मानव संसाधन की आवश्यकता का आकलन कैसे करें? | Read this article in Hindi to learn about the four methods used to estimate the need for human resources. The methods are:- 1. स्थिर-आदा गुणांक विधि (Fixed-Input Coefficients Approach) 2. माँग की अनन्त कीमत लोच विधि (The Infinite Price Elasticity of Demand) 3. रेखीय प्रयोजना (Linear Programming) 4. शिक्षा से प्रतिफल विधि (Return from Education Method).

भविष्य में मानव शक्ति आवश्यकताओं का अनुमान लगाने की विधियाँ निम्न हैं:

Method # 1. स्थिर-आदा गुणांक विधि (Fixed-Input Coefficients Approach):

यह विधि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में शिक्षा की आवश्यकताओं के साथ प्रक्षेपित क्षेत्रीय उत्पादन के वर्तमान गुणांकों की सहायता से भविष्य में प्रत्येक क्षेत्र में चाही जाने वाली मानवशक्ति आवश्यकताओं एवं शिक्षा के स्तरों का आकलन करती है ।

इस विधि में यह संकल्पना ली गई है कि एक वर्ग अथवा समूह में रखे श्रम को श्रम के अन्य समूहों के साथ, प्रतिस्थापित किया जाना संभव है । वास्तविक जीवन में हम पाते हैं कि यह सामान्य रूप से सत्य नहीं है । इस विधि का दूसरा दोष यह है कि यह श्रम के वैकल्पिक वर्गों को उपलब्ध लागतों में अन्तर को ध्यान में नहीं रखती ।

Method # 2. माँग की अनन्त कीमत लोच विधि (The Infinite Price Elasticity of Demand):

ADVERTISEMENTS:

जिसके द्वारा उन विशिष्ट कुशलताओं व शिक्षा के स्तरों को निर्दिष्ट किया जा सकता है । जिनके अधीन वर्तमान मजदूरी संरचना उच्चतम प्रतिफल प्रदान करती है । इस विधि में यह मान्यता सन्निहित है कि विद्यमान मजदूरी संरचना सही रूप से विविध कुशलताओं व शिक्षा स्तरों के सापेक्ष उत्पादन को सूचित करती है ।

यह ध्यान रखना होगा कि विकसित देशों के सापेक्ष विकासशील देशों में बाजार संयन्त्र की अपूर्णताएँ मजदूरी संरचना को सापेक्षिक उत्पादकताओं के संदर्भ में अधिक तोड़ती है जिससे मजदूरी संरचना पर आधारित निर्णय गलत दिशाओं की ओर ले जाते हैं । इसके साथ ही श्रम के विभिन्न वर्गों के मध्य प्रतिस्थापनीयता का थोड़ा अंश विद्यमान होता है कि प्रतिस्थापन की अनन्त लोच जैसा कि इस विधि में माना गया है ।

Method # 3. रेखीय प्रयोजना (Linear Programming):

जिसके द्वारा प्रत्येक क्षेत्र में चाही जाने वाली कुशलताओं व शिक्षा स्तरों का निर्धारण संभव बना है । यह अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में कौशल एवं शिक्षा स्तरों की उत्पादकता का आंकलन करती हैं तथा भविष्य के क्षेत्रीय उत्पादन को प्रक्षेपित करती है । इस प्रकार उन कुशलताओं व शिक्षा स्तरों के संयोग का निर्धारण संभव होता है जो भविष्य के सकल राष्ट्रीय उत्पाद को अधिकतम करते हैं ।

रेखीय प्रयोजना विधि का मुख्य दोष यह है कि इसमें अन्य दो विधियों के सापेक्ष अधिक आंकडों की आवश्यकता पड़ती है । अधिकांश विकासशील देशों में प्रत्येक क्षेत्र के शिक्षा स्तरों हेतु उत्पादकता के आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते ।

ADVERTISEMENTS:

जो आंकड़े उपलब्ध होते हैं वह भी प्रासंगिक नहीं होते । रेखीय प्रयोजना विधि यद्यपि उपर्युक्त दो विधियों की कई कमियों को दूर करती है पर यह विकसित देशों की वर्तमान परिस्थितियों में अपनाई नहीं जा सकती ।

Method # 4. शिक्षा से प्रतिफल विधि (Return from Education Method):

यह विधि प्रत्येक प्रकार के शैक्षिक विनियोग से प्राप्त प्रतिफल की दरों का आंकलन करती है । इसके द्वारा उन कुशलताओं व शैक्षिक स्तरों को ज्ञात करना संभव होता है जिनकी एक समय विशेष में सबसे अधिक आवश्यकता है ।

इस विधि का मुख्य दोष यह है कि:

(1) इस विधि में विनियोग को शिक्षा पर किए गए व्यय के उपभोग भाग से अलग नहीं कर पातीं ।

ADVERTISEMENTS:

(2) यह शिक्षा के शुद्ध उच्च स्तरों में प्राप्त प्रतिफल व दूसरी ओर उन्नत ज्ञान एवं प्रेरणाओं के द्वारा प्राप्त प्रतिफल के अनुपात को पृथक नहीं कर पाती ।

(3) इस विधि में व्यक्ति को शिक्षा के उच्च स्तरों द्वारा प्राप्त होने वाली बाह्य मितव्ययिताओं को ध्यान में नहीं रखा जाता ।

(4) शिक्षा पर व्यय होने वाली लागत एवं लाभ की तुलना के लिए बट्टे की उचित दर का निर्धारण कर पाना संभव नहीं है ।

मूल्यांकन:

उपर्युक्त सीमाओं के बावजूद भी अर्थशास्त्री इस विधि को अन्य के सापेक्ष अधिक पसंद करते हैं । कारण यह कि एक निर्णय जिसमें शिक्षा के स्तर पर अधिक जोर दिया जाता है, सामान्य रूप से लागत लाभ मापन पर आधारित रहता है जिसके अर्न्तगत इस प्रतिफल की दर की माप किसी सीमा तक की जा सकती है ।

इस विधि में जो सैद्धांतिक मान्यताएँ ली गयी हैं वह किसी सीमा तक स्पष्ट हो तथा इस आधार पर किया गया सैद्धांतिक व अनुभवसिद्ध अवलोकन का कार्य इसे एक व्यापक आधार प्रदान करता है । अन्य विश्लेषण में इसे सापेक्ष कम प्राथमिकता दी जाती है । उन्हें एक पूरक विधि के रूप में देखा जाता है जिसमें मानवशक्ति की आवश्यकताओं से संबंधित अन्य अनुमान लगाए जाने संभव बनें ।