बटन मशरूम के रोगों को कैसे नियंत्रित करें? | Read this article in Hindi to learn about how to control diseases of button mushroom.

(A) कवक जनित बीमारियां:

(1) इन्की टोपी:

साधारण नाम:

इन्क वीड, जंगली खुंभी

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लक्षण:

स्पान के फैलाव के समय या ताजी डाली गयी आवरण मृदा या खाद की ढेरी के बाहरी भाग पर किण्वीकरण के समय इन्ही टोपी कवक दिखायी देती है । ये लंबी घंटी के समान खुंभी है जो कि पहले दूधिया रंग की बाद में नीली काली हो जाती है जो कि शल्कों से ढंकी रहती हैं ।

ये नीचे से ऊपर की तरफ जलीय होते जाते हैं । जब पौधा परिपक्व होता है तब टोप और गिल्स स्वयं गलन के कारण काले चिपचिपे पदार्थ में बदल जाते हैं ।

रोगकारक:

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कोप्राइनस लेगोपस, को. एट्रेमेन्टेरियस, को. कोमेटस. को फिमिटेरियस ।

टोपी 1.5-4 से.मी चौडी, पतली, लंबी, अण्डाकार बाद में शंक्वाकार और अंत में घंटाकर हो जाती है । यह पहले सफेद शल्कों से ढकी रहती है जो कि बाद में खत्म हो जाती हैं । नवजात टोपी में गिल्स बहुत पास-पास होते हैं. जो कि गिल की सतह पर उत्पन्न छोट-छोटे उभारों द्वारा अलग होते हैं । ये नीचे से ऊपर की तरफ जलीय होते जाते हैं ।

रोगचक्र:

अपाश्चुरीकृत या आशिक पाश्चुरीकृत खाद या आवरण मृदा या हवा द्वारा बीमारी फैलती है । यदि खाद में अमोनिया रहती है तब स्याही टोपी कवक दिखायी देती है । टोक के स्याही में बदलने से अधिक संख्या में बीजाणु स्वतंत्र होते हैं जो कि ताजी बनी खाद को प्रभावित करते है ।

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प्रबंधन:

i. उचित प्रकार से पाश्चुरीकृत खाद व आवरण मृदा उपयोग में लाना चाहिए ।

ii. अत्यधिक पानी नहीं देना चाहिए ।

iii. नवजात फलनकायों को उखाड देना चाहिए ।

(2) सिन्नेमॉन प्रत्याशी कवक:

साधारण नाम:

सिनमॉन भूरी प्रत्याशी कवक, भूरी प्रत्याशी कवक

लक्षण:

खाद या आवरण मृदा पर प्रत्याशी कवक का सफेद वायवीय कवकजाल बडे गोलाकार धब्बों के रूप में पाया जाता है । जो कि बाद में पीले भूरे रग के हो जाते हैं । जिनकी किनारी मोटी व रूई के समान होती है । कवक शैया पर असंख्य कप के समान गूदेदार फलनकाय बनाते हैं ।

रोगकारक:

क्रोमिलोस्पोरियम फल्वा, क्रो. ओलेरी

इसकी पूर्ण अवस्था पेजाइजा आस्ट्रेकोडर्मा है । एपोथीसियम कप के समान, किनारे लहरदार, प्रायः फटे हुये, आधार की तरफ नुकीले, तना लंबा, एसाई बेलनाकार 80-160 से 8-12 माइक्रान के, एस्कोस्पार 8 एकल कतार में, काचाभ 8-12×4-8 माइक्रान, काचाभ, पेराफाइसिस उपस्थित ।

रोगचक्र:

मिट्‌टी, केसिंग मिश्रण और गीली लकडी निवेशद्रव्य के प्राथमिक स्त्रोत हैं । कवक के बीजाणु आसानी से हवा जनित होते है । अधिक नमी व अमोनिया की अधिकता में बीमारी का विकास तेजी से होता है ।

प्रबंधन:

i. आवरण मृदा को भाप या फार्मेल्डीहाइड द्वारा पूरी तरह से निर्जीवीकृत नहीं करना चाहिए ।

ii. आवरण की परत में नमी की सही मात्रा बनाये रखना चाहिए ।

(3) लिप्सटिक प्रत्याशी कवक:

साधारण नाम:

लिप्सटिक या लाल लिप्सटिक

लक्षण:

यह प्रत्याशी कवक खाद पर बीज फैलने के समय श्वेत रवेदार दिखायी देती है जिसे खुंभी के कवकजाल से अलग करना कठिन होता है । जैसे ही कवक के बीजाणु का परिपक्वन होता है । इस कवक का रंग श्वेत से गुलाबी बदरी रक्त हो जाता है और बाद में मंद नारंगी व पण्डु हो जाता है । खुंभी का कवकजाल उन जगहों पर पाया जाता है जहां कि आवरण ढीला हो । यह अच्छी प्रकार से अनुकूलित खाद का भी उपनिवेशन करता है ।

रोगकारक:

स्पीरेन्डोनीमा पुरपुरीसेन्स

(4) गुलाबी प्रत्याशी कवक:

लक्षण:

इस प्रत्याशी कवक की सफेद वृद्धि आवरण मृदा में दिखायी देती है, जो कि बाद में गुलाबी हो जाती हैं । इसके कारण से 90 प्रतिशत तक हानि आंकी गयी है । कभी-कभी पूरी फसल ही नष्ट हो जाती है ।

रोगकारक:

सिफेलोथीसियम रोसियम

कवकजाल पटयुक्त शाखित, कोनिडियोधर सीधे, प्राय: शाखित, सिरे पर थोड़े फूले रहते हैं । कोनिडिया अकेला, एक्रीजनिस, नाशपाती के आकार का, दो कोशिका वाला, ऊपरी कोशिका बड़ी, काचाभ से गुलाबी, 11-18 x 7-9.5 माइक्रान, संक्रमण प्रायः हवा द्वारा ।

प्रबंधन:

आवरण मृदा पर 10 दिन के अंतराल से दो बार थाइरम या केप्टान (0.4 प्रतिशत) के छिडकाव से प्रत्याशी कवक को नियंत्रित किया जा सकता है ।

(5) उडे सिफेलम प्रत्याशी कवक:

लक्षण:

स्पान मिलाने के पहले खाद को ठण्डा करते समय खाद की सतह पर अनयिमित, हल्के चमकीले भूरे रग के धब्बे दिखायी देते हैं । बीज मिलाने के बाद कवक का रंग बीजाणुओं के परपिक्व होने के कारण बदलकर गहरा कत्थई दिखायी देता है । इसी प्रकार की वृद्धि केसिंग परत पर भी पायी गयी ।

रोगकारक:

उड़ोसिफ़ेलम फिमिटेरियम एवं उड़ोसिफेलम स्प. ।

कवक के कोनिडियोघर सीधे रहते हैं । जिसके सिरे पर बडे बीजाणुओं का एक गोल झुण्ड पाया जाता है । खाद में उडोसिकेलियम स्प. की उपस्थिति यह दर्शाती है कि पाश्चुरीकरण और अनुकूलन के समय अमोनिया व अमीनस् पूरी तरह से अलग नहीं हुये हैं ।

प्रबंधन:

दो प्रतिशत फार्मेलिन का छिडकाव या स्थानीय उपचार करने से प्रत्याशी कवक को नियंत्रित किया जा सकता है ।

(6) सफेद प्लास्टर प्रत्याशी कवक:

लक्षण:

खाद या आवरण मृदा पर बीमारी सफेद धब्बों के रूप में दिखायी देती है । अनुकूल परिस्थितियों में ये धब्बे या कवकजाल की वृद्धि 50 से.मी. से भी ज्यादा होती हैं । धब्बे बनने के एक सप्ताह बाद यह सफेद वृद्धि हल्के गुलाबी रग में बदल जाती है । खाद में बीज का फैलाव प्रभावशाली रूप से कम हो जाता है । अत्याधिक प्रकोप होने पर पूरी फसल नष्ट हो जाती है ।

रोगकारक:

स्कोपुलेरियोप्सिस फिमिकीला ।

रोगजनक का कवकजाल पटयुक्त, कोनिडियोंघर छोटे शाखित, कवकजाल पर अनियमित रूप से पार्श्वीय शाखाओं में लगे, एनीलोबीजाणु अण्डाकार, गोलाकार, गोल या तने के समान, समूह में चमड़े के रंग के, शृंखला में या झुण्ड में, 4.89 x 4.8 मिली माइक्रान माप के होते है कम या अधिक समय तक बनी खाद जिसका पी.एच. मान ज्यादा (8 से अधिक) हो तथा जिसमें अमोनिया की गध आती हो, रोगजनक के लिये अनुकूल रहता है ।

प्रबंधन:

i. सही प्रकार से खाद बनाना एवं खाद में उचित मात्रा में पानी व जिप्सम अनुमोदित है ।

ii. बीमारी के नियंत्रण के लिये बेनोमाइल (0.1 प्रतिशत) का छिडकाव या खाद से कवक को निकालने के बाद फार्मेलिन (4 प्रतिशत) का स्थानीय उपचार प्रभावशाली पाया गया ।

(B) जीवाणु जनित बीमारियां:

अगेरिकस बाइस्पोरस अ. बाइटारकस, प्लूरोटस प्रजाति, लेनटाइनस इडोड्‌स, फ्लेमुलिना वेलुटाइपस, वाल्वेरियेला प्रजाति और आरिकुलेरिया प्रजाति पर सारे संसार में जीवाणु जनित बीमारियाँ सर्वव्यापी पायी गयी । परंतु भारत में अगेरिकस बाइस्पोरस एवं प्लूरोटस प्रजाति पर ही जीवाणु जनित बीमारियाँ उल्लेखित हैं । भारत में बटन खुंभी पर केवल जीवाणु जनित दाग पाया गया ।

जीवाणु जनित दाग या भूरा दाग:

साधारण नाम:

भूरा दाग, जीवाणु दाग

लक्षण:

खुंभी की सतह पर रोगजनक दाग बनाता है । ये दाग प्रारंभ में हल्के पीले होते हैं परंतु अतः में ये दाग सुनहरे पीले या गहरे रंग के हो जाते हैं । ये दाग सतह से थोडे धसे रहते हैं ।

इन दागों के नीचे के ऊतक पनियल, भूरे या पीले भूरे दिखायी देते हैं । जब खुंभी की बटन अवस्था की शुरुआत रहती है तब जीवाणु जनित दाग दिखायी पडते हैं । परन्तु यह दाग खुंभी की किसी भी अवस्था में जैसे तुडाई के बाद शीतलित खुंभी या पालीथीन से ढकी खुंभी पर दिखायी देते हैं ।

ये धब्बे बढकर आपस में मिल जाते हैं । जिसके कारण कभी-कभी पूरी टोपी ढक जाती है । अत्याधिक रोगीत खुंभी के तनों पर भी ऐसे लक्षण देखे जा सकते हैं ।

विशिष्ट लक्षण खुंभी की टोपी पर या किनारे दो खुंभीयों की टोपीयों के मिलने की जगह, खुंभी के मुंडी में दरारों पर या पानी के छिड़काव के बाद सहल 4-6 घंटे तक या अधिक समय तक गीली रहने पर दिखायी पडते हैं । अत्याधिक रोगग्रस्त खुंभी की टोपियाँ फट जाती हैं तथा उनका आकार नष्ट हो जाता है, और जहाँ भूरा दाग पाया जाता है वहाँ से टोपी फट जाती है ।

रोगकारक:

स्युडोमोनास फ्लूरोसेन्स बायोटाइप जी (पी.टोलासी, फाइटोमोनास टोलासी, बेक्टिरियम टोलासी)

रोगचक्र:

खुंभी घर में केसिंग मिश्रण से तथा हवा जनित धूल द्वारा यह रोगजनक प्रवेश करता है । जीवाणु रोगजनक पाश्चुरीकरण के बाद भी केसिंग माध्यम में उपस्थित रहता है । केसिंग मिश्रण के बजाय जब जीवाणु की संख्या खुंभी की टोपी पर बढने लगती है तब बीमारी पायी जाती है ।

खुंभी वृद्धि की किसी भी अवस्था में टोपी की बाहरी सतह या तने या दोनों पर दाग बन सकते हैं । फार्म में एक बार प्रवेश करने के बाद रोगजनक फसल अंतरालों की अवधि में विभिन्न सामग्रियों की सतहों पर, कचरों में तथा औजारों पर जीवित रहता है ।

साथ ही, यह पीट और चाक का एक प्राकृतिक निवासी बन जाता है । जिन फार्मों में यह जीवाणु मौजूद रहता है. वहीं इसका द्वितीयक प्रसार खुंभी तोड़ने वाले कर्मचारियों के हाथों, औजार, अन्य सामग्रियों, खुंभी के बीजाणुओं एव कचरा, सीढ़ी आदि से भी होता हैं । इनके अतिरिक्त इस के फैलाव में सियेरिड मक्खियों एवं बरूथियों आदि की प्रमुख भूमिका होती है ।

प्रबंधन:

इस रोग के प्रबंधन में सबसे अधिक प्रभाव उपाय आपेक्षिक आर्द्रता, तापमान, हवा की गति और हवा का बहाव आदि को नियंत्रित करना है । कमरे में 200 डिग्री से. की अधिक तापमान और 85 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होना चाहिये । पानी के छिडकाव के बाद कुछ समय के लिये ताजी हवा का अंदर आना जरूरी होता है, जिससे खुंभी की सतह सुख जाये ।

अधिक नमी (85 प्रतिशत से अधिक) पर तापमान के अत्याधिक बदलाव से जमने वाली बूंदों को रोकना चाहिए । एंटागोनिस्टिक जीवाणु जैसे स्यूडोमोनास फ्लूरोसेन्स और दूसरे एंटागोनिस्टिक जीवाणु के उपयोग से इस बीमारी में 30-60 प्रतिशत तक नियंत्रण पाया गया ।

छिडकाव के लिये क्लोरीन युक्त जल (0.5 लीटर/मीटर) के साथ-साथ वातावरण के नियंत्रण से जीवाणु दाग पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है । टैरामासिन (9 मि.ग्राम/वर्ग फुट), स्ट्रेप्टोमाइसिन (200 पीपीएम), आक्सी टेट्रासाइक्लिन (300 पीपीएम) कासुगामा, दुगामाइसिन और कानामाइसिन का छिडकाव भी प्रभावी पाया गया ।

जीवाणु रोगजनक को निकालने के लिये केसिंग मिश्रण का ठीक ढंग से भाप या हवा मिश्रण द्वारा या कम वेव लेंथ वाली विकिरण किरणों द्वारा पाश्चुरीकरण प्रभावी पाया गया । पाश्चुरीकरण के समय अधिक तापक्रम नहीं रखना चाहिये अन्यथा इसके बाद मोल्ड का आक्रमण बहुत ज्यादा होगा ।

(C) विषाणु जनित बीमारियां:

साधारण नाम:

ला फ्रांस बीमारी, भूरा रोग, पनीली डंठल, एक्स बीमारी या उल्टा सूखा रोग ।

उल्टा सूखा रोग में 3 प्रकार के विषाणु पाये जाते हैं । भारत में बटन और आयस्टर खुंभी पर ही विषाणु और विषाणु जनित बीमारियाँ पायी गयी । लक्षणों का प्रकट होना विषाणु की मात्रा, संक्रमण का समय, स्पान के प्रभेद और वातावरण की अवस्था आदि पर निर्भर करता है ।

इन रोगों के मुख्य लक्षण निम्न प्रकार है:

1. रोगग्रस्त खुंभी का कवक केसिंग परत को भेद नहीं पाते या साधारण रूप से फैलने के बाद मर जाते हैं । जिससे खुंभी झुण्डों में निकलती है और बहुत जल्दी परिपक्व हो जाती है ।

2. रोगित खुंभी के डंठल से निकालकर अगर-अगर पर खुंभी कवक को उगाने पर इसकी वृद्धि स्वस्थ कवक जाल की तुलना में धीमी रहती है ।

3. पिन हेड बाद में निकलते हैं । कभी-कभी केसिंग परत की सतह के नीचे पाये जाते हैं । केसिंग परत के ऊपर तने के आने के शीघ्र बाद ही टोपी खुल जाती है ।

4. तने पर विभिन्न प्रकार के लक्षण पाये जाते हैं रोगित खुंभी में निम्न असामान्यताएं पायी जाती हैं:

(i) टोपी का रंग मटमेला सफेद होना व जल्दी परिपक्व होना ।

(ii) पिन हेड के धीमी गति से बढने के कारण खुंभी का बौना होना ।

(iii) लंबे व थोड़े झुके तने ।

(iv) खुंभी का आधार पर हल्के से लगा होना और छूने से अलग हो जाना ।

(v) तना जलायमान या तने पर धारियां ।

(vi) खुंभी मोटी ढोलक के आकार की, टोपी छोटी व चपटी, वेल अनियमित या अनुपस्थित, कडे गलफडे ।

5. रोगित खुंभी घर से विशिष्ट प्रकार की गंध का आना ।

6. खुंभी के विषाणु को पहचानना थोडा कठिन है । क्योंकि इसी प्रकार के लक्षण अनेकों प्रकार के कारकों द्वारा भी प्रकट होते हैं । पहचानने में दूसरी कठिनाई विषाणु की कम सांद्रता है । आजकल मुख्यतः आई.एस.इ.एम. एलीसा टेस्ट ही उपयोग में लाये जा रहे हैं ।

खुंभी के विषाणु का प्रबंधन:

इन रोगों से बचाव के लिये सफाई बहुत आवश्यक है । विषाणु ग्रसित सर्वधन को 330 डग्री से.ग्रे. पर 2 हफ्ते रखने के बाद और नवजात कवकजाल के सिरे से फिर से सर्वधन बनाकर 250 डिग्री से.ग्रे. पर रखने से नया बनने वाला सर्वधन विषाणु रहित रहता है ।

अनेरिकस बाइस्पोरस पर लगने वाले सभी विषाणु अगेरिकस बाइटारकस पर बिल्कुल नहीं लगते । अन्य प्रभेदों की तुलना में एगरिकस बाइस्पोरस के कुछ प्रभेदो जैसे, भूरा, हल्का पीला, गंदला सफेद विशिष्ट लक्षण नहीं दर्शाता । फार्म में लगातार गंदला सफेद या चिकनी सफेद खुंभी के प्रभेद या अगेरिकस बाइटारकस के लगाने से विषाणु के निवेश द्रव्य में कमी आती है ।

(D) असमान्य अनियमितताएं:

कई बार अनेकों प्रकार के अजैविक कारकों के कारण से खुंभी की वृद्धि के लिये उपयुक्त वातावरण उपलब्ध नहीं हो पाता । जिसके कारण से गुणवत्ता प्रभावित होती है जिसके कारण उपज की गुणवत्ता और मात्रा में कमी आती है । ये अजैविक कारक क्रियाधार में कम या अधिक नमी, पी.एच. तापक्रम, कमरे में कार्बन डाइ आक्साइड की सांद्रता, हवा की गति, आपेक्षिक आर्द्रता आदि है ।

इनमें से अनेकों कारकों के कारण क्रियाधार खुंभी के कवकजाल के लिये विशिष्ट नहीं रह पाता और यह अन्य मोल्ड कवकों व कीडों को आर्कषित करता है जो कि सामान्य खुंभी के उत्पादन को प्रभावित करते हैं ।

चूंकि बटन खुंभी का उत्पादन अधिकांशतः प्राकृतिक वातावरण में होता अतः निम्न अजीवित असामान्यताएं प्रायः पायी जाती हैं:

i. स्ट्रोमा:

साधारण नाम:

स्ट्रोमा, सेक्टर, सेक्टरिंग

कई बार केसिंग के ऊपर या स्पानयुक्त खाद की सतह से ऊपर सफेद सा, जैसे कवक जाल की वृद्धि दिखायी देती है, जिसे स्ट्रोमा कहते हैं । खाद के ऊपर

स्ट्रोमा छोटे-छोटे धब्बों के रूप में पाये जाते हैं जो कि आपस में मिलकर बड़ा क्षेत्र बना लेते हैं । पिन हेड बनने के पहले केसिंग पर स्ट्रोमा बनते हैं परंतु पानी देने के बाद शीघ्र ही सडने लगते हैं ।

सेक्टर स्पान का एक भाग है, जो कि सामान्य रचना में स्पान से अलग दिखायी पडता है । सेक्टर अत्याधिक सफेद, अधिक घना या असाधारण रूप से उठा हुआ और हमेशा सामान्य स्पान से अलग रहता है ।

स्ट्रोमा और सेक्टर, स्पान के अनुवांशिक गुणों से संबंधित रहते हैं परंतु स्पान को ठीक प्रकार से नहीं रखने या रसायनों के पेट्रोलियम युक्त धुंए के, भण्डारण, परिवहन या फार्म पर रसायनों के संपर्क में आने के कारण भी स्ट्रोमा बनने लगते हैं ।

इससे बचाव के लिये ध्यान रखना आवश्यक है कि जैसे ही केसिंग में थोडी बहुत रूई जैसी कवक फैल जाये, कमरे में एकदम ताजी हवा छोड देना चाहिए, ताकि कमरे में तापमान कम व आक्सीजन खूब मात्रा में बढ जाये । शुरू-शुरू में केसिंग पर नई रूई जैसे कवक जाल को ताजी निर्जीवीकृत केसिंग मिट्‌टी में ढकते जाना चाहिए । इससे खुंभी का निकलना शुरू हो जायेगा ।

ii. वीपर्स:

साधारण नाम:

वीपर्स, स्ट्रीकर्स, लीकर्स

वीपर्स कहलाने वाली खुंभी की टोपी से अत्याधिक मात्रा में पानी निकलता है । जब तने या टोपी से पानी की छोटी बूंदे निकलती हैं तब ऐसे खुंभी लीकर्स कहलाते हैं । ये पानी की बूंदें संख्या में कम होती है और एक दूसरे से अलग रहता है या बहुत अधिक संख्या में रहती है और खुंभी को ढक लेती हैं । वीपर्स खुंभी धुलकर सफेद स्पंज बनाता है । वीपर्स के नीचे केसिंग परत पर पानी जमा हो जाता है और प्रभावित क्षेत्र में सडी गंध आती है ।

खुंभी को वीपर्स बनाने वाले कारक ज्ञात नहीं हैं परंतु खाद में 64 प्रतिशत से कम नमी और केसिंग में अत्याधिक नमी से वीपर्स बने हैं । चिकनी सफेद खुंभी वीपर्स और लीकर्स से बचे रहते हैं । अन्य दूसरे प्रकार जैसे गंदला सफेद, हल्का पीला, सुनहरा सफेद आदि इस खुंभी बीमारी के प्रति रोगग्राही रहते हैं ।

iii. फ्लॉंक:

साधारण नाम:

फ्लॉंक, सख्त खुंभी

फ्लॉंक खुंभी की टोपी और गिल के उतकों में पाया जाने वाला आकारकीय उत्प्रेरित अनियमितता है । टोपी जल्दी खुल जाती है और प्रभावित खुंभी के गिल छोटे, अविकसित और कम रग वाले होते हैं ।

प्रायः प्रथम फसल में फ्लॉक वाली खुंभी दिखायी पडती हैं और बाद की अन्य फसलों में गायब हो जाती हैं । कई बार आगे आने वाली फसलों में ये बढते जाते हैं । खुंभी के फ्लॉंक होने के कारण अनुवांशिक है और कई प्रभेदों में यह अनियमितता बहुत ज्यादा पायी जाती है ।

वातावरण की अवस्था जैसे डीजल का धुआँ, तेलीय धुआँ, भाप यंत्र में पाये जाने वाले कुछ रसायन या कुछ बीमारियां जैसे उल्टा सूखा रोग, भूरी प्लास्टर रोग और फाल्स ट्रफल में फ्लॉंक लक्षण दिखायी देते हैं ।

फ्लॉंक लक्षण का ही एक बदलाव कडी टोपी है । इसमें फ्लॉंक की तरह ही टोपी और गिल रहते है और तने के आकार की तुलना में टोपी बहुत छोटा रहती है । केसिंग पर सीमित क्षेत्र में कडी टोपी वाली खुंभी रहती हैं परंतु कभी-कभी करीब 30 प्रतिशत क्षेत्र में कडी टोपी वाली खुंभी लगती हैं ।

iv. खोखला डंठल एवं भूरा पिथ:

अन्य प्रभेदी की तुलना में हल्के पीले प्रभेद अत्यधिक प्रभावित होते है, हालांकि गंदले सफेद प्रभेदो में भी खोखले डंठल पाये जाते है । जब तुड़ाई के बाद तने के सिरे को काटते हैं तो तने के बीच में गोलाकर छेद डंठल की लंबाई तक फैला रहता है या उससे कम छोटा रहता है । यह अनियमितता पानी की कमी और पानी देने से संबंधित है ।

v. बैंगिनी तना:

साधारण नाम:

बैंगनी तना, काला पांव, भंडारण बम

तोड़ाई के कुछ घंटों बाद या रातभर शीत ग्रह (360 डिग्री फेरनहाइट) में रखने के बाद खुंभी के कटे तनों का रंग गहरा बैंगनी हो जाता हैं । कभी-कभी बैंगनी की बजाय काला हो जाता है और यह बदलाव खुंभी के सभी प्रभेदों जैसे चिकना सफेद, गंदला सफेद, हल्के पीले और भूरे में पाया जाता है ।

तीसरी तुडाई से अंतिम फसल तक की खुंभीयां प्राय: ज्यादा रोगग्राही होती है । बाद की खुंभी में एन्जाइम पॉलीफीनॉल आक्सीडेज बढ जाता है और यह एन्जाइम रंग बनाने को प्रभावित करता है । वह कारक जिसके कारण खुंभी में यह बीमारी पायी जाती है, ज्ञात नहीं है । परंतु तोडाई के पहले डाले गये पानी की मात्रा और संख्या का प्रभाव इस पर पडता है ।

vi. रोज कोम्ब:

कई बार खुंभी की टोपियों में या निचले सतह पर गलफडों में रूस्टर कलगी की तरह असामान्य बढत नजर आती है । खुंभी टेढी-मेढ़ी व असामान्य शक्ल की हो जाती है । बाद में खुंभी फट भी सकती है । इसके बाद यह भूरी हो जाती है ।

खुंभी के कोयले, कोलतार, मिट्‌टी के तेल या पेट्रोल व डीजल जैसे पदार्थों के धुएँ आदि के सम्पर्क में आने से यह समस्या आ जाती है ।

vii. स्केल्स या क्रोकोडायल्स:

खुंभी की टोपी के और बढ़ने के बावजूद सतह वाले ऊतकों के नहीं बढने से स्केल दिखायी पड़ते हैं । बहुत अधिक सूखा या तेज गति की हवा स्केल बनने का मुख्य कारण है ।

फार्मेल्डीहाइड की तेज वाष्प या नाशक जीव नियंत्रण वाले रसायनों की अधिक मात्रा के कारण से भी अविकसित खुंभी की बाहरी त्वचा फटने लगती है । जैसे-जैसे खुंभी बढती जाती है, त्वचा फट जाती है और मगरमच्छ त्वचा बन जाती है । सफेद खुंभीयों की त्वचा में गंदले सफेद और हल्के पीले रंग की खुंभी स्केल बनने के प्रति ज्यादा संवेदी पाये गये ।

viii. लंबे तने वाली खुंभी:

कमरे में ताजी हवा यानि ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाये या कार्बन डाई ऑक्साइड अधिक हो तो लंबे-लंबे तने व छोटी टोपियों वाली खुंभी बनने लगती हैं । कमरे में ताजी हवा का उपयुक्त संचालन से खुंभी फिर से सामान्य रूप से निकलने लगती है ।

मौसमी खुंभीयो में छोटे पिन हेड या अर्द्धविकसित खुंभी भूरी होने लगती हैं । इसका कारण अधिक तापक्रम पर अधिक दबाव (04 एटमास्फीयर) से सिंचाई करना, अधिक क्लोरीन वाले पानी का उपयोग या फार्मेलिन की गलत मात्रा आदि है ।

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