आर्थिक विकास के लिए नव-शास्त्रीय दृष्टिकोण | Read this article in Hindi to learn about:- 1. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की प्रस्तावना (Introduction to Neo-Classical Approach to Economic Development) 2. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की मान्यताएँ (Assumptions of Neo-Classical Approach to Economic Development) and Other Details.

Contents:

  1. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की प्रस्तावना (Introduction to Neo-Classical Approach to Economic Development)
  2. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की मान्यताएँ (Assumptions of Neo-Classical Approach to Economic Development)
  3. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की पूंजी संचय (Capital Accumulation in Neo-Classical Approach to Economic Development)
  4. आर्थिक विकास एक धीमी एवं समन्वित प्रक्रिया (Harmonious Process of Economic Growth)
  5. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के आशावादी दृष्टिकोण (Optimism of Neo-Classical Approach to Economic Development)
  6. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के अनुसार अर्न्तराष्ट्रीय व्यापार (International Trade under Neo-Classical Approach to Economic Development)
  7. नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण में मार्शल का विकास विश्लेषण (Development Analysis of Marshall under Neo-Classical Approach)
  8. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित की विश्लेषण आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Evaluation of Neo-Classical Approach to Economic Development)

1. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की प्रस्तावना (Introduction to Neo-Classical Approach to Economic Development):

1870 के उपरान्त प्रतिष्ठित विश्लेषण को अपनी कुछ मान्यताओं के कारण सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा । यह ऐसा समय था जब औद्योगीकरण की गति तीव्र हो गयी थी, खोज एवं आविष्कारों से उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी जिससे स्थिर अर्थव्यवस्था का भय कम होने लगा था । प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा जीवन निर्वाह हेतु मजदूरी, प्रतिफल दर की न्यूनता तथा लगान की वृद्धि जैसी मान्यताएँ सत्य नहीं हो पायी थीं ।

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का विचार था कि आर्थिक विकास की गति असतत् व अनियमित होती है । उन्होंने भूमि की सीमितता को तेजी से बढ़ती जनसंख्या से संबंधित किया तथा प्रतिफल के गिरते हुए नियम पर विश्वास किया । वह बढ़ते हुए लगान से चिन्तित थे ।

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उन्होंने माना कि विकास की आवश्यकताएँ मजदूरियों को जीवन निर्वाह स्तर पर ला देती है । उनका दृष्टिकोण निराशावादी था । नव-प्रतिष्ठित विचार की में एलफ्रेडमार्शल, पी.टी. एल्सवर्थ, ए.पी. पीगू, विकस्टीड, फ्लक्स, चैपमेन व मीड मुख थे । इन्होंने अस्पकालिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया ।

उन्होंने उत्पादन साधनों की पूर्ति को दिया हुआ माना तथा उसके उपयोग की दशाओं को निर्धारित किया । उन्होंने यह जानना चाहा कि अल्पकाल में अर्थव्यवस्था में आर्थिक तत्व किस प्रकार कार्य करते हैं । नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री अर्थ व्यवस्था के विभिन्न भागों व सन्तुलन के मध्य के आन्तरिक सम्बन्धों को स्पष्ट करते है ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री आशावधी थे । प्रथम विश्वयुद्ध के उपरान्त तकनीकी प्रगति तीव्र हुई थी व इससे विकास के गतिरोध कम हुए थे । लाभ व मजदूरी की दरों में वृद्धि हो रही थी । मजदूरी का जीवन निर्वाह सिद्धान्त तत्कालीन सन्दर्भों में अप्रासंगिक होने लगा तथा माल्स्थ का जनसंख्या विश्लेषण भी । नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के अनुसार- उत्पादन के विभिन्न साधनों की एक दी हुई पूर्ति की स्थिति में एकाधिकार की अपेक्षा प्रतिस्पर्द्धात्मक दशाएँ अधिक उत्पादन सम्भव बनाती हैं तथा साधनों का बेहतर आबंटन होता है ।


2. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की मान्यताएँ (Assumptions of Neo-Classical Approach to Economic Development):

नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण उस सूक्ष्म आर्थिक सैद्धान्तिक प्रणाली के द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है जिनके द्वारा स्थैतिक सन्तुलन की दशा को जाना जा सके । नव-प्रतिष्ठित विचारकों के अनुसार, बचतें विनियोग को निर्धारित करती हैं । सन्तुलन की दशा को साधन कीमतों के परिवर्तन द्वारा पूर्ण रोजगार पर प्राप्त किया जा सकता है । संक्षेप में नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण सन्तुलन की समस्या तथा पूर्ण रोजगार की वृद्धि पर आधारित था ।

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नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास सम्बन्धी विश्लेषण में यह मान्यता ली कि:

i. देश में पूर्ण प्रतियोगिता की दशा विद्यमान है अर्थात् राज्य आर्थिक क्रियाओं में हस्तक्षेप नहीं करता ।

ii पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान है ।

iii. मूल्य स्थिर रहते हैं ।

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iv. देश में सन्तुलित विकास की नीति अपनाई जाती है ।

v. व्यक्तियों की रुचि, फैशन एवं राज्य व संस्थाओं की नीति में होने वाले परिवर्तन ध्यान में नहीं रखे जाते ।

नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के मुख्य विचार निम्न बिन्दुओं के अध्ययन से स्पष्ट किए जा सकते है ।


3. आर्थिक विकास की नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण की पूंजी संचय (Capital Accumulation in Neo-Classical Approach to Economic Development):

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा वर्णित पूँजी संचय सम्बन्धी दृष्टिकोण में मतभेद दिखाई देता है लेकिन इसके बावजूद भी वह किसी सीमा तक एक समान व परस्पर मिलते-जुलते विचार रखते थे । उन्होंने पूँजी को श्रम से प्रतिस्थापित करने की सम्भावना को ध्यान में रखा ।

उन्होंने पूँजी संचय के विश्लेषण को जनसंख्या के सिद्धान्त से सम्बन्यित नहीं किया । उनके अनुसार- पूँजी का संचय श्रम शक्ति में वृद्धि किए बिना भी किया जा सकता है । उनका विश्वास था कि तकनीक के एक दिए हुए स्तर पर पूँजी संचय की प्रत्येक वृद्धि के साथ पूँजी की सीमान्त उत्पादकता गिरती है ।

नव-प्रतिष्ठित विचारक स्वीकार करते थे कि आर्थिक विकास हेतु पूंजी संचय आवश्यक है जिसके लिए बचत की जानी चाहिए । वह मितव्ययिता को विकास हेतु आवश्यक मानते थे । बचतें मुख्यत: ब्याज की दर एवं आय के आकार द्वारा निर्धारित होती है । बचतें तब अधिक होंगी जब ब्याज की दर अधिक हो । साथ ही आय का स्तर उच्च होने पर अधिक बचत की जायेगी । स्पष्ट है कि उन्होंने ब्याज की दर आय के स्तर एवं बचत दर के मध्य कार्यात्मक सम्बन्ध स्थापित किया ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार- विनियोग की दर को भी ब्याज की दर निर्धारित करती है । विनियोग वृद्धि हेतु ब्याज की दरों को कम होना चाहिए । संक्षेप में ब्याज की दर केवल बचतों की दर को ही नहीं बल्कि तकनीक के स्तर व जनसंख्या के दिए होने पर विनियोग की दर को भी प्रभावित करती है ।

नव-प्रतिष्ठित विचारकों का विचार था कि उद्योगपति तब तक विनियोग करेंगे जब तक सीमान्त आगम एवं सीमान्त विनियोग इकाई में समानता बनी रहे । उन्होंने तकनीकी विकास से सम्बन्धित उन कार्यक्रमों को महत्वपूर्ण माना जिनसे राष्ट्रीय आय बढ़ती है । वह यह भी स्वीकार करते थे कि पूँजी के निर्माण के लिए श्रम शक्ति में वृद्धि आवश्यक नहीं है । नई तकनीकों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ता है तथा लागतें कम होती है । अत: मूल्य कम होते हैं व बचत क्षमता बढ़ती है ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने कहा कि उच्च क्षमता वाली परियोजनाओं की परिपक्वता अवधि पूर्ण होने पर पूँजीगत वस्तुओं की माँग कम हो जाती है अर्थात् विनियोग के अधिक लाभ प्रदान करने वाले कार्यक्रमों के पूर्ण होने पर ब्याज की दरें व पूँजीगत वस्तुओं के सापेक्षिक मूल्य गिरने लगते है । तब निम्न फल देने वाली योजनाओं की ओर विनियोग आकर्षित होता है । अंतत ब्याज की दरें इतनी कम हो जाती है कि बचत के लिए प्रोत्साहन नहीं रहता । इस स्थिति में पूँजी संचय लगभग समाप्त हो जाता है व अर्थव्यवस्था स्थिर दशा प्राप्त करती है । सम्भव है कि तब ब्याज की दर शून्य तक आ गिरे ।

संक्षेप में, पूँजी के संचय व विकास की प्रक्रिया के मध्य एक गहन सम्बन्ध विद्यमान होता है । आर्थिक वृद्धि को त्वरित करने के पीछे मुख्य कारक तकनीकी प्रगति है । इसके द्वारा पूंजीगत वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है लागतें कम होती हैं जिससे उत्पादक अधिक उत्पादन हेतु प्रोत्साहित होते है, साथ ही समय की बचत भी होती है ।


4. आर्थिक विकास एक धीमी एवं समन्वित प्रक्रिया (Harmonious Process of Economic Growth):

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों की दृष्टि में विकास एक मद एवं स्थायी प्रक्रिया है । अभिप्राय यह है कि विकास एक क्रमिक पद्धति के अनुसार, धीमी गति से होता है । साथ ही विकास की प्रक्रिया संचयी समन्वित तथा सामन्जस्यपूर्ण होती है । एलफ्रेड मार्शल ने डार्विन एवं स्पेन्सर के क्रमिक विकास सिद्धान्तों के अनुरूप जैविक दृष्टिकोण को स्वीकार किया तथा कहा कि प्रकृति इच्छानुसार ही ऊँचे शिखर पर नहीं पहुँचती ।

यह तथ्य आर्थिक विकास के सन्दर्भ में भी लागू किया जा सकता है । जंगलों में जिस प्रकार वृक्ष धीरे-धीरे सतत् व क्रमिक रूप से बढ़ते हैं आर्थिक विकास भी उसी प्रकार होता है ।

अर्थव्यवस्था में होने वाली वृद्धि उत्पादन के समस्त साधनों को लाभ पहुंचाती है अर्थात विकास के द्वारा अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्र व समाज के भिन्न आय वर्ग लाभ प्राप्त करते है । आर्थिक विकास ने न केवल श्रमिक बल्कि पूंजीपति व भूस्वामी भी लाभ प्राप्त करते है यह नव्य मार्क्स की धारणा से भिन्न है ।

आर्थिक विकास के साथ-साथ पूर्ण रोजगार प्राप्त करने की प्रवृति बढ़ती जाती है । नई तकनीक कुछ समय के लिए ही श्रम का प्रतिस्थापन करती है । अन्त में न केवल अधिक रोजगार का सृजन होता है बल्कि वास्तविक मजदूरी भी बढ़ती है । नवप्रतिष्ठित विश्लेषण में विकास की समरूपी प्रक्रिया को वाहय मितव्ययिताओं के सृजन द्वारा समझाया गया । मार्शल ने बताया कि एक आर्थिक क्षेत्र में समूचा उद्योग वाह्‌य मितव्ययिताओं की वृद्धि से स्फुरण प्राप्त करता है ।

विकास श्रम विभाजन तथा श्रम विभाजन बाजार के विस्तार पर निर्भर करता है । श्रम विभाजन द्वारा विशिष्टीकरण सम्भव होता है जिससे उत्पादन लागत कम होती है । ऐसे में संसाधनों के भौगोलिक व व्यावसायिक आवंटन सम्भव होते है तथा माँग बढ़ती है । स्पष्ट है कि एक क्षेत्र एवं उद्योग का विकास एक दूसरे से सम्बन्धित है । इसी कारण विकास की प्रक्रिया को निरन्तर स्थायी एवं संचयी कहा गया । नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था की आपसी निर्भरता व परिपूरकता की प्रवृति को रेखांकित करते हैं ।


5. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के आशावादी दृष्टिकोण (Optimism of Neo-Classical Approach to Economic Development):

प्रतिफल के ह्रास नियम एवं माल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त की निराशा प्रतिष्ठित विश्लेषण में छाई रही लेकिन नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री पूँजीवाद एवं आर्थिक विकास के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखते थे । उनका मत था कि ह्रासमान प्रतिफल की दशा को तकनीकी सुधारों के द्वारा दूर कर उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है न केवल उद्योग बल्कि कृषि में भी प्रतिफल की बढ़ती दर प्राप्त करना सम्भव है ।

नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के अनुसार- व्यक्ति की क्षमताएँ असीमित हैं । वह हर भौतिक एवं तकनीकी समस्या का समाधान प्राप्त कर । मार्शल ने कहा कि उत्पादन में जो कार्य प्रकृति के द्वारा किया जाता है उसकी प्रवृति क्रमागत उत्पत्ति हास नियम तथा जो कार्य मनुष्य द्वारा सम्पन्न होते हैं उनकी प्रवृति क्रमागत उत्पत्ति वृद्धि नियम की होती है । इसी आशावाद से प्रेरित होकर उन्होंने लिखा कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि हम एक स्थिर अवस्था के समीप हैं ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के आशावाद को माल्थस के जनसंख्या सिद्धान्त ने विपरीत रूप से प्रभावित किया । इंग्लैण्ड में होने वाली तीव्र जनवृद्धि से भविष्य में होने वाले आर्थिक विकास की दर धीमी पड़ने की आशंका उन्हें थी । उन्होंने यह सम्भावना भी बताई कि पूर्ण रूप से स्थिर अवस्था की दशा भी उत्पन्न हो सकती है । मार्शल ने कहा कि भविष्य में मात्र वह देश ही अर्न्तराष्ट्रीय विनिमय द्वारा लाभ प्राप्त कर पाएंगे जिनके पास विक्रय हेतु कच्चा माल होगा तथा औद्योगिक देशों को व्यापार में कमी की स्थिति देखनी पड़ेगी । उन्होंने अर्द्धविकसित देशों में औद्योगीकरण की सम्भावनाओं पर विचार किया तथा यह पूर्वानुमान प्रस्तुत किए कि भविष्य में औद्योगिक देशों को विदेशी बाजार में प्रतियोगिता का सामना करना पड़ेगा ।


6. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण के अनुसार अर्न्तराष्ट्रीय व्यापार (International Trade under Neo-Classical Approach to Economic Development):

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार- अर्न्तराष्ट्रीय व्यापार से एक देश की वास्तविक आय में वृद्धि होती है । उन्होंने तुलनात्मक लागत सिद्धान्त में सुधार करते हुए स्पष्ट किया कि एक देश को उन वस्तुओं के उत्पादन में विशिष्टीकरण प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए जिनमें उसे सापेक्षिक लाभ प्राप्त हों उन्होंने बाजार के विस्तार पूँजी निर्माण व राष्ट्रीय आय में वृद्धि की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का महत्व रेखांकित किया ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने कुछ विशेष परिस्थितियों में संरक्षण नीति का भी समर्थन किया । वस्तुत: उन्होंने स्वतन्त्र व्यापार नीति के द्वारा प्राप्त लाभों को ध्यान में रखते हुए निकोलसन के कथन को स्वीकार किया कि ईमानदारी की भाँति स्वतन्त्र व्यापार नीति अब भी सर्वोत्तम नीति है । उन्होंने बताया कि श्रम एवं पूँजी की अन्तर्राष्ट्रीय गतियाँ किस प्रकार नए देशों के विकास को त्वरित करती हैं । उनका विश्वास था कि अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी के हस्तान्तरण से भुगतान सन्तुलन की कठिनाइयाँ उत्पन्न नहीं होतीं ।


7. नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण में मार्शल का विकास विश्लेषण (Development Analysis of Marshall under Neo-Classical Approach):

एलफ्रेड मार्शल के आर्थिक विकास सम्बन्धी निष्कर्ष उनके ग्रन्थों (Principles of Economics (1890), The Pure Theory of Foreign Trade (1879) एवं Industry and Trade (1990) के अध्ययन से प्राप्त होते हैं । मार्शल वस्तुत: एडम स्मिथ एवं रिकार्डो के प्रतिष्ठित सम्पदाय का अनुगमन करते थे । उन्होंने प्रतिष्ठित विश्लेषण में वर्णित स्थिर अवस्था कुताल की सीमाओं को रेखांकित किया तथा उत्पादन अवधि की महत्ता वर्णित की ।

मार्शल के अनुसार- मात्र उत्पादन अथवा राष्ट्रीय आय की वृद्धि किसी देश के विकास का उपयुक्त मापदण्ड नहीं है । विकास का उचित मापदण्ड व्यक्तियों के वास्तविक, सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण की वृद्धि से सम्बन्धित होना चाहिए । इस प्रकार मार्शल राष्ट्रीय आय विचारधारा के जनक बने जिसे वर्तमान समय में आर्थिक विकास का मुख्य मापदण्ड स्वीकार किया गया है ।

मार्शल के विकास सम्बन्धी दृष्टिकोण को निम्नांकित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:

i. उत्पादन के साधन:

मार्शल के अनुसार- उत्पादन के मुख्य साधन भूमि, श्रम, पूँजी साहस एवं संगठन है जिनमें भूमि तथा श्रम को मुख्य तथा पूँजी को गौण स्थान दिया जाता है । मार्शल के अनुसार- उत्पादन के साधन पूरक एवं प्रतियोगी होते है ।

ii. विकास की सूचक राष्ट्रीय आय:

मार्शल ने राष्ट्रीय आय की वृद्धि को विकास का सूचक बताया । उनके अनुसार- देश में श्रम व पूँजी के द्वारा भौतिक व अभौतिक वस्तुओं एवं विविध प्रकार की सेवाओं का उत्पादन होता है । यह उस देश की शुद्ध वास्तविक आय का आगम या राष्ट्रीय लाभांश है । मार्शल ने भौतिक उत्पादन में होने वाली वृद्धि को विकास के द्वारा सूचित किया ।

iii. विकास एक क्रमिक प्रक्रिया:

मार्शल के अनुसार- विकास एक क्रमिक प्रक्रिया है । मार्शल, डर्विन एवं स्पेंसर के जीव विज्ञान एवं सामाजिक क्रमिक सिद्धान्त से प्रभावित थे इसलिए उन्होंने विकास की प्रक्रिया को आर्थिक जीव विज्ञान से सम्बन्धित करते हुए कहा कि अर्थशास्त्रियों का मक्का आर्थिक प्रावैगिकी के सापेक्ष आर्थिक जीव विज्ञान है ।

मार्शल ने स्पष्ट किया कि जिस प्रकार प्रकृति अपनी इच्छा से तीव्र गति से छलांग मार कर आगे नहीं बढ़ती वैसे ही विकास भी आकस्मिक उछाल के द्वारा सम्भव नहीं है । उन्होंने विकास को धीमी एवं मन्द प्रक्रिया के द्वारा सम्भव बताया तथा आविष्कार व नव-प्रवर्तन को भी क्रमिक एवं लगातार होने वाली प्रक्रिया के द्वारा अभिव्यक्त किया । यदि नव-प्रवर्तनों के द्वारा किसी अर्थव्यवस्था में आकस्मिक परिवर्तन आ भी रहे हों तो मार्शल का मत था कि यह लगातार किए जा रहे पूर्व प्रयासों का ही फल होता है ।

iv. तकनीक एवं श्रम विभाजन:

मार्शल ने कहा कि तकनीक एवं श्रम विभाजन द्वारा देश की उत्पादकता में वृद्धि सम्भव है । तकनीकी सुधारों से कृषि क्षेत्र में भी उत्पादन बढ़ाया जा सकता है । उन्होंने यन्त्रीकरण का पक्ष लिया जिससे अधिक श्रम विभाजन सम्भव होता है ।

v. पूँजी संचय:

मार्शल ने बचत की इच्छा को समाज हेतु आवश्यक बताया जिससे पूँजी संचय सम्भव होता है, पूँजी निर्माण द्वारा मशीनीकरण तथा यान्त्रिक प्रगति होती है । उनके अनुसार- जनसंख्या के परिवर्तन के बिना भी पूँजी निर्माण में वृद्धि की जा सकती है ।

vi. जनसंख्या वृद्धि:

मार्शल के अनुसार- यदि जनसंख्या में होने वाली वृद्धि समस्त प्रकार के भौतिक आनन्द के स्त्रोतों एवं उत्पादन के सहायक तत्त्वों की समान वृद्धि से सहभागिता रखे तो इससे सभी प्रकार के सुखों में वृद्धि होती है । मार्शल जनसंख्या की गुणात्मक वृद्धि के महत्व को रेखांकित करते थे अर्थात् स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधाओं के बढ़ने से विकास स्वयमेव बढ़ता है । उन्होंने माल्थस के जनसंख्या विश्लेषण का समर्थन न करते हुए कहा कि खाद्यान्नों का उत्पादन हमेशा क्रमागत उत्पत्ति हास नियम के अधीन नहीं होता कृषि के यन्त्रीकरण द्वारा कृषि उत्पादन में दुगनी से अधिक वृद्धि सम्भव है ।

vii. उचित वितरण प्रणाली:

मार्शल ने राष्ट्रीय आय में होने वाली वृद्धि के लिए उचित वितरण प्रणाली को आवश्यक माना । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने लगान, ब्याज, मजदूरी एवं लाभ के निर्धारण हेतु सिद्धान्त प्रतिपादित किए तथा परम्परागत विश्लेषण को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया । मार्शल रिकार्डों के लगान सिद्धान्त से सहमत थे । ब्याज निर्धारण के लिए उन्होंने माँग एवं पूर्ति विश्लेषण का आश्रय लिया ।

उन्होंने बचत व विनियोग में साम्य हेतु ब्याज की दरको सन्तुलनकारी घटक माना । ब्याज की दर अधिक होने से बचतें बढ़ेगी जिससे विनियोग हेतु पर्याप्त पूंजी प्राप्त हो सकती है । मजदूरी दर के निर्धारण हेतु उन्होंने जीवन निर्वाह सिग्नल के स्थान पर न्याय एवं मानवीयता जैसे घटकों को ध्यान में रखा ।

उन्होंने कहा कि मजदूरी की दर का निर्धारण सीमान्त उत्पादकता के द्वारा किया जाना चाहिए परन्तु इसे जीवन स्तर लागत से न्यून नहीं होना चाहिए । लाभ .को मार्शल जोखिम लेने का पुरस्कार बताते थे । लाभ की ऊँची दर को वह उचित मानते थे, क्योंकि यह पूँजी संचय का मुख्य स्त्रोत है ।

viii. बाहय मितव्ययिताएँ:

मार्शल ने बाहय मितव्ययिताओं के प्राप्त होने से विकास के संचयी सन्तुलित व समन्वित होने के पक्ष को रेखाकिंत किया । मार्शल ने आर्थिक प्रणाली की एकता के पक्ष को निरूपित करते हुए और उसे एक समन्वित रूप में प्रस्तुत किया जिसके अधीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न अर्न्त सम्बन्धित भाग एक दूसरे के साथ आपसी निर्भरता रखते हुए संचालित होते थे ।


8. आर्थिक विकास के नव-प्रतिष्ठित की विश्लेषण आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Evaluation of Neo-Classical Approach to Economic Development):

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का विकास विश्लेषण पश्चिम की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था हेतु प्रासंगिक था । उन्होंने तकनीक के स्तर, उत्पादन के साधनों में प्रतिस्थापन, प्रतिस्पर्द्धात्मक अर्थव्यवस्था, गतिशीलता के उच्च अंश एवं सामाजिक विकास के पक्षों पर विचार करते हुए अल्पकालीन विश्लेषण प्रस्तुत किया ।

उनके अनुसार- विकास धीमी नियमित व समन्वित गति से होता है । यह तब सम्भव है जबकि आर्थिक वातावरण स्थैतिक अवस्था में हों जिसमें तर्कसंगत निर्णय लिए जा रहे हों । उन्होंने आकस्मिक एवं चक्रीय उच्चावचनों की व्याख्या नहीं की ।

उनकी व्याख्या की कमियाँ निम्नांकित बिन्दुओं के द्वारा स्पष्ट की जा सकती हैं:

1. अवास्तविक मान्यताएँ:

यह माना गया कि प्रतिस्पर्द्धात्मक अर्थव्यवस्था विद्यमान है जिसमें सरकारी हस्तक्षेप अनुपस्थित है । सन्तुलित विकास नीति का समर्थन किया गया । उत्पादन के साधनों में उच्च गतिशीलता होती है तथा विकास हेतु सुव्यवस्थित बैकिंग प्रणाली व यातायात की यथेष्ट एवं समर्थ प्रणाली की आवश्यकता पर बल दिया जाता है ।

नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने विकास की सतत् व नियमित प्रक्रिया के विश्लेषण में आर्थिक प्रणाली में निश्चितता के एक उच्च अंश की कल्पना की, जबकि वास्तव में अर्थव्यवस्था में जोखिम व अनिश्चितता विद्यमान रहती है । ऐसी स्थिति में विनियोग का निर्धारण करने में कीमत स्तर एवं ब्याज की दर उतने प्रभावपूर्ण नहीं रह जाते जैसी नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने कल्पना की थी ।

2. नव-प्रतिष्ठित विश्लेषण कुछ दोषपूर्ण मान्यताओं पर आधारित रहा । जैसे कि उन्होंने प्रतिस्पर्द्धात्मक समाव में पूर्ण रोजगार की कल्पना की । कीन्ज के अनुसार- अर्थव्यवस्था में न्यून रोजगार सन्तुलन की दशा विद्यमान होती है ।

3. नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्तियों के अनुसार- बचत का मुख्य निर्धारक ब्याज की दर है । आलोचकों के अनुसार- बचत ब्याज की दर पर नहीं वरन आय के स्तर पर निर्भर होती है । पिछड़े देशों में मात्र व्याज दर में वृद्धि करने पर बचत बढ़ नहीं पाएगी । इसका कारण यह है कि इन देशों में आय का न्यून स्तर होता है । नव-प्रतिष्ठित विचारकों के अनुसार- विनियोग को मुख्यत: ब्याज की दर निर्धारित करती है, जबकि कीन्ज के अनुसार- विनियोग पूँजी की सीमान्त उत्पादकता एवं भावी प्रत्याशाओं पर निर्भर करता है ।

4. नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों के अनुसार- बचत करना व्यक्तिगत गुण होता है लेकिन कीन्ज के अनुसार बचतों के अधिक होने से उपभोग कम होने लगता है जिसका रोजगार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।

5. नव-प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने विकास की प्रक्रिया को क्रमिक, सतत, संचयी व समन्वित माना, जबकि शुम्पीटर के अनुसार- आर्थिक विकास की प्रवृति समन्वित न होकर उच्चावचन युक्त होती है ।