व्यापार संरक्षण नीति के खिलाफ तर्क | Read this article in Hindi to learn about the arguments against the protection of trade.

संरक्षण नीति एक आदर्श विदेशी आर्थिक नीति नहीं है । ”जब सीमा शुल्क की दीवारें ऊंची उठ जाती हैं, तो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में गिरावट आती है । प्रत्येक देश देशों की कम-से-कम संख्या के साथ व्यापार करता है । यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के परमाणविकी (Atomistic) स्वरूप को नष्ट कर देता है और प्रतिकार का भय विस्तृत रूप में प्रचलित यथार्थता में परिवर्तित हो जाता है ।” -टाइबर डी स्किटोवोस्की

इसलिये संरक्षण की नीति की कुछ आशंकाएं हैं जिनका वर्णन नीचे किया गया है:

1. घरेलू उत्पादक आलस्यपूर्ण बन जाते हैं (Home Producers Become Lethargic):

संरक्षण नीति के कारण घरेलू उत्पादक आलसी बन जाते हैं क्योंकि वह उद्योग में सुधारों की चिन्ता नहीं करते । इसके अतिरिक्त यह विकास को हतोत्साहित करती है तथा दक्षता को कम करती है ।

2. निहित स्वार्थ (Vested Interests):

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एक बार संरक्षण मिल जाने पर, प्रारम्भिक उद्योग इसे जन्म सिद्ध अधिकार समझने लगते हैं तथा भविष्य में इसे वापिस लेना कठिन हो जाता है । शिशु को संरक्षण देते हुये हम कभी-कभी उसे वयस्क बनने से रोक देते हैं ।

3. भ्रष्टाचार का भय (Danger of Corruption):

संरक्षण के विरुद्ध एक अन्य तर्क यह है कि यह भ्रष्टाचार को जन्म देता है । संरक्षित उद्योग अपनी ऊर्जा और धन का उपयोग कुछ लाभों के लिये प्रशासनिक मशीनरी को रिश्वत देने में करते हैं न कि अपने उद्योगों के सुधार की ओर ध्यान देने में । इसके अतिरिक्त राजनीतिक नेताओं को भी घुस दी जाती है ।

4. एकाधिकारों की रचना (Creation of Monopolies):

प्रतियोगिता की अनुपस्थिति में घरेलू निर्माता आपस में मिल जाते हैं तथा बहुत लाभ कमाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक शक्तियों का केन्द्रीकरण हो जाता है और एकाधिकार प्रथाएं आरम्भ हो जाती हैं ।

5. धन और आय का अनुचित वितरण (Unfair Distribution of Wealth and Income):

संरक्षण के अन्तर्गत सदैव धन और आय का अनुचित वितरण होता है । इससे उच्च कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं पर अवांछित बोझ पड़ता है । संरक्षण, एक ओर, अधिक-से-अधिक धन द्वारा पूंजीपति का पक्ष करता है तथा दूसरी ओर निर्धनता का । इस प्रकार, यह समाज में धनी और निर्धन के बीच की खाई को विस्तृत करता है ।

6. प्राकृतिक साधनों का उचित उपयोग नहीं (No Proper Utilization of Natural Resources):

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एक अन्य तर्क जो संरक्षण की नीति के विरुद्ध जाता है वह यह है कि इस नीति के अन्तर्गत साधनों का उचित उपयोग नहीं होता । वास्तव में, यह श्रम एवं पूंजी को उत्पादक मार्गों से हटा कर कम उत्पादक मार्गों में लगा देता है । अधिकतम उत्पादन का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता ।

7. आय की हानि (Loss of Revenue):

संरक्षण के कारण सार्वजनिक आय की भी हानि होती है क्योंकि उच्च शुल्क के कारण प्राय: आयात घट जाते हैं । अत: संरक्षणात्मक शुल्कों के कारण सरकार को कम राजस्व प्राप्त होता है ।

8. उपभोक्ताओं पर बोझ (Burden on Consumers):

संरक्षण नीति की एक अन्य त्रुटि यह है कि उपभोक्ताओं को बहुत हानि होती है । सस्ते आयात समाज हो जाते हैं तथा कीमतें बढ़ जाती हैं । अन्तिम बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ता है क्योंकि उन्हें सामान्य वस्तुओं के लिये भारी कीमतें चुकानी पड़ती हैं ।

9. अदक्ष इकाइयों का अस्तित्व (Existence of Inefficient Units):

संरक्षण एवं विदेशी प्रतियोगिता की समाप्ति के कारण अदक्ष उद्योगों को अपने उत्पादन के साथ बाजार में बने रहने का अवसर प्राप्त होता है । अत: संरक्षण का बोझ उपभोक्ताओं और निर्धन लोगों को सहन करना पड़ता है क्योंकि उन्हें उच्च मूल्य पर घटिया वस्तुएं खरीदनी पड़ती हैं ।

10. अधिकतम सामाजिक उत्पादन में बाधा (Hindrances in Maximum Social Output):

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यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि संरक्षण की नीति के अन्तर्गत लगाये गये प्रतिबन्धों के कारण उत्पादन के कारकों की गतिशीलता और अन्तर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन में कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं । इसलिये कारकों का पूर्ण उपयोग और श्रम विभाजन के लाभ असम्भव हो जाते हैं । संक्षेप में, यह अधिकतम सामाजिक उत्पादन में अनावश्यक बाधाएं डालता है ।

संरक्षण के पक्ष और विपक्ष की परिचर्चा के निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि अविवेकी संरक्षण आन्तारिक वैर-भाव और ईर्ष्या का कारण बनते हैं । दूसरी ओर विवेकपूर्ण संरक्षण लाभप्रद प्रमाणित हो सकता है तथा मूलभूत एवं प्रारम्भिक उद्योगों की स्थापना कर सकता है ।

इस सम्बन्ध में एस. एल. परमार (S.L. Parmar) ने सत्य ही कहा है- “न्यायसंगत संरक्षण को सदैव समर्थित किया जाता है ।” सत्य यह है, कि विश्व के सभी देशों ने किसी-न-किसी कारण से कभी-कभी संरक्षण की नीति अपनाई है ।

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