हैरोड-डोमर आर्थिक विकास मॉडल के अनुप्रयोग | Read this article in Hindi to learn about the applications of Harrod-Domar model. The applications are:- 1. सरकार की भूमिका (Role of Government) 2. पूर्ण रोजगार की अनुपस्थिति (Absence of Full Employment) 3. पूँजी-उत्पादन अनुपात की स्थिरता (Constancy of Capital-Output Ratio) and a Few Others.

हैरोड-डोमर मॉडल प्राथमिक रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत विकसित पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के सम्मुख सुदीर्घकालिक जड़ता के सकट के कारणों को विश्लेषित करने हेतु प्रतिपादित किया गया था । बाद में इस मॉडल का प्रयोग अर्द्धविकसित देशों की समस्याओं के संदर्भ में किया जाने लगा । भारत में पहली पंचवर्षीय योजना में हैरोड-डोमर मॉडल के सुधरे हुए रूप को अपनाया गया ।

वस्तुत: हैरोड-डोमर मॉडल उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की समस्याओं से संबंधित रहा व अर्द्धविकसित देशों के संदर्भ में इनकी सीमित उपयोगिता रही । इसका मुख्य कारण हैरोड-डोमर मॉडल की वह मान्यताएँ है जो व्यावहारिक दृष्टि से अपर्याप्त व असंगत बनी ।

1. सरकार की भूमिका (Role of Government):

हैरोड-डोमर मॉडल इस मान्यता पर आधारित है कि आर्थिक क्रियाओं में कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता । यह मान्यता अर्द्धविकसित देशों के संदर्भ में व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि बिना सरकार की भूमिका के इन देशों में अर्न्सरचनात्मक सुविधाओं व सामाजिक उपरिमदों का निर्माण संभव नहीं है । सरकार के द्वारा इन देशों में संरचनात्मक परिवर्तन लाए जाते है तथा राज्य द्वारा उपक्रमी की विशिष्ट भूमिका का निर्वाह किया जाता है । यह बड़े उद्योगों की आधारशिला रखने के साथ निजी उपक्रमों का नियमन व निर्देशन करता है ।

2. पूर्ण रोजगार की अनुपस्थिति (Absence of Full Employment):

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हँराड-डोमर मॉडल में प्रारंभिक स्तर पर पूर्ण रोजगार की संकल्पना ध्यान में रखी गयी है, जबकि अर्द्धविकसित देश छद्‌म बेकारी व अर्द्धरोजगार की समस्याओं से पीड़ित रहते हैं । इन देशों में संरचनात्मक बेकारी भी पाई जाती है जिसका मुख्य कारण श्रम व पूँजी का असंतुलन है । अर्द्धविकसित देशों में पूँजी संचय की अपेक्षा जनसंख्या वृद्धि तीव्र गति से होती है । अत: संरचनात्मक बेकारी का मूल कारण पूँजी संचय का अभाव है ।

3. पूँजी-उत्पादन अनुपात की स्थिरता (Constancy of Capital-Output Ratio):

अर्द्धविकसित देशों में किया जा रहा उत्पादन प्राय: अभावों, अन्य बाधाओं एवम बाजार की अपूर्णताओं से ग्रस्त रहता है । विनियोग की जा रही पूँजी की उत्पादकता प्राय: इन अपूर्णताओं के फलस्वरूप उच्चावचन करती है । ऐसी दशा में अर्द्धविकसित देशों में पूँजी-उत्पादन अनुपात का सही अनुमान लगाना संभव नहीं है ।

विकसित देशों के संदर्भ में पूँजी उत्पाद अनुपात की स्थिरता की संकल्पना प्रासंगिक हो सकती है । इसका कारण यह है कि किसी समय अवधि में पूँजी गुणांकों के संतुलित वितरण वाली परियोजनाएँ चालू की जाती है, जबकि अर्द्धविकसित देश क्षेत्रीय असंतुलनों एवं असमानताओं की समस्या से ग्रस्त रहते हैं ।

हर्षमैन के अनुसार इन्हीं कारणों से बचत की प्रवृति एवम् पूँजी-उत्पाद अनुपात पर आधारित मॉडल उन्नत देशों के सापेक्ष कम विकसित देशों में कहीं कम उपयोगी रहा है । इसकी पूर्वानुमान एवम् क्रियात्मक क्षमता अल्प है । यह वास्तव में हमें उस मुख्य तकनीक के बारे में अधिक नहीं बतलाता जिसके द्वारा आर्थिक वृद्धि संभव होती है एवम् जिसे अर्द्धविकसित देशों में लागू किया जा सकता है ।

4. बचत एवं विनियोग (Saving and Investment):

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विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बचत एवम् विनियोग निर्णय एक दूसरे से प्राय: स्वतन्त्र होते हैं और बचतों की पूर्ति का मुख्य निर्धारक प्रति व्यक्ति आय है ।

ऐसे आर्थिक संगठनों में बचत व विनियोग की समानता साम्य की दशाओं को संतुष्ट करती है लेकिन अर्द्धविकसित देशों में बचत व विनियोग निर्णय काफी अधिक अन्तर्निर्भरता रखते हैं । इन देशों में बचतों की अधिक मात्रा की प्राप्ति किसी सीमा तक नए विनियोग अवसरों पर निर्भर करती है । मात्र आय में होने वाली वृद्धि इन देशों की बचत की दर में वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होती ।

5. विदेशी व्यापार (Foreign Trade):

हैरोड-डोमर मॉडल बंद अर्थव्यवस्था की मान्यता पर आधारित है । यह अर्द्धविकसित देशों के विकास में विदेशी पूँजी के योगदान तथा विदेशी व्यापार कि स्थितियों का विवेचन नहीं करता ।

6. स्थिर कीमत स्तर (Constant Price Level):

यह मॉडल स्थिर कीमत स्तर की दोषपूर्ण मान्यता पर आधारित है । अर्द्धविकसित देशों में आर्थिक विकास के साथ कीमत परिवर्तन होते रहते हैं ।

7. संस्थागत घटक (Institutional Factors):

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हैरोड-डेमर विश्लेषण संस्थागत घटकों को दिया हुआ मान कर चलता है । वास्तव में अर्द्धविकसित देशों में संस्थागतपरिवर्तनों के बिना आर्थिक विकास नहीं इसी कारण यह विश्लेषण अर्द्धविकसित देश की समस्याओं को बास्तविक परिप्रेक्य में नहीं देखता ।

प्रो. एलबर्ट ओ हर्षमेन ने अपने अध्ययन The Strategy of Economic Development (1958) में स्पष्ट किया कि डोमर मॉडल हमें केवल उस दर के बारे में ही जिस पर अर्थव्यवस्था नए विनियोग के द्वारा सृजित क्षमता के पूर्ण उपयोग से अवश्य विकास इसके साथ ही एक निश्चित लक्ष्य वृद्धि को प्राप्त करने के लिए चाही जाने वाली बचतों एवम अनुपातों की भी जानकारी देता है । ऐसा करते हुए पूँजी-उत्पादन अनुपातों की भी जानकारी ऐसा करते हुए पूँजी-उत्पादन अनुपात को से 2.5 से 5 मध्य किसी मूल्य पर माना जाता है ।

अर्द्धविकसित देशों में हैरोड-डोमर मॉडल विकास नियोजन में किस प्रकार सहायक होता है ।

इसे हम निम्न की सहायता से स्पष्ट कर सकते हैं:

माना किसी विकासशील देश में वृद्धि की पूर्ण रोजगार दर 4% वार्षिक है एवम अनुभव सिद्ध के आधार पर पूँजी उत्पादन दर 3: 1 मानी जाती है । इसके आधार पर डोमर के अनुसार

इससे अभिप्राय है कि 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के लिए पूँजी-उत्पादक अनुपात के 3: 1 होने पर बचत की दर में वार्षिक आय की 12% ।

इस आकलन से स्पष्ट होता है कि एक देश अपनी पूँजी आवश्यकताओं की गणना कर सकता है, जबकि वृद्धि की आवश्यक दर एवम पूँजी उत्पादन अनुपात दिया हुआ हो । बहुधा एक देश वृद्धि दरों के ऊपर नियन्त्रण नहीं रख पाता लेकिन वह पूँजी के प्रवाहों को निश्चित रूप से नियन्त्रित कर सकता है ।

ऐसी दशा में नीति निर्धारक वृद्धि की हर्षमैन ने यह स्पष्ट किया कि इस मॉडल में लिए गए फलनात्मक संबंध विकास की प्रक्रिया का अशुद्ध विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं । ऐसी स्थिति विद्यमान होने पर मॉडल अर्द्धविकसित देशों की वास्तविकताएँ वर्णित करने के स्थान पर बाधा उत्पन्न कर सकता है ।

प्रो. एस. चक्रवर्ती ने अपने अध्ययन The Logic of Investment Planning में स्पष्ट किया है कि हैरोड-डोमर मॉडल में वृद्धि चर बहुत अधिक सामूहिक प्रकृति के हैं । जिसके परिणामस्वरूप यह विस्तृत मात्रात्मक नीति निर्धारण के उपकरण की भाँति प्रयोग करने हेतु अपर्याप्त होता है तथा सतत् या अविरत विकास की समस्याओं के संरचनात्मक पक्ष को छुपा जाता है ।

प्रो.के.के. कुरिहारा ने अपनी पुस्तक The Keynesian Theory of Development (1959) में यह मत व्यक्त किया कि हैरोड-डोमर मॉडल प्रति चक्रीय उपाय एवम प्रति अवरूद्धता की नीति निर्माण की प्रक्रिया में उपयोगी बन सकता है । यह औद्योगीकरण कार्यक्रमों हेतु दिशा निर्देशक नहीं बन पाता जिसकी अर्द्धविकसित देशों को सर्वाधिक आवश्यकता होती है ।

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि यह मॉडल अर्द्धविकसित देशों की समस्याओं के संदर्भ में सार्थक नहीं बन पाता तथा उन महत्वपूर्ण पक्षों को रेखांकित नहीं कर पाता जो इन देशों की विकास प्रक्रिया से संबंधित हैं लेकिन इसके बावजूद भी यह आय विनियोग व बचतों के लक्ष्य का परीक्षण करने एवम लक्ष्यों में संगति का मूल्यांकन करने की दृष्टि से उपयोगी है ।

कुरिहारा के अनुसार हैरोड-डोमर मॉडल ने वृद्धि की प्रक्रिया की क्रियात्मक महत्ता की प्रकृति को स्पष्ट किया । इसके लिए उन्होंने बचत के अनुपात एवम पूँजी उत्पादन अनुपात को महत्वपूर्ण चर माना जिससे वृद्धि की आवश्यक दर को मापा जा सके एवम् इनमें फेरबदल किया जाना भी संभव हो सके । इन चरों की सार्वभौमिक प्रवृति को देखते हुए हैरोड-डोमर की वृद्धि प्रक्रिया सभी आर्थिक प्रणालियों में लागू हो सकती है भले ही इसमें कुछ संशोधन करने पड़े ।

कुरिहारा का मत है कि यद्यपि यह मॉडल एक उन्नत अर्थव्यवस्था में प्रगतिशील संतुलन की वृद्धि दशाओं को सूचित करने के उद्देश्य से निर्मित किया गया है लेकिन इसके बाद भी यह मॉडल केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यह कींज के स्थैतिक अल्पकालीन बचत विनियोग सिद्धांत का प्रावैगिक एवम् दीर्घकालिक विश्लेषण करता है बल्कि इसलिए भी कि एक अर्द्धविकसित देश की आर्थिक वृद्धि हेतु इसमें राजकोषीय नीति के प्राचलों को सुव्यक्त चरों के रूप में प्रस्तावित किया जाना संभव है ।

संक्षेप में, हैरोड-डोमर मॉडल में कुछ संशोधन करते हुए इनका प्रयोग अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास प्रक्रिया के विश्लेषण हेतु किया जा सकता है ।

भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना में हैरोड-डोमर मॉडल का प्रयोग किया गया था । इस योजना में बचत की दर को बचत की सीमांत व औसत दरों के अंतर द्वारा अभिव्यक्त किया गया जिससे पूँजी निर्माण के स्वरूप का निर्धारण हो । यद्यपि अर्थव्यवस्था में वृद्धि की चालू दर को अधिकतम करने के लिए नियोजन के माध्यम को अपनाया गया था । एस. चक्रवर्ती के अनुसार इस मॉडल के द्वारा अर्द्धविकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय से जुड़ी समस्याओं के आयामों को मोटे रूप से समझा जा सकता है ।

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