भारत में विकास बैंकों का महत्व | Read this article in Hindi to learn about the importance of development banks in India.

विश्व के विभिन्न विकसित देशों में विकास बैंकों का उनकी विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान रहा है । भारत में भी पिछले कुछ वर्षों से इन बैंकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

इन बैंकों की उपयोगिता का महत्व को निम्न प्रकार सिद्ध किया जा सकता है:

1. वित्तीय व्यवस्था करना:

प्रायः विकासशील एवं पिछड़े देशों में पूँजी का अभाव रहता है । ऐसी स्थिति में औद्योगिक विकास सम्भव नहीं होता । ऐसी स्थिति में विकास बैंक नवीन उद्योगों की स्थापना एवं विद्यमान उद्योगों के विस्तार तथा आधुनिकीकरण के लिए पूँजी प्रदान करके सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाते हैं ।

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विकास बैंक उद्योगों की वित्तीय व्यवस्था कई प्रकार से करते हैं, जैसे-स्थाई पूँजी के लिए ऋण देना, निर्गमित अंशों (शेयर्स) एवं ऋण पत्रों में प्रत्यक्ष अभिदान करना, अंशों एवं ऋण पत्रों का अभिगोपन करना स्थगित भुगतानों की गारन्टी देना आदि ।

2. आर्थिक विकास को गति देना:

वर्तमान समय में विकास बैंकों को विकस का इंजिन माना जाता है जो सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को गतिशील करके उसे विकास के मार्ग में आगे बढाता है । विकास बैंक न केवल विद्यमान उद्यमियों को ऋण देते हैं वरन् नवीन उद्यमियों को प्रेरित करके उन्हें औद्योगिक विस्तार के कार्य में लगा देते हैं । इससे उत्पादन, आय एवं रोजगार आदि सभी क्षेत्रों में विकास होता है और औद्योगिक उत्पादकता में वृद्धि होती है ।

3. उद्यमशीलता का विकास:

प्रायः यह कहा जाता है कि इंग्लैण्ड के औद्योगिक विकस में वहीं के उद्यमियों का विशेष योगदान रहा है, किन्तु भारत जैसे विकासशील देशों में जोखिम उठाने वाले वर्ग का अभाव रहता है ऐसी स्थिति में विकास बैंक अनेक प्रकार से उद्यमियों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करते है ।

विकास बैंक उन्हें परियोजनाओं की जानकारी देते हैं वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराते हैं बाजार का सर्वेक्षण करते हैं तथा प्रबन्धकीय शान देते है । इससे उद्यमियों को प्रेरणा मिलती है और वे अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी के लिए आगे आते हैं ।

4. सन्तुलित विकास में योगदान:

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भारत में प्रारम्भ से ही सन्तुलित विकास को महत्व दिया गया है । फलतः पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना पर ओर दिया जाता है । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विकस बैंक पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना के लिए अनेक रियायतें देते है । इससे देश में सन्तुलित विकास को बल मिलता है ।

5. उद्योगों का विविधीकरण:

देश की आवश्यकतानुसार औद्योगिक विकस आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है । विकास बैंक प्राथमिकता के अनुसार उद्योगों को आकर्षित करते हैं तथा उन्हें नवीन क्षेत्रों की जानकारी देते हैं । इससे परम्परागत उद्योगों के साथ-साथ नवीन उद्योगों का भी विकास होता है । फलतः औद्योगिकरण में विविधता आती है ।

6. पंचवर्षीय योजनाओं में रखे गए लक्ष्यों की प्राप्ति:

भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास की दर 6 से 7 प्रतिशत के मध्य रही है । इस लक्ष्य से प्राप्त करने में विकास बैंकों क महत्वपूर्ण योगदान रहा है । वस्तुतः विकास बैंकिंग व्यवस्था ने भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं को सफल बनाने में एक महत्वपूर्ण उपकरण का कार्य किया है । इन बैंकों ने आयात प्रतिस्थापन एवं निर्यात प्रोत्साहन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

7. पूँजी बाजार का विकास:

पूंजी बाजार का विकास मुख्यतः शेयरों, ऋण-पत्रों, विकास आदि के क्रय-विक्रय पर निर्भर करता है किन्तु यह तभी सम्भव है जब औद्योगिक संस्थाएँ एवं व्यावसायिक घराने अपने शेयरों एवं ऋण पत्रों का निर्गमन करें तथा जन-साधारण अपनी बचतों को इनमें लगाएँ ।

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विकास बैंक पूँजी निर्गमन के अभिगोपन एवं शेयरों में प्रत्यक्ष निवेश से पूंजी बाजार का विकास करते हैं । इसके साथ ही विकस बैंक पूँजीबाजार में प्रोत्साहित करने एवं स्वस्थ परम्पराओं के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं ।

8. परियोजना प्रस्तावों की जाँच एवं मार्गदर्शन:

जब किसी व्यक्ति द्वारा ऋण प्राप्त करने हेतु आवेदन किया जाता है तब उसे परियोजना के विस्तृत प्रस्ताव भी देना होते हैं । विकस बैंक इन प्रस्तावों को अलग-अलग दृष्टिकोणों से जाँचते है, अर्थात् परियोजना की प्रचलन दक्षता (Operational Efficiency) का तकनीकी, आर्थिक, वित्तीय तथा प्रबन्धकीय दृष्टि से जाँच करना । इससे परियोजना की कमियों की जानकारी प्राप्त होती है और उसमें सुधार करके एक सुदृढ़ प्रस्ताव तैयार करना सम्भव होता है ।

9. विदेशी मुद्रा की उपलब्धता:

औद्योगिकरण के लिये मशीनें, तकनीकी ज्ञान एवं कुछ विशिष्ट प्रकार के कच्चे माल आवश्यक होते है, जिनका विदेशों से आयात करना पड़ता है । विकास बैंक ऐसे उद्योगों को विदेशी मुद्रा में ऋण देती है ।

इसके साथ ही विकास बैंक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं, जैसे विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम, एशियन विकास बैंक आदि से प्राप्त ऋणों को प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न उद्योगों को विदेशी मुद्रा का आवंटन भी करती है । इससे उद्योगों का आधुनिकीकरण करने एवं उन्नत तकनीकी अपनाने में सहायता मिलती है ।

10. निर्यात सम्बर्धन एवं आयात प्रतिस्थापन में सहायता:

विकास बैंक प्राथमिकता के आधार पर वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराते है । इससे ऐसे उद्योग जिनके द्वारा निर्यात सम्बर्धन एवं आयात प्रतिस्थापन सम्भव होता है, को वित्तीय सहायता प्राप्त करना सरल हो जाता है । फलतः भुगतान सन्तुलन की समस्याओं को हल करने में सहायता मिलती है ।

11. कृषि एवं ग्रामीण विकास में सहायक:

विकास बैंक न केवल देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है, वरन् कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में भी सक्रिय रुचि ले रहे हैं । प्रायः सभी राज्यों में स्थापित राज्य वित्त निगम जहाँ लघु उद्योगों में वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं, वहीं नाबार्ड (NABARD) कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में पुनर्वित्त प्रदान करके योगदान देता है ।

12. समन्वय का कार्य:

प्रायः निजी क्षेत्र के उद्योगपति अनेक स्रोतों से ऋण प्राप्त कर लेते हैं और समन्वय न होने के कारण उद्योगों पर ऋण-भार बहुत अधिक बद जाता है । इस समस्या को हल करने का दायित्व विकास बैंकों का है जो विभिन्न ऋण देने वाली संस्थाओं के मध्य समन्वय का कार्य करते हैं ।

13. नवप्रवर्तक का कार्य:

नये-नये उद्योग, उन्नत तकनीकी, स्तरीय प्रबन्ध व्यवस्था के माध्यम से विकास बैंक नवप्रवर्तक का कार्य भी कर रहे हैं । उद्योगों का आधुनिकीकरण में नवप्रवर्तक का कार्य महत्वपूर्ण होता है । विकास बैंक बचत एवं निवेश के क्षेत्र में नई-नई आकर्षक एवं उत्पादक योजनाएँ क्रियान्वित करके निवेश के लिए उत्साह बर्धकवातावरण का निर्माण भी कर रही हैं ।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि देश के औद्योगिक विकास में विकस बैंकें महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं । इससे न केवल बड़े उद्योगों को लाभ हो रहा है, वरन् मध्यम एवं लघु उद्योगों के साथ-साथ कृषि को भी वित्तीय सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं । संक्षेप में, विकास बैंकों ने अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है ।