महासागर प्रदूषण पर निबंध: कारण और प्रभाव | Essay on Ocean Pollution: Causes and Effects!

Essay # 1. सागर प्रदूषण का प्रारम्भ (Introduction to Ocean Pollution):

पृथ्वी पर मनुष्य के पदार्पण के बहुत पहले ही सागर बन चुका था । उसमें असंख्य किस्म के जीव-जंतु विकसित हो चुके थे । वह पृथ्वी की जलवायु को और उसके माध्यम से थल के जीव-जंतुओं के जीवन को भी प्रभावित कर रहा था ।

सागर के ये प्रभाव आज भी, करोड़ों-अरबों वर्षों बाद भी, थल पर पड़ रहे हैं । इसका कदाचित् सबसे प्रमुख कारण है सागर की विशालता । सागर पृथ्वी पर थल की अपेक्षा 2.43 गुना स्थान घेरे हुए है । अगर निरपेक्ष रूप से कहें तो वह पृथ्वी के 36,10,00,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को (उसके 70.9 प्रतिशत भाग को) घेरे हुए है । उसमें 1,40,00,00,000 घन किलोमीटर पानी है ।

अगर किसी कारणवश पृथ्वी के सब पर्वत, टीले, गड्ढे और खाइयाँ समाप्त हो जाएं, पृथ्वी एकदम सपाट हो जाए, तब यह पानी पूरी पृथ्वी पर फैल जाएगा और उसकी ऊँचाई होगी लगभग 300 मीटर । पृथ्वी के छोटे-बड़े सब सागर आपस में जुड़कर एक ही जलराशि बनाते हैं ।

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इस जलराशि में थल का खंड (महाद्वीप) स्थित है । इसीलिए कुछ लोग पृथ्वी को ‘जल द्वीप’ भी कहते हैं । मनुष्य का विकास थल पर हुआ था और वह थल पर ही जीवनयापन करता रहा है । यद्यपि वह बहुत प्राचीन काल में ही सागर के संपर्क में आ गया था पर हजारों-लाखों वर्षों तक उसके लिए सागर थल खंडों को अलग करने वाली जलराशि मात्र ही रहा है ।

अब, पिछले लगभग दो सौ वर्षों से, वैज्ञानिकों ने उसके अंदर झाँकने के प्रयत्न किए हैं और उसके कुछ रहस्यों का उद्घाटन किया है परंतु सागर बहुत हद तक अब भी रहस्यमय बना हुआ है । मनुष्य सदैव सागर द्वारा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित होता रहा है और आज भी, जब वह भ्रमवश अपने आपको संपूर्ण पृथ्वी का ‘सर्वश्रेष्ठ जीव’ और उसका ‘भाग्य निर्माता’ मानने लगा है, सागर से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित है ।

ये प्रभाव इतने बढ़ गए हैं कि मनुष्य का पूरा भविष्य ही सागर पर निर्भर होता जा रहा है । सागर का कदाचित् सबसे पहला प्रभाव जो हमें एकदम दिखाई देता है वह है थल की आकृति में परिवर्तन करना । सागर की लहरें थपेड़े मार-मारकर तटों की चट्टानों को तोड़ती रहती है । उन्हें तोड़-तोड़कर अपने साथ सागर में ले जाती हैं । ऐसा करने में कुछ पदार्थ पानी में घुल भी जाते हैं । अनेक बार तूफानों और चक्रवातों के दौरान सागर का पानी थल में कई किलोमीटर तक अंदर आ जाता है ।

उस समय तो वह कहर ही बरपा देता है । उस दौरान तट के कई किलोमीटर अंदर तक की थलाकृतियाँ बदल जाती हैं । पर जहाँ तक सागर के अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रभाव का प्रश्न है, वह पृथ्वी की जलवायु पर पड़ता है ।

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सागर पृथ्वी की जलवायु का नियंत्रक और नियामक है । वह वर्षा के लिए अपना जल ही प्रदान नही करता वरन् थल के ताप को भी नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण योग देता है । अपने तट के निकट के ताप को वह दिन में न तो बहुत बढ़ने देता है और न रात में बहुत घटने देता है ।

दिन के समय ‘जल-समीर’ और रात के समय ‘थल-समीर’ उत्पन्न करके वह तट के निकटवर्ती क्षेत्रों के ताप को नियंत्रित रखता है । जब जल और थल समीर बड़े पैमाने पर पैदा होने लगती हैं, जब ग्रीष्म ऋतु दिन की और शीत ऋतु रात की पर्याय बन जाती है, तब मानसून हवाएँ पैदा होती हैं ।

इन्हीं मानसून हवाओं से ही हमारे देश में तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में वर्षा होती है । इन मानसूनों पर ही हमारी फसलें और लगभग संपूर्ण आर्थिक स्थिति निर्भर है । गरम जलधारा- गल्फ स्ट्रीम के कारण ही ब्रिटेन के बंदरगाह सर्दियों में भी खुले रहते हैं और पश्चिमी यूरोप उतना ठंडा नही हो पाता जितना मध्य यूरोप हो जाता है ।

सागर में होनेवाली उथल-पुथल के फलस्वरूप ही पेरु देश की अर्थव्यवस्था समुद्री मत्स्य उद्योग और गेनू उर्वरक पर निर्भर हो गई है । पृथ्वी के 70.9 प्रतिशत भाग में फैले सागर ने मानव इतिहास को अत्यधिक प्रभावित किया है ।

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इतिहास साक्षी है कि अगर मौके पर सागर में तूफान न उठा होता तो सोलहवीं शताब्दी में स्पेन के सम्राट फिलिप द्वितीय अंग्रेजी जहाजी बेड़े से इतनी बुरी तरह मात नहीं खाते । इसी तरह ब्रिटेन को नेपोलियन के प्रकोप से बचाने में सागर का बहुत बड़ा हाथ था ।

यूरोपवासी हजारों किलोमीटर दूर से आकर हमारे देश पर शासन न कर पाते अगर उन्होंने सागर को ‘वश में’ न कर लिया होता । सागर ने ही हमारे देश के दक्षिणी भाग के निवासियों को इतना साहसिक और उद्यमी बनाया कि वे- ”भारत से बाहर भी एक भारत” स्थापित कर सके ।

इस प्रकार सागर अनेक देशों के निवासियों के भाग्य को निर्धारित करता रहा है और अब भी कर रहा है । मनुष्य के लिए सागर के महत्व के दिनोंदिन बढ़ते जाने का एक प्रमुख कारण है मनुष्य की निरंतर बढ़ती हुई जनसंख्या और इस जनसंख्या-वृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाले अन्य परिणाम ।

आज संसार की आबादी पाँच अरब से भी अधिक हो गई है । इतनी आबादी इतिहास में पहले कभी भी नही थी । फिर भी वह बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है । इसका एक दुःखद पहलू यह है कि यह वृद्धि उन देशों में अपेक्षाकृत अधिक है जिनके पास साधनों की कमी है ।

यद्यपि आबादी की वृद्धि-दर को कम करने के अनेक उपाय किए गए है पर उसमें बहुत कम सफलता हाथ लगी है । साथ ही बढ़ती हुई आबादी के लिए पर्याप्त अन्न पैदा करने में जी-तोड़ प्रयत्न किए गए पर सब केवल अस्थायी ही सिद्ध हुए है ।

इसी प्रकार कारखानों को समुचित मात्रा में उपयुक्त किस्म के कच्चे माल और पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध कराने में स्थायी रूप से सफलता नहीं मिल पा रही है । धीरे-धीरे जनसंख्या-वृद्धि का यह हाल होता जा रहा है कि कुछ दशक बाद शायद मनुष्य को पृथ्वी पर रहने की नही वरन् खड़े होने तक की जगह मिलनी कठिन हो जाएगी ।

इन समस्याओं को हल करने के लिए अंतत: हमें सागर की शरण में जाना पड़ेगा । अब तक मनुष्य अपनी निरंतर उग्रतर होती हुई समस्याओं का हल थल पर ही ढूँढता रहा है । पर थल की अपनी सीमाएँ हैं । वह इन समस्याओं का हल प्रदान करने में असमर्थ सिद्ध होता जा रहा है ।

इसलिए अब हमें सागर का आश्रय लेना ही होगा । आज हमें मालूम है कि सागर खाद्य और अन्य उत्पादों का बहुत बड़ा स्रोत है । सागरीय पर्यावरण जीव-जंतुओं के निवास के लिए थलीय और ताजा पानी के क्षेत्रों से लगभग तीन गुने से भी बड़ा है । वह खाद्य का अपार भंडार तो है ही, ऊर्जा का भी असीमित स्रोत है ।

यदि हम उसके पानी के विभिन्न स्तरों के तापांतरों का उपयोग बिजली बनाने के लिए कर सकें तो हमें बिजली की कमी कभी नहीं होगी । सागर से इतनी मात्रा में मैंगनीज, लोहा, निकेल, कोबाल्ट और ताँबे जैसी धातुएँ ही नही वरन् चाँदी, सोना, यूरेनियम और प्लेटिनम जैसी धातुएँ भी मिल सकती हैं कि हम शताब्दियों तक उन्हें बिना सोचे-समझे इस्तेमाल कर सकते हैं ।

सागर में पेट्रोलियम और गैस भंडारों की भी कमी नहीं है । उससे ओषधि निर्माण के लिए भी कच्चे मालों की अपार मात्रा प्राप्त की जा सकती है और सागर से मिल सकती है पानी की कभी समाप्त न होनेवाली मात्रा; यद्यपि उसके लिए हमें पानी के निर्लवणीकरण की सस्ती और बेहतर विधियाँ विकसित करनी होंगी ।

सागर की उपयोगिता के फलस्वरूप ही अधिकांश देशों के उन देशों के भी जो द्वीप-देश नही हैं, तटीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक लोग बसे हुए हैं । वास्तव में विश्व की अधिकांश आबादी सागर-तटों अथवा उनके निकट के क्षेत्रों में ही है । संयुक्त राज्य अमेरिका की कुल आबादी का 70 प्रतिशत भाग तटीय क्षेत्रों में है ।

हमारे देश में भी, जहाँ सागर से लोगों को अधिक प्रेम नहीं है और जहाँ अन्य अनेक देशों की तुलना में उसका बहुत कम उपयोग किया जा रहा है, तटीय क्षेत्रों में लगभग 20 करोड़ लोग रहते हैं । तटों पर बहुत बड़े-बड़े शहर और तीर्थ स्थित हैं ।

सागर 100 से अधिक देशों को छूता है और आज उसका महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है । वह देशों को आपस में जोड़नेवाली जलराशि ही नही रहा है वरन् उनके बीच संपर्कों और संघर्षों को उत्पन्न करने वाली भू-राजनीतिक कड़ी भी बन गया है ।

भविष्य में वह प्रत्येक देश के जीवन और राजनीति में अधिक प्रभावशाली हो जाएगा । फिर वही देश प्रगति कर पाएगा जो सागर का भलीभाँति मंथन कर सकेगा । पर आज उसी सागर को हम जाने-अनजाने कचराघर बनाते जा रहे हैं । थल से लगभग पूरी तरह घिरे हुए बाल्टिक और भूमध्यसागर जैसे समुद्र मात्र गंदी झीलें बनकर रह गए हैं । उनमें जीव-जंतुओं की संख्या बहुत घट गई है ।

साथ ही उनके तटों पर बसे लोगों का जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होने लगा है । यहाँ यह बात स्पष्ट करना उचित होगा कि नदियाँ पिछले करोड़ों-अरबों वर्षों से सागर में, अपने पानी में घोलकर अथवा अपने साथ बहाकर, बहुत बड़ी मात्रा में मिट्टी, गाद, खनिज तथा अन्य पदार्थ लाती रही हैं, जिनसे सागर संदूषित होता रहा है ।

साथ ही सागर को संदूषित करने में कुछ अन्य कारकों का भी हाथ रहा है । उसकी लहरें तटों पर थपेड़े मार-मारकर चट्टानों को पानी में घोल लेती हैं अथवा उन्हें तोड़कर अपने साथ ले जाती हैं । सागर के गर्भ में स्थित ज्वालामुखियों से समय-समय पर निकलनेवाले लावाओं, सागर की तली के फैलने के फलस्वरूप भूगर्भ से निकलनेवाले पदार्थ और पेट्रोलियम कुंओं से रिसकर आनेवाला तेल भी उसे प्रदूषित करते रहे हैं । पवन के माध्यम से आनेवाला रेडियोधर्मी पदार्थ तथा पीड़कनाशी भी सागर में मिलते रहे हैं ।

सुदूर अंतरिक्ष से आनेवाली कास्मिक किरणों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बननेवाले समस्थानिक सागर की रेडियोधर्मिता मैं वृद्धि करते रहे हैं । इस तरह सागर अपने जन्मकाल से ही, प्राकृतिक रूप से, प्रदूषित होता रहा है । साथ ही मनुष्य भी अत्यंत प्राचीन काल से सागर में अपना कूड़ा-करकट फेंकता रहा है ।

कुछ दशक पूर्व तक प्रदूषण की मात्रा सागर की विशालता और स्वतः शुद्ध होते रहने की पानी की क्षमता की तुलना में नगण्य थी । इसलिए सागर स्वच्छ और शुद्ध था । पर पिछले कुछ वर्षों से स्थिति बदल गई है । सागर तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है ।

Essay # 2. सागर प्रदूषण के कारक (Causes of Ocean Pollution):

प्रदूषण को ‘औद्योगिकीकरण और प्रगति का बोनस’ माना जाता है- ऐसा बोनस जो अवांछित है और जबरदस्ती हमें लेना ही पड़ना है । जैसे-जैसे मनुष्य प्रगति करता है, कचरे और व्यर्थ पदार्थों की मात्रा, विविधता और घातकता बढ़ती ही जाती है ।

उन्हें समुचित तरीके से ठिकाने लगाने की समस्याएँ भी उग्र से उग्रतर होती जाती हैं । पहले घरेलू कचरे और मल-मूत्र को आसानी से नदियों में बहा दिया जाता था । नदियां उन्हें ‘पचा’ लेती थीं और स्वयं शुद्ध रहती थी । पर अब वे ऐसा नहीं कर पातीं ।

वे स्वयं गंदी हो जाती हैं और अपनी गंदगी को ढोकर सागर में ले जाती हैं । तटीय क्षेत्रों की आबादी अपने मल-मूत्र, औद्योगिक व्यर्थ पदार्थों और बहिःस्रावों को, बिना उपचार के अथवा अंशत: उपचारित करके, सीधे सागर में बहा देती हैं ।

इस प्रकार आज सागर में कृषि छीजन, पीडकनाशियों और डिटरजेंटों की इस्तेमाल की जानेवाली कुल मात्राओं का लगभग 25 प्रतिशत भाग तक पहुँच जाता है । साथ ही उसमें बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम टैंकरों से होनेवाले रिसाव, रिफाइनरियों से फेंके जानेवाले पदार्थों, टैंकरों के साथ आए दिन होनेवाली दुर्घटनाओं के फलस्वरूप बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम भी मिलता रहता है ।

नदियाँ अपने साथ, पिछले करोड़ों-अरबों वर्षों से पानी में घोलकर अथवा छितराकर बहुत बड़ी मात्रा में विभिन्न धातुओं, यथा पारा, कैडमियम, सीसा, ताँबा, लोहा, आसेंनिक, जस्त आदि, के अवशेष लाकर सागर में डाल रही हैं । इन अवशेषों में प्राकृतिक और मानवीय, दोनों, स्रोतों से प्राप्त होनेवाले अवशेष शामिल होते हैं ।

अनेक बार हवाएं भी धातुओं के सूक्ष्म कणों को भारी मात्रा में सागर तक पहुंचा देती हैं । ये अवशेष समुद्री जीवों के लिए हानिकारक ही नहीं, घातक भी होते हैं । साथ ही समय-समय पर मनुष्यों में भी घातक रोग फैलाते रहते हैं । सागर को प्रदूषित करनेवाले घातक पदार्थों में रेडियोधर्मी पदार्थों का विशेष योग है ।

ये पदार्थ नाभिकीय परीक्षणों के फलस्वरूप तो बड़ी मात्रा में सागर में मिलते ही हैं, रिएक्टरों में उत्पन्न रेडियोधर्मी कचरे को सागर में फेंक देने से भी मिलते रहते हैं । आज सागर को, विशेष रूप से उसके गहरे भागों को, रेडियोधर्मी कचरा फेंकने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान समझा जाता है ।

सागर को स्थानीय रूप से प्रदूषित करने में कारखानों और बिजलीघरों से निकलनेवाले गरम पानी का भी योग होता है । यदि तट पर स्थित बिजलीघर नाभिकीय शक्ति से बिजली बनाता है तब उससे निकलनेवाले गरम पानी की मात्रा काफी अधिक होती है । इससे सागर का, स्थानीय रूप से, ताप काफी बढ़ जाता है । इसके कुप्रभाव उस स्थान के समुद्री जीव-जंतुओं पर भी पड़ते हैं ।

संदूषण और प्रदूषण:

इन सबका नतीजा यह है कि आज सागर के हर जीव के शरीर में पीड़कनाशी, क्लोरीनीकृत हाइड्रोकार्बन और मनुष्य-निर्मित रेडियोधर्मिता के अंश मौजूद हैं । साथ ही सीसा, पारा और यहाँ तक कार्बन डाइऑक्साइड भी चिंताजनक स्तरों तक पहुंच गई है ।

आज संपूर्ण विश्व के सागर कम या ज्यादा प्रदूषित है । उन्हें प्रदूषण से मुक्त कराने अथवा और अधिक प्रदूषित न होने देने के उद्देश्य से उनमें प्रदूषण की मात्रा का सही मूल्यांकन करना होगा और उसके लिए ‘प्रदूषण’ को परिभाषित करना पड़ेगा ।

आमतौर से सागरवैज्ञानिक ‘संदूषण’ (कंटेमिनेशन) को ‘प्रदूषण’ (पॉल्युशन) से भिन्न मानते हैं । उनकी दृष्टि में सागर में किसी बाहरी वस्तु को डालना संदूषण है । यह जरूरी नहीं कि वह बाहरी वस्तु सागर के पर्यावरण को दूषित ही करें । यह लकड़ी जैसी हानिरहित वस्तु भी हो सकती है ।

इसके विपरीत विशेषकों- (समुद्री प्रदूषण के वैज्ञानिक पक्ष के विशेषज्ञों के समूह-ग्रुप ऑफ. एक्सपर्ट्स ऑन दि साइंटिफिक एस्पेक्ट ऑफ मेरिन पाल्यूशन (जी.ई.एस.ए.एम.पी.) ने प्रदूषण की परिभाषा इस प्रकार की है- “समुद्री पर्यावरण (ज्वारनदमुख सहित) में मनुष्य द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से ऐसे पदार्थ या ऊर्जा का मिलाना जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के हानिकारी प्रभाव उत्पन्न हों जिनसे जीवों को हानि पहुँचे, मानव स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न हो, मछली मारने और समुद्री पानी की गुणवत्ता में सुधार करने जैसे कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न हों तथा सुविधाओं में कमी आए ।”

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी समुद्री प्रदूषण की यही परिभाषा मानी है । इस बारे में विचित्र बात यह है कि प्राकृतिक कारणों, यथा समुद्र के गर्भ में होनेवाले ज्वालामुखी विस्फोटों और पेट्रोलियम कुंओं के रिसाव आदि, के फलस्वरूप सागर में मिलनेवाले पदार्थों को प्रदूषक नहीं माना जाता ।

 

उक्त परिभाषा से यह स्पष्ट है कि सागर में वही पदार्थ प्रदूषण उत्पन्न करता है जो मुख्यत: निम्न चार कार्यों में से कोई एक अथवा अधिक करता है:

(1) जीवधारियों को हानि,

(2) मानव स्वास्थ्य के लिए संकट,

(3) समुद्री क्रिया-कलापों में बाधा और

(4) सागर से प्राप्त होनेवाली सुविधाओं में कमी ।

आवास अवधि:

सागर के पानी में हर तत्व एक विशेष अवधि तक ही मौजूद रह पाता है । उसके बाद वह कार्बनिक और अकार्बनिक क्रियाओं द्वारा पानी से अलग कर दिया जाता है । वास्तव में जैसे ही कोई तत्व (अपने यौगिकों के रूप में) सागर में पहुँचता है उस पर कार्बनिक और अकार्बनिक क्रियाएँ आरंभ हो जाती हैं और वे उस समय तक होती रहती हैं जब तक वह एकदम समाप्त नहीं हो जाता ।

हर तत्व की सागर के पानी में मौजूद रहने की अवधि भिन्न-भिन्न है । कोई तत्व, यथा लोहा मात्र 140 वर्ष में ही सागर के पानी से अलग हो जाता है जबकि लीथियम जैसा तत्व 2 करोड़ वर्षों तक भी पानी में रहता है । सोडियम के यौगिक तो 26 करोड़ वर्ष तक पानी में बने रहते हैं ।

इस बारे में वैज्ञानिक आमतौर से एक पद, ‘आवास अवधि’ (रेसिडेंस टाइम) का उपयोग करते हैं । आवास अवधि- ”वह समय है जब तक कोई तत्व सागर के पानी में रहा आता है, कार्बनिक और अकार्बनिक क्रियाओं द्वारा बिलगाया नही जाता ।”

कुछ लोग आवास अवधि की परिभाषा उस अनुपात के रूप में भी देते हैं जो किसी दिए गए समय पर सागर में उपस्थित किसी तत्व की कुल मात्रा और उसके विस्थापन की दर के बीच होता है । आवास अवधि के बारे में दो कल्पनाएं की जाती हैं ।

इसका महत्व इन्हीं कल्पनाओं पर आधारित है:

(1) सागर में इकाई समय में प्रवेश करनेवाली तत्व की मात्रा अवसाद के रूप में जमनेवाली मात्रा के बराबर होती है और

(2) तत्वों के सागर में प्रवेश करने के बाद वे तेजी से और एक-सी गति से सागर में मिल जाते हैं और मिलने में लगनेवाला समय आवास अवधि की तुलना में बहुत कम होता है ।

लंबी आवास अवधिवाले तत्व कम क्रियाशील होते हैं, जबकि लघु आवास अवधिवाले तत्व अधिक क्रियाशील । सिलिकन और लोहा जैसे तत्वों की आवास अवधि कम होने का कारण कुछ सूक्ष्मजीवों का इन तत्वों को अपने शरीर में सांद्रित कर लेने का गुण है ।

साथ ही उनके, विशेष रूप से लोहे और मैंगनीज के, हाइड्रोऑक्साइड अत्यधिक क्रियाशील होते हैं । वे सागर के पानी में उपस्थित अन्य तत्वों के आयनों से शीघ्र ही संयुक्त हो जाते हैं । सागरों की तली में पाई जानेवाली बहुधात्विक पिंडिकाओं के निर्माण में यह क्रिया महत्वपूर्ण योग देती है ।

सांद्रता गुणांक:

सागर प्रदूषण के प्रभाव समुद्री जीवों और मनुष्यों के लिए हानिकारक और घातक हो सकते हैं । सागर में असंख्य किस्मों के जीव निवास करते हैं । वहाँ सूक्ष्मदर्शी बैक्टीरिया और प्लांक्टन से लेकर संसार का सबसे बड़ा प्राणी ह्वेल तक निवास करता है ।

अलग-अलग किस्म के जीवों पर एक ही प्रदूषक के असर अलग-अलग होते हैं । किसीके लिए कोई प्रदूषक एकदम हानिरहित होता है तो किसीके लिए अत्यंत घातक । कुछ जीव उसे बहुत सूक्ष्म मात्रा में ही अपने शरीर में संचित करते हैं तो कुछ जीव अपने शरीर में आसपास के पानी की तुलना में कई हजार और लाख गुने तक सांद्रित कर लेते हैं ।

इस बारे में आमतौर से डी.डी.टी. का उदाहरण दिया जाता है । सीप (ओएस्टर) उस समुद्री पानी में से, जिसमें डी.डी.टी. की सांद्रता मात्र 0.1 भाग प्रति एक अरब भाग होती है, अपने ऊतकों में 7 भाग प्रति दस लाख भाग तक डी.डी.टी. सांद्रित कर लेती है । दूसरे शब्दों में, सीप अपने शरीर में पानी की तुलना में 70,000 गुनी डी.डी.टी. सांद्रित कर सकती है । कुछ जीव भारी धातुओं, रेडियोधर्मी पदार्थों और पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बनों को भी इसी प्रकार सांद्रित कर लेते हैं ।

इस संबंध में ‘सांद्रता गुणांक’ (कांसेंट्रेशन कोईफीशिएंट) का उल्लेख करना उचित होगा । ‘सांद्रता गुणांक’ वह अनुपात है जिसे कोई जीव अपने इर्द-गिर्द के पर्यावरण की तुलना में, किसी पदार्थ की जितनी गुनी मात्रा अपने शरीर में सांद्रित कर सकता है । इसे ‘समृद्धि गुणांक’ भी कहते हैं ।

Essay # 3. सागर प्रदूषण के  प्रभाव (Effects of Ocean Pollution):

समुद्री जीव अपने शरीर में पीड़कनाशी, भारी धातुएँ, पेट्रोलियम, हाइड्रोकार्बन, रेडियोधर्मी पदार्थ आदि तो सांद्रित करते ही हैं, वे प्रदूषकों के साथ सागर में आनेवाले वायरसों, बैक्टीरियाओं, परजीवियों आदि को भी ग्रहण कर लेते हैं । इन सबके समुद्री जीवों पर कुप्रभाव पड़ते हैं ।

परिणामस्वरूप वे मामूली तौर से अस्वस्थ होने से लेकर मर भी सकते हैं । इससे भी भयंकर बात यह होती है कि वे अपने शरीर में संचित हानिकारक घातक पदार्थों को उस जीव के शरीर में भी पहुँचा देते हैं जो उन्हें खाता है ।

इस प्रकार प्लांक्टन जैसे जीवों के शरीर में जमा होनेवाले प्रदूषक समुद्री खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्य के शरीर में भी पहुंच जाते हैं । साथ ही इस प्रक्रिया में उनकी सांद्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है । इसीलिए सागर प्रदूषण से मानव के स्वास्थ्य के लिए सबसे भयंकर संकट प्रदूषित जीवों के भक्षण से उत्पन्न होता है ।

इस शताब्दी को छठे दशक के अंतिम चरण में जापान में फैली ‘मिनीमाता व्याधि’ का असली कारण मछुआरों द्वारा मिनीमाता और निगाता खाड़ियों की उन शैलफिशों और फिनफिशों का भक्षण था, जिन्होंने अपने शरीरों में काफी मात्रा में पारद यौगिक संचित कर लिये थे ।

मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए भारी धातुएँ ही नही वरन् पेट्रोलियम, हाइड्रोकार्बन, कीटनाशी, पीड़कनाशी, रेडियोधर्मी पदार्थ, उर्वरक आदि वे सब पदार्थ जो सागर को प्रदूषित करते हैं, संकट उत्पन्न कर सकते हैं । इनके साथ अनेक किस्म के सूक्ष्मजीव, जो प्रदूषकों के साथ सागर में पहुंचते हैं, भी मनुष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं । सागर प्रदूषण के इन प्रत्यक्ष प्रभावों के अतिरिक्त अनेक परोक्ष प्रभाव भी हो सकते हैं ।

इसके फलस्वरूप समुद्री जीवों के कुछ वंश पूर्ण रूप से भी लुप्त हो सकते हैं । इससे उन जीवों को भी भारी हानि पहुंच सकती है जो इन वंशों के जीवों को ही खाते हैं । इस प्रकार पूरी खाद्य श्रृंखला ही गड़बड़ा सकती है । इसका प्रभाव अंतत: मनुष्य पर भी पड़ता है ।

Essay # 4. निराकरण के उपाय (Solution for Prevention of Ocean Pollution):

हम प्रगति के चक्र को विपरीत दिशा में नहीं चला सकते । हमारे घरों में से कूड़ा-करकट निकलेगा ही । मानव आबादी में वृद्धि होने के साथ-साथ मल-मूत्र की मात्रा भी बढ़ेगी । अधिक खाद्यान्न उत्पादन हेतु हमें अधिकाधिक मात्रा में उर्वरक तथा पीड़कनाशी इस्तेमाल करने होंगे ।

कारखानों में उत्पादन बढ़ने के साथ बहि:स्रावों और व्यर्थ पदार्थों की मात्रा भी बढ़ेगी । जीवन को अधिक सुखमय बनाने के लिए हमें ज्यादा-से-ज्यादा मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होगी और उसके लिए पेट्रोलियम और उसके उत्पादों को एक जगह से दूसरी जगह लाना-ले जाना भी पड़ेगा ।

साथ ही ऊर्जा उत्पादन हेतु और बेहतर फसलों और चिकित्सा-कार्यों के लिए रेडियोधर्मी पदार्थों का अधिक उपयोग करना पड़ेगा । इन सबका परिणाम यह होगा कि ये सब सागर में और अधिक मात्रा में पहुंचती ही रहेंगी क्योंकि सागर ही वह जगह है जहाँ बेकार पदार्थों को आसानी से फेंका जा सकता है ।

इस प्रकार अगर समय रहते समुचित उपाय नहीं किए गए तो मानव की प्रगति के साथ सागर अधिकाधिक प्रदूषित होता ही रहेगा । प्रदूषण को रोकने के कुछ उपाय थल पर ही करने होंगे । वहाँ ही सीवेज, कूड़ा-करकट तथा औद्योगिक व्ययों आदि को उपचारित करना होगा ।

पर इस तरह के उपाय एक हद तक ही कारगर होते हैं । इनके द्वारा सागर को प्रदूषित होने से, पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता । सागर को स्वच्छ और शुद्ध रखने के लिए हमें सागर के गुणों का भी उपयोग करना पड़ेगा । उसके पानी की उथल-पुथल, विभिन्न प्रकार के जलों का आपस में मिलना, उसकी ‘पाचन शक्ति’, उसकी लहरों, धाराओं और ज्वार-भाटों का उपयोग करना होगा ।

सागर की विशालता को ध्यान में रखकर उसमें प्रदूषकों को शीघ्रातिशीघ्र फैलाने की विधियों खोजनी होंगी । साथ ही प्रदूषकों की प्रकृति पर भी एक नजर डालनी पड़ेगी जिससे सागर में ही उनको अहानिकारक पदार्थों में बदला जा सके ।

इसलिए यह श्रेयष्कर होगा कि पहले सागर को गंदे और अस्वास्थ्यकर करनेवाले विभिन्न पदार्थों की चर्चा कर ली जाए और फिर उन उपायों और सुझावों पर एक नजर डाली जाए जो सागर को पुन: शुद्ध करने के लिए अपनाए जा सकते हैं ।

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