वर्षा पर निबंध | Essay on Rainfall in Hindi!

जब जलवाष्प युक्त वायु ऊपर को उठती है तो तापमान में कमी आने के कारण उसका संघनन होने लगता है । इस तरह मेघों का निर्माण होता है । कुछ समय बाद मेघों में जलवाष्प की मात्रा अधिक हो जाती है तथा वायुमंडल उसे संभाल नहीं पाता है । फलस्वरूप ये वर्षा के विभिन्न रूपों का कारण बन जाती है ।

उत्पत्ति के आधार पर वर्षा को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall):

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इसकी उत्पत्ति गर्म एवं आर्द्र पवनों के ऊपर उठने से होती है । जब भूतल बहुत गर्म हो जाता है तथा उसके संपर्क में रहने वाली पवनें गर्म इफर उठती है, तो संवहनीय धाराओं का निर्माण होता है ।

अधिक ऊंचाई पर पहुँचने के पश्चात् ऐसी संवहनीय धाराएँ पूर्णतः संतृप्त हो जाती है, जिसके पश्चात् संघनन से काले कपासी वर्षी मेघ बनते हैं तथा घनघोर वर्षा होती है ।

इस प्रकार की वर्षा को ‘संवहनीय वर्षा’ कहते हैं । विषुवतीय प्रदेश अथवा शान्त पेटी (डोलड्रम) में यही वर्षा होती हैं । उच्च तापमान एवं आर्द्रता के कारण इन क्षेत्रों में दोपहर 2 से 3 बजे के बीच घनघोर बादल छा जाते हैं । कुछ क्षणों की मूसलाधार वर्षा के बाद 4 बजे सायं तक वर्षा रूक जाती है ।

2. पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall):

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जब जलवाष्प से लदी हुई गर्म वायु को किसी पर्वत या पठार की ढलान के साथ ऊपर चढ़ना होता है तो यह वायु रुद्धोष्म प्रक्रिया से ठंडी होने लगती है तथा धीरे धीरे संतृप्त हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप संघनन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है । संघनन के पश्चात् होने वाली इस प्रकार की वर्षा को ‘पर्वतीय वर्षा’ कहते हैं ।

यह वर्षा उन क्षेत्रों में अधिक होती है, जहाँ पर्वत-श्रेणी समुद्र तट के निकट तथा उसके समानान्तर हो । संसार की अधिकांश वर्षा इसी रूप में होती है । ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वर्षा की मात्रा भी बढ़ती जाती है । इस प्रकार पर्वतीय क्षेत्र का जो ढाल पवन के सम्मुख होता है, वहाँ खूब वर्षा होती है । इसे ‘पवनाभिमुख ढाल’ (Windward Slope) कहते हैं ।

परन्तु जैसे ही पवन पर्वत की दूसरी ढलान पर उतरने लगती है, रुद्धोष्म ताप वृद्धि के कारण गर्म और शुष्क होने लगती है । इस प्रकार उसकी सापेक्षिक आर्द्रता में कमी आ जाती है तथा इनसे कम वर्षा होती है । इसे ‘पवनविमुख ढाल’ (Leeward Slope) या ‘वृष्टि-छाया प्रदेश’ (Rain Shadow Region) कहते हैं ।

भारत में इसका सर्वोत्तम उदाहरण पश्चिमी घाट में स्थित महाबलेश्वर (वर्षा 600 सेमी.) और पुणे (वर्षा 70 सेमी.) है, जो एक दूसरे से मात्र कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है । पश्चिमी घाट महाबलेश्वर के पवनाभिमुखी ढाल पर अवस्थित है, जबकि पुणे पवनविमुखी ढाल पर । इसी कारण ऐसा होता है ।

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3. चक्रवाती या वाताग्री वर्षा (Cyclonic Rainfall):

चक्रवातों के कारण होने वाली वर्षा को ‘चक्रवाती वर्षा’ कहते हैं । इस प्रकार की वर्षा तथा हिमवृष्टि विशेषकर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवाती क्षेत्रों में होती है । यहाँ गर्म एवं शीतल वायुराशियों के टकराने से भीषण तूफानी दशाएँ उत्पन्न हो जाती है तथा गर्म वायुराशि के शीतल वायुराशि के ऊपर चढ़ जाने की प्रक्रिया में संघनित होकर वर्षा करती है । अयनवर्ती भागों में भी गर्मियों में चक्रवाती वर्षा होती है ।

वर्षण के सिद्धांत (Principles of Rainfall):

i. हिमकण सिद्धांत (Ice-Crystal Theory) – बर्गरान

ii. मेघ-स्थिरता सिद्धांत (Cloud instability Theory) – फिडिन्सन

iii. संलयन सिद्धांत (Coalescence Theory) – ई. जी. बोवेन

कृत्रिम वर्षा (Artificial Precipitation):

कृत्रिम वर्षा को मेघों का कृत्रिम बीजारोपण भी कहा जाता है । इसका तात्पर्य वस्तुतः उस प्रक्रिया से है, जिसमें एक विशेष प्रकार के मेघों को संतृप्त करके वर्षा कराई जाती है ।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 ई. में न्यूयार्क के अमेरिकी वैज्ञानिकों विंसेंट जे. शेफर एवं इरविंग लैंगम्यूर ने पश्चिमी मेसाचुसेट्‌स के ऊपर 4,300 मी. की ऊँचाई पर वायुयान के द्वारा तीन किलोग्राम ठोस कार्बन डाईऑक्साइड (Dry Ice) का छिड़काव कर अतिशीतलित मेघों के कृत्रिम बीजारोपण में सफलता प्राप्त की ।

परंतु यह आंशिक रूप से ही सफल रहा तथा इनसे बहुत सीमित क्षेत्रों में कृत्रिम वर्षा की प्राप्ति संभव हो सकी । चूँकि यह अत्यधिक खर्चीली विधि थी, अतः यह अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी ।

1946 ई. में ही बी. वॉनगुट ने ‘सिल्वर आयोडाइड’ प्रविधि द्वारा कृत्रिम वर्षा हेतु प्रयास किया । उन्होंने पाया कि बहुत ऊँचे तापमान पर गर्म करने पर सिल्वर आयोडाइड वाष्पीकृत हो जाता है तथा शीतल होने पर इनसे सिल्वर आयोडाइड के अत्यंत सूक्ष्म कणों (व्यास 0.01 से 0.1 माइक्रॉन) का निर्माण हो जाता है, जो धुएँ के रूप में अति शीतलित जल कणों से निर्मित मेघों में जमा हो जाते हैं ।

ये -5C से निम्न तापमान पर अति सूक्ष्मों नाभिकों का कार्य करते हैं, जिनपर हिम का निर्माण होता है । इस प्रकार ये मेघों को हिमकणों से निर्मित मेघों में तत्काल परिवर्तित कर देते हैं तथा इनके सूक्ष्म कणों पर हिम क्रिस्टलों का विकास होने लगता है ।

सइन सूक्ष्म नाभिकों व हिम कणों की संरचना में समानता होती है, अतः अतिशीतलित कपासी-वर्षी मेघों में इनके कणों को छोड़ जाने पर गत्यात्मक प्रभाव दिखाई पड़ता है । सिल्वर आयोडाइड को इन मेघों में पहुँचाने के लिए पहले इसके घोल को एसीटोन नामक अत्यधिक ज्वलनशील तरल पदार्थ में गर्म किया जाता है, जिनसे सूक्ष्म क्रिस्टलों का निर्माण होता है ।

धरातल पर जेनरेटरों को थोड़ी-थोड़ी दूरी पर एक पंक्ति में रखकर यदि कई घंटे तक सिल्वर आयोडाइड को मेघों की ओर छोड़ा जाए तो मेघों के संतृप्त होने व संघनन की यह प्रक्रिया संभव हो पाती है । कृत्रिम वर्षा की यह विधि अपेक्षाकृत कम मंहगी होती है, क्योंकि इस प्रविधि में सिल्वर आयोडाइड की थोड़ी मात्रा की ही आवश्यकता पड़ती है ।

उपर्युक्त रासायनिक द्रव्यों का प्रयोग केवल उन्हीं मेघों में प्रभावकारी हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से वृष्टि की संभावनाएँ विद्यमान हो । मौसम विशेषज्ञों की राय है कि धरातल से 1 से 2 किमी. की ऊँचाई पर पाने जाने वाले गहरे भूरे वर्षी मेघों से ही कृत्रिम वर्षा संभव है ।

कृत्रिम मेघ बीजारोपण के लिए चुने गए मेघों की मोटाई 1,500 मीटर होनी चाहिए, साथ ही इन मेघों में सापेक्षिक आर्द्रता का कम से कम से 50% से 65% तक होना आवश्यक है ।

अन्य प्रविधियों के अंतर्गत बादलों में विद्युत तरंगों व प्रघाती तरंगों के द्वारा विद्युत आवेशन उत्पन्न कर वृष्टि की संभावना पर विचार किया जाता है । सैद्धांतिक रूप से इसमें अपार संभावनाएँ हैं, क्योंकि कपासी-वर्षी मेघों में बिजली की चमक के तत्काल बाद तीव्र वर्षा की प्राप्ति होती है, परंतु इनकी व्यवहारिकता संदिग्ध है ।

इसी प्रकार एक अन्य प्रविधि वायुयानों द्वारा बादलों में जल के छिड़काव की प्रक्रिया द्वारा उसे संतृप्तावस्था में लाने से सम्बंधित है, ताकि संघनन की प्रक्रिया प्रारंभ कराई जा सके । परंतु वर्तमान समय में ये प्रविधियाँ लोकप्रिय नहीं हो सकी हैं ।

कृत्रिम वर्षा हेतु इजराइल व रूस में सफल प्रयोग हुए हैं एवं इनसे सिल्वर आयोडाइड प्रविधि द्वारा कृत्रिम वर्षा की संभावना को बल मिला है । भारत में भी गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रोजेक्ट ‘रेन ड्रॉप’ चलाए गए थे, परंतु यह अधिक सफल नहीं रहा ।

वस्तुतः व्यवसायिक संस्थानों की कृत्रिम वर्षा सम्बंधी बड़े-बड़े दावों की व्यवहारिकता संदिग्ध रही है, क्योंकि कुछ विशेष प्रकार के मेघों से ही ऐसी वर्षा संभव है और वह भी एक थोड़ी क्षेत्र में व सीमित मात्रा में, फिर भी इस दिशा में प्रयास सराहनीय रहे हैं ।

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