Read this article in Hindi to learn about:- 1. जीन अभिव्यक्ति का परिचय (Introduction to Gene Expression) 2. जीव अभिव्यक्ति का अर्थ (Meaning of Gene Expression) 3. क्रियाविधि (Mechanism) 4. क्रियाविधि एवं अभिव्यक्ति (Mechanism and Expression).

जीन अभिव्यक्ति का परिचय (Introduction to Gene Expression): 

कोशिका में DNA की दो महत्वपूर्ण भूमिकाएं रहती है । एक तो पुनर्गुणन एवं दूसरी है अभिव्यक्ति । पूर्ववर्ती बिन्दुओं में DNA पुनर्गुणन की विस्तृत विवेचना की जा चुकी है । इस दूसरी परिदृश्य में जीन अभिव्यक्ति व नियमत की विवेचना इस बिंदु में की गयी है ।

रसायनत: जीन DNA का एक खण्ड है अथवा न्यूक्लिओटाइड्स का विशिष्ट अनुक्रम है । विभिन्न जीन्स में क्षार अनुक्रम भिन्न-भिन्न होते है । प्रकार्यात्मकरूपेण जीन DNA का खण्ड है, जो प्रोटीन के संश्लेषण पर नियंत्रण रखता है ।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जीन अपने आपको प्रोटीन एन्जाइम के रूप में अभिव्यक्त करता है, विशिष्ट लक्षण अथवा विशिष्ट प्रकार्य के परिवर्द्धन का नियंत्रण करता है ।

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जीव में अभिलक्षण की फीनोटाइपिक अभिव्यक्ति जीन्स के द्वार परिवर्द्वन का नियंत्रण करता है । जीव में अभिलक्षण की फीनोटाइपिक अभिव्यक्ति जीन्स के द्वारा कोशिका में नियमन की जा रही आण्विक जैव संश्लेषण गतिविधियों में श्रृंखला का अंतिम परिणाम है ।

संरचनात्क जीन (Structural Gene)- जीन जिनमें किसी पोलीपेप्टाइड (प्रोटीन) के अमीनो अम्लों के क्रम (Sequence) से संबंधित सूचना कोडित होती है । अर्थात् जो प्रोटीन की रचना का निर्धारण करती है । लैक्टोज ऑपेरॉन में β – गैलेक्टोसाइडेज, परमिएज व ट्रांसएसिटाइलेज को कोडित करने वाली जीन । यह सहलग्न (Linked) होते हैं ।

हाऊसकीपिंग या संगठनात्मक जीन (House Keeping or Constitutive Gene):

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वह जीन जिनके उत्पाद की कोशिका को हर समय आवश्यकता होती है अर्थात् वह जीन जो लगातार अभिव्यक्ति होती है । जैसे- ग्लाइकोलिसिस पथ के एन्जाइम से संबंधित जीन ।

ऑपेरॉन (Operon)- प्रोकैरियोट्स में संरचनात्मक जीनों का एक समूह जो एक साथ नियंत्रित होकर एक m-RNA के रूप में अनुलेखित होता है + उनके निकट उपस्थित नियंत्रक तत्व (प्रमोटर + ऑपरेटर) ।

प्रमोटर (Promoter)- DNA का वह स्थान जहाँ आर.एन.ए. पोलीमेरेज जुड़कर अनुलेखन प्रारंभ करता है ।

प्रेरक (Inducer)- अनुलेखन प्रेरण (Induction) में सक्षम अणु, जैसे- एलोलैक्टोज ।

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संदमक प्रोटीन (Repressor Protein)- ऑपरेटर से जुड़कर अनुलेखन को रोकने वाली प्रोटीन । अर्थात्- वह अणु जो ऑपरेटर से बन्ध कर आर.एन.ए. पोलीमेरेज का रास्ता रोक देता है और स्विच ऑफ कर देता है ।

नियामक जीन (Regulatory Gene)- संदमक (Repressor) का निर्माण करने वाली जीन ।

को-रिप्रेसर (Co-Repressor)- रिप्रेसर से जुड़कर रिप्रेसर + कोरिप्रेसर जटिल बनाने वाला अणु । यह जटिल ऑपरेटर से जुड़कर स्विच ऑफ कर देता है । जैसे- ट्रिप्टोफेन ।

एक्सॉन (Exons)- जीन के वह भाग जो प्रोटीन की संरचना से संबंधित सूचना रखते है व प्रसंस्करित m-RNA का भाग बनाते हैं ।

इंट्रान (Intron)- जीन के वह क्षेत्र जो m-RNA का भाग नहीं बनाते तथा m-RNA प्रसंस्करण के समय हटा दिये जाते हैं, इंट्रान कहलाते हैं ।

स्प्लिसिंग (Splicing)- m-RNA प्रसंस्करण (Processing) की एक विधि जिसमें अवान्छित RNA खण्ड (इंट्रान द्वारा कोडित) निकाल दिये जाते हैं तथा अमीनो अम्लों को कोड करने वाले क्षेत्र (एक्सॉन द्वारा कोडित) आपस में जोड़ दिये जाते हैं ।

एन्हांसर (Enhancers)- नियामक तत्व जो जीन के कोडिंग क्षेत्र से किसी भी ओर (अपस्ट्रीम या डाउनस्ट्रीम) तथा बहुत दूर तक स्थित हो सकते हैं ।

फीड बैक कन्ट्रोल (Feed back Control)- ऐसा तंत्र जिसमें किसी क्रिया के उत्पाद का एकत्रीकरण (Accumulation) इसके उत्पादन की दर के प्रभावित करता है ।

धनात्मक नियंत्रण (Positive Control)- तंत्र जिसमें एक्टीवेटर प्रोटीन (S) से जुड़कर अनुलेखन तेज कर देती है ।

ऋणात्मक नियंत्रण (Negative Control)- ऐसे तंत्र जिसमें डी. एन. ए. से जुड़ने वाली प्रोटीन रिप्रेसर होती है अर्थात् जो स्विच ऑफ कर अनुलेखन बन्द कर देती है ।

रेगुलोन (Regulon)- ऑपेरॉनों का एक समूह जो एक ही रेगुलेटर से नियंत्रित होता है ।

अनुलेखन कारक (Transcription Factors)- लैक्टोज रिप्रेसर, ट्रिप्टोफन रिप्रेसर व कैटाबोलाइट एक्टीवेटर प्रोटीन जैसे अणु जो डी. एन. ए. से जुड़कर अनुलेखन को प्रभावित करते हैं ।

जीव अभिव्यक्ति का अर्थ (Meaning of Gene Expression):

जीव में फिनोटाइप में स्वयं को अभिव्यक्त करने संबंधी जीन की आण्विक स्तरीय क्रियाविधि को जीन अभिव्यक्ति कहा जाता है । इसमें विभिन्न प्रकारों के RNAs, पॉलीपेप्टाइड्‌स, एन्जाइम्स व संरचनात्मक प्रोटीन्स की संश्लेषण होता है, जो कि जीव का विशिष्ट गतिविधियों एवं लक्षणों के नियंत्रण हेतु आवश्यक है ।

DNA से विभिन्न प्रकारों के tRNA के संश्लेषण को अनुलेखन कहते है तथा mRNA से पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के संश्लेषण की प्रक्रिया को अनुलिपिकरण कहा जाता है । संरचनात्मक प्रोटीन्स, एन्जाइम्स व प्रोटीन्स युक्त अन्य जैवरसायनों का निर्माण करते हुए पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला द्वारा जीन्स को अभिव्यक्ति किया जाता है । अब ये पदार्थ सजीव तंत्र को जैविक अनुक्रिया प्रदान करते है ।

जीन अभिव्यक्ति की क्रियाविधि (Mechanism of Gene Expression):

जीन अभिव्यक्ति घटनाओं की एक श्रृंखला द्वारा संपन्न होती है । DNA में उपस्थित सूचनाएँ उन अणुओं में परिवर्जित कर दिया जाता है, जिनका निर्धारण कोशिका के उपाचय के द्वारा होता है ।

जीन अभिव्यक्ति की प्रक्रिया के दौरान DNA की प्रति सर्वप्रथम उस RNA अणु में होती है, जो प्रोटीन के अणु के अमीनो अम्ल अनुक्रम का निर्धारण करता है । डबल स्ट्रण्डेड DNA के सिंगल के क्षार अनुक्रमों के भाग का प्रयोग करते हुए RNA अणुओं का संश्लेषण होता है ।

इस सिंगल स्ट्रैण्ड को साँचा कहा जाता है । इसलिए RNA अनुलेख का निर्माण RNA अणु पॉलीमरेज एंजाइम द्वारा सहज हो जाता है, इसलिए सादृश्य जीन से RNA अणु के संश्लेषण की प्रक्रिया में अनुलेखन कहा जाता है ।

क्षार अनुक्रमों एवं RNA अणु के प्रयोग द्वारा प्रोटीन्स को सुनिश्चित क्रम में संश्लेषित कर लिया जाता है । अनुलिपिकरण की समाप्ति उपरान्त प्रोटीन्स संश्लेषित होते है । इसलिए जीन अभिव्यक्ति का अभिप्राय अनुलेखन (ट्रांस्क्रिप्शन) एवं अनुलिपिकरण (ट्रांस्लेशन) नामक दो मुख्य घटनाओं के द्वारा प्रोटीन संश्लेषण से होता है ।

जीन-अभिव्यक्ति आण्विक-स्तर (Molecular-Level) पर होने वाली वह क्रिया है, जिसमें जीन अपने आपको जीवधारी के बाह्यकृति लक्षण (Phonotype) के रूप में अभिव्यक्त करती है । जीन-अभिव्यक्ति की क्रियाविधि जीव-रासायनिक आनुवांशिकी (Bio-Chemical Genetics) पर आधारित है ।

इसमें पोलीपेप्टाइड, एंजाइम या विशिष्ट प्रकार के आर.एन.ए. का संश्लेषण शामिल होता है, जो किसी लक्षण विशेष की संरचना या कार्य का नियंत्रण करते हैं । जीन से एम-आर.एन.ए. (m-RNA) का निर्माण अनुलेखन (Transcription) कहलाता है ।

इस प्रक्रिया में जीन में निहित आनुवंशिक सूचना का m-RNA के रूप में अनुलेखन हो जाता है । कुछ जीन r-RNA या t-RNA का निर्माण करते हैं । अनुलेखन में डी. एन. ए. द्विकुण्डलित अणु का केवल एक स्ट्रैंड भाग लेता है ।

m-RNA केन्द्रक को छोड़कर कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) में प्रवेश करता है तथा जीन की सूचना को पोलीपेप्टाइड में अमीनो अम्लों के क्रम के रूप में अनुवादित (Translate) कर देता है । अनुवाद में t-RNA महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं ।

1. प्रोकेरियोट में जिन–अभिव्यक्ति (Gene-Expression in Prokaryotes):

किसी प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell) जैसे- जीवाणु व नील-हरित शैवाल (Blue-Green Algae) में जीन अभिव्यक्ति का नियमन प्रायः संसाधनों के किफायती (Economical) उपयोग तथा ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) की प्राप्ति के लिए ही होता है ।

परिणामस्वरूप प्रोकैरियोट्स में जीन अभिव्यक्ति का नियमन अधिकांशत: अनुलेखन स्तर (Transcription Level) पर ही होता है । दूसरी ओर यूकैरियोटिक कोशिकाओं व जीवधारियों की जटिलता व विकास (Development) के नियमन की अधिक आवश्यकता के कारण इनमें ऊपर वर्णित विभिन्न प्रकार की नियमन प्रक्रियाओं के बीच एक बेहतरीन सामंजस्य पर बल दिया जाता है ।

इस कारण यूकैरियोटिक जीन अभिव्यक्ति का नियमन अनेक स्तरों पर होता है ।

जीवाणु कोशिका में डी. एन. ए. की मात्रा का लगभग एक हजारवां हिस्सा होती है । जीवाणु कोशिका का एकमात्र क्रोमोसोम भी केवल एक गोल डी. एन. ए. अणु से मिलकर बना होता है ।

प्रोकैरियोट्‌स में आनुवंशिक पदार्थ कोशिका कला (Nuclear Membrane) द्वार कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) से अलग नहीं रहता, क्योंकि इनमें कोशिका कला का अभाव होता है ।

जीवाणुओं का गुणन (विभाजन) बहुत तेजी से होता है । एक कोशिका के विभाजन द्वारा दो कोशिकाओं के निर्माण में लगा समय पीढ़ी काल (Generation Time) कहलाता है । कुछ जीवाणुओं में यह समय मात्र 20 मिनट का होता है । जीवाणुओं के डी. एन. ए. प्रतिकृतिकरण (Replication) केवल एक स्थान से प्रारंभ होता है ।

जीवाणुओं में प्रजनन (विभाजन) प्रायः अलैंगिक विधि (Asexual Method) द्वारा ही होता है अर्थात् यूकैरियोट्स के समान इनमें आनुवांशिक पदार्थ (Genetic Material) का विनिमय (Exchange) नहीं पाया जाता । लेकिन कुछ जीवाणु आनुवांशिक पदार्थ का यह विनिमय प्रदर्शित करते हैं ।

आपने रूपान्तरण (Transformation) विधि के बारे में पढ़ा है । इस विधि द्वारा न्यूमोनिया रोग के कारक जीवाणु डिप्लोकोकस न्यूमोनी (Diplococcus Pneumonia) का एक विभेद (Strain) दूसरे विभेद में रूपान्तरित (Transformed) हो जाता है ।

एक विभेद के डी. एन. ए. द्वारा माध्यम में उपस्थित दूसरे विभेद के डी. एन. ए. को ग्रहण कर लिए जाने के कारण ही ऐसा होता है । बाह्य डी. एन. ए. के ग्रहण से ही ग्रहण करने वाले जीवाणु के फीनोटिपिक लक्षण (Phenotypic Characters) बदल जाते हैं ।

लिंगक्रमण (Sexduction):

‘उर्वरता-करक (Fertility-Factor) युक्त प्लाज्मिड प्रतिकरण’ करता है । उसकी प्रति संयुग्मन नलिका के द्वारा ग्राही कोशिका (Recepient Cell) में स्थानांतरित कर दी जाती है । ग्राही कोशिका भी दाता (Donor) बन जाती है । इस परिघटना (Phenomenon) को लिंगक्रमण (Sexduction) कहते हैं ।

2. विषाणुओं में जिन-अभिव्यक्ति (Gene-Expression in Viruses):

विषाणु, अन्त:कोशिकीय (Intracellular) अविकल्पी परजीवी (Obligate Parasites) हैं, जो नाभिकीय अम्ल व प्रोटीन से मिलकर बने होते हैं । कोशिका से बाहर यह अक्रिय (Inert) रहते हैं । कोशिका से बाहर के अक्रिय विषाणु को विरिऑन (Virion) कहा जाता है ।

टोबेमे मोजेक वाइरस (Tobacco Mosaic Virus) सबसे पहले खोजा जाने वाला विषाणु था । एडॉल्फ मेयर (Adolf Mayer) ने 1880 में बताया कि रोगी पौधे के रस द्वारा टोबेको मोजक रोग स्वस्थ पौधे में संचारित हो जाता है ।

इवानोवस्की (Iwanowsky) को विषाणु की खोज का श्रेय दिया जाता है । उसने बताया कि रोगी पौधे के रस (Sap) को अगर बैक्टीरियल फिल्टर (Bacterial Filter) से छान लिया जाये, तब भी रस में स्वस्थ पौधे को संक्रमित करने की क्षमता होती है । स्टेनले (Stanley) ने सर्वप्रथम विषाणुओं को क्रिस्टल रूप में प्राप्त किया ।

विषाणुओं में केवल एक प्रकार का नाभिकीय अम्ल (अर्थात् डी.एन.ए. या आर.एन. ए.) पाया जाता है । उनमें कोशिकीय संरचना का अभाव होता है । चूंकि विषाणुओं में अपनी कोशिकीय मशीनरी नहीं होती ।

अत: अपनी जीन की अभिव्यक्ति के लिए तथा अपने जनन के लिए वह पोषक कोशिका की कोशिकीय मशीनरी (जैसे- राइबोसोम, एंजाइम आदि) का इस्तेमाल करते हैं । विषाणु जीन की क्रिया भी विषाणु के पोषक कोशिका (Host Cell) को संक्रमित करने योग्य बनाने के लिए होता है ।

कोशिका के अन्दर विषाणुओं की क्रिया दो प्रकार की होती है:

(i) लाइटिक-चक्र (Lytic-Cycle),

(ii) लाइसोजेनिक-चक्र (Lysogenic-Cycle) ।

(i) लाइटिक-चक्र (Lytic-Cycle):

वाइरुलेंट (Virulent Phage) का गुणन (प्रजनन) लाइटिक-चक्र (Lytic-Cycle) कहलाता है । पोषक कोशिश (जीवाणु) की लाइसिस (Lysis) हो जाने के कारण ही इसे लाइटिक-चक्र कहा जाता है ।

जो विषाणु पोषक कोशिका के अन्दर प्रोफेज (Prophage) का निर्माण नहीं करते, वाइरुलेंट विषाणु (Virulent Virus) कहलाते हैं । इस चक्र में सबसे पहले विषाणु जीवाणु कोशिका से चिपक जाता है ।

अगले पद में यह अपने नाभिकीय अम्ल को जीवाणु कोशिका में प्रविष्ट करा देता है । कोशिका के अन्दर पहुँचने पर विषाणु जीन जीवाणु की कोशिकीय मशीनरी को अपने कब्जे में लेकर विषाणु प्रोटीन, नाभिकीय अम्ल का निर्माण करता है । कुछ समय बाद जीवाणु कोशिका फट जाती है व नव-संश्लेषित विषाणु बाहर निकल आते हैं । इसी को लाइसिस कहा जाता है ।

(ii) लाइसोजेनिक चक्र (Lysogenic Cycle):

कुछ विषाणु, पोषक कोशिका के आनुवांशिक पदार्थ से जुड़कर प्रोफेज (Prophage) का निर्माण करते हैं, इन्हें टेम्परेट विषाणु (Temperate Viruses) व इनके गुणन (Multiplications) को लाइसोजेनी कहा जाता है ।

λ फेज अपने आप को ई. कोलाई (E. Coli) कोशिका से संलग्न कर लेती है । अगले पद में इसका डी. एन. ए. (DNA) जीवाणु कोशिका के अन्दर प्रविष्ट कर दिया जाता है । यहाँ डी. एन. ए. के सामने दो अवसर होते हैं ।

T4 फेज की तरह यह लाइटिक-चक्र (Lytic Cycle) को जन्म देकर विषाणुओं का गुणन (Multiplication) कर सकता है । दूसरे, यह जीवाणु के क्रोमोसोम के डी. एन. ए. से जुड़कर प्रोफेज (Prophage) का निर्माण कर सकता है ।

इस चक्र में फेज, पोषक की कोशिकीय मशीनरी पर नियंत्रण नहीं करती । वह पोषक के डी. एन. ए. के साथ पुनरावृत्ति (Replicate) होती रहती है । प्रोफेज के द्वारा निर्मित एक संदमक प्रोटीन (Repressor Protein), फेज के अन्य जीनों को अभिव्यक्त (Express) नहीं होने देती अर्थात संदमित अवस्था (Repressed State) में रखती है ।

बदली हुई पर्यावरणीय परिस्थितियों में प्रोफेज सक्रिय हो सकती है । ऐसी अवस्था में प्रोफेज द्वारा रिप्रेसर प्रोटीन का निर्माण बन्द कर दिया जाता है । फलस्वरूप लाइटिक-चक्र (Lytic-Cycle) से संबंधित जीन सक्रिय हो जाते हैं । अर्थात् प्रोफेज (Prophage) अब लाइटिक फेज (Lytic Phage) में परिवर्तित होकर लाइटिक-चक्र प्रारंभ कर देती है ।

चूँकि प्रोफेज का वहन करने वाली ई. कोलाई कोशिका लाइसिस (Lysis) प्रदर्शित कर सकने में सक्षम होती है, अत: इस प्रकार की कोशिका को लाइसोजेनिक कोशिका (Lysogenic Cell) कहा जाता है । फेज डी. एन. ए. जीवाणु का कोशिका के डी. एन. ए. में प्रोफेज (Prophage) के रूप में पाया जाना लाइसोजेनी (Lysogeny) कहलाता है ।

3. यूकेरियोट् में जिन-अभिव्यक्ति (Gene-Expression in Eukaryotes):

यूकैरियोट्स में जीन अभिव्यक्ति नियमन (Regulation of Gene Expression in Eukaryotes):

यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय (Multicellular) जीवधारियों में श्रम विभाजन (Division of Labour) के लिए कोशिकाओं के समूह आपस में एक-दूसरे से सहयोग करते हैं ।

प्रोकैरियोट्‌स के विपरीत यूकैरियोट्‌स में जीन अभिव्यक्ति नियमन के कुछ अतिरिक्त (Additional) व विशिष्ट (Specific) तरीकों की आवश्यकता होती है, जो एक कोशिका को किसी कार्य विशेष करने की क्षमता प्रदान करने तथा कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissue) व अंगों (Organs) के रूप में संगठित होने में सक्षम बनाते हैं ।

हम जानते हैं कि यूकैरियोट्‌स डी. एन. ए. प्रतिलिपिकरण (DNA Replication), अनुलेखन (Transcription), अनुवाद (Translation), प्रोकैरियोटस् की अपेक्षा जटिल होते है । यह जटिलता भी यूकैरियोट्‌स में जीन नियमन के अतिरिक्त अवसर व तरीके प्रदान करने में सहायक होती हैं ।

सरल शब्दों में इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि चूंकि यूकैरियोटिक जीवधारियों में एक ही जीन को अलग-अलग कोशिकाओं में अलग-अलग तरह के नियमन की आवश्यकता हो सकती है । अत: यूकैरियोट्‌स में जीन नियमन जटिल होता है ।

प्रोकैरियोट्‌स की अपेक्षा यूकैरियोटिक कोशिका का जीवन काल (Life Span) प्रायः अधिक होता है, जिसके दौरान उसे विभिन्न प्रकार के उद्दीपनों (Stimuli) के प्रति अनेकानेक बार प्रतिक्रिया करनी पड़ सकती है । हर बार नये एंजाइम बनाने की बजाय यह कोशिकाएँ पूर्व निर्मित एंजाइमों में कुछ फेरबदल कर उससे कार्य लेने का प्रयास करती है ।

बहु-कोशिकीय यूकैरियोट्‌स (Multicellular Eukaryotes) के जीन नियमन में प्रत्येक ऊतक में कोशिकाओं के प्रकार और कार्य की विशिष्टता (Specificity) पर विशेष बल दिया जाता है । प्रत्येक प्रकार की कोशिकाओं में कुछ जिन सक्रिय रहते हैं व कुछ ऐसे जीन होते हैं, जिनका उपयोग कभी नहीं होता ।

स्पष्ट है कि बहुकोशिकीय जीवधारियों में कोशिकीय सहयोग के लाभ, कोशिकाओं द्वारा असक्रिय जीनों (Inactive Genes) व कुछ रसायनों के ढोने की मामूली सी हानि से कहीं ज्यादा होते हैं ।

अनेक प्रोकैरियोटिक जीन्स (Prokaryotic Genes) के विपरीत अधिकांश यूकैरियोटिक जीन्स ऑपेरॉन जैसे समूह (Opernor-Like Clusters) के रूप में नहीं पाये जाते । फिर भी, प्रत्येक यूकैरियोटिक जीन के विशिष्ट नियंत्रक क्रम (Regulatory Sequences) होते हैं जो अनुलेखन (Transcription) के नियंत्रण के लिए आवश्यक होते हैं ।

यूकैरियोटिक जीवधारियों के संगठनात्मक जीन (Constitutive Genes) की अभिव्यक्ति हर समय होती रहती है । इन जीवधारियों में अधिक ताप, भारी (Heavy Metal) व विषाणु संक्रमण (Viral Infection) जैसे पर्यावरणीय खतरों (Environmental Threats) के प्रति संवेदी प्रेरण योग्य (Inducible Genes) भी पाये जाते हैं ।

बहुकोशिकीय जीवधारियों में वृद्धि व विकस (Growth & Development) भी जटिल होता है । इनमें पाये जाने वाले कुछ जीन (Genes) जीवधारी के जीवन की विशेष प्रावस्था में ही प्रेरित (Induced) होते हैं । इनका नियंत्रण टेम्पोरल नियमन प्रक्रियाओं (Temporal Regulation Mechanism) के अधीन होता है ।

अन्य जीन, ऊतक विशिष्ट नियमन (Tissue Specific Regulation) के अधीन होते हैं । उदाहरण लिए किसी एंजाइम विशेष के निर्माण के लिए उत्तरदायी एक जीन, किसी ऊतक विशेष में किसी एक से तथा दूसरे प्रकार के ऊतक में पूर्णरूप से भिन्न दूसरे प्रकार के उद्दीपन (Stimulus) तथा तीसरे ऊतकों में सर्वथा भिन्न प्रकार के उद्दीपन (Stimulus) से नियमित (Regulated) हो सकती है ।

जीन की क्रियाविधि एवं अभिव्यक्ति (Mechanism and Expression of Genes):

विभिन्न उत्परिवर्तनों के अध्ययनों के अनुसार- जीन की क्रिया का रूप रासायनिक (Chemical) होता है । जीन्स एन्जाइम्स (Enzymes) के निर्माण में सहयोग देने तथा कोशिकीय उपापचयी क्रियाओं (Cellular Metabolic Processes) पर नियंत्रण (Control) रखने के महत्वपूर्ण कार्य करते हैं ।

जीन m-RNA के माध्यम से राइबोसोम्स पर प्रोटीन संश्लेषण के आनुवंशिक संहिता (Genetic Code) का प्रेषण करते हैं । प्रत्येक जीन एक विशिष्ट आनुवंशिक प्रभाव (Genetic Effect) दिखाता है ।

उसकी यह विशिष्टता (Specificity) इसके DNA के अंश पर निर्भर करती है । प्रत्येक जीन में दो हजार या ज्यादा क्रियात्मक बिन्दु एक क्रम में व्यवस्थित होते हैं । इनकी प्रत्येक इकाई में सैकड़ों-हजारों न्यूक्लिओटाइड के समूह होते हैं तथा न्यूक्लिओटाइड भी एक विशेष क्रम में व्यवस्थित रहते हैं ।

चार प्रकार के न्यूक्लिओटाइड का क्रम ही जीन की विशिष्टता का निर्धारण करता है । कुछ जीन स्थायी प्रत्यक्ष प्रभाव (Direct Effect) दिखलाते हैं, जबकि कुछ का प्रत्यक्ष प्रभाव बाहरी या भीतरी वातावरण या दोनों द्वारा बदलता रहता है । तापक्रम, सूर्य के प्रकाश, हॉर्मोन आदि कारकों से जीन प्रभावित होते हैं ।

वृद्धि हॉर्मोन (Growth Hormones) की कमी होने पर लम्बेपन के जीनों के होते हुए भी सजीव (Living) बौना (Dwarf) ही रह जाता है । इसी तरह कई बार लैंगिक हॉर्मोन (Sex Hormones) भी जीन के प्रत्यक्ष प्रभावों को प्रभावित करते हैं ।

एक जीन का जोड़ा जो एक गुणसूत्र पर स्थित है, अन्य गुणसूत्रों को प्रभावित कर सकता है । ऐसे जीन को रूपान्तरित जीन (Modified Gene) कहते हैं । जीन के प्रत्यक्ष प्रभाव की अभिव्यक्ति (Expression) का समय परिवर्तनशील (Variable) होता है ।

कई जीन अपना प्रभाव जीवधारी की उत्पत्ति के समय ही दिखाते हैं तथा कुछ जीन जन्म के कुछ सप्ताहों, महीनों या वर्षों बाद ही अपना प्रभाव दिखाते हैं, जैसे सिर के बाल उड़ने का समय 25-30 वर्ष की उम्र के पूर्व सामान्यतः मानव में नहीं होता है ।

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