विदेशी सहायता या सहायता: प्रभाव और समस्या | Read this article in Hindi to learn about the impact and problem of foreign aid or assistance.

विदेशी सहायता अथवा विदेशी सहयोग का प्रभाव (Impact of Foreign Aid or Assistance):

विदेशी सहायता प्रायः तीन मुख्य कार्यों के संचालन के लिये होती है ।

अर्थात्:

(i) विदेशी विनिमय की अतिरिक्त पूर्तियां उपलब्ध करने,

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(ii) प्रौद्योगिकी के स्थानान्तरण को सुविधापूर्ण बनाने और

(iii) घरेलू बचत को बढ़ाने के लिये ।

विदेशी सहायता अथवा सहयोग किसी सीमा तक उत्पादक क्षमता के विकास में योगदान कर सकता है, पूर्णतया विदेशी सहायता के प्रयोग की विधि पर निर्भर करता है । विदेशी सहायता, प्रयोग बिन्दु के पश्चात वृद्धि प्रवृतिक मानी जाती है । पूजी वस्तुओं का आयात, वर्तमान उपभोग को बढ़ाने के लिये गैर सहायता साधनों को मुक्त कर सकता है ।

संक्षेप में, विदेशी सहायता के प्रभाव को निम्नलिखित अनुसार संक्षिप्त किया जा सकता है:

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1. सहायता का खाद्य पदार्थों की कीमतों के स्थायीकरण में उपयोग (Aid Used to Stabilize Food Prices):

विदेशी सहायता का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि कुल सहायता का उच्चतम अनुपात खाद्य अनाजों के आयात के लिये प्रयोग किया जाता है । इस कारण देश में खाद्य अनाजों की कीमतों के स्थिरीकरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है । इस राशि का प्रयोग कच्चा माल आयात करने के लिये किया जाता है जो उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है ।

2. निवेश का स्तर बढ़ाना (Raise the Level of Investment):

निवेश के दर में पर्याप्त वृद्धि हुई है । पहली योजना के आरम्भ में इसका वार्षिक स्तर राष्ट्रीय आय का 5 प्रतिशत था जो वर्ष 1990-91 में 25 प्रतिशत तक पहुंच गया । निवेश की दर में वृद्धि के कारण, विदेशी विनिमय व्यय में भी अनुकूल वृद्धि हुई है ।

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3. यातायात का संवर्धन (Promotion of Transportation):

विदेशी सहायता का एक अन्य हितकर प्रभाव यह है कि इसका प्रयोग देश में यातायात की सुविधाओं को बढ़ाने और सुधारने के लिये किया गया है । इसने देश में गाड़ियों और इंजनों की सफलतापूर्वक वृद्धि की है ।

4. विस्तृत तकनीकी साधन (Enlarged Technical Resources):

विदेशी सहायता ने भारतीय कर्मचारियों के प्रशिक्षण और विशेषज्ञ सेवाओं की व्यवस्था द्वारा तकनीकी साधनों के विस्तार में सहायता की है ।

5. इस्पात उद्योगों की स्थापना (Establishment of Steel Industries):

विदेशी सहायता ने देश में इस्पात के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई है । निर्माण उद्योग द्वारा प्रयुक्त सहायता राशि का 80% से अधिक भाग इस्पात उद्योग के विकास के लिये प्रयोग किया गया । यह सहायता पश्चिमी जर्मनी, यू.एस.एस.आर. तथा यू.के.से प्राप्त हुई । इस समय इस्पात का उत्पादन, 1950 के दशक के आरम्भिक वर्षों से 7 गुणा अधिक है ।

6. विद्युत वस्तुओं के उद्योग का विकास (Development of Electronics Industry):

भारत जटिल पैट्रोलियम और विद्युत उद्योगों के विकास के प्रयत्न कर रहा है जो विदेशी सहायता के बिना पूरे नहीं हो सकते । इसलिये सरकार देश में पैट्रोकैमीकल और विद्युत वस्तुओं की उन्नति के लिये विदेशी सहायता का अत्यधिक प्रयोग करने के प्रयत्न कर रही है ।

विदेशी सहायता अथवा सहयोग की समस्याएं (Problems of Foreign Aid or Assistance):

विदेशी सहायता के प्रयोग में कुछ कठिनाइयों का सामना किया जा रहा है जिन पर निम्नलिखित अनुसार प्रकाश डाला जा रहा है:

1. बाहरी ऋण का बोझ (Burden of External Debt):

विदेशी सहायता की मुख्य समस्या यह है कि बाहरी ऋण वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है । उदाहरणतया पहली 3 योजनाओं के दौरान कुल ऋण पर व्यय 686 करोड़ था जबकि चौथी योजना काल में यह 2445 करोड़ रुपयों तक बढ़ गया और पांचवर्षीय योजना में 2,889 करोड़ रुपयों तक बढ़ा और पुन: सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान यह 6406 करोड़ रुपये था ।

2. अनिश्चितता (Uncertainty):

देश द्वारा सामना की जा रही एक अन्य कठिनाई विदेशी सहायता के विस्तार की अनिश्चितना है जोकि कुछ अवधि के लिये उपलब्ध रहेगी । अनिश्चितता का यह तत्व सम्भावित आयोजन के निर्वस्त्र कार्य में बाधा है । जब प्राप्तकर्ता देश को विदेशी सहायता की ठीक राशि का ज्ञान नहीं होगा तो आयोजन कार्यक्रम सुविधापूर्ण कैसे हो सकता है ।

3. विदेशी सहायता के समावेश की क्षमता (Capacity to Absorb Foreign Aid):

विदेशी सहायता के समावेशन की क्षमता, इस कोष के उचित उपयोग की अन्य समस्या है जबकि समावेशन की क्षमता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है । इस प्रयोजन से सहायता के अनुकूलतम प्रयोग के लिये परियोजना का दक्ष संचालन अत्यावश्यक है । पुन: देश के विस्तृत निर्यात सक्षम न होने के कारण समस्या और भी तीव्र हो गई है ।

4. राजनीतिक दबाव (Political Pressure):

उपरोक्त कठिनाइयों के अतिरिक्त, विदेशी सहायता से एक अन्य बाधा उत्पन्न होती है । वह है-अन्य देशों पर भारत की निरन्तर और बढ़ती हुई निर्भरता । ऐसे समय भी आये हैं जब भारत इन दाता देशों के दबाव को सहन करने में असमर्थ रहा है । उदाहरणतया, भारत को वर्ष 1966 में राजनीतिक दबाव के अधीन रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा ।

वर्ष 1971 में, अमेरिका ने हस्तक्षेप करते हुये दिसम्बर 1971 में भारत-पाक संघर्ष के दौरान सहायता बन्द करने की धमकी दी । इसी प्रकार अमरीका सरकार ने तारापुर परमाणु बिजली संयंत्र के लिये परमाणु ईंधन की पूर्ति सम्बन्धी समझौते को मानने से इन्कार कर दिया था ।

सुझाव (Suggestions):

विदेशी सहायता/सहयोग के उपयोग की समस्या के समाधान के लिये निम्नलिखित सुझाव सहायक हो सकते हैं:

1. तकनीकी सहायता को देश में तकनीकी संस्थाओं के स्थापन का रूप लेना चाहिये, न कि अनुदानकर्ता देशों में दिये जाने वाले तकनीकी प्रशिक्षण का ।

2. विदेशी सहायता के अनुकूलतम उपयोग के लिये, आवश्यक है कि सहायता को कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जाये न कि परियोजनाओं के साथ ।

3. ऋण/सहायता संयुक्त होने चाहिये न कि बन्धी सहायता ।

4. विदेशी सहायता दीर्घकालिक वचनबद्धता के रूप में होनी चाहिये न कि वार्षिक वचनबद्धताओं के अनुसार ।

5. प्रत्येक व्यक्तिगत परियोजना का व्यक्तिगत और पृथक समझौता होना चाहिये ।

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