स्ट्रॉ मशरूम (खुंभी) कैसे खेती करें? | Read this article in Hindi to learn about how to cultivate straw mushroom.

वोल्वेरियेला स्पसीज को प्रायः पुआल खुंभी भी कहते है । यह उष्ण और उपोष्ण कटिबंधों में खायी जाने वाली खुंभी है । इसका उल्लेख फिलिपाइन के प्रांत जैसे क्वाटुग, फुकीन और चीन में ताईवान, मलेशिया प्रायद्वीप, जापान, मेडागास्कर, आइवरी कोस्ट, कैमरून, बरमूडा, पलोरिडा, केनेडा, संयुक्तराज का न्यूयार्क प्रांत आदि देशों में मिलता है ।

चीन के नन्हुआ मंदिर में लगभग 200 वर्ष पहले बौद्ध साधुओं द्वारा इस खुंभी की खेती प्रारंभ की गयी । चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में यह बहुत ही स्वाद पूर्ण खाद्य माना जाता है । प्रवासी चीनियों द्वारा लगभग सन् 1932-35 में पुआल खुंभी को फिलीपाइन, मलेशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में उगाया गया ।

इसके बाद इन क्षेत्रों से बाहर इस खुंभी की खेती उन देशों में प्रारंभ की गयी जहाँ का उष्मकटिबधीय वातावरण इसकी वृद्धि के लिए अनुकूल था । भारत में सु और सेठ (1940) ने पहली बार वाल्वेरियेला डिप्लेशिया की खेती शुरू की ।

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वैज्ञानिक विधि से पुआल की खेती थॉमस व अन्य (1943) ने कोयम्बटूर में प्रारंभ की और तबसे इसकी खेती दूसरे स्थानों पर भी होने लगी । सारे संसार में इसकी पैदावार में बढोतरी हो रही है । इसमें चीन सबसे ज्यादा पैदावार करता है इसके बाद थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया और वियतनाम का नाम आता है ।

यह खुंभी तुलनात्मक रूप से अधिक तापक्रम (30-350 सेन्टीग्रेड) पर उगायी जाती है । यह 150 सेन्टीग्रेड से कम और 450 सेन्टीग्रेड से अधिक तापक्रम पर नहीं उगायी जा सकती और 200 सेन्टीग्रेड से कम तापक्रम पर उपज प्राप्त नहीं होती । दक्षिण पूर्वी एशिया के अधिकांश लोग बटन खुंभी की तुलना में पुआल खुंभी को पसंद करते हैं क्योंकि इसकी खेती आसान है और फसल का समय तीन सप्ताह है ।

पुआल खुंभी उगाने के फायदे (Benefits of Cultivating Straw Mushroom):

i. यह खुंभी वहाँ उगायी जा सकती है जहाँ का तापक्रम तुलनात्मक रूप से अधिक हो (30-400 सेन्टीग्रेड) ।

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ii. इसको पैदा करने की तकनीक आसान और कम खर्च वाली है ।

iii. पुआल खुंभी को उगाने के लिए धान का डंठल मुख्यतः उपयोग में लाया जाता है । इसके अलावा व्यर्थ कपास, व्यर्थ नारियल के छिलके और व्यर्थ भाग, सूखे केले के पत्ते, गन्ने की सीठी, व्यर्थ जूट और दूसरे सेल्युलोज युक्त व्यर्थ पदार्थ आदि इसकी खेती के लिए भी उपयोग में लाये जा सकते हैं ।

iv. यह बहुत तेजी से बढने वाली खुंभी है और बीजाई (स्पानिंग) से कटाई के बीच का समय लगभग 10 दिन का होता है ।

v. इसकी खेती भारत के गांवों में आसानी से की जा सकती है ।

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हानियाँ:

यह खुंभी शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और इसे रेफ्रीजरेटर में एक या दो दिन से ज्यादा नहीं रखा जा सकता । भारत में वाल्वरियैला की 13 प्रजातियों ज्ञात हैं । इनमें केवल 3 प्रजातियाँ मुख्यतः वोल्वेरियेला वाल्वेसिया, वा. डिप्लेसिया (वर्क) सिंग और वा. एस्कुलेन्टा (मास.) सिंग की खेती की जाती है ।

वाल्वेरियेला वाल्वेसिया की अपेक्षा वा. डिप्लेशिया का छत्रक हल्के भूरे रंग लिए, छोटे बीजाणु वाला और सफेद फलनकाय वाला होता है । वाल्वेरियेला वाल्वेसिया का छत्रक गुलाबी रंग का होता है । वोल्वेरियेला एस्कुलेन्टा और वा. बाकेरी को वा. वाल्वेसिया का पर्यायवाची माना जाता है ।

पुआल खुंभी के खेती की तकनीक (Techniques of Cultivating Straw Mushroom):

पुआल खुंभी अधिकतर धान के डंठलों और व्यर्थ कपास पर उगायी जाती है परंतु इसके अलावा वाल्वेरियेला स्पसीज को विभिन्न प्रकार के माध्यमों पर भी उगाया जा सकता है जैसे गन्ने की सीठी, केले के सूखे पत्ते, नारियल के पेडों का व्यर्थ भाग तथा छिलका, जल खुंभी, बेकार अन्ननास का कचरा, गेहूँ, जौ, जई का डंठल और लकड़ी का बुरादा आदि ।

खुंभी कई प्रकार के बाह्यकोशीय जल अपघटनीय और ऑक्सीकरणीय एन्जाइम जिनमें लिग्नोसेल्युलोटिक एन्जाइम आते हैं, पैदा करती हैं । इसमें जल अपघटनीय एन्जाइम बडे अणुओं को तोडकर कम अणुभार वाले कार्बोहाइड्रेट बनाती हैं जो कि खुंभी द्वारा आसानी से ग्रहण कर लिये जाते हैं ।

खुंभी द्वारा उत्पन्न सेल्युलोलाइटिक और हमीसेल्युलोलाटिक एन्जाइम्स पॉलीसैकेराइड पदार्थों को तोड़कर ग्लूकोज और जाइलोज में बदल देते हैं जो कि खुंभी की वृद्धि में सहायता करते हैं ।

कार्बन का सबसे उपयुक्त स्त्रोत है । वोल्वेरियेला खुंभी फिनॉल ऑक्सीकरण और लिग्निन को तोडने वाला एन्जाइम नहीं बनाती अतः कम लिग्निन वाले माध्यम जैसे कपास और कागज पर अधिक लिग्निन वाले पदार्थों की अपेक्षा अधिक उपज मिलती हैं ।

वाल्वेरियेला वाल्वेसिया की खेती की कई तकनीक उष्णकटिबंध में विकसित की गयी जहाँ तापक्रम 30-350 सेन्टीग्रेड और आपेक्षिक आर्द्रता 75-78 प्रतिशत तक रहती है । तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में पुआल खुंभी को धान के डंठलों पर उगाते हैं क्योंकि धान यहाँ की मुख्य फसल है ।

फिर भी धान के डंठल पर पैदावार बहुत कम और अनिश्चित रहती है । आजकल व्यर्थ कपास की खाद पर पुआल खुंभी की खेती व्यवसायिक तौर पर की जा रही है । यह तकनीक केवल व्यवसायिक क्षेत्रों तक ही सीमित है ।

धान के डंठल पर खेती कम खर्च वाली और गांवों के लिए उपयुक्त है, पर यहाँ खुंभी लगते समय वातावरण को नियंत्रित नहीं किया जा सकता और इस कारण से पैदावार कम होती है । दूसरी तरफ व्यर्थ कपास की खाद पर खेती में अधिक पूजी लगानी पडती है और वातावरण को नियंत्रित करने के लिए दक्षता की आवश्यकता पडती है ।

पुआल खुंभी की खेती की कई तकनीकें और तकनीक का चुनाव माध्यम या क्रियाधार की उपलब्धता और उपलब्ध साधन पर निर्भर करता है । खुंभी की व्यवसायिक स्तर पर खेती के लिए एक पूर्ण विकसित आंतरिक तकनीक का अनुमोदन किया जाता है जबकि अन्य तकनीकें कम खर्च वाली और देहाती क्षेत्रों के विकास के लिए उपयुक्त हैं, जहाँ पर खेती सामूहिक स्तर पर की जाती है ।

A. धान पुआल तकनीक:

उत्तरी भारत के मैदानी भाग में पुआल खुंभी की खेती धान के डंठलों पर गर्मी के मौसम में अप्रैल से अगस्त तक की जाती है और कम से कम 4 फसल ली जाती है । दक्षिण भारत में सालभर में 10-12 फसल ली जाती है, जहाँ सर्दी के महीने में थोडी गर्मी दी जाती है ।

i. आंतरिक (कमरे में) खेती:

इस विधि में एक किलो धान के पुआल के गट्‌ठों से धान के पुआल की शैया तैयार की जाती है । गट्‌ठरों को बनाने वाले डंठल साफ, सूखे और बिना मुडे होना चाहिये । गट्‌ठरों को बनाने के लिए पूरे डंठल का उपयोग किया जाता है । इनको इस प्रकार दोनों सिरों पर बाधा जाता है जिससे गट्‌ठर का सिरा खुले रहे ।

गट्‌ठरों को साफ पानी में 16-24 घंटे तक भिगोकर रखते हैं और दूसरे दिन इनको एक ढालू फर्श पर रखते हैं, जिससे पानी निथर जाये । डंठल को गर्म पानी में 800 से.ग्रे. पर 2 घंटे तक रखते हैं जिससे बीज के फेलने के समय बीमारियों और कीड़े न लगें । कमरे के अंदर इन गट्‌ठरों को बास या लकड़ी के फ्रेम पर या कुछ ऊँचे धरातल पर नियमित देरी बनाकर रख दिया जाता है ।

प्रत्येक शैया में उपस्थित 22 गट्‌ठरों को चार तह में 5 गट्‌ठर प्रति तह के हिसाब से आडे या खडे रखते हैं । दो खुले गट्‌ठर सबसे ऊपर रखे जाते हैं । पाँच से सात दिन पुराने स्पान व जीवाणुरहित बेसन को प्रत्येक तह में 15 प्रतिशत सूखे डंठल के भार से फैला देते हैं । स्पान को किनारे से 3-4 इंच अंदर 4-6 इंच चौडी पट्‌टी में डालते हैं ।

सबसे ऊपर की तह पर स्पान सपूर्ण सतह पर छिडककर 2 गट्‌ठर खुले पुआल से ढक देते हैं । एक शैया के लिए एक बोतल बीज व लगमग 250 ग्राम बेसन की आवश्यकता होती है ।

मौसम के अनुसार ढेर की मोटाई बदलती रहती है । गर्म मौसम में (400 सेन्टीग्रेड से ज्यादा) शैया की मोटाई 50 से.मी. से ज्यादा नहीं होना चाहिये, जिससे शैया अधिक गर्म न हो और स्पान नष्ट न हो जाये । जब शैया तैयार हो जाती है तब इसे धान की पुआल या पॉलीथीन की चादर से ढक देते हैं जिससे आपेक्षित आर्द्रता को नियंत्रित रखा जा सके ।

शैया तैयार करते समय 0.1 प्रतिशत बेविस्टिन का घोल का छिडकाव शैया पर कर देना चाहिये, जिससे प्रतिस्पर्द्धी कवकों द्वारा फसल का नुकसान न हो सके । प्रत्येक दिन का तापक्रम लिखते जाना चाहिये । यदि तापक्रम 380 से.ग्रे. से अधिक हो जाये जब किनारे की चादर हटा देते हैं और शैया पर पानी का छिडकाव किया जाता है जिससे तापक्रम कम हो जाये ।

जब तक शैया पर छोटे-छोटे बटन न आये तब तक कमरे में संवातन नहीं रहना चाहिये । फिर भी शैया पर फसल के समाप्त होने तक दिन में एक या दो बार पानी का छिडकाव करना चाहिये । हवा की आर्द्रता पर पानी का छिडकाव निर्भर करता है । प्रायः प्रथम तीन चार दिनों तक छिडकाव की आवश्यकता नहीं रहती ।

छोटी शैया बड़े आकार की शैया की अपेक्षा कम खर्चीली होती है और बडे गठ्ठरों की अपेक्षा प्रतिकिलो धान के डंठल से ज्यादा उपज प्राप्त होती है । यह पाया गया कि खोखले, त्रिभुजाकार आयताकार या वर्गाकार शैया से परंपरागत शैया की अपेक्षा अधिक उपज प्राप्त होती है ।

इन शैया में डंठलों की तहों के बीच नमी एक समान रहती है, तापक्रम उपयुक्त रहता है और ताजी हवा मिलती रहती है । इसके कारण कवकजाल की वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रहती है, अतः खुंभी ज्यादा लगती है । पुकायास्था व अन्य (1981) के अनुसार घुमावदार व टायर के समान शैया में पैदावार अधिक होती है ।

ii. बाह्य खेती:

एशिया के छोटे किसानों में घर के बाहर खुंभी की खेती कम लागत व सरल तकनीक के कारण अत्यंत लोकप्रिय है ।

पुआल खुंभी उगाने वाले किसान धान के डंठल का गड़वा बनाकर और स्पान बनाने वाले संस्थाओं से स्पान लाकर इसकी खेती करते हैं । धान के डंठल के गट्‌ठरों को छायादार स्थान पर बास के ऊंचे चबूतरे पर तैयार करते हैं । जिससे कि वे सूर्य की सीधी किरणों से बचे रहे ।

हवा और जोरदार वर्षा से शैया को बचाने के लिए शैया का पॉलीथीन कीं चादर, गीली घास या घास की चटाई से हक देते हैं, लेकिन वर्षा समाप्त होते ही इनको शैया के ऊपर से हटा लेते हैं । धान के गट्‌ठर के अतिरिक्त केले की सूखी पत्तियों या जलकुंभी का भी उपयोग किया जा सकता है ।

शैया को पूर्व पश्चिम दिशा में बनाना चाहिये जिससे सूर्य का प्रकाश और तापक्रम एक समान रहे । हवा की आर्द्रता के अनुसार प्रत्येक शैया की बार-बार सिचाई करना चाहिये और यह क्रिया फसल के अतः तक करते रहना चाहिये । बीजाई करने के 8-10 दिन बाद पिन हेड निकलने लगते हैं और 3-5 दिन बाद पिन हेड तोड़ने योग्य हो जाते हैं ।

iii. बक्सेनुमा सहज ले जाने योग्य शैया:

वाल्वेरियेला खुंभी के पैदावार को कीडे और बिमारियों से बचाने के लिए खुले, सहज ले जाने योग्य बक्से बहुत ही उपयोगी है । ये बक्से 2.5×5 से.मी. लंबी लकडियों से बनाये जाते हैं ।

ढांचे 50 से.मी. लंबे, 45 से.मी. चौड़े और 20 सेन्टी मीटर गहरे होता है और चारों तरफ से खुले रहते है । शैया बनाने के लिए माध्यम (धान का पुआल, केले की सूखी पत्तियाँ आदि) को 20 सेन्टीमीटर लंबा काट लेते हैं और पहले के समान शैया बनाने के लिए इनके गट्‌ठर बना लेते हैं ।

इन गट्‌ठरों को पहले पानी में रातभर डुबो देते हैं । दूसरे दिन पानी निथार लेते हैं और स्तरों के रूप में लकड़ी के ढांचों में भर देते हैं । जब ढांचे को भरा जाता है उस समय पर हर स्तर पर स्पान को मिलाया जाता है ।

शैया के किनारे से अतिरिक्त डंठलों को कैंची से काट दिया जाता है और बाकी बचे डंठलों को ढांचे में खोंस देते हैं जिससे खुंभी के ऊपर निकलने में कोई बाधा न आये । छटाई के बाद हर शैया को पॉलीथीन की चादर से इस प्रकार ढकते हैं जिससे पॉलीथीन शैया को न छुये । इससे कवकजाल की शीघ्र बढवार के लिये अनुकूल आर्द्रता और तापक्रम प्राप्त हो जाते हैं ।

अच्छे स्पान का फैलाव 5 से 7 दिन में हो जाता हैं । ढांचे के खुले भागों में से 10 दिन में खुंभी के पिन हेड बाहर निकलना प्रारंभ हो जाते हैं ।

B. आधुनिक व्यर्थ कपास विधि:

व्यर्थ कपास के कम्पोस्ट पर व्यापारिक स्तर पर खुंभी उगाने की विधि हांगकांग में सन् 1973 से बहुप्रचलित है । आजकल यह तकनीक थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, मलेशिया और फिलिपाइन में नियंत्रित परिस्थितियों में घरों के अंदर उपयोग में लायी जा रही है । चेंग (1982) ने व्यर्थ कपास पर घर के अंदर वोल्वेरियेला की खेती की तकनीक का विस्तृत वर्णन किया ।

i. कम्पोस्ट बनाने की विधि:

कई श्रेणी के व्यर्थ कपास (गिरा हुआ भाग, कार्ड फ्लाइज, कटर फ्लाइज और धूलि और तैलीय बुहारन आदि) को मिश्रित करके लकड़ी के 90x90x30 से.मी. के ढाँचे में रख दिया जाता है । इसमें पानी और 26 प्रतिशत चूने का पत्थर और अन्य पदार्थ जैसे मुर्गी की खाद (5 प्रतिशत) भी धीरे-धीरे डाली जा सकती है ।

इस कम्पोस्ट को दबा दिया जाता है, जिससे पानी धारण करने की क्षमता बढ़ जाये और कई श्रेणी के व्यर्थ पदार्थ आपस में मिल जायें । व्यर्थ कपास के बडे टुकडों को छोटे टुकड़ों में तोडा जाता है । जब यह ढांचा व्यर्थ नम कपास से भर जाता है तब इसे दबाया जाता है ।

जिससे कि इसमें कम्पोस्ट की दूसरी तह जमाई जा सके । इस प्रकार कम्पोस्ट के एक ढेर में इस तरह की 4-6 स्तर रहते हैं, और यह 70-90 से.मी. ऊँचा हो जाता है । इस ढेर को प्लास्टिक की चादर से ढक दिया जाता है, जिससे यह भलीभाँति सड जाये ।

दो दिन पश्चात इस ढेर को यांत्रिक विलोडक की सहायता से उलटकर-पलटकर अच्छी तरह मिलाते हैं । इसमें 5 प्रतिशत धान की भूसी और आवश्यकतानुसार थोडा पानी डाल देते हैं । इस मिश्रित कम्पोस्ट को ढेर बना देते हैं और इसे पुन: प्लास्टिक की चादर से ढक देते हैं । अगले दो दिनों तक किण्वन होने देते हैं ।

ii. शैया में कम्पोस्ट भरना:

कम्पोस्ट बनने में चार दिन लगते है इसके बाद शैया बनाई जाती है । एक आदर्श प्लास्टिक खुंभी घर में जिसका शैया क्षेत्र 146.5 वर्ग मीटर का होता है, में 10 शैया रहती है । इनमें कम्पोस्ट की तह 10 से.मी. मोटी रहती है ।

खुंभी घर बास या लकड़ी के ढांचे से तैयार किया जाता है और अंदर से 0.4 मि.मी. मोटा पॉलीथीन चादर से स्तरित रहता है और बाहर से 127 से.मी. मोटी पॉलीफॉर्म की चादर रोधन (इन्सुलेशन) के लिए ढक दिया जाता है ।

इस घर में प्रायः 1/4-1/2 हॉर्स पावर का बिजली का ब्लोअर, संवातन के लिए पॉलीइथीलीन की हवा की नली और घर की लंबाई में दोनों तरफ दो-दो खिडकियाँ रहती हैं जिसका उपयोग गर्मी के मौसम में तापक्रम, आर्द्रता और हवा को नियंत्रित करने में किया जाता है ।

iii. पाश्चुरीकरण:

शैया भरने के बाद खुंभी घर में ताजी भाप भेजी जाती है । दो घटे में हवा का तापक्रम 60-620 से.ग्रे. हो जाता है । इस तापक्रम को 2 घंटे तक स्थिर रखा जाता है । इसके बाद खुंभी घर में ताजी हवा प्रवेश कराकर हवा का तापक्रम 520 से.ग्रे. तक ले आते हैं । लगातार हवा भेजकर यह तापक्रम 8 घण्टे तक बनाये रखते हैं । अब भाप वाल्व को बंद कर दिया जाता है और तापक्रम को धीरे-धीरे 34-360 से.ग्रे. तक स्पानिंग के लिये गिरने दिया जाता है । बाहर के तापक्रम के अनुसार इसमें लगभग 12-16 घण्टे तक लग जाते हैं ।

iv. स्पानिंग:

खुंभी घर का तापक्रम 350 से.ग्रे. लाने से शैया का तापक्रम 36-380 से.ग्रे. तक रहता है । यह स्पानिंग के लिए उचित तापक्रम है । कम्पोस्ट के सूखे वजन का 1:4 प्रतिशत या गीले भार का 0.4 प्रतिशत स्पान उपयोग में लाया जाता है । स्पान की मात्रा घटायी या बढ़ायी जा सकती है ।

कम्पोस्ट के गीले भार के अनुसार स्पान की मात्रा 1.5 प्रतिशत तक बढ़ाने से कम समय में अच्छी उपज मिलती है । कम्पोस्ट की गुणवत्ता और तापक्रम के अनुसार 3-4 दिनों में पूरी उपज प्राप्त की जा सकती है । स्पानिंग के समय शुद्ध कल्चर को निकालकर इसके छोटे-छोटे टुकड़े कर लिये जाते हैं ।

कम्पोस्ट को 12-15 सेमी. की दूरी पर 2-2.25 से.मी. गहराई तक खोखला करके इसमें स्पान के टुकड़े डाल दिये जाते हैं । हटायी गयी कम्पोस्ट से स्पान को ढक दिया जाता है । अब शैया को प्लास्टिक की पतली चादर से ढक देते हैं । स्पान के फैलने के समय कमरे का तापक्रम 32-340 से.ग्रे. तक स्थिर रखा जाता है ।

v. फलन (फ्रुक्टीफिकेशन):

स्पान के फैलाव को बार दिन तक पानी और रोशनी की आवश्यकता नहीं रहती, परंतु थोडा संवातन रखा जाता है । तीन दिन बाद प्रतिदीप्तशील प्रकाशक (प्लूरोसेन्ट लैम्प) द्वारा सफेद प्रकाश डाला जाता है और हवा प्रवेश करायी जाती है । अच्छी कम्पोस्ट बनाने और पाश्चुरीकरण के बाद स्पान के फैलाव के समय एक्टीनोमाइसिटीज की अज्ञात प्रजाति और ह्यूमीकोला फ्यूसोएट्रा वोल्वेरियेला के कवकजाल के साथ शैया के अंदर और बाहर उत्पन्न हो जाती हैं ।

यह पाया गया है कि ह्यूमीकोला फ्यूसोएट्रा पुआल खुंभी के कवकजाल की वृद्धि को उत्तेजित करती है, साथ ही साथ हानिकारक कवकों की वृद्धि को रोकती है । चौथे दिन सभी प्लास्टिक की चादरें हटाकर शैया पर पानी का छिड़काव करने से एक्टीनोमाइसिटीज और ह्यूमिकोला की वृद्धि रूक जाती है । वोल्वेरियेला की वृद्धि होती रहती है । स्पानिंग के 5 दिन बाद शैया की सतह पर फलनकाय की प्रारंभिक रचनाएं दिखने लगती हैं ।

C. पैदावार और तुड़ाई:

नियंत्रित परिस्थितियों में स्पान मिलाने के 5 दिन बाद व्यर्थ कपास के कम्पोस्ट के ऊपरी धरातल पर खुंभी की छोटी-छोटी प्रारंभिक रचनाएं दिखने लगती हैं । अगले चार दिनों में रचनाएं तोडने लायक हो जाती हैं । पुआल खुंभी को बटन या अण्ड अवस्था में तोड़ा जाता है ।

बटन अवस्था में खुंभी परगुंठिका (यूनिवर्सल बेल) के अंदर टोपी और तने में बदलने लगती है । इस अवस्था के पूर्ण होने पर परगुंठिका टूट जाती है । परगुंठिका के फटने से पहले की अवस्था अण्ड अवस्था कहलाती है । बाद में टोपी दिखने लगती है और तना बढने लगता है ।

खुंभी को तोडने की यह अवस्था पसंद नहीं की जाती है । भण्डारण के एक दिन के अंदर खुंभी के तेजी से परिपक्व होने के कारण टोपी खुलकर छतरी के समान दिखाई देने लगती है ।

इसके साथ-साथ नमी की कमी, और अधिक बीजाणु झड़ने के कारण खुंभी का भार कम हो जाता है । खुंभी की सतह बीजाणु गिरने के कारण गुलाबी रंग की हो जाती है । इस समय खुंभी पनीली होने लगती है और इससे अनचाही गंध आने लगती हैं ।

शैया की पौष्टिकता और वातावरण की दशा पर ही खुंभी के फ्लश की समयावधि निर्भर करती है । प्रथम फ्लश प्राय: 4-5 दिन बाद निकलता है । इसके चार दिन बाद दूसरा फ्लश प्रारंभ होता है । यह भी 3-4 दिन रहता है ।

दूसरे फ्लश की पैदावार पहले फ्लश की अपेक्षा 10 प्रतिशत कम रहती है । व्यर्थ कपास के कम्पोस्ट पर घर के अंदर खुंभी का केवल एक फ्लश ही काटा जाता है । एक फसल का अर्थ एक फ्लश । खुंभी के घर में एक माह में दो फसल या तीन फसल दो माह में उगायी जा सकती हैं ।