ग्रामीण निर्धनता पर निबंध | Essay on Rural Poverty in Hindi

Essay # 1. ग्रामीण निर्धनता  का प्रस्तावना (Introduction to Rural Poverty):

भारत एक विकासशील देश है । 2011 की जनगणना के अनुसार, 121.06 करोड़ की जनसंख्या दृष्टि से भारत एवं विशाल देश है । भारत की कुल जनसंख्या का 68.84 प्रतिशत भाग अर्थात 83.35 करोड़ जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है । विपुल जनसंख्या युक्त विकासशील देश भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यत: ग्रामीण परिवेश से सम्पृक्त है ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्, भारत सरकार ने नियोजित आधार पर आर्थिक विकास के प्रयास किए ताकि देश की ज्वलंत आर्थिक सामाजिक समस्याओं का प्रभावी ढंग से निराकरण किया जा सके । योजनाबद्ध आर्थिक विकास का मूल उद्देश्य सर्वागीण विकास रहा है, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, पूर्ण रोजगार एवं आर्थिक विषमताओं में कमी के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके ।

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यह एक चिन्तनीय तथ्य है कि योजनाबद्ध विकास का इतना लम्बा रास्ता तय करने के बाद भी देश में ग्रामीण विकास के अनुकूल परिणाम उपस्थित नहीं हो सके । भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण विकास का विशिष्ट महत्व है ।

ग्रामीण बिकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत ऐसी नियोजन की नीति अपनाई जाती है जिसके द्वारा ग्रामीण लोगों को शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक स्थिति में सुधार, ग्रामीण निर्धनता को दूर कर उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास किया जाता है ।

वर्तमान समय में भारत में ग्रामीण निर्धनता उन्तुलन हेतु सरकार द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों एवं योजनाओं जैसे- समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, मनरेगा, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, इन्दिरा आवास योजना, भारत निर्माण योजना आदि योजनाओं का संचालन किया जा रहा है । ताकि लोग आत्मनिर्भर होकर जीवन यापन कर सके ।

सामान्यतः निर्धनता से आशय लोगों के निम्न निर्वाह स्तर से होता है । निम्न निर्वाह स्तर की स्थिति में जनसंख्या का एक भाग अपने जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता है । सैद्धान्तिक रुप से निर्धनता को सापेक्ष एवं निरपेक्ष निर्धनता के रुप में परिभाषित किया गया है ।

Essay # 2. भारत में ग्रामीण विकास की स्थिति (Status of Rural Development in India):

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सामान्यत: ग्रामीण विकास का अर्थ ग्रामीण लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है । किन्तु व्यापक अर्थ में ग्रामीण विकास से आशय गाँवों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि, उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक संसाधनों का यथेष्ट उपयोग लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण एवं स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, परिवहन, संचार आदि बुनियादी सुविधाओं को प्रोत्साहित करने से है ।

ग्रामीण विकास के संदर्भ में राष्ट्रपिता गांधी जी ने कहा था, कि यदि गाँवों की अवनति होती है तो देश की भी अधोगति निश्चित है । अत: ग्रामीण विकास का कार्यक्रम निर्धारित करते समय आर्थिक एवं सामाजिक पक्षों पर विशेष ध्यान दिया जाता है । आर्थिक पक्ष से तात्पर्य रोजगार, उत्पादन, आय, व्यवसायिक प्रगति एवं उपभोग स्तर में सुधार से है ।

स्वतंत्रतापूर्वक भारत में गावों के पुननिर्माण के संदर्भ में 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्धा शिक्षा कार्यक्रम चलाया था । 1921 में रविन्द्र नाथ टैगोर ने श्रीनिकेतन ग्रामोन्नति कार्यक्रम प्रारम्भ किया, जिसके अन्तर्गत कृषि, कुटीर उद्योगों, स्वास्थ, शिक्षा के लिए कार्यक्रम संचालित किए जाते थे ।

1924 में अल्बर्ट मेयर ने इटावा अग्रगामी योजना, 1946 में मद्रास में फिरका ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरु किया गया । स्वतंत्रता के पश्चात् पांचवी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत भारत में निर्धनता उन्तुलन के लिए श्रीमति इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया । योजना का प्रमुख उद्देश्य निर्धनता उन्तुलन के साथ आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था ।

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साथ ही विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए योजनाओं के अन्तर्गत गरीबी, बेरोजगारी आर्थिक विषमता आदि समस्याओं को दूर करने, लोगों को गुणवत्तामूलक जीवन बसर करने एवं उनके आर्थिक कल्याण में वृद्धि करने के लिए, जनकल्याण हेतु विभिन्न योजनाएं क्रियान्वित की है ताकि आय, रोजगार व उपभोग स्तर में यथेष्ट सुधार लाया जा सके ।

Essay # 3. ग्रामीण निर्धनता के कारण (Causes of Rural Poverty):

वर्तमान में भारत की लगभग एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है । गरीबी उन्मूलन क अनेक प्रयासों के बाबजूद भारतीय ग्रामीण क्षेत्र में ब्याज निर्धनता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की स्थिति निरन्तर चिन्तनीय है । अधिकांशतः: ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनिवार्य सुविधाएं जैसे- शिक्षा, चिकित्सा, पेयजल, परिवहन, आवास एवं विद्युत आदि का अभाव है ।

भारत में ग्रामीण निर्धनता के निम्नलिखित कारण है:

(i) देश के विभिन्न राज्यों में भूमिहीन कृषि श्रमिक, सीमान्त गैर कृषि श्रमिक एवं सीमान्त कृषक निर्धनता के कुचक्र में फंसे हुए है ।

(ii) ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि ग्रामीण निर्धनता का एक प्रमुख कारण है । वर्ष 1951 में कुल ग्रामीण जनसंख्या 30 करोड़ थी जो 2011 में बढ़कर 83 करोड़ हो गई । जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरुप खाद्यान्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा व चिकित्सा आदि की मांग के अनुसार पूर्ति न हो पाने के कारण ग्रामीण निर्धनता में वृद्धि हुई है ।

(iii) ग्रामीण क्षेत्रों में प्रछन्न एवं मौसमी बेरोजगारी का बढ़ता आकार भी ग्रामीण निर्धनता का मुख्य कारण है । पिछले वर्षों में देश में यंत्रीकरण व मशीनीकरण की प्रक्रिया को अपनाए जाने के कारण कृषकों के समक्ष रोजगार की समस्या उत्पन्न हो गई है ।

(iv) देश में कृषि जोतों का छोटा आकार एवं भूमिहीन श्रमिकों के अनुपात में वृद्धि होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता में वृद्धि हुई है ।

(vi) गत वर्षों में आर्थिक नीति में हुए परिवर्तनों और अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित लघु व कुटीर उद्योगों तथा ग्रामोद्योगों को आघात पहुंचाया हे । परिणामस्वरुप इन उद्योगों में कार्यरत लोग बेकार होकर निर्धनता के नीचे आने को मजबूर हो गए ।

(vii) साक्षरता का निम्न स्तर, तकनीकी ज्ञान व कौशल का अभाव, कृषि विपणन की दोषपूर्ण व्यवस्था, सामाजिक कुरीतियां तथा साहूकार महाजन एवं जमींदार द्वारा किसानों का शोषण भी ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता के उत्तरदायी कारण है ।

Essay # 4. ग्रामीण निर्धनता के सुझाव (Suggestion of Rural Poverty):

गरीबी उन्तुलन हेतु प्रयासों के बाबजूद भारतीय ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता व्याप्त है । भारतीय नियोजको ने भी इस बात का अनुभव किया कि भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण परिवेश में निवास करने के कारण गाँवों के सम्पूर्ण विकास के बारे में ध्यान देना आवश्यक है, प्राचीन समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था समूची अर्थव्यवस्था का आधार रही है । आचार्य कौटिल्य ने भी ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया है ।

अतः ग्रामीण विकास एवं ग्रामीण निर्धनता उन्तुलन हेतु निम्न सुझावों पर विचार किया जा सकता है:

(i) ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ।

(ii) गाँवों में लघु, कुटीर एवं परम्परागत उद्योगों के विकास को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, जो ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या के पलायन को रोकने में सहायक होगा ।

(iii) ग्रामोद्योग के विकास के लिए आवश्यक दिशा निर्देश तय किए जाए एवं इससे सम्बंधित वस्तुओं का आरक्षण किया जाए और उनका निर्माण ग्रामीण क्षेत्रों में ही किया जाए जिससे उन्हें बड़े उद्योगों ओर बहुराष्ट्रीय निगमों से प्रतिस्पर्धा न हो ।

(iv) ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अपनाए जाने वाले कार्यक्रम नीतियाँ ऐसे लोगों द्वारा तय किए जाने चाहिए जिनका सम्पर्क ग्रामीण क्षेत्रों से हो ।

(v) विकास कार्यक्रमों के लाभों से सम्बन्धित क्षेत्र के ग्रामीणों को अवगत कराया जाए । इसके लिए ग्रामीणों को उनकी ही भाषा में लाभों की जानकारी देने का प्रयास किया जाना चाहिए ।

(vi) यह सुनिश्चित किया जाए कि लाभ की पूर्ण राशि सम्बन्धित व्यक्ति को ही प्राप्त हो । इसके लिए गैर सरकारी संगठनों का सहयोग भी लिया जा सकता है ।

(vii) ग्रामीणों में व्याप्त विभिन्न कुरीतियों को समाप्त करने, ग्रामीण विकास जनसंख्या वृद्धि को रोकने के शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए ।

निष्कर्ष:

प्रस्तुत शोधपत्र के समग्र तथ्यों के विश्लेषण के पश्चात् निष्कर्ष को निम्न बिंदुओं में अभिव्यक्त किया जा सकता है:

(i) सुरेश तेन्दुलकर समिति ने दिसम्बर 2009 में बी.पी.एल. लोगों की पहचान हेतु नवीन फॉर्मूले में उपभोग व्यय के आधार को स्वीकार किया गया । जिसके अन्तर्गत निर्धनता रेखा का आकलन प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग के आधार पर किया जाता है । तेन्दुलकर समिति के इस फॉर्मूले के आधार पर 2004-05 में 372 प्रतिशत जनसंख्या को निर्धनता रेखा के नीचे माना गया ।

(ii) निर्धनता रेखा के नीचे की जनसंख्या के संबंध में योजना आयोग द्वारा जुलाई 2013 में तेन्दुलकर समिति के फॉर्मूले पर आधारित आँकड़े 2011-12 के सर्वेक्षण के लिए जारी किए गए । 2011-12 के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 816 रुपये प्रति माह एवं शहरी क्षेत्रों में 1000 रुपये प्रति माह निर्धनता रेखा का आकलन के लिए निर्धारित किया गया है ।

(iii) 1993-94 की तुलना में 2011-12 में ग्रामीण निर्धनता अनुपात एवं निर्धनों की निरपेक्ष संख्या में कमी आई है ।

(iv) भारत में बीमार राज्यों (बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान) में 2009-10 की अपेक्षा 2011-12 में ग्रामीण निर्धनता में कमी हुई है ।

(v) ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता रेखा से नीचे निर्वाह करने वाली जनसंख्या के प्रतिशत में 2009-2010 की तुलना में 2011-12 में कमी हुई है ।

(vi) 2011-12 में ग्रामीण निर्धनता का सबसे अधिक प्रतिशत बिहार में है जबकि निर्धन व्यक्तियों की संख्या उत्तर प्रदेश में अधिक है ।

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