Read this article in Hindi to learn about the process of governance in the Delhi sultanate during medieval period in India.

उत्तर भारत में बारहवीं सदी के अंतिम वर्षो में तुर्कों ने जो राज्य स्थापित किया उसके स्वरूप और विकासक्रम को सावधानी से समझना आवश्यक है । प्रारंभिक दौर भारी खून-खराबे और नरसंहार का काल था जिसमें प्रख्यात नगर उजाड़ दिए गए और बहुत-से वैभवशाली मंदिर तोड़ दिए गए ।

किंतु इसी काल में एक नए प्रकार के राज्य की नींव रखी गई । पुराने राजपूत राज्यों के विपरीत इस साम्राज्य मैं केंद्रीय तत्व अधिक शक्तिशाली था । यद्यपि सरदारों के संरक्षण मे बहुत-से विशाल क्षेत्र थे जिनसे वे मालगुजारी इकट्‌ठा करते थे तथापि उसका अधिकाश भाग वे स्वयं पर और अपने सिपाहियों पर खर्च करते थे ।

वे सब सुल्तान की इच्छा पर काफी हद तक आश्रित होते थे और वह उनका स्थानांतरण जब चाहे तब कर सकता था । किंतु साथ ही सुल्तान के पास एक बड़ी सुगठित फौज होती थी । सुल्तान एक बड़ी फौज इसलिए रख पाता था क्योंकि वह अपने प्रशासनिक सगंठन के द्वारा किसानों की उपज का एक बड़ा भाग वसूलता था ।

ADVERTISEMENTS:

इन्हीं सेनाओं की सहायता से सुल्तानों ने दूर मदुरै तक अपना साम्राज्य फैलाया तथा दक्षिण और गुजरात के समृद्ध इलाकों में लूट-मार करके और संचित खजानों को हथिया कर अपने संसाधनों और स्थिति को मजबूत बनाया ।

पंद्रहवीं सदी के आरंभिक भाग में दिल्ली सल्तनत का विघटन हुआ और देश के विभिन्न भागों में अनेक स्वतंत्र राज्य बन गए । लेकिन इनमें से अधिकतर राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था सल्तनत की प्रशासन व्यवस्था से प्रभावित रही । यहाँ तक कि सोलहवीं सदी में विकसित मुगल प्रशासन व्यवस्था को भी सल्तनतकालीन प्रशासन व्यवस्था ने प्रभावित किया ।

सुल्तान:

हालांकि भारत के बहुत-से तुर्की सुल्तानों ने स्वयं को बगदाद के अब्बासी खलीफा हना ‘वफादार का प्रतिनिधि’ घोषित किया और लंबे समय तक जुम्मे (शुक्रवार) की न्माप्त के बाद खुत्बों में और सिक्कों में भी, उस खलीफा का नाम शामिल करते ल्है पर खलीफा की यह स्थिति केवल नैतिक थी ।

उसकी सर्वोच्च स्थिति का ऐलान करके दिल्ली के सुल्तान बस यह जता रहे थे कि वे इस्लामी दुनिया के अंग हैं । इसका उद्‌देश्य जनमत अर्थात मुस्लिम जनता को संतुष्ट करना भी था तथा उन धर्मशास्त्रियों के शक्तिशाली वर्ग को भी जिनका कहना था कि सिर्फ अब्बासी खलीफा ही वैधानिक शासक हो सकता था ।

ADVERTISEMENTS:

सुल्तान का पद सल्तनत में सबसे महत्वपूर्ण पद था । गजाली जैसे विचारक एक सुल्तान के अस्तित्व को सामाजिक जीवन की सबसे पहली आवश्यकता मानते थे क्योंकि राज्य के मामलों के संचालन के लिए यदि कोई शासक न हो तो सारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी ।

हिंदू और फारसी परंपराओं में राजा को साक्षात ईश्वर या दैवी गुणों से युक्त माना जाता था । इस्लाम को यह स्वीकार नहीं था । इस कारण सुल्तान के शरीर से नहीं उसके पद से दैवत्व जोड़ दिया गया । उसे जिल्ल-अल्लाह अर्थात ईश्वर की परछाईं कहा गया तथा जनता से और अमीरों से आशा की जाने लगी कि वे वैसे ही झुककर उसे सिज्दा करें, जैसे अल्लाह के आगे करते हैं ।

शेरशाह सूरी के एक उत्तराधिकारी के समय मैं कुलीनों से तख्त पर रखी उसकी जूतियों के सामने भी सिन्दा करने की आशा की जाती थी । सर्वोच्च राजनीतिक सैनिक और यहाँ तक कि वैधानिक सत्ता भी उसी की होती था । वह राज्य की सुरक्षा और प्रतिरक्षा के लिए जिम्मेदार था ।

इस हैसियत से वह प्रशासन के लिए जिम्मेदार था और सैन्यबलों का प्रमुख कमानदार भी था । कानून और न्याय की सुरक्षा भी उसी की जिम्मेदारी थी । वह यह कार्य करने के लिए काजी (न्यायाधीश) नियुक्त करता था पर सुल्तान काजियों के बाद अपील सुनने वाली अदालत भी था । उसके किसी भी अधिकारी की मनमानी के खिलाफ उससे सीधे अपील की जा सकती थी ।

ADVERTISEMENTS:

न्याय करना किसी भी सुल्तान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना जाता था । हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि बलबन कितनी सख्ती से न्याय करता था और अपने सबंधियों या राज्य के उच्च अधिकारियों तक को नहीं बखाता था । यही काम मुहम्मद तुगलक ने धर्मशास्त्रियों (उलमा) के साथ किया जो पहले सख्त सजाओं से मुक्त रखे जाते थे ।

फिर भी सुल्तान भले ही निरंकुश होते हों उनको अग्रणी कुलीनों सेना और धर्मशास्त्रियों जैसे शक्तिशाली तत्वों का समर्थन हासिल करना होता था और उसी तरह जनता से एक सीमा तक समर्थन या स्वीकृति भी प्राप्त करनी पड़ती थी ।

समर्थन जुटाने या जारी रखने में धर्म की यहाँ तक कि लोकप्रिय संतों तक की भूमिका एक और महत्वपूर्ण चीज होती थी । वास्तव में शायरों गायकों और दरबारी नर्तकियों की भी अपनी भूमिका होती थी ।

मुसलमानों में उत्तराधिकार का कोई स्पष्ट नियम विकसित नहीं हुआ । इस्लामी विचारक शासक के चुनाव के पक्ष में थे पर व्यवहार में किसी सफल शासक के पुत्र के उत्तराधिकार को स्वीकार कर लिया जाता था । लेकिन गद्‌दी पर एक शासक के सभी बेटों का बराबर का दावा माना जाता था । ज्येष्ठाधिकार के विचार को न तो मुसलमानों ने पूरी तरह स्वीकार किया न हिंदुओं ने । कुछ शासकों ने अपने किसी एक पुत्र को जो आवश्यक नहीं कि ज्येष्ठ हो उत्तराधिकारी घोषित करने का प्रयास किया ।

जैसा कि माना जाता है इल्तुतमिश ने अपनी बेटी को अपने बेटों पर वरीयता देकर उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया । पर ऐसे नामांकन को स्वीकार करना कुलीनों पर निर्भर होता था । मुस्लिम जनमत आम तौर पर वैधता के विचार को स्वीकार करता था, किंतु किसी सफल सिपहसालार द्वारा सत्ता के हड़पे जाने के खिलाफ सुरक्षा का कोई उपाय नहीं था जैसा कि दिल्ली सल्तनत में कई बार हुआ ।

इस तरह सैन्यबल गददी के उत्तराधिकार का प्रमुख आधार बन गया । पर जनमत को भी उपेक्षित नहीं किया जा सकता था विशेषकर राजधानी में । जनमत के भय से ही खलजी बलबन के उत्तराधिकारियों को सत्ता से हटाने के बाद लंबे समय तक पुरानी दिल्ली में प्रवेश न कर सके और उन्होंने पुरानी दिल्ली के पास अर्थात कुतुबमीनार से थोड़ी दूरी पर सीरी नामक एक नया नगर बसाया ।

केंद्रीय प्रशासन:

सुल्तान की सहायता के लिए अनेक मंत्री होते थे । इनका चयन वही करता था और वे सुल्तान की इच्छानुसार पद पर रहते थे । मंत्रियों की संख्याओं शक्तियों और अधिकारों में समय-समय पर अंतर आते रहे । तेरहवीं सदी के अंतिम भाग में प्रशासन को एक सुस्पष्ट व्यवस्था विकसित हुई । प्रशासन में केंद्रीय स्थान वजीर का था ।

आरंभिक काल में वजीर मुख्यत सेना प्रमुख होते थे । चौदहवीं सदी में वजीर को राजस्व के मामलों का विशेषज्ञ अधिक माना जाने लगा और वे एक बड़े विभाग के प्रमुख हो गए जिसका संबंध आय और व्यय दोनों से होता था । राजस्व विभाग के गठन पर मुहम्मद तुगलक ने बहुत ध्यान दिया । उसका वजीर ख्वाजा जहाँ एक सम्मानित व्यक्ति था और मुहम्मद तुगलक जब विद्रोहों से निबटने के लिए दिल्ली के बाहर जाता था तो राजधानी को उसी के भरोसे छोड़ जाता था ।

वजीर के अंतर्गत हुए व्यय की जाँच के लिए एक अलग महालेखा परीक्षक होता था और आय की जाँच के लिए एक महालेखाकार होता था । हालांकि विभिन्न हाकिमों के झगड़े इस विभाग के सुचारू कार्यकलाप को प्रभावित करते थे पर मुहम्मद तुगलक के काल में राजस्व विभाग मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद भारत में कायम होने वाले सबसे बड़े साम्राज्य के मामलों की देख-रेख करने में समर्थ रहा ।

फिरोज तुगलक ने एक धर्मातरित तैलंग बाह्मण खान-ए-जहाँ को अपना वजीर चुना जो पिछले वजीर का नायब रह चुका था । राजस्व विभाग में उसे पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त था । वजीर रूप में उसका 18 वर्ष का लंबा कार्यकाल सामान्यत: वजीर के प्रभाव का चरमोत्कर्ष माना जाता है । खान-ए-जहाँ के बाद उसका बेटा खान-ए-जहाँ द्वितीय वजीर बना ।

फिरोज की मृत्यु के बाद उसने किंग-मेकर बनने का प्रयास किया, पर इस प्रयास की असफलता से वजीर के पद को गहरा धक्का लगा । वजीर का प्रभाव फिर मुगल साम्राज्य में ही जाकर बहाल हुआ ।

वजीर के बाद राज्य का सबसे महत्वपर्ण विभाग दीवान-ए-अर्ज अर्थात सैन्य विभाग था । इस विभाग का प्रमुख अरीज-ए-मुमालिक कहलाता था । अरीज सेना का सिपहसालार नहीं होता था, क्योंकि सैन्यबलों की कमान स्वयं सुल्तान सँभालता था । उन दिनों सैन्यबलों की कमान किसी और को सौंपकर कोई शासक तख्त पर बना ही नहीं रह सकता था ।

अरीज के विभाग का मुख्य दायित्व था सेना की भरती करना उसे साज-सामान से लैस करना और सिपाहियों को वेतन बाँटना । सलजूकों के अंतर्गत अरीज का पद महत्वपूर्ण होता था पर भारत में एक अलग विभाग के रूप में इसका जिक्र पहली बार बलबन के काल में ही होता है । बाद में अलाउद्‌दीन खलजी ने उसके कार्यकलाप पर बहुत ध्यान दिया । अलाउद्‌दीन ने सैन्यबलों की एक नियमित सूची रखने पर जोर दिया ।

उसने घोड़ों को दागने की व्यवस्था का भी आरंभ किया, ताकि सैनिक जाँच के लिए घटिया घोड़े न ला सकें । हर सैनिक का एक विवरण रखा जाता था । सेना देश के विभिन्न भागों में तैनात की जाती थी और एक बड़ा दस्ता राजधानी में शासक के पास रहता था ।

शिकार की मुहिमों के बहाने लंबी-लंबी दूरियाँ तय करके बलबन सेना को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखता था । दिल्ली के सभी सुल्तानों में सबसे बड़ी स्थायी सेना अलाउद्‌दीन खलजी के पास थी । बरनी ने उसकी सेना की संख्या तीन लाख बतलाई है जो अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है ।

सैनिकों का पूरा वेतन नकद देनेवाला पहला सुल्तान भी अलाउद्‌दीन ही था । पहले तुर्क सैनिकों को वेतन के बदले दोआब में अनेक गाँव दे दिए जाते थे । ये सैनिक इन आवंटनों को पुश्तैनी समझने लगे और इनमें से बहुत-से तो जब इतने बूढ़े और कमजोर हो जाते थे कि काम नहीं कर सकते थे तब भी अपने पद छोड़ने को तैयार नहीं होते थे ।

बलबन ने इन आवंटनों को वापस लेने का प्रयास किया पर इन सिपाहियों की पैदा की हुई उथल-पुथल के बाद और दिल्ली के कोतवाल की सलाह पर जो उसका पुराना मित्र था उसने अपने आदेश को संशोधित किया । लेकिन अलाउद्‌दीन ने तो कलम के एक झटके से इन आवंटनों को रद्‌द कर दिया । अलाउद्‌दीन जब दकन की विजय में लगा हुआ था तब भी मंगोलों के हमलों को नाकाम कर दिया गया । इसका प्रमुख कारण उसकी सेना की दक्षता थी ।

सुल्तान बड़ी संख्या में हाथी भी रखते थे जिन्हें युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया जाता था । सेना के कूच के समय सड़कें साफ करने और बाधाएँ हटाने के लिए, खंदकें और खदान खोदनेवालों का एक दस्ता भी उससे जुड़ा होता था । घुड़सवार सेना में जिसे सम्मानपूर्ण माना जाता था तुर्को और अफ़गानों की प्रधानता थी । गजनवियों के दौर में हिंदुओं को सवार और पैदल सेना दोनों में भरती किया जाता था । बाद के काल में भी उनको भरती किया जाता रहा, पर अधिकतर पैदल सेना में ।

राज्य के दो अन्य महत्वपूर्ण विभाग दीवान-ए-रिसालत और दीवान-ए-इंशा थे । पहले का संबंध धार्मिक विषयों, धर्मार्थ संस्थाओं तथा सुपात्र विद्वानों और धर्मपरायण व्यक्तियों के गुजारे-भत्तों से था । उसका अध्यक्ष एक मुख्य सद्र होता था जो सामान्यत: कोई प्रमुख काजी होता था ।

वह आम तौर पर मुख्य काजी भी होता था । मुख्य काजी न्याय विभाग का प्रमुख होता था । साम्राज्य के विभिन्न भागों में काजी तैनात किए जाते थे विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी होती थी । काजी लोग मुस्लिम विधान (शरीअत) के आधार पर दीवानी कानून लागू करते थे ।

हिंदुओं पर उनके अपने धार्मिक विधान लागू किए जाते थे; इन्हें गाँवों में पंचायतों द्वारा तथा नगरों में विभिन्न जातियों के मुखियों द्वारा लाग किया जाता था । फौजदारी कानून शासकों द्वारा बनाए गए नियम कायदों पर आधारित होता था ।

दीवान-ए-इंशा का संबंध राजकीय पत्राचार से था । सुल्तान और दूसरे देश के शासकों के बीच तथा सुल्तान और उसके मातहत हाकिमों के बीच चलने वाले सभी औपचारिक और गोपनीय पत्र-व्यवहार यही विभाग सँभालता था ।

इनके अलावा अनेक दूसरे विभाग भी थे । सुल्तान सल्तनत के विभिन्न भागों में वहाँ की घटनाओं की खबर रखने के लिए जासूस तैनात करते थे जिनको बरीद कहते थे । मुख्य बरीद किसी ऐसे कुलीन को ही बनाया जाता था जिसे सुल्तान का पूरा-पूरा विश्वास प्राप्त हो ।

शाही घराने की व्यवस्था राज्य का एक और महत्वपूर्ण विभाग करता था । वह सुल्तान के निजी ऐशो-आराम का तथा शाही घराने की स्त्रियों जिनकी संख्या बहुत बड़ी होती थी की जरूरतों का ध्यान रखता था । वह ‘कारखानों’ की एक बड़ी संख्या की देखभाल भी करता था जिनमें सुल्तान और शाही घराने की आवश्यकता की वस्तुओं को रखा जाता था । कभी कभो ये वस्तुएं राज्य की निगरानी में बनवाई जाती थीं ।

फिरोज तुगलक ने गुलामों का एक अलग विभाग ही बनाया था उनमें से अनेक को इन शाही ‘कारखानों’ में काम दिया जाता था । इन सभी कार्यकलापों के प्रभारी अधिकारी को वकील-ए-दर कहा जाता था । वह दरबार में मुनासिब शिष्टाचार बनाए रखने तथा औपचारिक समारोहों में प्रमुखता के उचित क्रम में कुलीनों को बिठाने के लिए भी जिम्मेदार होता था । फिरोज ने अलग से एक सार्वजनिक निर्माण विभाग भी बना रखा था जिसने नहरों का तथा उसके सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया था ।

स्थानीय प्रशासन:

तुर्कों ने जब देश को जीता तो इसे अनेक भागों में बाँटा, जिनको इक्ता कहते थे । इन्हे प्रमुख तुर्क अमीरों के बीच बाँट दिया जाता था । इनके धारकों को मुक्ति या वली कहते थे । बाद में ये ही भूखंड प्रांत (सूबे) बन गए । कहते हैं कि मुहम्मद तुगलक के काल में 24 सूबे थे जो दक्षिण में माबर (तमिल देश) तक फैले हुए थे ।

आरंभ में मुक्ति लगभग स्वतंत्र होते थे । उनसे अपने भूभाग में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सरकार को देय मालगुजारी वसूल करने की अपेक्षा की जाती थी । वसूली के धन से सैनिकों को वेतन देने के बाद बकाया रकम वह अपने पास रख सकता था । जब केंद्र सरकार की शक्ति और उसके अनुभव में वृद्धि हुई तो वह मुक्तियों पर अधिक नियंत्रण रखने लगी ।

उसने वास्तविक आय का आकलन करने तथा सैनिकों और मुक्तियों का नकद वेतन तय करने की भी कोशिश की । अब मुक्ति से यह आशा की जाने लगी कि वह सारा खर्च निकालने के बाद आय में से बची रकम केंद्र को भेजेगा । खातों की जाँच कुछ-कुछ वर्षो के अंतराल पर की जाती थी । प्राय: इसमें सख्ती बरती जाती थी जिसमें मुक्ती को यातना देना और कैद करना भी शामिल था । सल्तनत काल के अंतिम भाग में फिरोज तुगलक ने ही इन नियमों में ढील दी ।

सूबों के नीचे शिक थे और उनके नीचे पतन । इन इकाइयों के प्रशासन के बारे में हमें कुछ अधिक ज्ञान नहीं है । कहा गया है कि गाँवों को 100 से 84 तक की इकाइयों में समूहबद्ध किया गया था (इन्हें परंपरागत रूप से चौहानी या चौरासी कहते हैं) | इसक आधार परगने रहे होंगे । परगने का प्रमुख आमिल था । गाँव में सबसे प्रमुख व्यक्ति सूत (भूस्वामी) और मुकद्‌दम मुखिया थे ।

हमें पटवारी के बारे मे भी सुनने को मिलता है । गाँव का प्रशासन ठीक-ठीक कैसा था हमें नहीं पता । जब तक देय मालगुजारी मिलती रहती थी गाँव के प्रशासन में संभवत: हस्तक्षेप नहीं किया जाता था । आरंभिक चरण में स्थानीय स्तर के प्रशासन के कार्यकलाप में शायद ही कोई परिवर्तन किया गया हो ।

मालगुजारी पहले के ही ढंग से, कमोबेश उन्हीं, व्यक्तियों द्वारा वसूल की जाती रही । देहातों में तुर्कों की सत्ता की शीघ्र स्थापना के पीछे यह एक बड़ा कारण रहा होगा । जिन परिवर्तनों का उल्लेख हमने किया है वे चौदहवीं सदी के आरंभ में अलाउद्‌दीन खलजी के दौर में आरंभ हुए । उनके कारण टकराव हुए यहाँ तक कि किसान विद्रोह भी हुए ।

Home››Hindi››