आर्थिक विकास: अर्थ, टेस्ट और ईविल | Read this article in Hindi to learn about:- 1. आर्थिक विकास का परिचय (Introduction to Economic Development) 2. आर्थिक विकास  का अर्थ तथा परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Economic Development) 3. समस्याओं का स्वरूप (Nature of Problem) 4. आधुनिक स्वरूप (Modern Version) and Other Details.

Contents:

  1. आर्थिक विकास का परिचय (Introduction to Economic Development)
  2. आर्थिक विकास  का अर्थ तथा परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Economic Development)
  3. आर्थिक विकास समस्याओं का स्वरूप (Nature of Economic Development Problem)
  4. आर्थिक विकास का आधुनिक स्वरूप (Modern Version of Economic Development)
  5. आर्थिक विकास के परीक्षण (Tests of Economic Development)
  6. आर्थिक विकास की बुराइयां (Evils of Economic Development)

1. आर्थिक विकास का परिचय (Introduction to Economic Development):

तीस के दशक की महान् मन्दी तथा द्वितीय विश्व युद्ध दो ऐसी मुख्य ऐतिहासिक घटनाएं थीं जिन्होंने आर्थिक विकास के नियमों, समस्याओं, नीतियों के अध्ययन को महत्वपूर्ण मोड़ दिया । ऐसा शायद, अधिकांश एशियाई और अफ्रीकी देशों को उपनिवेशी दासता से प्राप्त स्वतन्त्रता के कारण था ।

तब से अर्थशास्त्रियों ने अल्प-विकसित देशों के विकास को तीव्र करने और विश्व के विकसित देशों में विकास को बनाये रखने का विश्लेषणात्मक अध्ययन आरम्भ किया ।

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डब्ल्यू. सी. माइकल के अनुसार- “विभिन्न देशों में उत्तरोतर पीढ़ियों में विकास जिस दर से बढ़ता है उसकी तुलना में कुछ समस्यायें अधिक मोहक अधिक महत्वपूर्ण तथा अधिक उपेक्षित है ।”

इस तथ्य के बावजूद, आर्थिक विकास के अध्ययन ने मर्कनटाइल स्कूल से लेकर एडम स्मिथ और कार्ल मार्क्स तक Mercantile School to Adam Smith and Karl Marx के प्रसिद्ध विद्वानों और अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित किया है ।

मुख्य ध्यान स्थैतिक प्रकृति की समस्याओं पर दिया गया जो मुख्यता पश्चिमी यूरोप की सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के ढांचे से सम्बन्धित थी । एडम स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध कार्य, “An Inquiry into the Nature and Causes of Wealth of Nations” में आर्थिक प्रगति की ओर ले जाने वाली शक्तियों का प्रतिपादन किया है ।

इसी प्रकार डेविड रिकार्डों भी आर्थिक वृद्धि में गहरी रुचि रखते थे । 1930 की मन्दी के दौरान केन्ज के विश्लेषण ने द्विपक्षीय सन्देश दिया जिसमें- चक्रीय बेरोजगारी के फलस्वरूप साधनों की व्यर्थता की निन्दा और दीर्घकालिक स्थिरता की आशंकाओं के विरुद्ध चेतावनी दी गई ।

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यह दोनों परस्पर सम्बन्धित समस्याएं आर्थिक वृद्धि की सामान्य परिचर्चा में जुड़ी हुई हैं, ओर यही केन्ज के पश्चात् विश्लेषण की मुख्य चिन्ता है । पूंजीवादी विकास की अधिक उन्नत स्थितियों में, अर्थशास्त्री सतत् वृद्धि को बनाये रखने तथा सामान्य उत्पादन के आधिक्य अथवा अल्प-उत्पादन की गम्भीर दीर्घकालीन समस्या से बचाव के लिए आवश्यक गम्भीर दीर्घकालीन स्थितियों को खोजने के प्रयत्न कर रहे हैं ।

दूसरी ओर, अल्प विकसित क्षेत्रों में आर्थिक विकास की समस्या एक अग्रगामी विषय बन गई है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् एशियाई और अफ्रीकी राष्ट्रों में फैली राजनीतिक जागृति के कारण विशेष महत्व प्राप्त कर लिया है । वह आर्थिक विकास और सामान्य लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के प्रयास कर रहे हैं ।

इस तथ्य के साथ, आर्थिक विकास का अध्ययन आर्थिक सिद्धान्त के लिए अनिवार्य बन जाता है । इसमें स्वतः ही इन देशों से निर्धनता और पिछड़ेपन के उन्मूलन के कारण और उपाय सम्मिलित हो जाते हैं ।

वास्तव में, निर्धनता प्रत्येक स्थान की समृद्धि के लिए एक खतरा है । इस सन्दर्भ में, मायर एण्ड बाल्डविन ने ठीक ही कहा है- “विकास को बनाये रखना समृद्ध देशों के लिये एक समस्या है, परन्तु विकास को तीव्र करना निर्धन देशों के लिए और भी बड़ी समस्या है ।”

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वे तो यहां तक कहते हैं- “राष्ट्रों की निर्धनता का अध्ययन राष्ट्रों की समृद्धि के अध्ययन से अधिक महत्व रखता है ।” पिछले कुछ समय से, पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने विकास गतिविधियों में आसामान्य रुचि दिखायी है ।

तथा इस विषय पर साहित्य की आवर्ती वृद्धि, सोवियत संघ के विघटन तक, मुख्यतया समाजवादी और पूंजीवादी देशों के बीच आर्थिक विकास सम्बन्धी प्रतियोगिता के कारण हुयी द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् अफ्रीकी-एशियाई देशों कीं राजनीतिक स्वतन्त्रता और उनका उपनिवेशी शोषण सम्बन्धी ज्ञान उन्हें अल्प विकास और निर्धनता के दलदल में ले गया और वे इस विषय को अधिक महत्व देने के लिये विवश हुये ।

लैटिन अमरीका, अफ्रीका तथा अनेक एशियाई देशों द्वारा पिछले पांच दशकों से सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने के लिये किये गये अथक प्रयत्नों को देखते हुए, इन राष्ट्रों द्वारा की गई प्रगति अधिक उत्साहपूर्ण नहीं है । बहुत से प्रकरणों में गलतियां, भ्रान्तियां तथा अन्य आघात प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं । फिर भी भविष्य में विकास की अच्छी सम्भावनाएं हैं ।


2. आर्थिक विकास  का अर्थ तथा परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Economic Development):

आर्थिक विकास को संक्षिप्त रूप से परिभाषित करना सरल नहीं है क्योंकि विकसित एवं अल्प विकसित देशों के बीच अन्तर करने के लिये विभिन्न मानदण्डों का प्रयोग किया गया है ।

लेखकों के कुछ समूह राष्ट्रीय आय को आर्थिक विकास का सूचक मानते हैं ।

इस समूह में प्रो. साइमन कुजनैटस (Prof. Simon Kuznets), पाल एलबर्ट (Paul Albert), यांगसन् (Youngson) तथा मायर और बाल्डविन (Meir and Baldwin) सम्मिलित हैं ।

इसके विपरीत बैन्जामिन हिग्गनज (Benjamin Higgins), आर्थर ल्यूस (Arthur Lewis), वाइनीयर और हार्वे लेवनस्टीन (Vinear and Harvey Leibenstein) ने प्रति व्यक्ति आय के मानदण्ड का समर्थन किया । परवर्ती विचार, पहली धारणा अर्थात् राष्ट्रीय आय की धारणा से कहीं अधिक वैज्ञानिक है ।

आइये, अधिक स्पष्ट एवं संक्षिप्त ढंग से आर्थिक विकास का अनुमान लगाने के लिये हम विभिन्न आधारों पर दी गई कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाओं का परीक्षण करते हैं । प्रो. मायर और बाल्डविन के अनुसार- ”आर्थिक विकास वह प्रक्रिया है जिससे दीर्घकालीन अवधि में राष्ट्र की वास्तविक राष्ट्रीय आय बढ़ती है ।”

यह परिभाषा सरल और संक्षिप्त है ।

परिभाषा आर्थिक विकास के तीन संघटकों पर बल देती है:

(1) प्रक्रिया,

(2) वास्तविक राष्ट्रीय आय तथा

(3) दीर्घकाल ।

यह तीन संघटक, आर्थिक विकास की मुख्य धारणा को समझने के लिये आधार प्रस्तुत करते हैं:

1. विकास (Process):

आर्थिक विकास को एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है जिसका अर्थ है सामाजिक, प्रौद्योगिक और आर्थिक शक्तियों में होने वाले निरन्तर परिवर्तन, जो विकास की गति को तीव्र करने में सहायक हैं ।

प्रक्रिया का अर्थ कुछ शक्तियों का संचलन भी है जो आर्थिक विकास में निरन्तर परिवर्तन लाती है, विशेषतया पूंजी का अनुकूलतम प्रयोग, उत्पादन की आधुनिक तकनीकें, तकनीकी विकास, संस्थागत सुधार, जनानकिकी एवं सामाजिक ढांचा ।

इसलिये, यह मूल तत्वों से परस्पर सम्बन्धित परिवर्तनों की लम्बी श्रृंखला है जो दीर्घ काल में, वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि की ओर ले जाती है ।

इसमें सरकार द्वारा लिये जाने वाले वे उन्नतिशील पग भी शामिल हैं, जिन्हें सरकार, समाज को आर्थिक विकास के परिवर्तित वातावरण के अनुकूल बनाने के लिये, अपनी मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों द्वारा लेती है । संक्षेप में आर्थिक विकास एक गतिशील प्रक्रिया है ।

2. वास्तविक राष्ट्रीय आय (Real National Income):

वास्तविक राष्ट्रीय आय अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं का वह कुल उत्पादन है जिसे वास्तविक के सन्दर्भ में वर्णित किया गया है न कि मुद्रा के सन्दर्भ में । इसलिये, इसे कुल राष्ट्रीय उत्पाद अथवा शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद के रूप में देखना चाहिए है ।

तथापि, शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद सर्वोत्तम मानदण्ड है जिसमें केवल अन्तिम उपभोक्ता उत्पाद तथा सेवाएं, पूंजी गत वस्तुओं में केवल शुद्ध वृद्धि को शामिल किया जाना है । इसी प्रकार, उत्पादन प्रक्रिया के दौरान पूंजी प्रतिस्थापन की व्यवस्था रखी जाती है जैसे यन्त्रों की व्यर्थता के कारण होने वाली क्षति ।

3. दीर्घकाल (Long Period):

आर्थिक विकास में ‘दीर्घकाल’ एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है । इसका अर्थ है कि वास्तविक राष्ट्रीय आय को केवल लघु काल में ही नहीं बढ़ना चाहिये बल्कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया को कायम रखने के लिये इसे दीर्घकाल में भी ऊपर की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति दिखानी चाहिये ।

अत: वास्तविक राष्ट्रीय आय में लम्बे समय तक निरन्तर वृद्धि, आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिये एक अनिवार्य शर्त बन गई है । संक्षेप में, हमारा विचार है कि आर्थिक विकास एक लघु-कालिक परिदृश्य न होकर एक दीर्घकालिक परिदृश्य है । प्रो. मायर और बाल्डविन द्वारा दी गई परिभाषा बहुत सरल है और आर्थिक विकास की सन्तोषजनक व्याख्या प्रस्तुत नहीं करती ।

जब इसका आर्थिक रूप में पिछड़े हुए और निर्धन देशों के संदर्भ में परीक्षण किया जाता है तो यह भ्रामक एवं अपूर्ण सिद्ध होती है, क्योंकि इन देशों में राष्ट्रीय आय की वृद्धि एक बड़ी सीमा तक जनसंख्या वृद्धि द्वारा निष्क्रिय कर दी जाती है । इस प्रकार, इन परिस्थितियों के अन्तर्गत, आर्थिक विकास का प्रति व्यक्ति आय अथवा उत्पादन के आधार पर मापन अधिक उचित होगा ।

अन्य परिभाषाएं (Other Definitions):

“आर्थिक विकास अथवा वृद्धि वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी देश अथवा क्षेत्र के लोग, वस्तुओं और सेवाओं के प्रति व्यक्ति उत्पादन में सतत वृद्धि लाने के लिये उपलब्ध साधनों को प्रयोग में लाते हैं ।” -विलियम और बट्रिक

“आर्थिक विकास का अभिप्राय अधिक उत्पादन और तकनीकी एवं मूलभूत प्रबन्धों में परिवर्तन दोनों से हैं जिसके द्वारा यह उत्पादित क्रिया जाता है ।” -सी. पी. किन्डलबरगर

“आर्थिक विकास को कल्याण में सतत् सुधार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो वस्तुओं और सेवाओं के बढ़ते हुये प्रवाह में प्रतिबिम्बित होता हुआ माना जा सकता है ।” -बरनार्ड ओकुन और डब्ल्यू रिचर्डसन्

”आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी अर्थव्यवस्था का परिवर्तन एक कम अथवा नकारात्मक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्था से ऐसी अर्थव्यवस्था में होता है जिसमें प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर स्व-संरक्षित स्थायी एवं दीर्घकालिक होती है ।” -इरमा अंडलमान

“विकास केवल व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित नहीं बल्कि उसके जीवन की सामाजिक स्थितियों में सुधार से भी सम्बन्धित है । इसलिये विकास केवल आर्थिक वृद्धि ही नहीं है वरन वृद्धि के साथ परिवर्तन है, वे परिवर्तन जो सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्थागत और आर्थिक परिवर्तन सम्मिलित हैं ।” -यू. एन. ओ.

उपर्युक्त सभी परिभाषाएं आर्थिक विकास की प्रक्रिया में सम्मिलित विभिन्न पहलुओं पर बल देती हैं । चार्लेस बैटलीचियम (Charles Bettlehcium) के अनुसार- “आर्थिक वृद्धि के लिये आयोजन में लक्ष्य केवल मात्रात्मक परिवर्तन (अधिक उत्पादन) नहीं होना चाहिये बल्कि गुणात्मक परिवर्तन (अर्थात श्रम की उच्च उत्पादकता) भी होना चाहिये । केवल गुणात्मक परिवर्तन के आधार पर ही कोई अर्थव्यवस्था समग्र रूप में ऊपर उठ सकती है ।”


3. आर्थिक विकास समस्याओं का स्वरूप (Nature of Economic Development Problem):

वर्तमान युग में आर्थिक विकास की जड़ें यूरोप में हैं जहां से वे यू. एस. ए., आस्ट्रेलिया तथा विश्व के कुछ अन्य भागों में फैली है । पिछले दो सौ वर्षों के दौरान, इन देशों ने आर्थिक विकास की उच्च त्वरित वृद्धि का अनुभव किया है ।

जबकि बड़ी भारी संख्या में अन्य देश प्राय: स्थैतिक स्थिति में रहे हैं अथवा उनकी उन्नति की दर बहुत मन्द रही है । इन देशों को अल्प विकास सन्तुलन (Underdevelopment Equilibrium) के वर्ग में रखा जा सकता है । विरुद्ध निर्देशों की यह प्रवृत्ति निश्चित रूप में महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को जन्म देती है । कौन-से कारण हैं जो आर्थिक प्रसार में योगदान करते हैं?

अधिकांश देशों की जनसंख्या भूखमरी के कगार पर क्यों रहती है? कुछ देश उन्नति प्रदर्शित करते हैं तथा अन्य स्थिरता या क्षय, ऐसा क्यों? यह प्रश्न आज के अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं ।

यद्यपि, ऐसा प्रतीत होता है कि बहुत लम्बे समय तक निर्धन और पिछड़े देशों ने इसे अपना दुर्भाग्य मान लिया था और वे अपनी निर्धनता के प्रति चिन्तित नहीं थे । परन्तु अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं और लोगों में अपनी निर्धनता के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और वे आर्थिक स्थिरता की विपरीत स्थिति का सामना करने के लिये तैयार हो रहे हैं ।

अल्प-विकसित देशों में इस महान जागृति का मुख्य कारण विकसित देशों में इसके प्रतिरूप का होना है । समृद्ध देशों में, अधिक से अधिक लोग विश्व के अन्य भागों में फैली निर्धनता से सचेत हो रहे हैं तथा वे अपने आप से प्रश्न करते हैं कि अधिकांश जनसंख्या निर्धन क्यों है ?

इसके अतिरिक्त पिछड़े क्षेत्रों की बढ़ती हुई दुर्दशा ने विगत वर्षों में समृद्ध लोगों का ध्यान आकर्षित किया है जिसके फलस्वरूप इस विषय पर तीव्र गति से साहित्य का सृजन हुआ है । यहां, एक और वैध प्रश्न यह उठता है कि समृद्ध राष्ट्र अल्प-विकसित देशों में फैली हुई निर्धनता को दूर करने में रुचि क्यों रखते हैं?

निर्धन देशों की सहायता का एक मान्य कारण रूस और पश्चिम के बीच का शीत-युद्ध रहा है । प्रत्येक देश अल्प-विकसित देशों का समर्थन और निष्ठा प्राप्त करने के लिए दूसरे से अधिक सहायता देने के लिए प्रयत्नशील रहा ।

“अल्प विकसित देशों का विकास, यू. एस. ए. और यू. एस. एस. आर. के बीच भविष्य में अनेक वर्षों तक गहन प्रतियोगिता का क्षेत्र रहेगा । वे अल्पविकसित क्षेत्र जहां या तो विस्तृत प्राकृतिक साधन हैं जिनकी विश्व शक्तियों को आवश्यकता है या जहां सैनिक दृष्टिकोण से युक्ति संगत स्थितियां विद्यमान हैं वे विश्व के मामले में, अपने महत्व के कारण विशेष रुचि के विषय होंगे ।” –लाइल डब्ल्यू. शानन

इस मत के प्रकाश में, आर्थिक विकास की समस्या को बेहतर समझा जा सकता है और राष्ट्रों की निर्धनता के विश्लेषण के लिये अधिक प्रभावी उपकरण विद्यमान हैं । दीर्घकालिक स्थिरता को दूर करने के लिए, समृद्ध देशों को सदैव बढ़ती हुयी विकास दर के साथ बढ़ते हुये पूंजी भण्डार के प्रयोग के लिये एक निकास की आवश्यकता है ।

दूसरी ओर, निर्धन देशों को अपनी विकास दर को तीव्र करने की आवश्यकता है ताकि वे अपनी निर्यात क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ भुगतान सन्तुलन के घाटे से अपने आप को बचा सके । इस प्रकार आर्थिक विकास का अध्ययन सहायता देने वाले और सहायता प्राप्त करने वाले दोनों देशों के लिए मूल्यवान है ।

“विकसित देशों में आर्थिक विकास को एक सामान्य बात मानने की प्रवृत्ति होती है- एक ऐसी वस्तु, जो स्वयं अपना ध्यान रखती है और अर्थव्यवस्था के लघु कालीन घटाव-बढ़ाव पर ध्यान केन्द्रित करती है ।” -रैगनर नर्सक

इस प्रकार, आर्थिक विकास का विषय निर्धन एवं समृद्ध दोनों प्रकार के देशों के लिये विशेष महत्व रखता है । समृद्ध देशों के लिये, यह आर्थिक विकास को बनाये रखने की समस्या है जबकि निर्धन देशों के लिये आर्थिक विकास की प्राप्ति और उसमें तीव्रता लाना प्रमुख समस्या है ।


4. आर्थिक विकास का आधुनिक स्वरूप (Modern Version of Economic Development):

1960 के दशक तक आर्थिक साहित्य में ‘आर्थिक विकास’ को प्राय: ‘आर्थिक वृद्धि’ के एक समानार्थ प्रयोग किया जाता था । लेकिन अब आर्थिक विकास को आर्थिक वृद्धि के समरूप नहीं माना जाता । अब इसे वृद्धि के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रगतिशील परिवर्तनों के रूप में माना जाता है जो लोगों का कल्याण सुनिश्चित करते हैं ।

विकास प्रक्रिया में कुछ गुणात्मक आयाम सम्मिलित होते हैं जो वृद्धि के रूप में परिभाषित अर्थव्यवस्था में शामिल नहीं होते और जिसे राष्ट्रीय उत्पाद अथवा प्रति व्यक्ति उत्पाद के रूप में व्यक्त किया जाता है ।

अर्थशास्त्री किसी देश में वृद्धि निष्पादन से प्रभावित नहीं होते जो इसकी जी. डी. पी. अथवा जी. एन. पी. में वृद्धि से प्रतिबिम्बित होती है, अब वह प्रत्यक्ष रूप से विकास प्रक्रिया पर ध्यान देते हैं ।

इसलिये, विकास की समस्या को निर्धनता पर चयनात्मक प्रहार के रूप में परिभाषित करना आवश्यक है । इसका मूल्यांकन, कुपोषण, रोग, निरक्षरता, बेरोजगारी और असमानता के क्रमिक घटाव और विलोपन के संदर्भ में करना आवश्यक है ।

परम्परागत रूप में, हम विकास को सही अर्थों में आर्थिक सन्दर्भों में परिभाषित करते हैं । इसका अर्थ है जी. एन. पी. (अथवा जी. डी. पी.) में 5 से 7 प्रतिशत अथवा अधिक सतत् वार्षिक वृद्धि और इसके साथ ही उत्पादन और रोजगार के ढाँचे में एक ऐसा बदलाव लाना जिससे कि कृषि का भाग दोनों में कम हो जाता है जबकि निर्माण और तृतीयक क्षेत्रों का बढ़ जाता है ।

अत: प्रस्तावित नीति उपाय ऐसे हैं जो कृषि विकास के मूल्य पर औद्योगिकीकरण को प्रोत्साहित करते हैं । निर्धनता उन्मूलन, आर्थिक असमानताओं को घटाने तथा रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लक्ष्यों का वर्णन केवल नाम मात्र के लिये किया जाता है तथा अधिकांश प्रकरणों में यह माना जाता है कि जी. एन. पी. अथवा प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय (अथवा घरेलू) उत्पाद में समग्र वृद्धि से लोगों को अन्तत: लाभ प्राप्त हो ही जायेंगे ।

साथ ही, यह महसूस किया जाता है कि बीसवीं शताब्दी के मध्य में 40 प्रतिशत जनसंख्या को लाभ प्राप्त नहीं हुआ बल्कि सामान्य लोगों के कष्टों में वृद्धि हुयी है । फलत: आर्थिक विकास की संकीर्ण परिभाषा को अस्वीकार कर दिया गया ।

1970 के दशक के दौरान अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास की धारणा को पुन: परिभाषित करने का प्रयास किया और उसे निर्धनता, असमानता और बेरोजगारी कम करने के विशेष सन्दर्भ में व्यक्त किया गया । ‘वृद्धि के साथ पुर्न:वितरण’ एक लोकप्रिय नारा बन गया ।

“आर्थिक विकास को सामान्यता कम आय वाले लोगों के लिये, भौतिक कल्याण में सुधार, सामूहिक निर्धनता और सह-सम्बन्धित निरक्षरता, रोग तथा शीघ्र मृत्यु के विलोपन के रूप में परिभाषित किया जाता है । इसमें आगतों और निर्गतों के गठन में होने वाले वे परिवर्तन शामिल है जिनसे प्राय: उत्पादन के ढांचे में वे परिवर्तन होते हैं जो कृषि गतिविधियों से हट कर औद्योगिक गतिविधियों की ओर होते हैं, अर्थव्यवस्था का संगठन इस प्रकार होता है कि कार्य योग्य आयु की जनसंख्या के बीच उत्पादक रोजगार, सुविधा प्राप्त अल्पसंख्यकों की स्थिति की तुलना में सामान्य होता है तथा आर्थिक एवं अन्य दिशाओं में निर्णय लेने में बहुसंख्यक वर्गों की अधिक भागीदारी होती है जिसमें उन्हें अपने कल्याण के सुधार की और बढ़ना चाहिये ।”

चार्ल्स पी. किन्डलबरगर एण्ड ब्रूस हैरिक आर्थिक विकास के इस चरित्र-चित्रण के भारी लक्ष्य हैं क्योंकि मानवीय स्थितियाँ हमारे लिये अधिक महत्व रखती हैं । हम दृढ़तापूर्वक महसूस करते हैं कि इससे कम में काम नहीं चलेगा । निर्धन लोगों के लिये विकार, एक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है जिसे बढ़ती हुई युद्ध संलग्नता से चलाया जाता है ।

डुडले सीयरज (Dudley Seers) विकास के अर्थ के सम्बन्ध में मौलिक प्रश्न पूछते हुए दृढ़ता से कहते हैं- “देश के विकास सम्बन्धी प्रश्न हैं : निर्धनता को क्या हो रहा है? बेरोजगारी को क्या हो रहा है? असमानता को क्या हो रहा है? यदि यह तीनों उच्च स्तर से नीचे आ गये है, तो, निःसन्देह सम्बन्धित देश के लिये यह विकास का समय है । यदि, इनमें एक या दो केन्द्रीय समस्याएं बद से बदतर हो रही हैं, विशेषतया यदि यह तीनों बढ़ रही हैं तो स्थिति को विकास नहीं कहा जा सकता चाहे प्रति व्यक्ति आय दुगनी भी हो जाये ।”


5. आर्थिक विकास के परीक्षण (Tests of Economic Development):

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहना सत्य होगा कि वाक्यांश आर्थिक विकास का सरल अर्थ हैं- निर्धन देशों द्वारा वास्तविक प्रति व्यक्ति आय के स्तरों में वृद्धि तथा अपने जन सामान्य के लिये सुधरी हुई परिस्थितियों की प्राप्ति । प्रो. वाल्टर क्राउस (Prof. Walter Krause) के अनुसार, देश में आर्थिक विकास हो रहा है या नहीं, यह जानने के तीन आवश्यक परीक्षण हैं ।

इनका संक्षिप्त वर्णन नीचे किया गया है:

1. पर्याप्त समय के लिये आय का संचयी रूप में बढ़ना आवश्यक है । आर्थिक विकास के सम्बन्ध में अति महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह लम्बे समय की अवधि के लिये आय की संचयी वृद्धि की प्रक्रिया है । अत: आय का साल दर साल बढ़ना आवश्यक है तभी यह कहना न्यायसंगत होगा कि आर्थिक विकास हो रहा है ।

2. समग्र रूप में, आय की इस वृद्धि से जनसंख्या को लाभ अवश्य पहुंचना चाहिये । यदि इस प्रक्रिया से कुछ उच्च आय प्राप्त करने वालों को लाभ होगा तो इसे आर्थिक विकास नहीं कहा जा सकेगा । वास्तव में आर्थिक विकास का अर्थ है कि आय वृद्धि के लाभ जनसंख्या को संयुक्त रूप में प्राप्त होने चाहिये ।

3. अन्य लाभों के अतिरिक्त, वास्तविक प्रति व्यक्ति आय का संचयी रूप में बढ़ना आवश्यक है, परन्तु ऐसे उदाहरण सम्भव हैं जब आर्थिक विकास को घटित होता माना जा सकता है जबकि वास्तविक प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ती ।

बढ़ती हुई जनसंख्या प्रति व्यक्ति आय के लाभों को निष्क्रिय कर सकती है, कुल आय के बढ़ते स्तर के बावजूद ऐसा हो सकता है जबकि आशा की जाती है कि कुल आय जनसंख्या से तीव्र गति से बढ़ेगी ।

अध्ययन का महत्व (Significance of the Study):

आर्थिक विकास का अध्ययन महान व्यवहारिक महत्व रखता है । यह न केवल विकासशील देशों के लिये महत्व रखता है बल्कि विश्व के विकसित देशों के लिये भी महत्वपूर्ण है । यह जानकारी प्रत्येक व्यक्ति के लिये आकर्षण का विषय है कि एक देश के आर्थिक विकास की दर दूसरे देश के आर्थिक विकास की दर से ऊंची क्यों है?

अन्य शब्दों में कुछ देशों में वृद्धि की दर मन्द क्यों है ? इसके अतिरिक्त आर्थिक विकास के अध्ययन निर्धनता की समस्याओं के समाधान में सहायता करते है और राष्ट्रों के बीच की खाई को दूर करने के ढंग उपलब्ध करता है । वास्तव में, अर्द्ध विकसित देशों में आर्थिक विकास एक सहज साधन तथा लोकप्रिय नारा बन गया है ।

अत: आर्थिक विकास का अध्ययन बहुत महत्व रखता है और निम्नलिखित लाभ उपलब्ध करता है:

1. राष्ट्रों की निर्धनता के कारणों को समझना (To Understand the Causes of Poverty of Nations):

मायर और बाल्डविन का यह अवलोकन सत्य ही है कि राष्ट्रों की निर्धनता का अध्ययन राष्ट्रों की सम्पत्ति के अध्ययन से अधिक महत्व रखता है । इस प्रकार के अध्ययन अधिकांश देशों की उन्नति की धीमी गति पर निश्चित रूप में प्रकाश डालते हैं ।

निर्धन देशों में आर्थिक उद्धार की प्रक्रिया के प्रभावी नियोजन में यह सहायक हो सकते हैं । अर्थशास्त्री राष्ट्रों की सम्पत्ति और समृद्धि का विश्लेषण करने में व्यस्त हैं परन्तु अर्थशास्त्रियों की नई पीढ़ी के पास राष्ट्रों की निर्धनता के कारणों का अध्ययन करने का बड़ा और महान कार्य है ।

दूसरी ओर निर्धन देश अपनी आय के निम्न स्तरों और जीवन के निर्धन स्तरों के प्रति बहुत सचेत हैं । निर्धन देश में विकास के प्रति बहुत उत्सुकता है तथा इसने एक राजनैतिक समस्या का रूप ले लिया है जिसे जितनी शीघ्रता से सम्भव हो हल किया जाना चाहिये ।

मायर और बाल्डविन ने सत्य ही कहा है- “आज नया यह है कि विश्व के अल्प विकसित क्षेत्रों ने आर्थिक विकास को एक उच्च आदर्श बना लिया है ।” निर्धनता रेखा से ऊपर उठने की उनकी आशाओं को पूरा करने के लिये आर्थिक विकास का अध्ययन सहायक सिद्ध हो सकता है ।

2. अर्थशास्त्रियों के लिये एक चुनौती (A Challenge to Economists):

अल्प विकसित देशों में व्याप्त व्यापक निर्धनता एक महान चुनौती है सामान्यत: निर्धन देशों के लोगों की तीव्र इच्छा होती है कि उनकी वास्तविक आय बढ़े तथा वे अर्थशास्त्रियों से इस प्रश्न का उत्तर चाहते हैं कि उनकी आय क्यों नहीं बढ़ रही ?

यह इतनी धीमी गति से क्यों बढ़ रही है ? यह तीव्र गति से कैसे बढ़ सकती है ? इसलिये, आर्थिक विकास का व्यवस्थित अध्ययन ऐसे मौलिक प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक हो सकता है । उचित नीति उपायों की खोज के लिये अधिक-से-अधिक लोग आर्थिक विकास का अध्ययन कर रहे हैं ताकि आर्थिक विकास की गति को तीव्र किया जा सके ।

3. समृद्ध राष्ट्रों की रुचि (Interest of Rich Nations):

आर्थिक विकास के अध्ययन के सम्बन्ध में एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि समृद्ध देश स्वयं निर्धन देशों के विकास में रुचि रखते हैं । इस कारण यह यू. एस. ए., ब्रिटेन और अन्य यूरोपियन देशों की विदेशी नीति का भाग बन गया है ।

यह महसूस किया जा रहा है कि किसी भी स्थान की निर्धनता किसी भी अन्य स्थान की समृद्धि के लिये खतरा है । निर्धन देशों के विकास को कुछ हद तक समृद्ध देशों का दायित्व माना जाता है ।

निर्धन देशों का तीव्र विकास, विश्व के उन्नत देशों के लिये मानवीय और राजनैतिक आधारों पर महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन गया है । वे भी मानते हैं कि निर्धन देशों के विकास के लाभ जैसे- उनकी क्रय शक्ति में वृद्धि तथा विस्तृत बाजार आदि से समृद्ध देश लाभान्वित होगे ।

4. विकसित देशों में विकास समस्याएं (Development Problems in Developed Countries):

विकसित देश भी कुछ विकासात्मक असन्तुलनों का सामना करते हैं । वास्तव में उन्होंने निर्धनता रेखा को तो पार कर लिया, परन्तु उनका विकास समस्याओं से मुक्त नहीं है ।

उनकी गम्भीर समस्याएं हैं:

(i) आर्थिक विकास की उच्च दर को कैसे कायम रखा जाये ?

(ii) अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ावों को कैसे रोका जाये और स्थायी वृद्धि कैसे प्राप्त की जाये ।

(iii) दीर्घकालीन स्थिरता का सामना कैसे किया जाये ?

इस प्रकार आर्थिक विकास का अध्ययन विकसित देशों की लघु कालीन एवं दीर्घ कालीन समस्याओं के समाधान में सहायता कर सकता है । वह यह भली प्रकार जानते है कि उन्हें गम्भीर मन्दी से बचना है तो उन्हें पर्याप्त उच्च विकास दर बनाये रखनी होगी ।

5. दीर्घकालीन विश्लेषण के लिये आवश्यक (Imperative for Long Period Analysis):

आर्थिक विकास के दीर्घकालीन विश्लेषण का भाग होने के कारण, लघु काल से दीर्घ कालीन विश्लेषण की ओर आकर्षित करने में सहायता करता है । लघुकालीन समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित होने से दृष्टिकोण संकीर्ण होता है तथा हम विस्तृत प्रक्रिया को समझने में असफल रहते हैं ।

दीर्घकालीन परिवर्तनों की जांच द्वारा आर्थिक विकास का अध्ययन, लघुकालीन अध्ययनों की त्रुटियों को कम करने में सहायक होता है । इसके अतिरिक्त, दीर्घकालीन परिदृश्य द्वारा लघुकालीन समस्याओं की ओर उचित ध्यान दिया जा सकता है ।

वास्तव में, लघु काल दीर्घ काल में सम्मिलित हो जाता है । अत: हमें लघुकालीन समस्याओं के साथ नहीं जुड़े रहना चाहिये बल्कि दीर्घकालीन समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करने की चेष्टा करनी चाहिये ।

आर्थिक विकास के सैद्धान्तिक महत्व के अतिरिक्त, जब एक अल्प विकसित देश स्वत: विकास के मार्ग पर चलना आरम्भ करता है तो अनेक व्यवहारिक लाभ स्वयं प्राप्त होने लगते हैं ।

तथापि, आर्थिक विकास द्वारा निर्धन देशों को उपलब्ध होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं:

(क) यह कृषि क्षेत्र में क्रान्ति ला देता है;

(ख) तीव्र उद्योगीकरण तथा दृढ़ और विविध प्रकार की औद्योगिक संरचना की स्थापना;

(ग) पूंजी निर्माण की दर का तेज होना;

(घ) सामाजिक ऊपरी खर्चो (संरचना) का विस्तार;

(ङ) राष्ट्रीय उत्पादन और प्रति-व्यक्ति आय में वृद्धि;

(च) प्रौद्योगिकी और तकनीकी जानकारी में सुधार;

(छ) रक्षात्मक शक्ति में वृद्धि तथा देश की उच्च स्थिति;

(ज) आत्म-निर्भरता, उत्पादन, स्थायित्व में वृद्धि;

(झ) वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता जिससे अन्य सामाजिक सेवाओं में विस्तार होता है;

(ञ) राजकोषीय आत्म-निर्भरता और अन्य लाभ जिसमें सार्वजनिक आय में वृद्धि भी सम्मिलित है ।


6. आर्थिक विकास की बुराइयां (Evils of Economic Development):

किसी देश का आर्थिक विकास एक मिश्रित वरदान होता है । अर्थव्यवस्था की सामाजिक संरचना पर इसके अच्छे और बुरे दोनों प्रभाव होते हैं । एक ओर इसे सभी आर्थिक बुराइयों के लिये रामबाण और अल्प विकसित देशों की समस्याओं का समाधान माना जाता है, दूसरी ओर यह अर्थव्यवस्था पर कुछ बुरे प्रभाव और बुराइयां छोड़ता है ।

इनमें से कुछ बुराइयां निम्नलिखित हैं:

1. मानवीय प्रसन्नता के लिये भयंकर (Hideous of Human Happiness):

आर्थिक विकास की सबसे बड़ी बुराई यह है कि यह मानवीय प्रसन्नता के लिये भयंकर है । किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास नये समाज की स्थापना चाहता है जिसका अधिक झुकाव संग्रहणशीलता की ओर होता है ।

वर्तमान अभिवृत्तियों और संस्थाओं को परिवर्तित होते हुये वातावरण के प्रतिकूल माना जाता है, फलत: एक नया समाज जन्म लेता है । नया समाज भौतिकवाद पर बल देता है तथा भौतिकवाद का अन्तिम सीमा तक अनुकरण करता है ।

फलत: मानवीय प्रसन्नता के विलम्बित होने की पूर्ण सम्भावनाएं होती हैं । यदि मानवीय प्रसन्नता को लागत के सन्दर्भ में मापा जाता है तो यह इसे तुरन्त अस्वीकार कर सकता है । इस प्रकार आर्थिक विकास मानवीय प्रसन्नता के लिये भयंकर एवं खतरनाक माना जाता है ।

2. जनजातीय बन्धनों की अवनति (Decline of Tribal Bonds):

आर्थिक विकास की सतत प्रक्रिया से जनजातीय सम्बन्धों की अवनति होती है । विकास के गति पकड़ने के साथ ऊर्ध्व सामाजिक गतिशीलता घटित होती है, परन्तु साथ ही जनजातीय सम्बन्धों में अवनति होती है तथा व्यक्तिवाद की भावना पोषित होती है । उदाहरणार्थ, पश्चिमी धारणा के अनुसार कार्य व्यक्तिगत प्रयत्नों पर आधारित है जबकि पूर्व के बड़े भाग में इसे सामुदायिक प्रकृति का माना जाता है ।

नि:सन्देह, संयुक्त परिवार प्रणाली से व्यक्तिवाद की ओर परिवर्तन को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, परन्तु बाद में सामाजिक बन्धनों की दुर्बलता के कारण यह समाप्त हो सकती है । यही कारण है कि संयुक्त परिवार प्रणाली, आर्थिक विकास के उन्नत होने के कारण उत्पन्न परिवर्तनों से पराजित हो गई है ।

3. परम्परावादी संस्कृति का विघटन (Disruption of Traditional Culture):

परम्परावादी संस्कृति का विघटन आर्थिक विकास की एक अन्य त्रुटि है । संस्कृति की व्याख्या लोगों के सामाजिक रूप में स्वीकृत व्यवहार को सीखने के रूप में की गई है, जबकि नये मार्गों के अनुसार समाज के समन्वय में उनके मौलिक मूल्यों और संस्कृति में विकट परिवर्तन और बदलाव सम्मिलित है ।

अन्य शब्दों में आर्थिक परिवर्तन पूर्व-स्थापित ध्येयों में एक प्रेरित परिवर्तन चाहते हैं । परन्तु परम्परागत संस्कृति नव-प्रवर्तन का विरोध कर सकती है जो अन्त में सांस्कृतिक और व्यक्तित्व कारकों को शक्तिशाली परिवर्तन के प्रभाव के अधीन नष्ट कर देती है और जिससे आर्थिक विकास की प्रक्रिया रुक जाती है तथा सामाजिक रीति-रिवाजों और परम्पराओं का अपहरण कर लेती है ।

4. सामाजिक और धार्मिक विश्वासों को क्षति (Social and Religious Beliefs are Undermined):

किसी देश में आर्थिक विकास मौलिक रूप में प्रकृति और सामाजिक विश्वासों के प्रति तर्कसंगत अभिवृत्ति और विवेक अपनाता है । यद्यपि, तार्किक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप धार्मिक अविश्वास उत्पन्न होता है । यह सत्ता की स्वीकार्यता के भी प्रतिकूल है ।

इन परिस्थितियों में, इस बात में सन्देह है कि परम्परावादी विश्वास समाप्त हो जायेंगे । उसी समय, यह और भी सन्देहपूर्ण है कि क्या सभी विवेकशील लोग आवश्यक रूप में सर्वशक्तिमान भगवान के अस्तित्व में विश्वास खो देंगे ।

भगवान में विश्वास के प्रतिकूल कोई तर्क नहीं है, यदि यह सत्य भी है, भगवान के विश्वास में अवनति सभी बुराइयों का कारण नहीं होगी । फलत: आर्थिक विकास विश्व में सामाजिक एवं धार्मिक विश्वासों को क्षति पहुंचा सकता है ।