Read this article in Hindi to learn about the systems followed by state government to control urban bodies. The types are:- 1. विधायी नियन्त्रण (Legislative Control) 2. कार्यपालिकीय या प्रशासनिक नियन्त्रण (Executive or Administrative Control) 3. वित्तीय नियंत्रण (Financial Control) and a Few Others.

संवैधानिक स्वरूप प्राप्त करने के बाद स्थानीय शासन संस्थाओं को काफी अधिकार और उनके प्रयोग की स्वायत्तता प्राप्त हो गयी है । परन्तु यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि इस स्वायत्तता का प्रयोग विधि सम्मत और जनहित में हो । जैसा कि लार्ड एक्टन ने कहा- “सत्ता बिगाड़ती है और भ्रष्ट सत्ता अधिक बिगाड़ती है ।”

चूंकि राज्य सरकार के तीन अंग हैं:

(1) कार्यपालिका,

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(2) विधायिका और

(3) न्यायपालिका ।

अतएव स्थानीय निकायों पर सरकारी नियन्त्रण इन अंगों से संबंधित होता है, यद्यपि मुख्य नियन्त्रण कार्यपालिकीय या प्रशासनिक नियन्त्रण ही होता है ।

1. विधायी नियन्त्रण (Legislative Control):

a. यद्यपि संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा अब नगरीय संस्थाओं की स्थापना राज्यों के द्वारा बाध्यकारी है तथापि उनकी स्थापना के साथ उनका सांगठनिक स्वरूप, कार्य, शक्तियां और अधिकार आदि का निर्धारण राज्य विधायिका के अधीन है ।

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b. विधायिका अधिनियम पारित करते समय और उसके बाद इसमें संशोधन करके नगरीय निकायों पर नियन्त्रण अध्यारोपीत करती है ।

c. इन निकायों के क्रियाकलापों पर वह मंत्रिपरिषद से सवाल-जवाब करके भी नियंत्रण को सुनिश्चित करती है ।

d. राज्य बजट में स्थानीय निकायों को दी जाने वाली राशि पर बहस, मतदान द्वारा विधायिका इन पर वित्तीय नियन्त्रण लागू करती है ।

2. कार्यपालिकीय या प्रशासनिक नियन्त्रण (Executive or Administrative Control):

यह सबसे प्रभावशाली नियन्त्रण है । मंत्रिपरिषद या कार्यपालिका का नियन्त्रण प्रत्यक्ष नियन्त्रण होता है ।

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जैसे:

i. नगरीय निकायों को दर्जा देना जैसे नगर पंचायत या नगर पालिका या नगर निगम घोषित करना ।

ii. नगरीय निकायों की सीमा में परिवर्तन करना ।

iii. नगरीय निकायों को समय पूर्व भंग करना ।

iv. पार्षदों की संख्या का निर्धारण, उनमें सदस्यों का मनोनयन ।

v. वार्डों की संख्या का निर्धारण ।

vi. इसकी समितियों का निर्धारण करके ।

vii. निकायों की अधिकार सीमा का निर्धारण ।

viii. निकायों का निरीक्षण करके ।

ix. इन निकायों से कार्यों का प्रतिवेदन प्राप्त करके भी उन पर नियंत्रण रखा जाता है ।

x. कुछ कार्यों को अंतिम स्वीकृति के अधीन रखना ।

xi. जनहित में निकायों को कतिपय कार्य करने का आदेश देना ।

xii. इनके निर्णयों, कार्यों के विरूद्ध जन शिकायतों, अपीलों को सुनना और निर्णय करना ।

xiii. निकायों के कार्मिकों की नियुक्ति, स्थानांतरण, पदमुक्ति और अन्य आनुशासनिक कार्यवाही ।

xiv. इनकी योजनाओं की तकनीकी समीक्षा करके और उनकी तकनीकी स्वीकृति देने या न देने के आधार पर ।

इस प्रकार प्रशासनिक नियन्त्रण का दायरा व्यापक और प्रभाव तुलनात्मक रूप से अधिक है ।

3. वित्तीय नियंत्रण (Financial Control):

नगरीय निकायों पर राज्य का प्रभावशाली वित्तीय नियन्त्रण होता है ।

यह नियन्त्रण उसके तीनों अंगों के माध्यम से निम्नानुसार लागू होता है:

A. सर्वाधिक प्रभावशाली वित्तीय नियंत्रण कार्यपालिका का होता है, जो उनके बजट की सीमा तय करती है, उसकी अंतिम स्वीकृति देती है । इनके पदाधिकारियों, समितियों, प्रशासनिक अधिकारियों के व्यय स्वीकृत करने और खर्च करने के अधिकारों के बारे में नियम भी कार्यपालिका बनाती है ।

कार्यपालिका उन करों का निर्धारण करती है जो उन्हें लागू और वसूल करने के लिये सौंपे जाते हैं । कार्यपालिका अपनी संचित निधि से इन्हें ऋण भी दे सकती है ।

B. विधायिका भी इन संस्थाओं पर वित्तीय नियंत्रण रखती है । इनके बजट की राशि राज्य कार्यपालिका के बजट का भाग होता है, जिन पर विधायिका बहस और मतदान करती है । इस बजट में ही निकायों को दिये जाने वाले ”अनुदान” का उल्लेख होता है, जिन पर भी बहस, मतदान होता है ।

निकायों की वित्तीय शक्तियों में वृद्धि करने या होने वाली अनियमितताओं पर बहस प्रस्ताव लाने का काम भी विधायिका का निकायों पर नियन्त्रण आरोपित करता है ।

C. न्यायपालिका भी इनकी वित्तीय शक्तियों के प्रयोग का परीक्षण कर सकती है, यदि इस संबंध में अनियमितताओं या विसंगतियों को न्यायालय के ध्यान में लाया जाता है ।

4. न्यायिक नियन्त्रण (Judicial Control):

राज्य में स्थित न्यायालय, विशेष रूप से उच्च न्यायालय भी नगरीय निकायों पर नियन्त्रण रखता है ।

यह निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट है:

i. निकायों के द्वारा निर्मित अधिनियमों, नियम प्रक्रियाओं की संवैधानिक समीक्षा करके ।

ii. कार्यों में जनता के साथ भेदभाव या उपेक्षापूर्ण व्यवहार करने पर ।

iii. अधिकारों से अधिक शक्तियों का उपयोग करने पर ।

iv. शक्तियों का मनमाना प्रयोग करने पर ।

वस्तुत: न्यायिक नियन्त्रण स्वमेव सुनिश्चित नहीं होता, अपितु पीड़ित पक्ष को न्यायालय के ध्यान में विधिवत तरीके से अनियमितता को लाना पड़ता है ।

5. जन-नियन्त्रण (Public Control):

a. जनता अपने निकायों के कार्यों से सीधी जुड़ी और प्रभावित होती है । उसका नियन्त्रण इन पर सर्वाधिक प्रभावी हो सकता है यदि जनता जागरूक हो ।

b. वह समाचार पत्रों के माध्यम से या उच्चाधिकारियों को शिकायत प्रेषित कर या निकाय या पदाधिकारी का घेराव कर, धरना-प्रदर्शन आदि द्वारा इन पर नियन्त्रण रखने का प्रयास करती है ।