ग्लेशियर: ग्लेशियर पर निबंध | Glaciers: Essay on Glaciers in Hindi language!

पर्वतीय एवं ध्रुवीय क्षेत्रों की वह रेखा जिसके ऊपर वर्ष भर हिम का आवरण रहता है तथा बर्फ पूर्णतया कभी नहीं पिघलती, हिमरेखा कहलाती है । हिमरेखा में ऋतु के अनुरूप परिवर्तन भी देखे जाते हैं ।

भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर हिमरेखा की ऊँचाई क्रमशः घटती जाती है तथा ध्रुवीय क्षेत्रों में यह प्रायः समुद्रतल के बराबर ही पाई जाती है । भूमध्यरेखा पर हिमरेखा की ऊँचाई 6,000 मीटर है जबकि हिमालय पर यह 5,500 मीटर है ।

हिमानी या हिमनद धीमी गति से बहने वाली हिम या बर्फ की नदी है । ऊँचे पर्वतों में बनने वाली हिमानियाँ लम्बी तथा तंग होती है, क्योंकि वे किसी पूर्ववर्ती नदी की घाटी में बनती है । इन्हें घाटी हिमानी (Valley Glacier) कहते हैं । भारतीय हिमनदों में सबसे बड़ी काराकोरम श्रेणी में अवस्थित सियाचिन हिमनद है, जो 72 किमी. लम्बी है ।

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जब हिमावरण आस-पास की निम्नभूमि पर फैल जाता है, तो वह महाद्वीपीय हिमानी कहलाता है । बर्फ से ढँकी ऊँची पर्वत चोटियाँ, जिससे हिमनद निकलती है, हिमछत्रक (Ice Cap) कहलाती है । पठार पर जमी बर्फ की चट्‌टानें हिमचादर (Ice Sheet) कहलाती हैं जबकि पानी में तैर रही बर्फ की सिल्ली हिमशैल (Iceberg) कहलाती है ।

हिमानी या हिमनद द्वारा धरातलीय उच्चावच में परिवर्तन कार्य मुख्यतः दो रूपों में सम्पन्न होता है- उत्पाटन व अपघर्षण ।

हिमानी द्वारा निर्मित स्थलरूप निम्न हैं:

i. ‘U’ आकार की घाटी (‘U’ Shaped Valley):

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पहाड़ों पर पहले से मौजूद नदी घाटी में हिमानी के लंबवत् अपरदन से ‘U’ आकार की घाटी का निर्माण होता है ।

ii. निलम्बित या लटकती घाटी (Hanging Valley):

जब किसी मुख्य हिमनद से कोई सहायक हिमनद आकर मिलती है, तो सहायक हिमनद की घाटी मुख्य हिमनद घाटी पर लटकती सी प्रतीत होती है, जिसे लटकती घाटी कहते हैं ।

iii. हिम गह्वर या सर्क (Cirque):

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जब किसी पर्वतीय भाग से हिमानियाँ हटती हैं तो वहाँ आरामकुर्सी की तरह की आकृति बनती है, जिसे सर्क कहते हैं ।

iv. एरीट (Arete):

किसी पर्वत के दोनों ओर सर्क के विकसित होने से मध्य का भाग अपरदित होकर नुकीला हो जाता है, जिसे एरीट कहते हैं ।

v. गिरि शृंग या हॉर्न (Horn):

जब किसी पर्वतीय भाग पर चारों ओर से सर्क बनने लगते हैं, तो बीच का नुकीला शीर्ष हॉर्न कहलाता है । स्विट्‌जरलैंड का ‘मैटरहॉर्न’ विश्व प्रसिद्ध है ।

vi. नुनाटक (Nunatak):

किसी पर्वतीय भाग में हिमाच्छादन के बावजूद चट्‌टानों के निकले हुए ऊँचे टीले नुनाटक कहलाते हैं ।

vii. भेड़ शिला (Roche Moutonne):

हिमानी के मार्ग में जब कोई बड़ी ऊँची चट्‌टानी आकृति अवरोधक के रूप में आती है तो हिमानी उसके ऊपर से बहने लगती है तथा चढ़ते समय अपघर्षण के कारण इसे मंद व चिकना कर देती है; किंतु विपरीत दिशा की ढाल, जिसपर हिमानी उतरती है, को तोड़-फोड़ कर अधिक तीव्र, उबड़-खाबड़, ढाल बना देती है । ऐसे चट्‌टानी टीले दूर से देखने पर भेड़ के पीठ के समान दिखते हैं । अतः इन्हें भेड़शिला कहते हैं ।

viii. हिमोढ़ (Moraines):

हिमानियों द्वारा अपरदित व परिवहित पदार्थों का निक्षेप हिमोढ़ कहलाता है । यह प्रायः उन्हीं स्थानों पर होता है, जहाँ हिमानियाँ पिघलकर जल में परिवर्तित होने लगती है ।

ix. ड्रमलिन (Drumlins):

जब हिमानियों के तलस्थ हिमोढ़ का थोड़े-थोड़े सामय पर गुंबदाकार टीलों के रूप में जमाव होता है तो उससे बनी स्थलाकृतियों को ड्रमलिन कहा जाता है । इसका आकार उल्टे हुए नौका के समान होता है ।

x. अपक्षेप मैदान (Outwash Plain):

हिमानी के पिघलने पर बने हिमजल के प्रवाहित होने से हिमोढ़ एक चादर की भांति काफी बड़े क्षेत्र पुर विस्तृत हो जाते हैं । इन्हीं मैदानों को अपक्षेप मैदान कहते हैं । इस मैदान में धाराओं द्वारा निर्मित शिलाखंडों की तहों वाली टेढ़ी-मेढ़ी कगारें एस्कर (Esker) कहलाती है । केम, केटल व हम्मक अवक्षेप मैदान के अन्य प्रमुख स्थल रूप हैं ।

परिहिमानी (Intro Glacier):

ये ध्रुवीय व उपध्रुवीय प्रदेशों में सतही हिमानी के द्वारा होता है । इनमें तुषार-अपक्षय (कंजेलीफ्रैक्शन), मृदासर्पण (सोलफ्लक्शन) व मृदाउत्क्षेपण जैसी क्रियाएँ देखी जाती हैं । पिंगो, पल्सा, थर्मोकास्ट, हम्मक (गिरिका), तुषार क्लिफ, तुषार बहुभुज व अंतर्वलन इसके द्वारा निर्मित प्रमुख स्थलाकृतियाँ है । पेल्टियर ने परिहिमानी चक्र का प्रतिपादन किया है ।

पवन (Wind):

शुष्क व अर्द्धशुष्क मरूस्थलीय भागों में पवन ही अपरदन का सबसे शक्तिशाली साधन है, क्योंकि यहाँ वर्षा नाम मात्र की होती है तथा आर्द्रता और वनस्पति के अभाव में मिट्‌टी के कण ढीले रहते हैं । यहाँ पवन को यांत्रिक अपक्षय से बहुत मदद मिलती है ।

ऊँचाई पर पवन द्वारा कटाव कम और भूतल के निकट अधिक होता है, क्योंकि बालू के कण अधिक ऊँचे नहीं उठ पाते । इसका अपरदनात्मक कार्य मुख्यतः भौतिक ही होता है, जो अपघर्षण, सन्निघर्षण तथा अपवहन के रूप में किया जाता है ।

पवन द्वारा निर्मित स्थलरूप निम्न हैं:

i. वात गर्त या अपवाह बेसिन (Blow Out):

पवन के अपवहन कार्य द्वारा अर्द्धशुष्क मरूस्थलीय क्षेत्रों में धरातल पर बिछी रेत को उड़ाए जाने के कारण छोटे-छोटे गर्तों का निर्माण हो जाता है, जो क्रमशः बढ़कर बड़ा आकार धारण कर लेते हैं । इन्हीं गर्तों को वात गर्त कहा जाता है ।

ii. छत्रक शैल या गारा (Mushroom Rock or Gara):

यह पवन के अपघर्षण से बनी वह स्थलाकृति है, जो कुकुरमुत्ते जैसी लगती है । चट्‌टानों के निचले भागों में अधिक कटाव होने के कारण ऐसी आकृति बनती है ।

iii. ज्यूगेन (Zeugen):

यह दावातनुमा आकृति है, जिसका निर्माण वहाँ होता है जहाँ मुलायम और कड़ी चट्‌टानों की परतें क्षैतिज अवस्था में होती हैं । चट्‌टान की दरारों में ओस भरने और रात में तापमान कम होने से मुलायम चट्‌टानों का अपरदन होने लगता है । कठोर चट्‌टानी भाग टोपी की भांति नजर आता है । इन्हें ही ज्यूगेन कहते हैं ।

iv. यारडांग (Yardang):

कड़ी और मुलायम चट्‌टानों की परतें जब पवन की प्रवाह दिशा में होती है तो कड़ी चट्‌टानों की अपेक्षा मुलायम चट्‌टानें अधिक कटने लगती है तथा वहाँ नालीनुमा गड्‌ढे बन जाते हैं । इसे ही यारडांग कहा जाता है ।

v. गुंबदाकार टीला या इंसेलबर्ग (Inselburg):

पवन के प्रभावकारी अपरदन से जब चट्‌टानी भाग कट-छंटकर समतल हो जाता है तथा यत्र-तत्र कड़े चट्‌टान टीले के रूप में उभरे रह जाते हैं, तो उन्हें इंसेलबर्ग नाम दिया जाता है ।

vi. ड्राइकांटर (Dreikanter):

भूमि पर बिछे कठोर चट्‌टानी टुकड़ों पर बालूयुक्त हवा की चोट पड़ने से उनका आकार घिसकर चिकना व तिकोना हो जाता है । ये तिकोने टुकड़े ही ड्राइकांटर कहलाते हैं ।

vii. जालीदार शिला (Stone Lattice):

जब तीव्रगति से चलने वाली पवन के मार्ग में विविधतापूर्ण संरचना वाली चट्‌टान उपस्थित होती है तो उसके कोमल भागों को काटकर पवन आर-पार प्रवाहित होने लगती है, जिससे वह चट्‌टान जाली के समान दिखाई पड़ने लगता है ।

viii. बालुका स्तूप (Sand Dunes):

ऐसे टीले जो हवा द्वारा उड़ाकर लाई गई रेत आदि पदार्थों के जमाव से बनते हैं, बालुका स्तूप कहलाते हैं । ये पवन की दिशा में खिसकते या स्थानान्तरित होते रहते हैं ।

‘बरखान’ अर्द्धचन्द्राकार बालू का टीला होता है, जिसके दोनों छोरों पर आगे की ओर नुकीली सींग जैसी आकृति निकली रहती है । लूनेट, ह्वेल बैक स्तूप, तारा स्तूप, सीफ आदि भी बालूका स्तूपों के विभिन्न प्रकार है ।

ix. लोएस (Loess):

मरूस्थलीय क्षेत्रों के बाहर पवन द्वारा उड़ाकर लाए गए महीन बालूकणों के वृहत् निक्षेप को लोएस कहते हैं । इसकी मिट्‌टी जल मिलने पर अत्यन्त उपजाऊ हो जाती है । चीन के उत्तरी मैदान में लोएस मिट्‌टी मिलती है, जो गोबी मरुस्थल से उड़ाकर लाई गई है । ऑक्सीकरण के कारण इसका रंग पीला होता है ।

x. पेडीमेंट (Pediment):

मरूस्थलीय प्रदेशों में किसी पर्वत, पठार या इंसेलबर्ग के पदीय प्रदेशों (Foot Hill Regions) में मिलने वाले सामान्य ढालयुक्त अपरदित शैल सतह वाले मैदान को पेडीमेंट कहा जाता है ।

xi. प्लाया (Playa):

मरूस्थल की अन्तःप्रवाहित नदियाँ वर्षा के बाद अस्थायी झीलों का निर्माण करती हैं, जिन्हें प्लाया कहते हैं । खारे जल के प्लाया को ‘सैलीनास’ कहते हैं ।

xii. बजादा या बहादा (Bajada):

इसका निर्माण पेडीमेंट के नीचे तथा प्लाया के किनारों पर जलोढ़ पंखों के मिलने से होता है ।

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