साका राजवंश: इतिहास और उत्पत्ति | Saka Dynasty: History and Origin. Read this article in Hindi to learn about:- 1. शक इतिहास के साधन (Saka Dynasty’s Tools of History) 2. शक इतिहास के उत्पत्ति तथा प्रसार (Origin and Exposure of Saka Dynasty) and Other Details.

शक राजवंश के इतिहास के साधन (Saka Dynasty’s Tools of History):

शकों के प्रारम्भिक इतिहास के ज्ञान के लिये हमें मुख्यतः चीनी-स्रोतों पर निर्भर करना पड़ता है । इनमें पान-कू कृत सिएन-हान-शू अर्थात् प्रथम हान वंश का इतिहास तथा फान-ए कृत हाऊ-हान-शू अर्थात् परवर्ती हान वंश का इतिहास उल्लेखनीय हैं ।

इनके अध्ययन से यू-ची, हूण तथा पार्थियन जाति के साथ शकों के संघर्ष तथा उनके प्रसार का ज्ञान होता है । चीनी ग्रन्थ तथा लेखक शकों को ‘सई’ अथवा ‘सई वांग’ कहते हैं । भारत में शासन करने वाले शक तथा पह्लव शासकों का ज्ञान हमें मुख्य रूप से उनके लेखों तथा सिक्कों से होता है ।

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शकों के प्रमुख लेख निम्नलिखित हैं:

(i) राजवुल का मथुरा सिंह-शीर्ष, स्तम्भलेख ।

(ii) शोडास का मथुरा दानपत्रलेख ।

(iii) गहपानकालीन नासिक के गुहालेख ।

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(iv) नहपानकालीन जुन्नार का गुहालेख ।

(v) उषावदात के नासिक गुहालेख ।

(vi) रुद्रदामन् का अन्धौ (कच्छ की खाड़ी) का लेख ।

(vii) रुद्रदामन् का गिरनार (जूनागढ़) का लेख ।

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(viii) गोण्डोफर्नीज का तख्ते-बाही (पेशावर के युसुफजई क्षेत्र में स्थित) का लेख ।

सातवाहन राजाओं के लेखों से शकों के साथ उनके सम्बन्धों का ज्ञान होता है । लेखों के अतिरिक्त पश्चिमी तथा उत्तरी पश्चिमी भारत के बड़े भाग से शक राजाओं के बहुसंख्यक सिक्के प्राप्त हुये हैं । कनिष्क के लेखों से पता चलता है कि कुछ शक-क्षत्रप तथा महाक्षत्रप उसकी अधीनता में देश के कुछ भागों में शासन करते थे ।

भारतीय साहित्य में भी शकों का पत्र-तत्र उल्लेख प्राप्त होता है । रामायण तथा महाभारत में यवन, पह्लव आदि विदेशी जातियों के साथ शकों का उल्लेख हुआ है । कात्यायन तथा पतंजलि भी शकों से परिचित थे । मनुस्मृति में हम इनका उल्लेख पारद, द्रविड़, पह्लव आदि के साथ पाते हैं ।

पुराणों में भी शक, मुरुण्ड, यवन आदि जातियों का उल्लेख किया गया है । इनके अतिरिक्त कई अन्य भारतीय ग्रन्थ, जैसे गार्गीसंहिता, विशाखदत्त कृत देवीचन्द्रगुप्तम्, बाण कृत हर्षचरित, राजशेखर कृत काव्यमीमांसा आदि भी शकों से परिचित हैं ।

जैन स्रोतों में शकों के विषय में विस्तृत विवरण दिया गया है । जैन ग्रन्थ ‘कालकाचार्य कथानक’ में उज्जयिनी के ऊपर शकों के आक्रमण तथा विक्रमादित्य द्वारा उनके पराजित किये जाने का विवरण सुरक्षित है । भारतीय साहित्य में शकों के प्रदेश को ‘शकद्वीप’ अथवा ‘शकस्थान’ कहा गया है ।

शक इतिहास के उत्पत्ति तथा प्रसार (Origin and Exposure of Saka Dynasty):

शक मूलतः सीरदरया के उत्तर में निवास करने वाली एक खानाबदोश तथा बर्बर जाति थी । चीनी ग्रन्थों से पता चलता है कि 165 ईसा पूर्व के लगभग यू-ची नामक एक अन्य जाति ने उन्हें परास्त कर वहाँ से खदेड़ दिया । शकों ने सीरदरया पार कर बल्ख (बैक्ट्रिया) पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ के यवनों को परास्त कर भगा दिया ।

परन्तु यू-ची जाति ने वहाँ भी उनका पीछा किया तथा शक पुन: परास्त हुये । पराजित शक जाति दो शाखाओं में विभक्त हो गयी । उनकी एक शाखा दक्षिण की ओर गयी तथा कि-पिन (कपिशा) पर अधिकार कर लिया । दूसरी शाखा पश्चिम में ईरान की ओर आई । वहाँ उसे शक्तिशाली पार्थियन सम्राटों से युद्ध करना पड़ा ।

शकों ने दो पार्थियन राजाओं-फ्रात द्वितीय (128 ईसा पूर्व) तथा आर्तबान (123 ईसा पूर्व) को पराजित कर पूर्वी ईरान तथा एरियाना के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । परन्तु पार्थियन नरेश मिथ्रदात द्वितीय (123-88 ईसा पूर्व) ने शकों को बुरी तरह परास्त कर ईरान के पूर्वी प्रदेशों पर पुन: अधिकार कर लिया ।

यहाँ से भागकर शक हेलमन्ड घाटी (दक्षिणी अफगानिस्तान) में आये तथा वहीं बस गये । इस स्थान को शकस्थान (सीस्तान) कहा गया । यहाँ से कान्धार और बोलन दर्रा होते हुये वे सिन्धु नदी-घाटी में जा पहुँचे । उन्होंने सिन्ध प्रदेश में अपना निवास-स्थान बना लिया । शकों के साथ सम्पर्क के कारण इस स्थान को ‘शक-द्वीप’ कहा गया । इस प्रकार भारत में शक पूर्वी ईरान से होकर आये थे ।

उन्होंने पश्चिमोत्तर प्रदेशों से यवन-सत्ता को समाप्त कर उत्तरापथ एवं पश्चिमी भारत के एक बड़े भू-भाग पर अपना अधिकार कर लिया । तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र, उज्जयिनी आदि स्थानों में शकों की भिन्न-भिन्न शाखायें स्थापित हुयीं । शक नरेशों के भारतीय प्रदेशों के शासक ‘क्षत्रप’ कहे जाते थे ।

तक्षशिला के शक शासक (Saka Ruler of Taxila):

तक्षशिला के प्रारम्भिक शक शासकों में मेउस का नाम सर्वप्रमुख है । सामान्यतः उसका समय 20 ईसा पूर्व से 22 ईस्वी तक माना जाता है । पश्चिमोत्तर प्रदेशों से उसके अनेक सिक्के मिलते हैं । उनकी पहचान तक्षशिला ताम्रपत्र के ‘महाराज मोग’ से की जाती है ।

अल्टेकर का विचार है कि वह पहले पार्थियनों का सामन्त था । पार्थियन शासक के निर्बल पड़ जाने पर उसने अपने को स्वतन्त्र कर लिया । उसके साम्राज्य में पूर्वी गान्धार सम्मिलित था तथा तक्षशिला उसकी राजधानी थी । सिक्कों के आधार पर कहा जाता है कि उसका साम्राज्य पुष्कलावती, कपिशा तथा पूर्व में मथुरा तक विस्तृत था ।

वह भारत का प्रथम शक-विजेता था । मेउस के पश्चात् एजेज तक्षशिला का शक शासक हुआ । वह भी एक प्रतापी राजा था । उसने पंजाब में यूथीडेमस कुल के यवनों को परास्त कर वहाँ अपना आधिपत्य कायम किया । उसने यवन नरेश अपोलोडोटस द्वितीय तथा हिप्पास्ट्रेटस की मुद्राओं को पुनरंकित करवाया ।

एजेज के बाद एजिलिसेज राजा हुआ । वह संभवतः एजेज का पुत्र था तथा कुछ समय तक उसने अपने पिता के साथ मिलकर राज्य किया था । एजिलिसेज की मुद्रायें दो प्रकार की हैं । प्रथम प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर यूनानी लिपि में एजेज का नाम तथा पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी में एजिलिसेज का नाम मिलता हैं ।

इन दोनों को ‘महाराज’ कहा गया है । द्वितीय प्रकार की मुद्राओं के मुख भाग पर यूनानी में एजिलिसेज तथा पृष्ठ भाग पर खरोष्ठी में एजेज नाम उत्कीर्ण है । इस आधार पर विद्वानों का अनुमान है कि एजेज नाम के दो शक शासक हुए । एजिलिसेज के पहले एजेज प्रथम हुआ तथा एजेज द्वितीय एजिलिसेज के बाद राजा हुआ । एजेज द्वितीय के ही समय से पश्चिमोत्तर भारत से शकों की शक्ति का ह्रास प्रारम्भ हो गया ।

इसके लिये दो कारण उत्तरदायी थे:

(1) फ्रायोटीज नामक एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने तक्षशिला पर अधिकार कर लिया ।

(2) पश्चिम की ओर से गोण्डोफर्नीज ने शक राज्य पर आक्रमण किया तथा बाद में तक्षशिला पर अधिकार कर लिया ।

फिलोस्ट्रेटस के विवरण से ज्ञात होता है कि फ्रायोटीज एक शक्तिशाली राजा था तथा सिन्ध प्रदेश के क्षत्रप पर भी उसका अधिकार था । ऐसा प्रतीत होता है कि फ्रायोटीज को पराजित करने के बाद ही पार्थियन गोण्डोफर्नीज ने तक्षशिला पर अपना अधिकार किया था ।

इस प्रकार तक्षशिला में शकों का शासन समाप्त हुआ । मेउस से एजेज द्वितीय तक के राजाओं ने लगभग 20 ईसा पूर्व से 43-44 ईस्वी तक शासन किया । भारतीय शासनतन्त्र के विकास में उनका मुख्य योगदान यह था कि उन्होंने क्षत्रप शासन-प्रणाली का प्रचलन किया ।

चुक्ष (तक्षशिला के उत्तर में वर्तमान चच), कपिशा, अभिसार, प्रस्थ, पुरुषपुर (पेशावर), शाकल, मथुरा आदि प्रदेशों में क्षत्रपों की नियुक्ति की गयी थी । इनमें से अधिकांश क्षत्रप कुलों ने शकों के पतन के बाद पह्लवों तथा कुषाणों की अधीनता में शासन किया ।

मथुरा के शक-क्षत्रप:

मथुरा में शकों का शासन कब और कैसे स्थापित हुआ यह निश्चित रूप से बता सकना कठिन है । टार्न तथा स्टेनकोनो जैसे कुछ विद्वान जैन ग्रन्थ ‘कालकाचार्य कथानक’ के आधार पर यह प्रतिपादित करते हैं कि मालवा में विक्रमादित्य (57 ईसा पूर्व) द्वारा पराजित होने और खदेड़े जाने पर शक मथुरा में आकर बस गये ।

इसी शासक को मालव अथवा विक्रम संवत् का संस्थापक माना जाता है । जैन ग्रन्थों के अनुसार इसके 135 वर्ष बाद शक-संवत् का प्रारंभ (78 ईस्वी में) हुआ । मथुरा के क्षत्रपों का तक्षशिला के शकों का साथ क्या सम्बन्ध था, यह भी ठीक-ठीक पता नहीं है । मथुरा के सिंह-शीर्ष अभिलेख में इस क्षेत्र के अनेक शक सरदारों के नाम मिलते हैं ।

संभवतः यह अभिलेख महाक्षत्रप राजूल के काल में उसकी प्रधान महिषी द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था । राजूल का समीकरण महाक्षत्रप राजवुल से किया जाता है जिसका उल्लेख मोरा (मथुरा) से प्राप्त ब्राह्मी में उत्कीर्ण लेख में हुआ है । मथुरा सिंहशीर्ष अभिलेख से पता चलता है कि राजूल या राजवुल मथुरा का प्रथम शासक था ।

उसके सिक्कों पर ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि खुदी हुई मिलती है । सिक्के सिन्धु नदी घाटी से गंगा के दोआब तक पाये गये हैं । सिक्कों की प्राप्ति-स्थानों से ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि राजवुल का अधिकार पूर्वी पंजाब से मथुरा तक था ।

राजवुल के बाद उसका पुत्र शोडास राजा हुआ । मथुरा से उसके अभिलेख तथा सिक्के मिलते हैं । उसके सिक्कों पर केवल ‘क्षत्रप’ की उपाधि मिलती है परन्तु आमोहिनी दान-पत्र में उसे ‘महाक्षत्रप’ कहा गया है । ऐसा लगता है कि अपने पिता की मृत्यु के बाद वह महाक्षत्रप बना था ।

पूर्वी पंजाब से उसका कोई सिक्का नहीं मिलता । इससे ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उसका राज्य केवल मथुरा तक ही सीमित था । शोडास के उत्तराधिकारियों के विषय में हमें पता नहीं है । एक सिक्के पर ‘तोरणदास’ नामक किसी शक-सरदार का उल्लेख हुआ है जो अपने को महाक्षत्रप का पुत्र बताता है ।

संभव है कि वह शोडास का ही पुत्र रहा हो । इसके पश्चात् मथुरा से शकों की स्वतन्त्र सत्ता का अन्त हो गया तथा वहाँ कुषाणों का आधिपत्य हो गया । अब शक क्षत्रप कुषाण नरेशों की अधीनता में शासन करने लगे ।

पश्चिमी भारत में शक वंशों के प्रमाण (Proof Regarding the Presence of Saka Dynasty in West India):

पश्चिमी भारत में शक वंशों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं:

इनका विवरण इस प्रकार है:

(1) महाराष्ट्र का क्षहरात वंश:

इस वंश ने संपूर्ण महाराष्ट्र, लाट तथा सुराष्ट्र प्रदेश पर शासन किया । क्षहरात वंश का पहला राजा भूमक था । उसके सिक्के गुजरात, काठियावाड़ तथा मालवा के क्षेत्र से मिलते हैं । सिक्कों पर ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों में लेख लिख गये हैं ।

खरोष्ठी लिपि के प्रयोग से ऐसा लगता है कि पश्चिमी राजपूताना तथा सिन्ध के कुछ भागों पर भी उसका अधिकार था । भूमक का कोई अभिलेख नहीं मिलता । नहपान इस वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था । इसके सिक्के अजमेर से नासिक तक के क्षेत्र से मिले हैं । ये चाँदी तथा ताँबे के हैं ।

सिक्के निश्चित मानक के हैं । उसके समय में सोने तथा चांदी के सिक्के (कार्षापण) की विनिमय दर 1:35 थी । नासिक के एक लेख में 70 हजार कार्षापणों का मूल्य 2000 स्वर्ण मुद्रा में दिया गया है । सिक्कों पर वह ‘राजन्’ की उपाधि धारण किये हुए हैं । नहपान के अमात्य अर्यमन् का एक अभिलेख जुन्नार (पूना) से मिलता है ।

उसके दामाद ऋषभदत्त (उषावदात) के गुहालेख नासिक तथा कार्ले (पूना) से मिले हैं । ऋषभदत्त, नहपान के समय में उसके दक्षिणी प्रान्त-गोवरधन (नासिक) तथा मामल्ल (पूना) का वायसराय था । नासिक के एक गुहालेख रो ज्ञात होता है कि जब राजस्थान के उत्तमभद्र जाति के लोग मालयों (मालवों) से घिर गये, तो उनकी रक्षा के लिये ऋषभदत्त वहाँ गया था ।

उसने मालवों को बुरी तरह परास्त किया तथा इसके बाद पुष्करतीर्थ में दान दिया । इससे ऐसा प्रतीत होता है कि राजपूताना के पुष्करतीर्थ (अजमेर) क्षेत्र पर भी नहपान का प्रभाव था । नासिक तथा पूना जिलों को उसने सातवाहनों से जीता था । इस प्रकार उसका राज्य उत्तर में अजमेर से लेकर दक्षिण में उत्तरी महाराष्ट्र तक विस्तृत था ।

पेरीप्लस के अनुसार उसकी राजधानी मिन्नगर (भडौंच तथा उज्जैन के बीच स्थित) थी । नहपान ने लगभग 119 ईस्वी से 125 ईस्वी तक राज्य किया । वह सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा पराजित हुआ और मार डाला गया । जोगलथम्बी से प्राप्त नहपान के बहुसंख्यक सिक्के गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा पुनरंकित किये गये हैं ।

इससे ऐसा लगता है कि गौतमीपुत्र ने नहपान के जोगलथम्बी स्थित कोषागार पर अधिकार कर लिया । नहपान के उत्तराधिकारी के विषय में हमें ज्ञात नहीं है । लगता है कि उसकी मृत्यु के साथ ही पश्चिमी भारत से क्षहरातों की शक्ति का अन्त हो गया ।

(2) कार्दमक (चष्टन) वंश अथवा सुराष्ट्र और मालवा के शक-क्षत्रप:

क्षहरातों के पश्चात् सुराष्ट्र तथा मालवा में शकों के एक दूसरे कुल ने शासन किया । यह नया वंश ‘कार्दमक वंश’ के नाम से प्रसिद्ध है । पश्चिमी भारत में इस नवीन वंश की सत्ता स्थापित करने वाला पहला शासक चष्टन था । वह यसमोतिक का पुत्र था । चष्टन संभवतः कुषाणों की अधीनता में पहले सिन्ध क्षेत्र का क्षत्रप था ।

नहपान की मृत्यु के वाद उसे कुषाण साम्राज्य के दक्षिणी-पश्चिमी प्रान्त का वायसराय नियुक्त किया गया । लगता है कि बाद में उसने अपने को स्वतन्त्र कर लिया तथा ‘महाक्षत्रप’ की उपाधि धारण कर ली । वृद्धावस्था में चष्टन ने अपने पुत्र जयदामन् को क्षत्रप नियुक्त किया । संभवतः उसने सातवाहनों से उज्जयिनी को जीत लिया था ।

चष्टन के जीवन काल में ही जयदामन् की मृत्यु हो गयी और वह स्वतन्त्र शासक नहीं हो पाया । उसके बाद चष्टन ने अपने पौत्र (जयदामन् के पुत्र) रुद्रदामन् प्रथम को क्षत्रप नियुक्त किया । अन्धी (कच्छखाड़ी) अभिलेख से ज्ञात होता है कि 130 ईस्वी में चष्टन अपने पौत्र रुद्रदामन् के साथ मिलकर शासन कर रहा था ।

चष्टन का पुत्र जयदामन् कभी महाक्षत्रप नहीं बन सका । मुद्राओं पर उसकी उपाधि केवल ‘क्षत्रप’ की है । इस आधार पर बूलर तथा भण्डारकर ने यह निष्कर्ष निकाला है कि उसके समय में शकों को सातवाहनों के हाथों पराजय उठानी पड़ी थी । परन्तु इस प्रकार का निष्कर्ष असंगत है ।

अन्धौ के अभिलेख से स्पष्ट हो जाता है कि चष्टन तथा रुद्रदामन् सहशासक थे । अत: जयदामन् को स्वतन्त्र रूप से शासन करने का अवकाश ही नहीं मिला । ऐसी स्थिति में सातवाहनों द्वारा उसके समय में शकों की पराजय का प्रश्न ही नहीं उठता ।

जूनागढ़ अभिलेख:

गुजरात के जूनागढ़ से प्राप्त एक महत्वपूर्ण अभिलेख है । जिस शिला पर यह उत्कीर्ण है उसी पर अशोक के चौदह प्रज्ञापनों की एक प्रति तथा स्कन्दगुप्त के दो लेख भी खुदे हुए हैं । जूनागढ़ से लगभग एक मील पूरब की ओर गिरनार पर्वत के पास जाने वाले दर्रे के पास यह स्थित है ।

जूनागढ़ का नाम इसमें ‘गिरिनगर’ दिया गया है जो बाद में गिरनार भी कहा जाने लगा । सर्वप्रथम 1832 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने इस लेख का पता लगाया तथा जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (JASB) के सातवें अंक में इसे प्रकाशित किया ।

तत्पश्चात् लासेन, एच. एच. विल्सन, भगवान लाल इन्द्रजी, बूलर आदि विद्वानों ने इसका उल्लेख विभिन्न शोध पत्रिकाओं में किया । अन्ततः कीलहार्न महोदय ने एपिग्राफिया इण्डिका के आठवें अंक में इसे प्रकाशित किया । यही प्रकाशन आज तक प्रामाणिक माना जाता है ।

जूनागढ़ लेख में कुल बीस पंक्तियां है जिनमें अन्तिम चार पूर्णतया सुरक्षित है । शेष कहीं-कहीं क्षतिग्रस्त हो गयी हैं । यह शुद्ध संस्कृत भाषा तथा ब्राह्मी लिपि (कुषाणकालीन) में लिखा गया है । इसमें रुद्रदामन् के शासन काल के 72 वर्ष का उल्लेख है ।

यह शक संवत् की तिथि है । तदनुसार यह लेख 78 + 72 = 150 ई. का है । जूनागढ़ लेख की रचना का मुख्य उद्देश्य सुदर्शन झील के बांध के पुनर्निर्माण का विवरण सुरक्षित रखना है । इसमें झील का पूर्व इतिहास भी लिखा गया है ।

साथ ही यह लेख रुद्रदामन् की वंशावली, विजयों, शासन, व्यक्तित्व आदि पर भी सुन्दर प्रकाश डालता है । भाषा तथा साहित्य की दृष्टि से भी इसका काफी महत्व है । विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखित यह प्राचीनतम लेखों में से है जिससे संस्कृत साहित्य के सुविकसित होने का अन्दाजा लगाया जा सकता है । जब हम यह देखते हैं कि उस समय सर्वत्र प्राकृत भाषा का ही वर्चस्व था, तब इस लेख का महत्व स्पष्ट हो जाता है । भाषा की दृष्टि से प्राकृत के समुद्र में यह लेख एक टापू के समान ही है ।

(3) पह्लव वंश:

पह्लवों तथा शकों का इतिहास एक-दूसरे से अत्यधिक उलझा हुआ है । अत: उसे अलग-अलग करना एक कठिन कार्य है । पह्लव मूलतः पार्थिया के निवासी थे । पार्थिया, बैक्ट्रिया के पश्चिम की ओर कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में स्थित सेल्युकसी साम्राज्य का सीमावर्ती प्रान्त था ।

तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य किया के साथ ही पार्थिया के यवन क्षत्रप ने भी अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी । परन्तु शीघ्र ही पूर्व की ओर से आने वाले कुछ व्यक्तियों ने यवन शासन की हत्या कर दी तथा उन्होंने जिस साम्राज्य की नींव डाली वह पार्थियन नाम से विख्यात हुआ ।

पार्थियन साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मिथ्रदात प्रथम (171-130 ईसा पूर्व) था । पूर्व में उसने जेड्रोसिया, हेरात तथा सीस्तान की विजय की थी । उसके बाद फ्रात द्वितीय (138-128 ईसा पूर्व) तथा फिर आर्तवान (128-123 ईसा पूर्व) राजा हुये जो शकों के विरुद्ध युद्ध में मारे गये ।

मिथ्रदात द्वितीय (123-88 ईसा पूर्व) इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था । उसने शकों को परास्त किया तथा सीस्तान और कान्धार पर अधिकार कर लिया । मिथ्रदात द्वितीय के बाद भी पार्थियनों का सीस्तान, आरकोसिया, एरिया तथा काबुल घाटी में अधिकार बना रहा ।

इन प्रदेशों से मिले हुये सिक्कों से अनेक राजाओं के नाम ज्ञात होते हैं । पहले वे पार्थियन नरेशों के गर्वनर थे, परन्तु बाद में स्वतन्त्र हो गये तथा इण्डो-यूनानियों को परास्त कर उन्होंने भारत के कुछ भागों पर अधिकार भी कर लिया । भारत पर आक्रमण करने वाले पार्थियन सरदार मूलतः सीस्तान तथा आरकोसिया से आये थे । उन्हीं को भारतीय ग्रन्थों में ‘पह्लव’ कहा गया है ।

उनमें निम्नलिखित शासकों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

(i) वोनोनीज:

जिस समय शक शासक मेउस गन्धार में शासन कर रहा था, वोनोनीज, सीस्तान, आरकोसिया तथा एरिया का राजा था । वह अपने सिक्कों पर ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण करता है । उसके कुछ सिक्के यवन नरेश यूक्रेटाइडीज के सिक्कों के अनुकरण पर डाले गये हैं ।

इस प्रकार के सिक्कों पर यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों ही लिपियों में लेख प्राप्त होते हैं । सिक्कों के पृष्ठभाग पर उसके भाई श्पलहोर तथा भतीजे श्पलगडम के नाम मिलते हैं । सम्भवत: ये दोनों उसके प्रान्तीय शासक थे ।

(ii) श्पेलिरस:

वोनोनीज के बाद श्पेलिरस राजा हुआ । उसके कुछ सिक्कों के मुखभाग पर यूनानी लिपि में श्पेलिरस का नाम तथा पृष्ठभाग पर शक नरेश एजेज का नाम खुदा है । इससे ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि संभवतः शक नरेश उसकी अधीनता में उपराजा (वायसराय) था । इससे पार्थियनों का तक्षशिला पर अधिकार सूचित होता है ।

(iii) गोण्डोफर्नीज:

यह पह्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा हुआ । उसके शासन-काल का एक अभिलेख तख्ते-बाही (पेशावर जिले में स्थित) से प्राप्त हुआ जिस पर 103 की तिथि दी गयी है । यदि इसे विक्रम संवत् की तिथि स्वीकार की जाये तो ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि वह 103 – 57 = 46 ईस्वी में राज्य कर रहा था । यह तिथि उसके राज्य-काल के 26वें वर्ष की हैं । अत: उसने 20 ईस्वी (40-26) में शासन-कार्य प्रारम्भ किया था ।

गोण्डोफर्नीज के सिक्के पंजाब, सिन्ध, कान्धार, सीस्तान तथा काबुल घाटी में पाये गये हैं । इससे उसके साम्राज्य के विस्तृत होने की सूचना मिलती है । ऐसा लगता है कि शकों को परास्त कर उसने पंजाब तथा सिन्ध पर अधिकार कर लिया था ।

तक्षशिला उसकी राजधानी बनी । अस्पवर्मन्, जो पहले शक नरेश एजेज द्वितीय की अधीनता में क्षत्रप था, अब गोण्डोफर्नीज की अधीनता स्वीकार करने लगा । ईसाई अनुश्रुति में उसे ‘सम्पूर्ण भारत का राजा’ कहा गया है जिसके शासन-काल में ईसाई धर्म का प्रचारक सेन्ट टामस भारत आया था । परन्तु इस अनुश्रुति की प्रामाणिकता काफी संदिग्ध है ।

गोण्डोफर्नीज के उत्तराधिकारियों के विषय में हमें निश्चय रूप से कुछ भी ज्ञात नहीं है । सिक्कों से दो राजाओं के नाम मिलते हैं- एब्डगेसस तथा पकोरिस । ये दोनों निर्बल शासक थे । इसके बाद कुषाणों के भारत पर आक्रमण हुए ।

कुषाणों ने पह्लव को परास्त कर यहाँ अपना शासन कायम कर लिया । परन्तु ऐसा लगता है कि पश्चिमी भारत में द्वितीय शताब्दी ईस्वी तक पह्लव की सत्ता किसी न किसी रूप से बनी रही । सातवाहन नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णि को नासिक गुहालेख में किसी पह्लव राजा को उखाड़ फेंकने का श्रेय दिया गया है ।

महाक्षत्रप रुद्रदामन् की अधीनता में सुविशाख नामक पह्लव सुराष्ट्र में शासन करता था । पार्थियन राजाओं के सिक्कों पर ‘ध्रमिय’ (धार्मिक) उपाधि उत्कीर्ण मिलती है । ऐसा लगता है कि शकों के समान वे भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुए तथा उन्होंने बौद्ध-धर्म ग्रहण कर लिया था ।

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