हवाओं का वर्गीकरण | Classification of Winds in Hindi.

पृथ्वी पर चलने वाली पवनों को निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

(1) स्थाई पवनें (Permanent Winds),

(2) सामयिक पवनें (Periodic Winds),

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(3) स्थानीय पवनें (Local Winds) तथा चक्रवाती पवनें (Cyclones) ।

(1) स्थाई पवनें (Permanent Winds):

इस वर्ग में व्यापारिक, प्रतिव्यापारिक तथा ध्रुवीय पवनें आती हैं ।

(क) व्यापारिक पवनें (Trade Winds):

उपोष्ण अक्षाशों पर विकसित उच्च वायु दाब की पेटी से जो पवनें विषुवत रेखा की डोलड्रम (Doldrum) की पेटी की ओर चलती हैं, को व्यापरिक पवनें कहते हैं । ये पवनें अधिक नियमितता के साथ महासागरों पर चलती हैं जहाँ इनके रास्ते में कोई रुकावट नहीं होती । सागर पर इनकी गति दस किलोमीटर प्रति घंटे से लेकर पन्द्रह किलोमीटर प्रति घंटा के आस-पास रहती है (Fig. 3.20) ।

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अश्व अक्षांश (Horse Latitudes):

उपोष्ण अक्षांशों में एक उच्च भार की पेटी विकसित होती है । इन अक्षांशों में पवन ऊपर से धरातल की ओर उतरती है, जिसके कारण इन आक्षांशों में वायुमण्डल शान्त रहते हैं । इन परिस्थतियों में घोड़ों के व्यापारी अपने घोड़ों को रस्से से बाँध कर सागर में छोड़ देते थे ताकि जहाजों का भार हल्का हो जाये । इस कारण इनको अश्व अक्षांश कहते हैं ।

(ख) प्रतिचक्रवाती पवनें अथवा पछुआ पवनें (Anti Trade Winds):

उपोष्ण उच्च वायु दाब से पवनें 60° अक्षांश पर विकसित कम वायु दाब की ओर चलती हैं । इनकी दिशा व्यापारिक पवनों के विपरीत होती है । यह उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिण पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर चलती हैं तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर चलती हैं (Fig. 3.20) । दक्षिणी गोलार्द्ध में इनका वेग अधिक होता है, जहाँ इनको गरजता चालीसा (Roaring Forties) कहते हैं ।

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(ग) ध्रुवीय पवनें (Polar Winds):

ध्रुवीय पवनें ध्रुवीय क्षेत्रों में 60° से 90° अक्षांशों के बीच चलती हैं । ध्रुवों पर अत्यधिक शीत के कारण उच्च वायु दाब साल भर बना रहता है जहाँ से शीतोष्ण कटिबंधीय निम्न दाब की ओर हवायें चलने लगती हैं । उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर चलती है ।

(2) सामयिक पवनें अथवा मानसून पवनें (Periodic or Monsoon Winds):

मानसून एक अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ मौसम होता है । जलवायु विज्ञान में मानसून उन पवनों को कहते हैं, जो हर एक छह महीने के पश्चात अपनी दिशा में पूर्ण परिवर्तन कर लेती हैं । मानसून पवनें छह महीने सागर से थल की ओर तथा छह महीने थल से सागर की ओर चलती हैं ।

पृथ्वी पर मानसूनी पवनें सबसे अधिक नियमिता के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा हिन्द महासागर में चलती हैं । मानसून पवनों की उत्पत्ति के संम्बंध में सबसे पहले हेली ने 1686 ई. में प्रस्तुत किया था । उनके अनुसार मानसून को उत्पत्ति का मुख्य कारण थल एवं जल का तापान्तर है ।

दूसरे शब्दों में एक ही अक्षांश पर थल तथा जल (सागर) के तापमान में भारी अन्तर होता है । इस तापमान की विविधता से कम वायु दाब तथा अधिक वायु दाब उत्पन्न हो जाता है । फलस्वरूप पवन अधिक दाब से कम वायु दाब की ओर चलती हैं ।

इस प्रकार मानसून बड़े पैमाने पर जल समीर तथा थल समीर हैं । गर्मी के मौसम में उत्तरी भारत में पंजाब से पेशावर तक एक कम वायु दाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है और इसी प्रकार साइबेरिया में बैकाल झील के निकट भी एक कम वायु दाब का क्षेत्र विकसित होता है ।

ऐसी परिस्थिति में सागर से थल की ओर पवन चलनें लगती हैं, जिनको ग्रीष्म ऋतु का मानसून कहते हैं । शीतकाल में दूसरे विपरीत थल पर उच्च वायु दाब तथा जल पर कम वायु दाब विकसित होता है, जिसके फलस्वरूप पवन थल से सागर की ओर चलने लगती है, जिसको शीत ऋतु अर्थात उत्तर-पूर्वी मानसून कहते हैं ।

गतिज अवधारणा (Dynamic Concept):

मानसून की उत्पत्ति के सम्बन्ध में यह अवधारणा फ्लोहन (Flohan) ने 1951 में प्रतिपादित की थी । इस अवधारणा के अनुसार वायु दाब एवं व्यापारिक पवन पेटियों के मौसम के साथ खिसकने के कारण मानसून की उत्पत्ति होती है ।

उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनों जो भू-मध्य रेखा के समीप हैं, अभिसरण के कारण अन्त : उष्णकटिबंधीय अभिसरण बनता है । इस ITCZ (अन्त: उष्णकटिबंधीय अभिसरण) की उत्तरी एवं दक्षिणी सीमाएं NITCZ (North Inter Tropical Convergence Zone) एवं SITCZ कहलाती हैं । इसके बीच डोलड्रम की पेटी है ।

21 जून को जब सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा पर पड़ती हैं तब NITCZ 30° उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत हो जाता है, जिसका दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशिया के क्षेत्र तक प्रभाव रहता है एवं उच्च तापीय भूमध्य रेखा उत्तरी भारत के मैदान पर स्थापित हो जाती है । इस समय हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग से भी व्यापारिक पवनें विषुवत को पार करके उत्तरी गोलार्द्ध में प्रवेश करती हैं । विषुवत रेखा को पार करने पर यह व्यापारिक पवनें उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती हैं जिसको दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहते हैं ।

संक्षेप में, फ्लोहन के अनुसार एशिया में मानसून का अस्तित्व स्थल एवं जल के तापक्रम के अन्तर के कारण नहीं है वरन् ताप के कारण उत्पन्न व्यापारिक पवनें एवं वायु दाब की पेटियों के वार्षिक स्थानान्तरण के कारण है ।

फ्लोहन ने ऊपरी वायुमण्डल के परिसंचरण जो एशिया के मानसून का एक जटिल तन्त्र बनाता है पर विचार नहीं किया । अत: इस गतिज विचारधारा को भी पूर्णतया मानसून की उत्पत्ति की अवधारणा नहीं माना जा सकता । द्वितीय महायुद्ध के पश्चात मौसम सम्बंधी आँकड़ों की बाढ़ आ गई । मानसून उत्पत्ति के सम्बंध में नई अवधारणाओं का परिपादन किया गया ।

इन अवधारणा में वायुमण्डलीय परिसंचरण तिब्बत का पठार जेट प्रवाह एवं भारतीय उप महाद्वीपीय व समीप के क्षेत्रों में अल-नीनो (Al-Nino) के प्रवाह से मानसून की उत्पत्ति बताई गई हैं ।

इन विद्वानों के अनुसार मानसून की उत्पत्ति निम्न बातों से सम्बंधित है:

(i) हिमालय एवं तिब्बत का पठार एक भौतिक बाधा एवं ताप स्रोत के उच्च स्तर के रूप में ।

(ii) क्षोभमण्डल में ऊपरी जेट वायु प्रवाह का परिसंचरण ।

(iii) एशिया के विस्तृत स्थल एवं हिन्द महासागर व प्रशान्त महासागर के क्षेत्रों के तापन एवं शीतलन की विभिन्नता ।

(iv) दक्षिणी प्रशान्त एवं हिन्द महासागर में अल-नीनों की मौजूदगी ।

मानसूनी जलवायु की विशेषताएं:

मानसूनी जलवायु की विशिष्ट विशेषताएं भारतीय उप-महाद्वीप में पाई जाती हैं ।

भारत में एक वर्ष को निम्न ऋतुओं में विभाजित किया जा सकता है:

(i) उत्तरी-पूर्वी मानसून का मौसम:

(क) शीत ऋतु (जनवरी-फरवरी) तथा;

(ख) गर्मी का मौसम (मार्च से मई) ।

(ii) दक्षिणी-पश्चिमी मानसून का मौसम:

(क) वर्षा ऋतु जून से सितम्बर,

(ख) मानसून वापसी का मौसम (अक्टूबर से दिसम्बर)

(3) स्थानीय पवनें (Local Winds):

स्थानीय पवनें किसी विशेष क्षेत्र में चलती हैं । इनकी उत्पत्ति स्थानीय वायु दाब की विविधता, आर्द्रता तथा तापमान के कारण होती है । कहीं-कहीं इनकी उत्पत्ति भौतिक अवरोधों (पर्वत इत्यादि) के कारण भी होती है  ।

स्थानीय पवनों की संख्या बहुत अधिक है । फिर भी उनमें से कुछ मौसम विज्ञान के लिये अत्यंत रुचिकर हैं, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप से समाज को प्रभावित करती हैं ।

कुछ प्रमुख स्थानीय पवनों का संक्षिप्त वर्णन निम्न में दिया गया है:

 

(i) जल समीर (Sea Breeze):

दिन के समय सागर की तुलना में तटीय धरातल का तापमान अधिक हो जाता है । परिणामस्वरूप थल पर कम वायु दाब तथा सागर पर अधिक वायु दाब उत्पन्न हो जाता है, ऐसी परिस्थिति मैं सागर से थल की ओर पवन चलने लगती है, जिसको जल समीर कहते हैं  ।

(ii) स्थलीय समीर (Land Breeze):

सूर्य अस्त होने के पश्चात विकिरण के कारण धरातल सागर की तुलना में ठंडा हो जाता है । इस प्रकार स्थल अधिक वायु दाब तथा सागर पर कम वायु दाब उत्पन्न हो जाता है । परिणामस्वरूप आधी रात के पश्चात पवन स्थल से सागर की ओर चलने लगती है जिसको थल समीर कहते हैं ।

जल समीर तथा स्थल समीर का सागर के तट पर रहने वाले मछुआरों के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ता है । आधी रात के पश्चात जब स्थल से सागर की ओर पवन चलती है तो मछुआरे मछली के लिये सागर की ओर प्रस्थान करते हैं और दिन के लगभग 12 बजे जब सागर से थल की ओर पवन चलती है तो यह अपना कार्य समाप्त करके घरों को लौटते हैं ।

जल समीर का श्रमिकों की कार्यक्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है । एक सर्वेक्षण के अनुसार सागरीय तटों पर मजदूरों की कार्यक्षमता जल समीर आने के पश्चात बढ़ जाती है । तटों पर पाये जाने वाले नारियल के बगीचों पर भी जल समीर का अनुकूल प्रभाव पड़ता हैं ।

(iii) पर्वत तथा घाटी समीर (Mountain and Valley Breezes):

पर्वत तथा घाटी समीर भी स्थानीय पवनें हैं, जो प्रत्येक 12 घंटे के पश्चात अपनी दिशा में पूर्ण परिवर्तन कर लेती हैं । रात के समय पर्वतीय घाटियों के निचले भाग में अधिक तापमान के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठती है तथा उसके स्थान पर ढलान के सहारे पवन शिखर से घाटी की ओर चलने लगती है ।

दिन के समय इसके विपरीत वायु दाब की परिस्थिति उत्पन्न होती है । शिखर पर कम वायु दाब तथा घाटी में अधिक वायु दाब उत्पन्न हो जाता है । परिणामस्वरूप दिन के समय घाटी से शिखर की ओर हवा चलती है, जिसको घाटी समीर कहते हैं  ।

(iv) चिनूक तथा फोहन (Chinook and Foehn):

चिनूक शब्द रेड-इण्डियन की भाषा का है, जिसका अर्थ बर्फ पिघलाने वाली पवन से है । चिनूक पवन रॉकी पर्वत के पूर्वी ढलानों पर चलती है । इसके चलने का समय दिसम्बर से मार्च के महीने हैं । पर्वत के पूर्वी ढलान पर उतरती पवन का तापमान बढ़ता जाता है । कभी-कभी तापमान में तीव्र गति से वृद्धि हो जाती है ।

शून्य से ऊपर तापमान के कारण धरती पर पड़ी बर्फ पिघल जाती है, बर्फ के नीचे से चारागाह निकल आते हैं, जिसके कारण मानव समाज को राहत तथा पशुओं को चारागाहों में घास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाती है  ।

आल्पस पर्वत से जर्मनी में उतरने वाली पवनों को फोहन कहते हैं । इनकी विशेषतायें भी चिनूक पवनों से मिलती हैं जो दक्षिणी जर्मनी की बर्फ को पिघलाने में सहायक होती हैं । इन गर्म पवनों से एक दिन में 15 सेन्टीमीटर बर्फ की परत पिघल जाती है ।

कुछ अन्य प्रमुख स्थानीय पवनों की मुख्य विशेषतायें नीचे  दिये गए हैं:

1. बोरा (Bora) – उत्तरी-पूर्वी दिशा से चलने वाली ठंडी तैज गति से चलने वाली स्थानीय पवन । शीत काल में लगभग 36 दिन चलती है । कभी-कभी इसकी गति 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो जाती है ।

2. चिनूक – गर्म स्थानीय पवन, जिसके तापमान में अकस्मात 10 से 20 तक वृद्धि हो जाती है । इनकी सापेक्षिक आर्द्रता केवल 10% तक रह जाती है । इनके चलने पर बर्फ की परतें तेजी से पिघल जाती हैं ।

3. इटेजियन – सर्द-शुष्क पवन जो ग्रीष्म काल तथा पतझड़ के मौसम में चलती है ।

4. फोहन (Foehn) – इनकी तुलना चिनूक पवन से की जाती है । सामान्यतः शीत ऋतु के अन्त तथा बसंत ऋतु में चलती हैं ।

5. हबूब (अरबी भाषा का शब्द) – ऊष्ण-आर्द्र स्थानीय पवन । एक वर्ष में लगभग 24 दिन चलती है ।

6. हर्मटन (Harmattan) – ऊष्ण-शुष्क स्थानीय पवन जिनमें धूल की मात्रा अधिक होती है । इसकी वजह से पूर्वी अफ्रीका देशों की अधिक आर्द्राता को यह पवन सोख लेती है, जिसके कारण मौसम सुझावना हो जाता हैं । इस पवन की इस विशेषता के कारण इसको डॉक्टर पवन भी कहते है ।

7. खमसिन (Khamsin) – ऊष्ण-शुष्क स्थानीय पवन जो लगभग 50 दिन ग्रीष्म काल में चलती है । कभी-कभी खमसीन पवन का तापमान 40 से लेकर 50 तक हो जाता है । लीबिया में चलने वाली गिबली (Gibli), स्पेन की लवेचे (Leveche) तथा सिरोक्को (Sirocco) भी इसी प्रकार की स्थानीय पवनें हैं ।

8. लेवाण्टर (Levanter) – जब्राल्टर तथा दक्षिण स्पेन में चलने वाली स्थानीय पवन । यह पवन सर्द ऋतु के आरम्भ में चलती है । तेज गति से चलने वाली इस ठंडी पवन के चलने पर कोहरा भी पड़ता है ।

9. मिस्ट्राल (Mistral) – शीतकाल में उत्तर से दक्षिण को चलने वाली मिस्ट्राल की गति कभी 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो जाती है । इसके आने पर कभी-कभी घना कोहरा पड़ता है ।

10. नॉर्थर (Norther) – शीलकाल में उत्तर से दक्षिण की ओर चलने वाली ठंडी पवन, जिससे तापमान में भारी गिरावट आती है ।

11. पेम्परो (Pemparo) – इसकी तुलना उत्तरी गोलार्द्ध की नोरदर से की जाती । यह ठंडी पवन तापमान में भारी गिरावट लाती है ।

12. जोंडा (Zonda) – गर्म-शुष्क स्थानीय पवन जो अर्जेन्टीना तथा उरुग्वे के पम्पाज घास के मैदानों में ग्रीष्म ऋतु में चलती है, जिनसे घास के मैदानों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, चारागाह सूख जाते हैं तथा चारे का अभाव होता है ।

चक्रवाती पवनें (Cyclonic Winds):

चक्रवाती पवनें निरन्तर अपनी दिशा में परिवर्तन करती रहती हैं, इसलिये इनको चक्रवाती पवनें भी कहते हैं ।

चक्रवाती पवनों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

(1) चक्रवात, तथा;

(2) प्रतिचक्रवात ।

(1) चक्रवात (Cyclones):

सामान्यत: चक्रवात कम वायु दाब के क्षेत्र को कहते हैं । इस कम वायु दाब के चारों ओर अधिक वायु भारी होता है । अधिक वायु दाब से कम वायु दाब की ओर पवन चलती है । उत्तरी गोलार्द्ध में चक्रवात में पवन की दिशा घड़ी की सुइयों के विपरीत होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में पवनों की दिशा घड़ी की सुइयों के अनुकूल होती है ।

चक्रवातों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

(i) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात ।

(ii) उष्णकटिबंधीय चक्रवात ।

2. प्रतिचक्रवात (Anticyclone):

प्रतिचक्रवात के केन्द्र में अधिक वायु दाब होता है और केन्द्र से बाहर की ओर पवन प्रवाहित होती है । उत्तरी गोलार्द्ध में पवन की दिशा घड़ी की सुइयों के अनुकूल होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध वायु की दिशा घड़ी की सुइयों के विपरीत होती है  । प्रतिचक्रवात (Anticyclone) शब्दावली का उपयोग सब से पहले एफ. गैल्टन हैं, (F. Galton) ने 1861 में किया था ।

 

अवरोधी चक्रवात (Blocking Anti-Cyclone):

इस प्रकार के प्रतिचक्रवात क्षोभ मण्डल (Troposphere) के ऊपरी भाग में विकसित होते है । इनकी उत्पत्ति का मुख्य कारण वायु संचार में रुकावट या अवरोध होता है । इनका आकार छोटा होता है तथा मन्द गति से चलते हैं । यह उत्तरी अटलान्टिक तथा उत्तरी प्रशान्त महासागर में विकसित होते है । अभी तक इनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी शोध कार्य जारी है आशा है इनके बारे में नये तथ्य जल्द सामने आयेंगे।

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