही थीं जिसके कारण साम्राज्यवादी शासन का एक नया चरण आरंभ हुआ ।

इसका आधार शर्की राज्य का पतन और लोदियों के अंतर्गत गगा की ऊपरी वादी का पुन एकीकरण होना था । लेकिन लोदियों को साथ ही साथ अपनी ही राज्य-व्यवस्था के अंदर कबीलाई अलगाववाद का सामना करना पड़ा ।

अगर इस समस्या का समाधान निकल आता-चाहे वह स्वयं के प्रयास से हो या बाहरी हस्तक्षेप से-तो उत्तर भारत में एक नए साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो जाता । तैमूरियों के उदय और बाबर के आगमन को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए ।

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1494 में 12 वर्ष की छोटी उम्र में ही बाबर आक्सस-पार के एक छोटे-से राज्य फरगाना का राजा बना । उजबेक खतरे की ओर से आँखें बंद करके तैमूरी शाहजादे एक दूसरे से लड़ने में व्यस्त थे । बाबर ने भी अपने चाचा से समरकंद को छीनने का प्रयास किया । उसने दो बार इस नगर को जीता पर दोनों अवसरों पर शीघ्र ही उसे खो बैठा ।

दूसरी बार बाबर को बाहर निकालने में सहायता देने के लिए उजबेक सरदार शैबानी खान को बुलाया गया । शैबानी खान ने बाबर को हराकर समरकंद को जीत लिया । जल्द ही उसने इस क्षेत्र के बाकी तैमूरी राज्यों को भी रौंद डाला । इससे बाध्य होकर बाबर काबुल की ओर चला जिसे उसने 1504 में जीता । अगले 14 वर्षो तक उजबेकों से अपना वतन फिर जीतने के लिए बाबर मौके का इंतजार करता रहा ।

उसने इस कार्य में अपने चाचा अर्थात हेरात के शासक से मदद लेने का प्रयास किया पर कोई लाभ नहीं हुआ । अंतत: शैबानी खान ने हेरात को भी रौंद डाला । इसके चलते उजबेकों और सफवियों में सीधा टकराव हुआ क्योंकि सफवी शासक भी हेरात और आसपास के क्षेत्रों के दावेदार थे जिनको समकालीन लेखकों ने खुरासान कहा है ।

1510 में मर्व के पास एक मशहूर लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी खान को हराकर मार डाला । बाबर ने अब समरकद को जीतने की एक और कोशिश की और इस बार उसने ईरानी फौजों की मदद ली । उसे समरकंद में बाकायदा गद्‌दी पर बिठाया गया, पर वह ईरानी सिपहसालारों के नियंत्रण से ऊबने लगा जो बाबर को एक स्वतंत्र शासक के बदले एक ईरानी सूबे के सूबेदार के रूप में ही रखना चाहते थे ।

इस बीच उजबेक तेजी से अपनी हार के झटके से मुक्त हो गए । बाबर एक बार फिर समरकंद से निकाला गया और उसे फिर काबुल आना पड़ा । अंतत: खुद शाह इस्माइल को 1514 में उस्मानी सुल्तान ने हरा दिया जिसके कारण उजबेक आक्सस-पार के क्षेत्रों के निश्चित मालिक बन बैठे । इन विकासक्रमों ने आखिर बाबर को भारत की ओर रुख करने पर मजबूर कर दिया ।

Essay # 2. भारत की विजय  (Victory of India):

बाबर ने कहा है कि काबुल की विजय (1504) से लेकर पानीपत में अपनी जीत तक ‘मैंने हिंदुस्तान को जीतने के बारे में सोचना कभी नहीं छोड़ा ।’ पर उसे कभी यह काम हाथ में लेने का उपयुक्त अवसर नहीं मिला था ‘क्योंकि कभी अपने बेगों की आशंकाओं और कभी मेरे भाइयों और मेरे बीच के मतभेद के कारण मेरा काम रुक जाता था ।’

मध्य एशिया से पहले के असंख्य हमलावरों की तरह बाबर भी भारत की बेपनाह दौलत के कारण उसकी ओर आकर्षित हुआ था । भारत सोने-चाँदी और सुख-समृद्धि का देश था । बाबर का पूर्वज तैमूर भारत से अपने साथ न केवल भारी खजाना और अनेक कुशल दस्तकार ले गया था जिन्होंने उसे भपने एशिया साम्राज्य को मजबूत बनाने और उसकी राजधानी को सुंदर बनाने में सहयोग दिया था ।

उसने पंजाब के कुछ क्षेत्रों पर भी कब्जा कर लिया था जो तैमूर के उत्तराधिकारियों के अधीन कई पीढ़ियों तक रहे । बाबर ने जब अफगानिस्तान को जीता तो उसे लगा कि वह इन क्षेत्रों का वाजिब हकदार है ।

पंजाब के परगनों की बाबर की लालसा का एक और कारण काबुल की मामूली आय थी । इतिहासकार अबुल फजल कहते हैं, ‘उसका (बाबर का) शासन बदख्शा, कंदहार और काबुल पर था जिनसे फ़ौज की जरूरतों के लिए पर्याप्त आय नहीं मिलती थी ।

वास्तव में, कुछ सरहदी इलाकों में सेना और प्रशासन पर नियंत्रण का खर्च आमदनी से भी अधिक था ।’ इन मामूली संसाधनों के बल पर बाबर अपने बेगों और रिश्तेदारों को पर्याप्त सुख-सुविधा नहीं दे सकता था । उसे काबुल पर उजबेक हमले की भी आशंका थी तथा वह भारत को शरण के लिए एक अच्छा स्थान और उजबेकों के खिलाफ कार्रवाई करने का उपयुक्त आधार मानता था । उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिति भारत में बाबर के प्रवेश के लिए उपयुक्त थी ।

1517 में सिकंदर लोदी की मृत्यु हो चुकी थी और इब्राहीम लोदी तख्त पर बैठा था । एक शक्तिशाली केंद्रीकृत साम्राज्य बनाने के लिए इब्राहीम के प्रयासों ने अफगान सरदारों को चौकन्ना कर दिया था और राजपूतों को भी । सबसे शक्तिशाली अफगान सरदार पंजाब का सूबेदार दौलत खान लोदी जो था लगभग एक स्वतंत्र शासक था ।

दौलत खान ने इब्राहीम लोदी के दरबार में सलाम बजाने के लिए अपने बेटे को भेजकर उससे सुलह करने का प्रयास किया । साथ ही वह भीड़ा के सरहदी इलाकों आदि को जीतकर अपनी स्थिति को मजबूत बनाने की इच्छा भी रखता था ।

1518-19 में बाबर ने भीड़ा के मजबूत किले को जीता । फिर उसने दौलत खान और इब्राहीम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर उन क्षेत्रों को देने की माँग की जो तुर्कों के थे । पर दौलत खान ने बाबर के दूत को लाहौर में नजरबंद कर लिया उसने उसको न तो मिलने का अवसर दिया न इब्राहीम लोदी के पास जाने की अनुमति दी, बाबर जब काबुल लौट गया तो दौलत खान ने, भीड़ा पर कब्जा कर लिया और बाबर के तैनात कारिंदों को वहाँ से निकाल फेंका ।

1520-21 में बाबर ने फिर एक बार सिंधु नदी को पार किया तथा आसानी से भीड़ा और सियालकोट पर कब्जा कर लिया जो हिंदुस्तान के दो द्वार थे । लाहौर भी उसकी झोली में आ गिरा । कंदहार से बगावत की खबर न आई होती तो वह और आगे बढ़ा होता । उसने कदम पीछे खींच लिए तथा डेढ़ साल की घेराबंदी के बाद कंदहार पर अधिकार कर लिया । इस तरह निश्चित होकर बाबर फिर एक बार भारत की ओर ध्यान देने की स्थिति में आ गया ।

लगभग यही समय था जब दौलत खान लोदी का एक प्रतिनिधिमंडल बाबर से मिला जिसका नेतृत्व उसका बेटा दिलावर खान कर रहा था । उन्होंने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया और सुझाया कि वह इब्राहीम लोदी को अपदस्थ करे क्योंकि वह निरंकुश था और उसको अपने अमीरों का समर्थन प्राप्त नहीं था ।

लगता है कि इसी समय राणा सांगा का एक संदेशवाहक भी बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण देने के लिए पहुँचा । इन प्रतिनिधिमंडलों ने बाबर को विश्वास दिला दिया कि स्वयं भारत न सही, पूरे पंजाब की विजय का अवसर आ चुका है ।

1525 में बाबर जब पेशावर में था, उसे समाचार मिला कि दौलत खान लोदी ने फिर पाला बदल लिया है । उसने 30,000-40,000 की सेना जमा कर ली थी, सियालकोट से बाबर के आदमियों को निकाल फेंका था और लाहौर पर चढ़ा आ रहा था । बाबर के करीब आने पर दौलत खान की सेना तितर-बितर हो गई । दौलत खान ने समर्पण कर दिया और क्षमादान पाया । इस तरह सिंध पार करने के तीन सप्ताह के अंदर बाबर पंजाब का स्वामी बन बैठा ।

Essay # 3. पानीपत की लड़ाई (20 अप्रैल 1520) (Battle of Panipat):

दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से बाबर का टकराव अपरिहार्य हो गया और दिल्ली की ओर कूच करके बाबर ने इसकी तैयारी की । बाबर से इब्राहीम लोदी का सामना पानीपत में हुआ; उसके पास एक लाख सैनिक और 1000 हाथी थे । चूंकि भारतीय सेनाओं में आम तौर पर चाकरों के बड़े-बड़े झुंड होते थे, इसलिए इब्राहीम लोदी की तरफ लड़नेवालों की संख्या इससे बहुत कम रही होगी ।

बाबर ने 12,000 लोगों के साथ सिंधु नदी को पार किया था लेकिन भारत में स्थित उसकी सेना के कारण और पंजाब में बाबर से हाथ मिलाने वाले हिंदुस्तानी कुलीनों और सैनिकों की बड़ी संख्या के कारण उसकी कतार बड़ी । तो भी बाबर की सेना संख्या में कम थी ।

बाबर ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए सेना के एक भाग को तो पानीपत नगर में टिकाया जहाँ बहुत-से मकान थे और दूसरे भाग को पेड़ों की डालियों और टहनियों से भरी एक खाई के जरिए सुरक्षा प्रदान की । सामने की ओर उसने गाड़ियों की एक बड़ी संख्या को आपस में बाँध दिया और वे एक प्रतिरक्षक दीवार का काम करने लगीं ।

दो गाड़ियों के बीच वक्षभीतियाँ (ब्रेस्टवर्क्स) बनाई गई जिन पर सैनिक अपनी बंदूकें टिकाकर गोली चला सकते थे । बाबर ने इस तरीके को उस्मानी (रूमी) तरीका कहा है क्योंकि ईरान के शाह इस्माइल के खिलाफ अपनी मशहूर जंग में उस्मानियों ने इसका प्रयोग किया था ।

बाबर ने उस्ताद अली और मुस्तफा नामक दो उस्मानी उस्ताद तोपचियों की सेवा भी ली । बारूद का इस्तेमाल भारत में धीरे-धीरे बढ़ रहा था । बाबर का कहना है कि किला भीड़ा पर हमले के लिए उसने सबसे पहले इसका प्रयोग किया था । लगता है कि भारत में बारूद का ज्ञान तो था पर उत्तर भारत में बाबर के आगमन के बाद ही तोपों में इसका आम इस्तेमाल शुरू हुआ ।

बाबर की ठोस प्रतिरक्षा प्रणाली का ज्ञान इब्राहीम लोदी को नहीं था । लगता है उसे यह आशा थी कि बाबर गतिशील शैली में युद्ध लड़ेगा जो मध्य एशिया वालों के लिए आम थी कि वे तेजी से आगे बड़े या जरूरत पड़ी तो पीछे हट गए । सात या आठ दिनों की झड़पों के बाद इब्राहीम लोदी की फौजें विनाशकारी युद्ध के लिए बाहर निकलीं ।

बाबर की शक्तिशाली स्थिति को देखकर वे हिचकिचाने लगीं । अभी इब्राहीम अपनी सेना को पुनर्गठित कर रहा था कि बाबर की सेना के दोनों बाहरी छोर मुड़े और उन्होंने पार्श्व और पीछे से इब्राहीम की सेनाओं पर आक्रमण किया । बाबर के तोपचियों ने सामने से अपनी तोपों का अच्छा उपयोग किया ।

लेकिन बाबर अपनी विजय का श्रेय एक बड़ी सीमा तक अपने तीरंदाजों को देता है । अजीब बात यह है कि वह इब्राहीम के हाथियों का कम ही जिक्र करता है । लगता है कि इब्राहीम को उनके उपयोग का अवसर नहीं मिला ।

इन शुरुआती धक्कों के बावजूद इब्राहीम की सेना बहादुरी से लड़ी । लड़ाई दो या तीन घंटों तक जारी रही । इब्राहीम लोदी अंत तक लड़ा और 5000-6000 सैनिक उसके इर्द-गिर्द रहे । अनुमान है कि इस लड़ाई में उसके अलावा उसके 15,000 से अधिक सैनिक मारे गए ।

पानीपत की लड़ाई को भारतीय इतिहास की निर्णायक लड़ाइयों में से एक माना जाता है । इस लडाई ने लोदी सत्ता की कमर तोड दी तथा दिल्ली और आगरा तक का पूरा क्षेत्र बाबर के अधीन कर दिया । आगरा में इब्राहीम लोदी के जमा किए हुए खजाने ने बाबर की वित्तीय कठिनाइयों को कम किया ।

अब जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र बाबर के सामने खाली पड़ा था । लेकिन बाबर को इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ मजबूत करने से पहले दो सख्त लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी-एक तो मेवाड़ के राणा सागा के खिलाफ और दूसरी पूर्वी अफगानों के खिलाफ । इस दृष्टि से देखें तो राजनीति के क्षेत्र में पानीपत की लड़ाई उतनी निर्णायक नहीं थी, जितनी कही जाती है । उसका वास्तविक महत्व इस तथ्य में है कि उसने उत्तर भारत में वर्चस्व के संघर्ष का एक नया चरण आरंभ किया ।

पानीपत की विजय के बाद बाबर के सामने अनेक कठिनाइयाँ आईं । उसके बेग भारत में एक लंबी मुहिम के लिए तैयार न थे । गर्मी का मौसम शुरू होने के साथ उनकी चिंताएँ बढ़ गई । वे अपने घरों से दूर एक अजनबी और दुश्मन के क्षेत्र में थे । बाबर कहता है कि भारत के लोगों ने ‘उल्लेखनीय शत्रुता’ का प्रदर्शन किया और मुगल सेनाओं के पास आने पर वे गाँव छोड्‌कर भाग जाते थे ।

जाहिर है कि तैमूर ने नगरों और गाँवों को जिस तरह लूटा और तबाह किया था उसकी यादें अभी भी उनके दिमाग में बनी हुई थीं । बाबर जानता था कि केवल भारतीय संसाधनों के बल पर ही चलकर वह एक मजबूत साम्राज्य बना सकेगा और अपने बेगों को संतुष्ट कर सकेगा ।

अपनी तुजुक में वह लिखता है, ‘नहीं, हमारे लिए काबुल की गरीबी फिर नहीं ।’ इस तरह उसने एक पक्का रुख अपनाया भारत में अपने ठहरने के इरादे का ऐलान किया और अपने अनेक बेगों को जो काबुल वापस जाना चाहते थे इसकी इजाजत दे दी । इससे माहौल फौरन साफ हो गया । पर इससे राणा साँगा की दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ी जिसने बाबर के साथ निबटारे की तैयारियाँ शुरू कर दीं ।

Essay # 4. खानवा की लड़ाई  (Battle of Khanwa):

मालवा के महमूद खलजी को हराने के बाद राणा का प्रभाव-क्षेत्र धीरे-धीरे आगरा के पड़ोस की एक छोटी-सी नदी पीलिया खार तक बढ़ चुका था । सिंधु-गंगा वादी में बाबर के साम्राज्य की स्थापना राणा साँगा के लिए चुनौती थी । इसलिए साँगा ने बाबर को निकाल बाहर करने या कम से कम पंजाब तक सीमित कर देने की तैयारी शुरू कर दी ।

बाबर ने राणा साँगा परं समझौता तोड़ने का आरोप लगाया है । वह कहता है कि उसे साँगा ने भारत बुलाया था और इब्राहीम लोदी के खिलाफ़ उसका साथ देने का वादा किया था, पर जब वह (बाबर) दिल्ली और आगरा जीतना चाहता था तो उसने (साँगा ने) कोई कोशीश नहीं की । साँगा ने ठीक-ठीक क्या वादा किया था, हमें नहीं पता ।

हो सकता है उसे युद्ध के लबा खिंचने की आशा रही हो जिसके दौरान वह (साँगा) अपने मनचाहे क्षेत्रों पर कब्जा कर सके । या हो सकता है उसे यह आशा रही हो कि तैमूर की तरह बाबर भी दिल्ली को लूटने और लोदियों को कमजोर करने के बाद वापस चला जाएगा । बाबर के भारत में ठहरने के फैसले ने स्थिति को पूरी तरह बदलकर रख दिया ।

इब्राहीम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी समेत अनेक अफगानों ने राणा साँगा का साथ इस आशा से दिया कि यदि साँगा जीत जाता है तो उन्हें दिल्ली का तख्त वापस मिल जाएगा । मेवात के शासक हसन खान मेवाती ने भी साँगा के साथ अपना भाग्य नत्थी कर दिया । लगभग सभी प्रमुख राजपूत शासकों ने राणा साँगा के लिए अपने दस्ते भेजे ।

राणा साँगा की प्रतिष्ठा तथा बयाना जैसी कुछ बाहरी मुगल चौकियों के खिलाफ उसकी आरंभिक सफलता ने बाबर के सैनिकों को हतोत्साहित कर दिया । उन्हें तैयार करने के लिए बाबर ने साँगा विरोधी जंग को एक जिहाद करार दे दिया । युद्ध से ठीक पहले उसने शराब की तमाम बोतलों और घड़ों को यह दिखाने के लिए तोड़ दिया कि वह कितना पक्का मुसलमान था ।

उसने अपनी पूरी सल्तनत में शराब की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी तथा मुसलमानों पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया । सावधानी से एक स्थान चुनकर बाबर ने आगरा से कोई 40 किलोमीटर दूर खानवा को अपना ठिकाना बनाया । यहाँ भी उसने पानीपत की तरह बाहरी प्रतिरक्षा के रूप में अनेक गाड़ियों को आपस मे बाँधा और दोहरी सुरक्षा के लिए सामने खाई खुदवा दी । प्रतिरक्षा में बंदूकचियों के गोली चलाने और पहियादार तिपाइयों के पीछे-पीछे बढ़ने के लिए स्थान खाली छोड़े गए थे ।

खानवा की लड़ाई (1527) बहुत भयानक रही । बाबर के अनुसार साँगा की फौज दो लाख से ऊपर थी । इनमें 10,000 अफगान सवार थे तथा हसन खान मेवाती ने भी इतनी ही सेना भेजी थी । हमेशा की तरह इन आंकड़ों में भी अतिशयोक्ति सभव है हालांकि बाबरी सेना की संख्या निश्चित ही कम थी ।

साँगा ने बाबर के दाए बाजू पर भयानक हमले किए और उसे लगभग काट ही डाला । पर मुगल तोपों ने राणा की सेना का भारी सहार किया और धीरे-धीरे साँगा की सेना पीछे धकेल दी गई । इसी समय बाबर ने अपने केंद्र-भाग के सैनिकों को जो अपने तिपाइयों के पीछे पनाह लिए हुए थे आक्रमण का आदेश दिया ।

जंजीर में बँधी गाड़ियों के पीछे से तोपखाना भी बाहर आ गया । पानीपत की ही तरह बाबर के पार्श्व वाले दस्तों ने, जो बगल और पीछे से हमले करते थे अपना खेल दिखाया । साँगा की फौज घिर गई और भयंकर मार-काट के बाद पराजित हो गई । इस तरह खानवा की लडाई पानीपत की लडाई की ही लगभग नकल थी ।

स्पष्ट है कि इब्राहीम लोदी की पराजय से राणा साँगा ने कुछ नहीं सीखा था और न बाबर की रणनीति का अध्ययन किया था । जैसा कि बाबर ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘कुछ हिंदुस्तानी तलवारबाज भले ही हों, पर अधिकांश तो सैन्य तौर-तरीकों, स्थितियों और रणनीतियों से अनजान और अकुशल हैं ।’

राणा साँगा बच निकला और वह बाबर से फिर टकराना चाहता था । पर उसके अपने ही कुलीनों ने उसे जहर दे दिया जो ऐसे किसी भी कदम को खतरनाक और आत्मघाती समझते थे । इस तरह राजस्थान के सबसे शूरवीर योद्धा की मृत्यु हो गई । साँगा की मौत से आगरा तक फैले एकीकृत राजस्थान के सपने को गहरा धक्का लगा ।

खानवा की लड़ाई ने दिल्ली-आगरा क्षेत्र में बाबर की स्थिति को सुरक्षित बना दिया । आगरा के पूरब में ग्वालियर, धौलपुर आदि किलों की एक शृंखला को जीतकर बाबर ने अपनी स्थिति को और मजबूत बनाया । उसने हसन खान मेवाती से अलवर का एक बहुत बड़ा हिस्सा छीन लिया ।

फिर उसने मालवा में चंदेरी के मेदिनी राय के खिलाफ़ एक अभियान चलाया । राजपूत प्रतिरक्षक जब एक-एक करके कट मरे और उनकी स्त्रियों ने जौहर के द्वारा अपना जीवन समाप्त कर दिया तो चंदेरी पर भी उसका अधिकार हो गया । पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफगानों की बढ़ती सरगर्मियों की खबर सुनकर बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियानों की योजना को ठप्प करना पडा ।

Essay # 5. अफ़गान (Afghan):

हालाँकि अफ़गानों को करारी हार का सामना करना पड़ा था, पर वे मुगल शासन से समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे । पूर्वी उत्तर प्रदेश अभी भी ऐसे अफगान सरदारों के वर्चस्व में था जिन्होंने बाबर की अधीनता तो स्वीकार की थी पर उसे उखाड़ फेंकने के लिए वे हमेशा तैयार थे ।

अफगान सरदारों को बंगाल का शासक नुसरतशाह शह दे रहा था जिसने अपनी एक बेटी इब्राहीम लोदी से ब्याही थी । इससे पहले अफगान पूर्वी उत्तर प्रदेश से मुगल हाकिमों को भगाकर कन्नौज तक पहुँच चुके थे । पर एक लोकप्रिय नेता की कमी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी ।

कुछ समय बाद इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी, जो खानवा में बाबर के खिलाफ लड़ चुका था बिहार जा पहुँचा । अफगानों ने अपने नेता के रूप में उसका स्वागत किया और उसके अंतर्गत शक्ति अर्जित करने में जुट गए ।

यह ऐसा खतरा था जिसकी बाबर उपेक्षा नहीं कर सकता था । मालवा से सीधे कन्नौज जाकर उसने एक तीखी लड़ाई में अफगानों को हराया और जौनपुर तक के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया । फिर वह आगरा पलटा । पर इस क्षेत्र में स्थिति डाँवाडोल बनी रही । एक स्थायी हल निकालने के लिए 1529 के आरंभ में वह आगरा से पूरब की ओर चला । बनारस के पास गंगा पार करके उसने उसके और घाघरा के संगम पर अफगानों और बंगाल के नुसरतशाह की संयुक्त सेना का सामना किया ।

हालांकि बाबर ने नदी को पार करके बंगाल की और अफगान सेनाओं को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया पर वह कोई निर्णायक विजय न पा सका । बीमार और मध्य एशिया की स्थिति के बारे में चिंतित बाबर ने अफगानों से समझौते का निश्चय किया । उसने बिहार पर अपनी थोड़ी-बहुत प्रभुता का दावा जताया पर इस प्रदेश के अधिकांश इलाकों को उसने अफगान सरदारों के अधिकार में ही रहने दिया ।

उसने बंगाल के नुसरतशाह से भी एक संधि की । बाबर जानता था कि अफगान समस्या अभी हल नहीं हुई है । बिहार को संभाले बिना पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफगानों की समस्या हल नहीं हो सकती थी, बल्कि बंगाल तक फैल सकती थी । इसके लिए लंबी मुहिम और समय की आवश्यकता थी । इन समस्याओं में न उलझने का फैसला करके बाबर आगरा लौट आया । कुछ ही समय बाद बाबर काबुल जाते हुए लाहौर के पास चल बसा ।

Essay # 6. भारत में बाबर के आगमन का महत्व (Importance of Babur’s Arrival in India):

भारत में बाबर का आगमन अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण था । कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद काबुल और कंदहार पहली बार उत्तर भारत पर आधारित एक साम्राज्य के अभिन्न अंग बने । ये क्षेत्र भारत पर आक्रमण के लिए हमेशा एक तैयारी के मैदान जैसा काम करते आए थे ।

इसलिए उन पर अधिकार जमाकर बाबर और उसके उत्तराधिकारियों ने लगभग 200 वर्षों तक भारत को बाहरी हमलों से सुरक्षित रखा । आर्थिक दृष्टि से भी काबुल और कंदहार के नियंत्रण ने भारत के विदेशी व्यापार को बल पहुँचाया क्योंकि ये दो नगर पूरब में चीन और पश्चिम मे भूमध्यसागरीय बंदरगाहों तक जानेवाले काफिलों के प्रस्थानबिंदु होते थे । इस तरह एशिया पार के विशाल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी ।

मध्य और पश्चिमी एशिया की राजनीतिक स्थिति कुल मिलाकर शांति और स्थायित्व की स्थिति थी, हालांकि युद्ध और खूनखराबे होते रहते थे । इस स्थिति में मध्य एशिया के मामलों में एकजुट भारत का आर्थिक और कूटनीतिक हस्तक्षेप लाजमी तौर पर पहले से बढ़ा ।

बाबर और उत्तराधिकारियों की हार्दिक इच्छा अपने वतन फरगाना को फिर से पाने की थी । इसके कारण भी भारत मध्य एशिया के विकासक्रमों पर गहरी नजर रखता रहा । इस तरह तेरहवीं सदी के तुर्क सुल्तानों के काल के विपरीत भारत को अब महाद्वीपीय एशिया की राजनीति का अभिन्न अंग माना जाने लगा ।

उत्तर भारत में बाबर ने लोदियों और राणा साँगा के नेतृत्व वाले राजपूत महासंघ की शक्ति को चूर कर दिया । इस तरह उसने इस क्षेत्र में मौजूद शक्ति-संतुलन को भंग कर दिया । यह एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की दिशा में बड़ा कदम था । पर इसको अंजाम देने से पहले और भी अनेक शर्तों को पूरा किया जाना आवश्यक था ।

बाबर ने भारत को युद्ध की नई शैली से परिचित कराया । भारत में बारूद का ज्ञान तो पहले भी था पर बाबर ने दिखाया कि तोपखाना और सवार सेना का कुशल समन्वय क्या-क्या कर सकता है । उसकी जीतों के कारण भारत में बारूद और तोप तेजी से लोकप्रिय हुए । चूंकि तोपखाना रखना बहुत खर्चीला होता था, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ वही शासक कर सकते थे जिनके पास पर्याप्त संसाधन हों । इस तरह छोटे रजवाड़ों का युग समाप्त हो गया ।

अपनी नई सैन्य विधियों और अपने निजी आचरण के द्वारा बाबर ने फिरोज तुगलक की मौत के बाद से ही कम होती जा रही ताज की प्रतिष्ठा को पुन: बहाल किया । हालांकि सिकंदर लोदी और इब्राहीम लोदी ने ताज की प्रतिष्ठा बहाल करने की कोशिश की थी पर स्वतंत्रता और समानता के अफगान विचारों के कारण इसमें आशिक सफलता ही मिली थी ।

बाबर की प्रतिष्ठा एशिया के दो सबसे मशहूर योद्धाओं चंगेज और तैमूर के वंशज के रूप में थी । इसलिए उसका कोई भी अमीर न तो उसकी बराबरी का दावा कर सकता था और न उसके तख्त की कामना कर सकता था । उसकी स्थिति को चुनौती अगर मिलती भी तो किसी तैमूरी शासक या उसके वंशज से ही मिलती ।

बाबर के निजी गुणों ने उसे उसके बेगों का प्यारा बनाया । वह हमेशा अपने सैनिकों के साथ मुसीबतें झेलने को तैयार रहता था । एक बार कड़कड़ाते जाड़े में बाबर काबुल लौट रहा था । बर्फ इतनी गहरी थी कि घोड़े उसमें फँस जाते और सैनिक दलों को बर्फ को कूटना पड़ता जिससे कि घोड़े गुजर सकें । बिना हिचक बाबर भी इस कमरतोड़ काम में जुट गया । बाबर को ऐसा करता देखकर उसके बेग भी इस काम में शामिल हो गए ।

बाबर शराब और अच्छी सोहबत का शौकीन था । खुद उसकी सोहबत भी बड़ी खुशदिल होती थी । साथ ही वह कठोर अनुशासनवादी और सख्त काम लेने वाला भी था । वह अपने बेगों का बहुत ध्यान रखता था और जब तक वे बेवफाई नहीं करते थे उनके अनेक दोषों को वह नजरअंदाज कर देता था ।

वह अपने अफगान और भारतीय अमीरों के प्रति भी यही रवैया अपनाने को तैयार रहता था । लेकिन उसके स्वभाव में कुछ बेरहमी भी थी जो संभवत: उसे पूर्वजों से मिली थी । अनेक अवसरों पर उसने अपने विरोधियों की खोपड़ियों की मीनारें बनाई । लेकिन निजी बेरहमी की इन तथा ऐसी ही दूसरी मिसालों को उस निर्मम दौर के संदर्भ में देखना होगा जिसमें बाबर रह रहा था । बाबर रूढ़िवादी सुन्नी था पर वह धर्माध नहीं था । न ही वह इस्लाम के धर्माचार्यो से प्रेरित होता था ।

जब ईरान और तूरान में शियों और सुन्नियों के बीच भयानक पंथगत लड़ाइयाँ होती थीं, तब भी उसका दरबार धार्मिक और पथिक टकरावों से मुका था । उसने साँगा से लड़ाई को जिहाद ठहराया और जीतने के बाद गाजी की उपाधि धारण की पर इसके स्पष्ट रूप से राजनीतिक कारण थे ।

यद्यपि उसका काल युद्धों का काल था पर मंदिरों के विध्वंस की कुछ ही मिसालें मिलती हैं । इसका कोई प्रमाण नहीं है कि स्थानीय सूबेदारों द्वारा संभल और अयोध्या में बनवाई गई मस्जिदें हिंदू मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई थीं । शायद उन्होंने कुछ मौजूदा मस्जिदो की मरम्मत कराई और फिर उन पर बाबर के सम्मान में शिलालेख लगवा दिए ।

फारसी और अरबी में बाबर का पूरा दखल था । उसे तुर्की भाषा के जो उसकी मातृभाषा थी दो सबसे मशहूर लेखकों में गिना जाता है । गद्य लेखन में उसका कोई सानी नहीं है तथा उसका सुप्रसिद्ध संस्मरण तुजुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) विश्व साहित्य की अद्वितीय कृतियों में एक माना जाता है । उसकी दूसरी रचनाओं में एक मसनवी तथा एक सुप्रसिद्ध सूफ़ी ग्रंथ का तुर्की अनुवाद शामिल है ।

वह अपने समय के प्रसिद्ध कवियों और कलाकारों के संपर्क में था तथा अपनी तुजुक में उनकी कृतियों का वर्णन भी करता है । वह प्रकृति प्रेमी था और उसने खासे विस्तार के साथ भारत की वनस्पतियों और यहाँ के प्राणियों का वर्णन किया है । उसने बहते पानी से युक्त अनेक सुंदर बाग लगवाए और इस तरह उसने बागवानी की एक परंपरा कायम की ।

बाबर ने राज्य की एक नई धारणा सामने रखी जो ताज की शक्ति और प्रतिष्ठा धार्मिक और पंथिक कट्‌टरता के त्याग तथा संस्कृति और ललित कलाओं के प्रोत्साहन पर आधारित थी । इस तरह वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक उदाहरण छोड़ गया और उनके लिए एक निश्चित दिशा निर्दिष्ट कर गया ।

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