Here is an essay on the ‘Azad Hind Army’ for class 6, 7, 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essay on the ‘Azad Hind Army’ especially written for school and college students in Hindi language.

‘भारत छोड़ो’ आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था । लगभग उसी समय भारत की पूर्वी सीमा पर अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए हजारों भारतीय सैनिक तैयार थे । ये सभी सैनिक आजाद हिंद सेना के सदस्य थे । नेताजी सुभाषचंद्र बोस, उनका नेतृत्व कर रहे थे ।

सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में दो बार चुनकर आए थे । उनका मानना था कि इस समय इंग्लैंड द्‌वितीय विश्व युद्ध में उलझा हुआ है । इसका लाभ उठाते हुए भारत में प्रखर आंदोलन किया जाना चाहिए और इसके लिए इंग्लैंड के शत्रुओं से भी सहयोग प्राप्त करना चाहिए परंतु इस विषय पर उनके और राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के बीच मतभेद उत्पन्न हुए ।

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फलस्वरूप सुभाषचंद्र बोस ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और जनता को अपने विचारों से अवगत क्वाने के लिए उन्होंने ‘फारवर्ड ब्लाक’ नामक दल की स्थापना की । सुभाषचंद्र बोस अपने भाषणों द्‌वारा भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने हेतु आह्वान करने लगे । अत: अंग्रेज सरकार ने उन्हें नजरबंद कर दिया ।

वहाँ से वे भेस बदलकर निकल गए और अप्रैल १९४१ को जर्मनी पहुँचे । वहाँ उन्होंने ‘फ्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की । उन्होंने जर्मनी के बर्लिन रेडियो से भारतीय जनता को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सशस्त्र युद्ध में सम्मिलित होने का आह्वान किया । उन्हें जर्मनी से अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं हुआ । उसी समय रासबिहारी बोस ने सुभाषचंद्र बोस से जापान आने का निवेदन किया ।

आजाद हिंद सेना की स्थापना:

रासबिहारी बोस ई॰स॰ १९१५ से जापान में रह रहे थे । उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्रों में रहनेवाले राष्ट्र प्रेमी भारतीयों को संगठित कर ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ नाम का संगठन स्थापित किया था । ई॰स॰ १९४२ के पूर्वार्ध में जापान ने दक्षिण-पूर्व एशिया के उन प्रदेशों को जीत लिया; जो प्रदेश अंग्रेजों के अधिकार में थे । उस समय अंग्रेजी सेना के हजारों भारतीय सैनिक एवं अधिकारी जापान के हाथ लगे थे ।

रासबिहारी बोस ने युद्ध में बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों की एक पलटन कैप्टन मोहन सिंह की सहायता से बनाई । उसे ‘आजाद हिंद सेना’ नाम दिया गया । सुभाषचंद्र बोस से प्रार्थना की गई के वे इस सेना का नेतृत्व करें ।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अक्तूबर १९४३ को सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना की । शाहनवाज खान, जगन्नाथ भोसले, डा॰ लक्ष्मी स्वामीनाथन, गुरुबख्श सिंह ढिल्लों, प्रेमकुमार सहगल आदि उनके प्रमुख सहयोगी थे । कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन ‘झाँसी की रानी’ महिला पलटन की प्रमुख थीं ।

‘तिरंगी झंडा’ आजाद हिंद सेना का चिह्न था और ‘जय हिंद’ संबोधन शब्द था । ‘चलो दिल्ली’ उनका नारा था और ‘कदम-कदम बढ़ाए जा’ उनका समर गीत था । ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ यह आह्वान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीयों से किया ।

आजाद हिंद सेना का पराक्रम:

जापान ने ई॰स॰ १९४३ के अंत में अंदमान और निकोबार द्‌वीप को जीता और उन्हें आजाद हिंद सरकार के अधिकार में कर दिया । नेताजी ने इन द्‌वीपों को क्रमश: ‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ नाम दिए ।

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ई॰स॰ १९४४ में आजाद हिंद सेना ने म्यानमार के आराकान प्रदेश पर अधिकार कर लिया तथा असम की पूर्वी सीमा पर कुछ सैनिकी थानों को भी जीत लिया परंतु जापान द्‌वारा आजाद हिंद सेना को मिलनेवाली रसद बंद हो जाने से इंफाल का अभियान पूर्ण नहीं हो सका । इसी समय अंग्रेजों को अमेरिका की सैनिक सहायता प्राप्त हुई ।

फलस्वरूप अंग्रेजों की सैनिक सामर्थ्य में वृद्धि हो गई परंतु इस प्रतिकूल परिस्थिति में भी आजाद हिंद सेना पूरे संकल्प के साथ संघर्ष करती रही । ई॰स॰ १९४५ में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बम छोड़े ।

परिणामस्वरूप जापान को आत्मसमर्पण करना पड़ा । इसी समय १८ अगस्त १९४५ को हुई विमान दुर्घटना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का निधन हुआ । इस स्थिति में आजाद हिंद सेना को अपने शस्त्र नीचे रखने पड़े । इस प्रकार आजाद हिंद सेना के संघर्ष का युग समाप्त हुआ ।

आजाद हिंद सेना के अधिकारियों पर अभियोग:

अंग्रेज सरकार ने आजाद हिंद सेना के अधिकारियों पर राजद्रोह का आरोप रखा । दिल्ली के लाल किले में सैनिक न्यायालय के सम्मुख उनके मुकदमे की कार्यवाही प्रारंभ हुई । इन अधिकारियों की ओर से बचाव का कार्य पं॰ जवाहरलाल नेहरू, भुलाभाई देसाई, तेजबहादुर सप्रू जैसे निष्णात अधिवक्ताओं ने किया ।

सैनिक न्यायालय ने इन अधिकारियों को दोषी पाया और उन्हें आजीवन कारावास का दंड दिया । भारतीयों के मन में आजाद हिंद सेना के प्रति आत्मीयता और गौरव की भावना थी । अंग्रेज सरकार द्‌वारा इन अधिकारियों को दंडित किए जाने से भारतीय जनता में अंग्रेजों के प्रति प्रखर असंतोष व्याप्त हुआ । परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने सैनिक न्यायालय द्‌वारा दी गई सजाएँ रद्द कर दीं ।

भारतीय नौसैनिकों और वायु सैनिकों का विद्रोह:

आजाद हिंद सेना द्‌वारा प्रेरणा पाकर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध नौसैनिकों और वायु सैनिकों में भी असंतोष निर्मित हुआ । इस असंतोष का विस्फोट १८ फरवरी १९४६ को मुंबई बंदरगाह में खड़ी अंग्रेजी युद्ध नौका ‘तलवार’ पर हुआ ।

सैनिकों ने इस युद्ध नौका पर तिरंगी झंडा फहराया । अंग्रेजी सत्ता के विरोध में नारे लगाए । अंग्रेज सरकार ने इन नौसैनिकों पर सेना भेजकर गोलीबारी की । आंदोलनकारियों ने इसका जवाब गोलीबारी से ही दिया । मुंबई के श्रमिकों और सामान्य लोगों ने नौसैनिकों को समर्थन दिया । अंतत: सरदार वल्लभभाई पटेल ने मध्यस्थता की और नौसैनिकों ने शस्त्र नीचे रखे ।

मुंबई में हुए नौसैनिकों के विद्रोह को समर्थन देने के लिए दिल्ली, लाहौर, कराची, अंबाला, मेरठ आदि स्थानों पर वायु सेना के अधिकारियों ने हड़ताल घोषित की । ये विद्रोह इस बात के संकेत थे कि अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध लोगों का असंतोष चरम सीमा तक पहुँच गया है । इस तरह ई॰स॰ १९४२ से ई॰स॰ १९४६ के बीच के कालखंड में भारत में अंग्रेजी सत्ता की नींव चरमरा गई । भारत छोड़ो आंदोलन द्‌वारा अंग्रेजों के प्रति भारतीय जनता का तीव्र विरोध व्यक्त हुआ ।

सेना, नौसेना और वायु सेना ये अंग्रेजी सत्ता के आधार स्तंभ थे । अब वे भी अंग्रेजों के विरोधी बनने लगे थे । इन सभी घटनाओं के कारण अंग्रेजों को बोध होने लगा कि भारत में उनकी सत्ता अधिक समय तक दृढ़ नही रह सकेगी ।

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